सूक्तिसुधा | Class 12 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

सूक्तिसुधा – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सूक्तिसुधा from Class 12 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
इस खंड में सूक्तिसुधा के कठिन शब्दों के अर्थ और उनके व्याकरणिक रूपों की विस्तृत व्याख्या दी गई है। जैसे 'नीरजराजितम्' का अर्थ है कमलों से सुशोभित, 'मरालस्य' का अर्थ है हंस का, 'मानस' का अर्थ है मन या मानसरोवर। 'तनुषे' शब्द 'तन्' और 'आत्मने' से बना है, जिसका अर्थ है विस्तार करना। 'विरसान्' का अर्थ है रसरहित या शुष्क। 'यापय' का अर्थ है व्यतीत करना या व्यतीत करो। 'निवसन्' का अर्थ है वास करना या निवास करते हुए। 'रसालः' का अर्थ है आम्रपादपः अर्थात आम के पेड़। 'दैष्टिकतां' का अर्थ है भाग्यत्व। 'निषीदति' का अर्थ है आश्रय लेना। 'कुर्वाणः' का अर्थ है करते हुए। 'सौख्यैः' का अर्थ है सुखों के द्वारा। 'अपोहति' का अर्थ है दूर करना। 'विद्धीत' का अर्थ है करो। 'वृणते' का अर्थ है वरण करना। 'विमृश्यकारिणम्' का अर्थ है विचार कर कार्य करने वाला।
यह शब्दार्थ छात्रों को श्लोकों को समझने में सहायता करते हैं और संस्कृत भाषा के व्याकरणिक नियमों को भी स्पष्ट करते हैं। साथ ही, यहाँ विभिन्न शब्दों के समास, उपसर्ग, प्रत्यय आदि की व्याख्या भी की गई है जो भाषा की गहराई को समझने में सहायक है।
📊 Diagram: Table on page 3 (19×3)
🔗 Connection: यह खंड अभ्यास और प्रश्नोत्तर की ओर मार्गदर्शन करता है।
Table on page 3 (19×3)
| नीरजराजितम् | कमलशोभितम् | कमलों से सुशोभित |
|---|---|---|
| मरालस्य | हंसस्य | हंस का |
| मानसम् | मनः मानसरोवरं च | मन एवं मानसरोवर |
| तनुषे (तन् + आत्मनेः | विस्तारयसि | विस्तृत कर रहे हो |
| लट्, मध्यम पुरुष एकवचन) | ||
| विरसान् | रसरहितान् | रसरहित (शुष्क) |
| यापय | व्यतीतं कुरु | व्यतीत करो |
| निवसन् (नि + वस् + शत्) | वास कुर्वन् | निवास करते हुए |
| रसालः | आम्रपादपः | आम का वृक्ष |
| दैष्टिकतां | भाग्यत्वं | भाग्यत्व को |
| निषीदति | अवलम्बते | आश्रय लेता है। |
| कुर्वाणः (कृ + शानच्) | कुर्वन् | करते हुए |
| सौख्यैः | सुखपूर्वकैः | सुखों के द्वारा |
| अपोहति | दूरीकरोति | दूर करता है। |
| विद्धीत | कुर्वीत | करो |
| (वि उपसर्ग + दुधाज् (धा) विधिलिङ्, प्रथम पुरुष एकवचन) | ||
| वृणते | वरणं कुर्वन्ति | वरण करती हैं। |
| विमृश्यकारिणम् | विचिन्त्यकारिणम् | विचारकर कार्य करने वाले को |
| स्वायत्तम् | निजाधीनं | स्वयं के अधीन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संस्कृतभाषया प्रश्नोत्तराणि लिखत । (क) सर्वत्र कौद्दशं नीरम् अस्ति? (ख) मरालस्य मानसं कं विना न रमते। (ग) विद्वान् कम् अपेक्षते? (घ) सत्कवि: कौ द्वौ अपेक्षते? (ङ) य: यस्य प्रिय: स: तस्य कृते किं भवति? (च) सहसा किं न विद्धीत? (छ) विधात्रा किं विनिर्मितम्? (ज) अपण्डितानां विभूषणं किम्? (झ) महात्मनां प्रकृतिसिद्धं किं भवति? (ञ) पापात् क: निवारयति? (ट) सन्त: कान् पर्वतीकुर्वन्ति? (ठ) कौद्दशं भूषणं न क्षीयते? (ड) कृपखननं कदा न उचितम्?
1. संस्कृतभाषया प्रश्नोत्तराणि निम्नलिखितानुसारं लिखिताः सन्ति: (क) सर्वत्र कौद्दशं नीरम् अस्ति? — न, सर्वत्र कौद्दशं नीरम् नास्ति। (ख) मरालस्य मानसं कं विना न रमते। — मरालस्य मानसं विना न रमते। (ग) विद्वान् कम् अपेक्षते? — विद्वान् सत्कविम् अपेक्षते। (घ) सत्कवि: कौ द्वौ अपेक्षते? — सत्कवि: विद्वान् च अपेक्षते। (ङ) य: यस्य प्रिय: स: तस्य कृते किं भवति? — य: यस्य प्रिय: स: तस्य कृते हितं करोति। (च) सहसा किं न विद्धीत? — सहसा किञ्च न विद्धीत। (छ) विधात्रा किं विनिर्मितम्? — विधात्रा जगत् विनिर्मित
2. अधोलिखितपद्यांशानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या विधेया । (क) वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेव सम्पद:। (ख) क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्। (ग) प्रोद्दीप्ते भवने च कृपखननं प्रत्युद्यम: कौद्दश:।
2. अधोलिखितपद्यांशानां हिन्दीभाषया व्याख्या: (क) वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धा: स्वयमेव सम्पद:। अर्थ: जो गुणों की खोज करता है और उन्हें समझता है, वह स्वयमेव सम्पदा (धन) प्राप्त करता है। व्याख्या: यहाँ कहा गया है कि जो व्यक्ति गुणों को समझने वाला और उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होता है, वह स्वयं ही धन-संपदा को प्राप्त कर लेता है।
(ख) क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्। अर्थ: वस्तुतः आभूषण क्षीण होते हैं, परन्तु वाक्-भूषण (अर्थात् वाक्पटुता, ज्ञान) सदैव स्थायी होता है। व्याख्या
3. रिक्तस्थानपूर्ति: करणीया । (क) सत्कविरिव विद्वान् शब्दार्थो ... अपेक्षते। (ख) सन्त: ... प्रवदन्ति।
3. रिक्तस्थानपूर्ति: (क) सत्कविरिव विद्वान् शब्दार्थो 'कौद्दश:' अपेक्षते। (ख) सन्त: 'सत्कवयः' प्रवदन्ति।
4. निम्नलिखितश्लोकयोः अन्वयं लिखत । यथा- यद्यपि नीरज-राजितं नीरं सर्वत्र अस्ति। (परं) मरालस्य मानसं मानसं विना न रमते। (क) नीरक्षीरविवेके ……………… । (ख) विपदि धैर्यमथाभ्युदये ……………… ।
4. निम्नलिखित श्लोकों का अन्वय: (क) नीरक्षीरविवेके नीरं सर्वत्र अस्ति। (ख) विपदि धैर्यमथाभ्युदये महात्मनाम्।
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