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कर्मगौरवम् | Class 12 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 2 मिनट का पठन

कर्मगौरवम् | Class 12 Sanskrit Notes

कर्मगौरवम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of कर्मगौरवम् from Class 12 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय एवं महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें कुल 700 श्लोक हैं जो 18 अध्यायों में विभाजित हैं। यह ग्रन्थ ज्ञान, भक्ति और कर्म योग का समन्वय प्रस्तुत करता है। युद्धभूमि में अर्जुन के विषाद को दूर करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने उसे धर्म और कर्तव्य का उपदेश दिया। गीता का संदेश है कि मनुष्य को अपने कर्मों में निपुण होकर, फल की चिंता किए बिना, निःसंग भाव से कर्म करना चाहिए। गीता ने भारतीय दर्शन, धर्म और जीवन दर्शन को गहराई से प्रभावित किया है। महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे महान विभूतियों ने गीता से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को दिशा दी। गीता का ज्ञान आज भी जीवन के हर क्षेत्र में प्रासंगिक है।

🧪 Activity: गीता के प्रमुख श्लोकों का अध्ययन और उनके जीवन में महत्व पर चर्चा।

🔗 Connection: अगले भाग में कर्मयोग और संयास के बीच के संबंध का विवेचन किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. संस्कृतभाषया उत्तरत । (क) अयं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलित:? (ख) अकर्मणः किं ज्याय:? (ग) जनकादयः केन सिद्धिम् आस्थिता:? (घ) लोकः कम् अनुवर्तते? (ङ) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे के जहाति? (च) केषाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्य प्राप्नोति? (छ) कः संयासी कथ्यते? (ज) लोक संग्रहं चिकीर्षुं विद्वान् किं कुर्यात्? (झ) जनः किं कृत्वापि न निबध्यते?

1.(क) अयं पाठः भगवद्गीता इति ग्रन्थात् सङ्कलितः। (ख) अकर्मणः कर्मे ज्यायः, अर्थात् निष्क्रियता (अकर्म) कर्मेण अपेक्षया अधिकं हानिकारकं भवति। (ग) जनकादयः कर्मणा एव सिद्धिम् आस्थिता:। (घ) लोकः यत्कृतं तदनुवर्तते। (ङ) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे पापं जहाति। (च) केषाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्यं प्राप्नोति, तेषु यः पुरुषः कर्मारम्भं न करोति। (छ) संयासी कः कथ्यते? यः पुरुषः कर्म त्यजति सः संयासी कथ्यते। (ज) लोकसंग्रहं चिकीर्षुं विद्वान् धर्मं, अर्थं, कामं, मोक्षं च साधयेत्। (झ) जनः किं कृत्वापि न

2. नियतं कुरु कर्म त्वं ... प्रसिद्ध्येदकर्मणः अस्य श्लोकस्य भावार्थं कुरुत ।

भावार्थः - त्वं निश्चितं कर्म करो, निष्क्रियता (अकर्म) से प्रसिद्धि नहीं मिलती। अर्थात् कर्म करना आवश्यक है, अकर्मण्यता से कोई लाभ नहीं होता।

3. ‘यद्यदाचरति ... लोकस्तदनुवर्तते’ अस्य श्लोकस्य अन्वयं लिखत ।

अन्वयः - यद्यद् आचरति जनः, लोकः तदनुवर्तते। अर्थात् जो जैसा कर्म करता है, लोग वैसा ही अनुसरण करते हैं।

4. अधोलिखितानां शब्दानां विलोमान् पाठात् चित्वा लिखत । यथा- वशः - अवशः (क) बुद्धिहीनः - ……………… (ख) दुष्कृतम् - ……………… (ग) अकौशलम् - ……………… (घ) न्यूनः - ……………… (ङ) कर्मणः - ……………… (च) दुर्गुणैः - ……………… (छ) कदाचित् - ……………… (ज) निकृष्टः - ……………… (झ) लाभः - ……………… (ड) सक्तः - …………………… (ट) सक्रियः - …………………… (ठ) असन्तुष्ट - ……………………

(क) बुद्धिहीनः - बुद्धिसम्पन्नः (ख) दुष्कृतम् - सुक्रियतम् (ग) अकौशलम् - कौशलम् (घ) न्यूनः - अधिकः (ङ) कर्मणः - अकर्मणः (च) दुर्गुणैः - सुगुणैः (छ) कदाचित् - न कदाचित् (ज) निकृष्टः - उत्कृष्टः (झ) लाभः - हानिः (ड) सक्तः - अकृत्स्नः (ट) सक्रियः - निष्क्रियः (ठ) असन्तुष्ट - संतुष्ट

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