कर्मगौरवम् | Class 12 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

कर्मगौरवम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of कर्मगौरवम् from Class 12 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
श्लोकानां विस्तृतार्थः एवं शब्दार्थाः
पाठ में प्रस्तुत प्रत्येक श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं शब्दार्थ समझना आवश्यक है। उदाहरणतः प्रथम श्लोक 'बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते' में 'बुद्धियुक्त:' का अर्थ है बुद्धिमान व्यक्ति, 'जहाति' का अर्थ है त्याग देता है, 'सुकृतदुष्कृते' का अर्थ है पुण्य और पाप दोनों। दूसरे श्लोक में 'नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:' का अर्थ है कि नियत रूप से कर्म करो क्योंकि कर्म करना अकर्म (कर्म न करने) से श्रेष्ठ है। इस प्रकार प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक विश्लेषण (विग्रह) और उसके अर्थ को समझना श्लोकों की गहन समझ के लिए आवश्यक है। शब्दार्थ में धातु रूप, समास, विभक्ति आदि का विवेचन किया गया है जिससे छात्र संस्कृत भाषा के व्याकरणिक नियमों को भी समझ सकें। इस भाग में श्लोकों के भावार्थ के साथ-साथ शब्दों के व्याकरणिक रूपों की भी व्याख्या की गई है।
🧪 Activity: श्लोकों के शब्दार्थ और व्याकरणिक रूपों का अभ्यास।
🔗 Connection: अगले भाग में अभ्यास प्रश्न एवं व्याकरणिक विश्लेषण से जुड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संस्कृतभाषया उत्तरत । (क) अयं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलित:? (ख) अकर्मणः किं ज्याय:? (ग) जनकादयः केन सिद्धिम् आस्थिता:? (घ) लोकः कम् अनुवर्तते? (ङ) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे के जहाति? (च) केषाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्य प्राप्नोति? (छ) कः संयासी कथ्यते? (ज) लोक संग्रहं चिकीर्षुं विद्वान् किं कुर्यात्? (झ) जनः किं कृत्वापि न निबध्यते?
1.(क) अयं पाठः भगवद्गीता इति ग्रन्थात् सङ्कलितः। (ख) अकर्मणः कर्मे ज्यायः, अर्थात् निष्क्रियता (अकर्म) कर्मेण अपेक्षया अधिकं हानिकारकं भवति। (ग) जनकादयः कर्मणा एव सिद्धिम् आस्थिता:। (घ) लोकः यत्कृतं तदनुवर्तते। (ङ) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे पापं जहाति। (च) केषाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्यं प्राप्नोति, तेषु यः पुरुषः कर्मारम्भं न करोति। (छ) संयासी कः कथ्यते? यः पुरुषः कर्म त्यजति सः संयासी कथ्यते। (ज) लोकसंग्रहं चिकीर्षुं विद्वान् धर्मं, अर्थं, कामं, मोक्षं च साधयेत्। (झ) जनः किं कृत्वापि न
2. नियतं कुरु कर्म त्वं ... प्रसिद्ध्येदकर्मणः अस्य श्लोकस्य भावार्थं कुरुत ।
भावार्थः - त्वं निश्चितं कर्म करो, निष्क्रियता (अकर्म) से प्रसिद्धि नहीं मिलती। अर्थात् कर्म करना आवश्यक है, अकर्मण्यता से कोई लाभ नहीं होता।
3. ‘यद्यदाचरति ... लोकस्तदनुवर्तते’ अस्य श्लोकस्य अन्वयं लिखत ।
अन्वयः - यद्यद् आचरति जनः, लोकः तदनुवर्तते। अर्थात् जो जैसा कर्म करता है, लोग वैसा ही अनुसरण करते हैं।
4. अधोलिखितानां शब्दानां विलोमान् पाठात् चित्वा लिखत । यथा- वशः - अवशः (क) बुद्धिहीनः - ……………… (ख) दुष्कृतम् - ……………… (ग) अकौशलम् - ……………… (घ) न्यूनः - ……………… (ङ) कर्मणः - ……………… (च) दुर्गुणैः - ……………… (छ) कदाचित् - ……………… (ज) निकृष्टः - ……………… (झ) लाभः - ……………… (ड) सक्तः - …………………… (ट) सक्रियः - …………………… (ठ) असन्तुष्ट - ……………………
(क) बुद्धिहीनः - बुद्धिसम्पन्नः (ख) दुष्कृतम् - सुक्रियतम् (ग) अकौशलम् - कौशलम् (घ) न्यूनः - अधिकः (ङ) कर्मणः - अकर्मणः (च) दुर्गुणैः - सुगुणैः (छ) कदाचित् - न कदाचित् (ज) निकृष्टः - उत्कृष्टः (झ) लाभः - हानिः (ड) सक्तः - अकृत्स्नः (ट) सक्रियः - निष्क्रियः (ठ) असन्तुष्ट - संतुष्ट
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