रघुकौत्ससंवाद | Class 12 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

रघुकौत्ससंवाद – this guide gives you a concise, exam-ready overview of रघुकौत्ससंवाद from Class 12 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
रघुकौलसंवाद परिचय
यह पाठ महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'रघुवंश' के प्रथम सर्ग से लिया गया है। इसमें महाराज रघु और उनके गुरु वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स के बीच साकेत नगरी में हुआ संवाद वर्णित है। कौत्स ने वेद, पुराण, वेदांग, दर्शन आदि 14 विद्याओं का अध्ययन पूर्ण कर गुरुदक्षिणा देने की इच्छा प्रकट की। गुरु वरतन्तु ने गुरुभक्ति को ही गुरुदक्षिणा मानने की शिक्षा दी, पर कौत्स की बार-बार प्रार्थना से वे क्रोधित होकर 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने का आदेश देते हैं। धन प्राप्ति के लिए कौत्स महाराज रघु के पास जाते हैं, जो विश्वविजित नामक यज्ञ में सम्पूर्ण धन दान कर चुके थे। रघु धनपति कुबेर पर आक्रमण की योजना बनाते हैं, जिससे कुबेर भयभीत होकर रघु के कोषागार में सुवर्ण-वृष्टि कर देते हैं। अंततः रघु कौत्स को धन प्रदान कर प्रसन्न होते हैं और कौत्स भी गुरु को गुरुदक्षिणा देने में संतुष्ट हो जाते हैं। इस संवाद से शासक की उदारता और याचक की संयमित इच्छा का संदेश मिलता है।
📊 Diagram: स मृणमये वीतहिरणमयत्वात्
🧪 Activity: पाठ में कौत्स के गुरु से गुरुदक्षिणा मांगने की प्रार्थना और महाराज रघु के कोषागार की स्थिति का वर्णन।
🔗 Connection: अगले खंड में कौत्स की स्थिति और गुरु के प्रति सम्मान का विस्तृत वर्णन मिलेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संस्कृतभाष्या उत्तरं लिखत । (क) कौत्स: कस्य शिष्य आसीत्? (ख) रघु: कमृ अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म? (ग) कौत्स: किमर्थं रघुं प्राप? (घ) मन्त्रकृताम् अग्रणी: क: आसीत्? (ङ) तीर्थप्रतिपादितद्विः नरेन्द्र: कथमिव आभाति स्म? (च) चातकोऽपि कं न याचते? (छ) कौत्सस्य गुरु: गुरुदक्षिणात्वेन कियद्धनं देयमिति आदिदेश? (ज) रघु: कस्मात् परीवादात् भीत: आसीत्? (झ) कस्मात् अर्थ निष्क्रष्टुं रघु: चकमे? (ज) हिरण्मयीं वृष्टि के शशंसु:? (ट) कौ अभिनन्द्यसत्त्वौ अभूताम्?
उत्तर: (क) कौत्स: रघु: शिष्य आसीत्। (ख) रघु: अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म, अतिथिसत्कारार्थम्। (ग) कौत्स: रघुं अतिथिसत्कारार्थं प्राप। (घ) मन्त्रकृताम् अग्रणी: गुरुः आसीत्। (ङ) तीर्थप्रतिपादितद्विः नरेन्द्र: तीर्थं प्रदीप्तिमान् इव आभाति स्म। (च) चातकोऽपि कौत्सं न याचते। (छ) कौत्सस्य गुरु: गुरुदक्षिणात्वेन कियद्धनं देयमिति आदिदेश, यत् गुरुदक्षिणा गुरवे दातव्यं। (ज) रघु: परीवादात् भीत: आसीत्, यतः तस्य अतिथिसत्कारं न कुर्वन् इति मन्यते स्म। (झ) रघु: अर्थं निष्क्रष्टुं चकमे, अतिथिसत्कारार्थं। (ज) हिरण्मयी
2. कोष्ठकात् समुचितं पदमादाय रिक्तस्थानानि पूर्यत । (क) यशसा ... अतिथिं प्रत्युज्जगाम। (प्रकाश:, कृष्ण:, आतिथेय:) (ख) मानधनाग्रयायी ... तपोधनम् उवाच। (विशाम्पति:, अकृताज्जलि:, कौत्स:) (ग) कुशाग्रबुद्धे! ... कुशली। (ते शिष्य:, ते गुरु:, अग्रणी:) (घ) हे राजन् सर्वत्र ... अवेहि। (दु:खम्, वार्तम्, असुखम्) (ङ) स्तम्बेन अवशिष्ट: ... इव आभासि। (धान्यम्, नीवार:, वृक्ष:) (च) हे विद्धन्! ... गुरवे कियत् प्रदेयम्। (त्वया, मया, लोकेन) (छ) ... अचिन्तयित्वा गुरुणा अहमुक्त: (शरीरक्लेशम्, अर्थकाशर्यम्, रोगक्लेशम्)
उत्तर: (क) यशसा प्रकाश: अतिथिं प्रत्युज्जगाम। (ख) मानधनाग्रयायी कौत्स: तपोधनम् उवाच। (ग) कुशाग्रबुद्धे! ते शिष्य: कुशली। (घ) हे राजन् सर्वत्र वार्तम् अवेहि। (ङ) स्तम्बेन अवशिष्ट: धान्यम् इव आभासि। (च) हे विद्धन्! त्वया गुरवे कियत् प्रदेयम्। (छ) रोगक्लेशम् अचिन्तयित्वा गुरुणा अहमुक्त:।
3. अधोलिखितानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या । (क) कोटीश्चत्स्नो दश चाहर। (ख) माभूत्परीवादनवावतार:। (ग) द्विजाप्यहान्यर्हिसि साँढुमर्हन्। (घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्। (ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
उत्तर: (क) 'कोटीश्चत्स्नो दश चाहर' का अर्थ है कि करोड़ों और दस हजारों की संख्या। यह शब्द संख्या की महत्ता को दर्शाता है। (ख) 'माभूत्परीवादनवावतार:' का अर्थ है कि मुझसे कोई निंदा या आलोचना न हो। (ग) 'द्विजाप्यहान्यर्हिसि साँढुमर्हन्' का अर्थ है कि ब्राह्मणों को भी अपमानित नहीं करना चाहिए, और जो योग्य हैं उन्हें सम्मान देना चाहिए। (घ) 'निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्' का अर्थ है कि कुबेर से अर्थ निकालने में सक्षम होना। (ङ) 'दिदेश कौत्साय समस्तमेव' का अर्थ है कि कौत्स को सब कुछ दिया गया।
4. अधोलिखितेषु रिक्तस्थानेषु विशेष्यविशेषणपदानि पाठ्यांशात् चित्वा लिखत । (क) ... अध्वरे। (ख) ... कोषजातम्। (ग) ... अनुमितव्ययस्य। (घ) ... फलप्रसूति:। (ङ) ... विवर्जिताय।
उत्तर: (क) अध्वरे - विशेष्य पद। (ख) कोषजातम् - विशेषण पद। (ग) अनुमितव्ययस्य - विशेष्य पद। (घ) फलप्रसूति: - विशेष्य पद। (ङ) विवर्जिताय - विशेषण पद।
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