सामाजिक न्याय | Class 11 Political Science Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

सामाजिक न्याय – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सामाजिक न्याय from Class 11 Political Science, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
परिचय
इस अध्याय की शुरुआत में न्याय और प्रेम के बीच समानता और भिन्नता को समझाया गया है। प्रेम के कई रंग होते हैं और उसकी व्याख्या करना आसान नहीं होता, ठीक वैसे ही न्याय की भी हमारी सहज समझ होती है, हालांकि उसकी सटीक परिभाषा देना कठिन होता है। प्रेम और न्याय दोनों ही भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं और दोनों की कोई नकारात्मक छवि नहीं होती। प्रेम हमारे परिचितों के साथ संबंधों का पहलू है, जबकि न्याय समाज के नियमों और तरीकों से जुड़ा है जो सामाजिक लाभ और कर्तव्यों के वितरण को नियंत्रित करता है। इसलिए न्याय का प्रश्न राजनीति के लिए केंद्रीय महत्व रखता है। इस अध्याय में न्याय के विभिन्न सिद्धांतों, वितरणात्मक न्याय, और जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत पर चर्चा की जाएगी।
🔗 Connection: यह परिचय न्याय की अवधारणा को समझाने के बाद न्याय के विभिन्न सिद्धांतों और सामाजिक न्याय के महत्व की चर्चा की ओर ले जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का क्या मतलब है? हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ-साथ कैसे बदला?
हर व्यक्ति को उसका प्राप्य देने का मतलब है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति को वह अधिकार, सम्मान और संसाधन मिलें जो उसके स्वाभाविक अधिकार और आवश्यकताओं के अनुरूप हों। इसका अर्थ है कि न्यायपूर्ण व्यवस्था में हर व्यक्ति को उसकी योग्यता, जरूरत और अधिकार के अनुसार उचित स्थान और संसाधन मिलना चाहिए। समय के साथ इसका अर्थ बदला है क्योंकि प्रारंभ में प्राप्य का मतलब केवल समानता और समान अधिकार देना था, जबकि आधुनिक समय में इसे सामाजिक न्याय के व्यापक अर्थ में लिया जाता है, जिसमें विशेष जरूरतों वाले व्यक्तियों
2. अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धांतों की संक्षेप में चर्चा करो। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइये।
न्याय के तीन मुख्य सिद्धांत हैं: (1) समानता का सिद्धांत: इसमें सभी को समान अधिकार और अवसर दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, सभी नागरिकों को समान मतदान अधिकार देना। (2) विशेष जरूरतों का सिद्धांत: इसमें उन लोगों को अतिरिक्त सहायता दी जाती है जिन्हें विशेष जरूरतें हैं, जैसे विकलांग व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधाएँ। (3) योग्यता का सिद्धांत: इसमें संसाधनों और अवसरों का वितरण व्यक्ति की योग्यता के आधार पर किया जाता है, जैसे नौकरी में मेरिट के आधार पर चयन। ये तीनों सिद्धांत न्याय के विभिन्न पहलुओं को दर्शात
3. क्या विशेष जरूरतों का सिद्धांत सभी के साथ समान बरताव के सिद्धांत के विरूद्ध है?
विशेष जरूरतों का सिद्धांत समान बरताव के सिद्धांत के विरूद्ध नहीं है, बल्कि इसे पूरक माना जाता है। समान बरताव का अर्थ है सभी के साथ बराबरी का व्यवहार करना, जबकि विशेष जरूरतों का सिद्धांत यह मानता है कि कुछ लोगों को उनकी विशेष परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती है। इसलिए, समानता का अर्थ हमेशा समान व्यवहार नहीं होता, बल्कि आवश्यकतानुसार भेदभाव करना भी न्यायसंगत हो सकता है। इस प्रकार, विशेष जरूरतों का सिद्धांत समानता के सिद्धांत को और अधिक न्यायसंगत और व्यावहारिक बनाता है।
4. निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में ‘अज्ञानता के आवरण’ के विचार का उपयोग किस प्रकार किया।
रॉल्स ने ‘अज्ञानता के आवरण’ (Veil of Ignorance) के विचार का उपयोग यह दिखाने के लिए किया कि निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण तभी संभव है जब निर्णयकर्ता को यह पता न हो कि वह समाज में किस स्थिति में होगा। इस स्थिति में लोग अपने स्वार्थ के बजाय सभी के लिए न्यायसंगत नियम बनाने का प्रयास करेंगे। इससे यह सुनिश्चित होता है कि संसाधनों और अवसरों का वितरण निष्पक्ष होगा क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने लिए अनुचित नियम नहीं बनाएगा। इस विचार से रॉल्स ने सामाजिक न्याय के सिद्धांत को युक्तिसंगत आधार प्रदान किया।
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