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बिहारी – दोहे: कक्षा 12 के लिए हिंदी साहित्य का महत्वपूर्ण अध्याय

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 1 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

बिहारी – दोहे: कक्षा 12 के लिए हिंदी साहित्य का महत्वपूर्ण अध्याय

बिहारी – दोहे हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण काव्य रूप हैं जो कक्षा 12 के छात्रों के लिए आवश्यक हैं। ये दोहे सरल भाषा में गहरी सीख देते हैं और हिंदी साहित्य की परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं। इस ब्लॉग में बिहारी के दोहों का परिचय, उनकी विशेषताएँ और उदाहरण दिए गए हैं।

बिहारी – दोहे का परिचय

बिहारी लाल चतुर्वेदी, जिन्हें बिहारी कहा जाता है, हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी रचना शैली मुख्यतः दोहे में है। दोहा एक द्विपदी छंद होता है जिसमें प्रत्येक पंक्ति में 24 से 26 मात्राएँ होती हैं। बिहारी के दोहे सरल भाषा में गहरी बात कहते हैं। वे जीवन के अनुभवों, नैतिकता और आध्यात्मिकता को संक्षिप्त और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करते हैं। कक्षा 12 के हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में बिहारी के दोहे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

बिहारी के दोहों की भाषा और शैली

बिहारी के दोहे अपनी भाषा की सहजता और देशजता के लिए प्रसिद्ध हैं। वे तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिससे उनकी भाषा जीवंत और सरल होती है। उदाहरण के लिए, 'कुज़की', 'चुरमुराए', 'तरुवर' जैसे शब्द दोहों में प्राकृतिक और स्थानीय रंग भरते हैं।

उनकी शैली में व्यंग्य, उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सुंदर मिश्रण मिलता है। दोहे में गहरी भावनाएँ कम शब्दों में व्यक्त की जाती हैं, जिससे वे याद रखने में आसान और प्रभावशाली होते हैं।

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बिहारी के दोहों में विषय-वस्तु

बिहारी के दोहे मुख्यतः जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूते हैं:

  • नैतिकता और जीवन दर्शन: जीवन के मूल्यों और सदाचार पर जोर।
  • प्रकृति और मानव संबंध: प्रकृति के सौंदर्य और मनुष्य की संवेदनशीलता।
  • सामाजिक और मानवीय मूल्य: समाज में सद्भाव और प्रेम का संदेश।
  • व्यंग्य और आलोचना: सामाजिक बुराइयों और मानवीय कमजोरी पर कटाक्ष।

इन विषयों को वे संक्षिप्त, सारगर्भित और प्रभावशाली दोहों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

बिहारी के दोहों का आधुनिक संदर्भ में महत्व

आज के आधुनिक युग में भी बिहारी के दोहे प्रासंगिक हैं। वे हमें जीवन के मूल्यों की याद दिलाते हैं और नैतिकता की ओर प्रेरित करते हैं। जैसे कविता 'वसंत आया' में प्रकृति और मनुष्य के टूटते संबंध को दिखाया गया है, वैसे ही बिहारी के दोहे भी मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मूल्यों को पुनः जागृत करते हैं।

कक्षा 12 के छात्रों के लिए यह समझना आवश्यक है कि दोहे केवल साहित्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।

बिहारी के दोहों के कुछ प्रसिद्ध उदाहरण

नीचे बिहारी के कुछ प्रसिद्ध दोहे दिए गए हैं, जिनका अर्थ और अलंकार समझना कक्षा 12 के लिए उपयोगी होगा:

दोहाअर्थअलंकार
बड़े-बड़े पियराए पत्तेबड़े-बड़े पीले पत्तेअनुप्रास (प का पुनरावृत्ति)
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई होसुबह की ताजगी गरम पानी से नहाने जैसी हैउपमा (जैसे का प्रयोग)
खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गईहवा का कोमल आना और जानारूपक (हवा को फिरकी से तुलना)

इन उदाहरणों से दोहों की भाषा और शैली की समझ बढ़ती है।

बिहारी के दोहों का विश्लेषण: एक कार्य उदाहरण

आइए एक दोहे का विश्लेषण करें:

> "बड़े-बड़े पियराए पत्ते"

  • अर्थ: यहाँ बड़े और पीले पत्तों का वर्णन है।
  • अलंकार: अनुप्रास अलंकार, क्योंकि 'प' ध्वनि की पुनरावृत्ति हुई है।
  • भाव: यह पंक्ति प्रकृति की सुंदरता और परिवर्तन को दर्शाती है।

इस तरह दोहे का विश्लेषण करना परीक्षा में मददगार होता है। कक्षा 12 के छात्रों को दोहों के भाव, अलंकार और भाषा पर ध्यान देना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिहारी के दोहे किस छंद में लिखे जाते हैं?

बिहारी के दोहे द्विपदी छंद में होते हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में लगभग 24-26 मात्राएँ होती हैं।

बिहारी के दोहों की भाषा में कौन से शब्द अधिक प्रयोग होते हैं?

उनकी भाषा में तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग अधिक होता है, जो भाषा को सरल और जीवन्त बनाते हैं।

बिहारी के दोहों में कौन-कौन से अलंकार पाए जाते हैं?

उनके दोहों में अनुप्रास, उपमा, रूपक जैसे अलंकार प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।

बिहारी के दोहों का सामाजिक महत्व क्या है?

बिहारी के दोहे समाज में नैतिकता, सदाचार और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देते हैं।

कक्षा 12 के छात्रों के लिए बिहारी के दोहे क्यों महत्वपूर्ण हैं?

क्योंकि वे हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण हैं और परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।

बिहारी के दोहों में प्रकृति का क्या स्थान है?

प्रकृति को वे जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं और उसकी सुंदरता को दोहों में दर्शाते हैं।

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