Chapter 9
Chapter 9 — अध्ययन नोट्स
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समास परिचय
अवधारणासमास परिचय
समास संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जिसका अर्थ है दो या दो से अधिक पदों को मिलाकर एक नया पद बनाना। इस प्रक्रिया में पदों के बीच प्रयुक्त विभक्तियों, समुच्चय बोधक 'च' आदि का लोप कर दिया जाता है ताकि भाषा संक्षिप्त, सुगम और प्रभावशाली हो सके। उदाहरण के लिए, 'गायने कुशला' को 'गायनकुशला' बनाया जाता है, जहाँ विभक्ति लोप हुआ है। इसी प्रकार 'राज: पुरुष:' से 'राजपुरुष:' और 'सीता च रामश्च' से 'सीतारामौ' समास बनते हैं, जहाँ समुच्चय बोधक 'च' का लोप होता है। समास के कारण पदों का संक्षेपण एवं अर्थ का संपूर्णता से अभिव्यक्त होना संभव होता है। कभी-कभी पदों के बीच विभक्ति का लोप नहीं होता, जैसे 'खेचर:', 'युधिष्ठिर:' आदि। ऐसे समासों को अलुक् समास कहा जाता है। समास के मुख्य चार प्रकार होते हैं: अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वन्द्व, और बहुव्रीहि। तत्पुरुष के दो उपप्रकार कर्मधारय और द्विगु भी होते हैं। इस प्रकार समास के कुल छह प्रकार माने जाते हैं। **Table on page 1 (4×3)** | यथाशक्ति | = | शक्तिम् अनतिक्रम्य | | --- | --- | --- | | निर्विघ्नम् | = | विघ्नानाम् अभाव: | | उपगङ्गम् | = | गङ्गाया: समीपम् | | अनुरूपम् | = | रूपस्य योग्यम् | **Table on page 2 (6×3)** | प्रत्येकम् | = | एकम् एकम् इति | | --- | --- | --- | | प्रतिगृहम् | = | गृहं गृहम् इति | | निर्मेक्षिकम् | = | मक्षिकाणाम् अभाव: | | उपनदम् | = | नद्या: समीपम् | | प्रत्यक्षम् | = | अक्ष्णो: प्रति | | परोक्षम् | = | अक्ष्णो: परम् |
- समास का अर्थ है दो या अधिक पदों का संक्षेपण।
- समास में विभक्ति और समुच्चय बोधक 'च' का लोप होता है।
- अलक् समास में विभक्ति का लोप नहीं होता।
- मुख्य समास प्रकार: अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहुव्रीहि।
- तत्पुरुष के उपप्रकार: कर्मधारय और द्विगु।
- समास भाषा को संक्षिप्त और प्रभावशाली बनाता है।
- 📌 समास: दो या अधिक पदों का संक्षेपण।
- 📌 विभक्ति लोप: पदों के बीच विभक्ति का हटना।
- 📌 समुच्चय बोधक 'च': पदों को जोड़ने वाला शब्द।
1. अव्ययीभाव
व्याख्या1. अव्ययीभाव
अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और वह समास का प्रधान पद भी होता है। इस समास में समस्त समास पद अव्यय बन जाते हैं तथा नपुंसकलिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं। अव्ययीभाव समास का प्रयोग ऐसे पदों के निर्माण में होता है जिनका अर्थ किसी क्रिया, स्थिति या गुण को सूचित करता है। उदाहरण के लिए, 'यथाशक्ति' का अर्थ है 'शक्तिम् अनतिक्रम्य' अर्थात् अपनी शक्ति के अनुसार। इसी प्रकार 'निर्विघ्नम्' का अर्थ है 'विघ्नानाम् अभाव:' अर्थात् बिना विघ्न के। इस प्रकार अव्ययीभाव समास में पदों के बीच विभक्ति संबंध नहीं होता, क्योंकि पहला पद अव्यय होता है। इस समास के अन्य उदाहरणों में 'उपगङ्गम्' (गङ्गाया: समीपम्), 'अनुरूपम्' (रूपस्य योग्यम्) आदि शामिल हैं। अव्ययीभाव समास के पदों का प्रयोग वाक्यों में विशेषण या क्रिया विशेषण के रूप में होता है। **Table on page 1 (4×3)** | यथाशक्ति | = | शक्तिम् अनतिक्रम्य | | --- | --- | --- | | निर्विघ्नम् | = | विघ्नानाम् अभाव: | | उपगङ्गम् | = | गङ्गाया: समीपम् | | अनुरूपम् | = | रूपस्य योग्यम् |
- अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय और प्रधान होता है।
- समस्त समास पद अव्यय और नपुंसकलिङ्ग में होते हैं।
- इस समास में विभक्ति संबंध नहीं होता।
- अर्थ किसी क्रिया, स्थिति या गुण को सूचित करता है।
- उदाहरण: यथाशक्ति, निर्विघ्नम्, उपगङ्गम्, अनुरूपम्।
- 📌 अव्यय: ऐसा शब्द जो न लिंग, वचन, कारक के अनुसार परिवर्तित होता है।
- 📌 नपुंसकलिङ्ग: संस्कृत में एक लिंग जो न पुरुष है न स्त्री।
2. तत्पुरुष समास
व्याख्या2. तत्पुरुष समास
तत्पुरुष समास में प्रायः उत्तर पद प्रधान होता है। इस समास में दोनों पदों के बीच विभक्ति संबंध होता है, जो द्वितीया से सप्तमी तक की विभक्ति हो सकती है। कभी-कभी दोनों पदों में समान विभक्ति होती है, तब पूर्वपद की विभक्ति का लोप कर समस्त पद बनाया जाता है
अभ्यास प्रश्न — Chapter 9
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.प्र. 1. उदाहरणमनुसृत्य रिक्तस्थानानां पूर्तिः कोष्ठकात् समुचितैः समस्तपदैः कुरुत— उदाहरण— तौ लवकुशौ वाल्मीके: आश्रमे पठत: । (लवकुशे/ लवकुशौ) i) ... जन: नित्यकर्म कृत्वा प्रातराशं करोति। (विशालवृक्ष:/ सुप्तोत्थित:) ii) त्रयाणां लोकानां समाहार: ... इति कथ्यते। (त्रिलोकी/ त्रिलोकम्) iii) कृषे: आश्रम: ... अस्ति। (प्रतिगृहम्/ उपगङ्गम्) iv) तव ... मलिनम् अस्ति। (पाणिपादा:/ पाणिपादम्) v) ... सैनिक: ब्रणयुक्त: जात:। (स्वर्गपतित:/ अश्वपतित:) vi) ... जीवनस्य उद्देश्या: सन्ति। (धर्मार्थकाममोक्ष/ धर्मार्थकाममोक्षा:)
उत्तर:
i) विशालवृक्ष: जन: नित्यकर्म कृत्वा प्रातराशं करोति। ii) त्रिलोकम् त्रयाणां लोकानां समाहार: इति कथ्यते। iii) कृषे: आश्रम: प्रतिगृहम् अस्ति। iv) तव पाणिपादम् मलिनम् अस्ति। v) अश्वपतित: सैनिक: ब्रणयुक्त: जात:। vi) धर्मार्थकाममोक्षा: जीवनस्य उद्देश्या: सन्ति। व्याख्या: - i) विशालवृक्ष: (विशाल वृक्ष) सही है क्योंकि जन: के लिए वृक्ष: होगा। सुप्तोत्थित: गलत होगा क्योंकि वह विशेषण है। - ii) त्रिलोकम् (त्रि + लोकम्) सही है क्योंकि समाहार: त्रयाणां लोकानां है। - iii) प्रतिगृहम् सही है क्योंकि आश्रम: के लिए उपगङ्गम् उपयुक्त नहीं है। - iv) पाणिपादम् सही है क्योंकि मलिनम् विशेषण है जो पाणिपादम् के लिए उपयुक्त है। - v) अश्वपतित: सही है क्योंकि सैनिक: अश्वपतित: के साथ जात: होता है। - vi) धर्मार्थकाममोक्षा: सही है क्योंकि जीवनस्य उद्देश्या: के लिए यह समास उपयुक्त है।
व्याख्या:
प्रत्येक रिक्त स्थान में दिए गए विकल्पों में से व्याकरण और अर्थ के अनुसार उपयुक्त समस्तपद का चयन किया गया है। उदाहरण के अनुसार समस्तपदों का प्रयोग किया गया है।
Q2.प्र. 2. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलपदानि आश्रित्य समस्तपदं विग्रहं वा लिखत— यथा— भिक्षुक: प्रत्येकं गृहं गच्छति। एकम् एकम् इति i) शरणम् आगत: तु सदैव रक्षणीय:। ... ii) विद्या हीन: छात्र: न शोभते। ... iii) असत्यं तु त्याज्यं भवति। ... iv) राम: महाराज: आसीत्। ... v) सीता च राम: च वनम् अगच्छताम्। ... vi) तडाग: नीलोत्पलै: सुशोभते। ...
उत्तर:
i) शरणागतम् (शरणम् + आगत:) समस्तपदः। विग्रहः - शरणम् आगत:। ii) विद्या हीनछात्र: (विद्या + हीन: + छात्र:) समस्तपदः। विग्रहः - विद्या हीन: छात्र:। iii) असत्यं त्याज्यं (असत्यं + त्याज्यं) समस्तपदः। विग्रहः - असत्यं तु त्याज्यं। iv) राममहाराज: (राम: + महाराज:) समस्तपदः। विग्रहः - राम: महाराज:। v) सीतारामौ (सीता + राम:) समस्तपदः। विग्रहः - सीता च राम: च। vi) तडागनीलोत्पलै: (तडाग: + नीलोत्पलै:) समस्तपदः। विग्रहः - तडाग: नीलोत्पलै: सुशोभते। व्याख्या: प्रत्येक वाक्य में स्थूलपदानि (मूल शब्द) को मिलाकर समस्तपद बनाना है तथा उसका विग्रह (शब्दों का विश्लेषण) लिखना है।
व्याख्या:
स्थूलपदानि मिलाकर समस्तपद बनाना और उसके विग्रह को लिखना व्याकरण की समास समझने की प्रक्रिया है। प्रत्येक वाक्य में दिए गए शब्दों को जोड़कर समस्तपद बनाकर उसका अर्थ स्पष्ट किया गया है।
Q3.प्र. 3. उदाहरणानि पठित्वा तदनुसारं विग्रहं समासनामानि च लिखत। उदाहरण— पाणी च पादौ च तेषां समाहार:— पाणिपादम् (समाहार द्वन्द्व) माता च पिता च इति — मातापितरौ (इतरेतर द्वन्द्व) माता च पिता च इति — पितरौ (एकशेष) [Page 9] समास परिचय 109 i) ब्राह्मणौ ii) सुखदु:खम् iii) शिरोग्रीवम् iv) रामलक्ष्मणभरता: v) अजौ vi) बालका: vii) शास्त्रप्रवीण: viii) नरसिंह: ix) प्रत्यक्षम् x) दशानन:
उत्तर:
i) ब्राह्मणौ — द्वन्द्व समास (इतरेतर द्वन्द्व), विग्रहः: ब्राह्मण: च ब्राह्मण: च। ii) सुखदु:खम् — समाहार समास, विग्रहः: सुख: च दु:ख: च। iii) शिरोग्रीवम् — समाहार समास, विग्रहः: शिर: च ग्रीव: च। iv) रामलक्ष्मणभरता: — द्वन्द्व समास (इतरेतर द्वन्द्व), विग्रहः: राम: च लक्ष्मण: च भरत: च। v) अजौ — द्वन्द्व समास (इतरेतर द्वन्द्व), विग्रहः: अज: च अज:। vi) बालका: — बहुव्रीहि समास, विग्रहः: बालक: (बालक: के लिए विशेषण)। vii) शास्त्रप्रवीण: — बहुव्रीहि समास, विग्रहः: शास्त्र: में प्रवीण:। viii) नरसिंह: — तत्पुरुष समास, विग्रहः: नर: + सिंह:। ix) प्रत्यक्षम् — तत्पुरुष समास, विग्रहः: प्रत्यक्ष: (प्रत्यक्ष: का अर्थ है 'साक्षात्')। x) दशानन: — बहुव्रीहि समास, विग्रहः: दश: + अनन: (दस मुख वाला)। व्याख्या: प्रत्येक समास का प्रकार पहचानकर उसका विग्रह लिखा गया है।
व्याख्या:
प्रत्येक समास के प्रकार (द्वन्द्व, समाहार, तत्पुरुष, बहुव्रीहि) को समझकर विग्रह किया गया है। उदाहरणों के अनुसार समासों का वर्गीकरण किया गया है।
Q4.प्र. 4. अधोलिखितवाक्येषु समस्तपदं चित्वा तस्य विग्रहं लिखत— | समस्तपदम् | विग्रहम् | | --- | --- | | i) विष्णु: पीताम्बरं धारयति। | ... | | ii) भवत: कार्यं निर्विघ्नं समापयेत्। | ... | | iii) दुर्गासप्तशती पठितव्या। | ... | | iv) शरविद्ध: हंस: भूमौ पतित:। | ... | | v) वृद्ध: पुत्रपौत्रम् दृष्ट्वा प्रसीदति। | ... | | vi) विष्णु: चक्रपाणि: कथ्यते। | ... |
उत्तर:
i) विष्णुपीताम्बरं — तत्पुरुष समास। विग्रहः: विष्णु: + पीताम्बरं (पीताम्बरं विष्णु: धारण करता है)। ii) भवत्कार्यं — तत्पुरुष समास। विग्रहः: भवत: + कार्यं (आपके कार्य)। iii) दुर्गासप्तशती — बहुव्रीहि समास। विग्रहः: दुर्गा + सप्त + शती (दुर्गा की सात सौ श्लोकों वाली)। iv) शरविद्धहंस: — तत्पुरुष समास। विग्रहः: शरविद्ध: + हंस: (शर से विद्ध हंस)। v) वृद्धपुत्रपौत्रम् — बहुव्रीहि समास। विग्रहः: वृद्ध: + पुत्र + पौत्रम् (वृद्ध के पुत्र और पौत्र)। vi) विष्णुचक्रपाणि: — तत्पुरुष समास। विग्रहः: विष्णु: + चक्रपाणि: (जिसके हाथ में चक्र और पाणि हैं)। व्याख्या: प्रत्येक वाक्य में समस्तपद को चिन्हित कर उसके विग्रह (शब्दों का विश्लेषण) को लिखा गया है।
व्याख्या:
समस्तपदों को पहचानकर उनके विग्रह को लिखना व्याकरण की समास समझने की प्रक्रिया है। प्रत्येक वाक्य में समस्तपदों का विश्लेषण किया गया है।
Q5.समास शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है और समास की प्रक्रिया में क्या होता है?
उत्तर:
समास शब्द का अर्थ है संक्षेपण। समास की प्रक्रिया में दो या दो से अधिक पदों में प्रयुक्त विभक्तियों, समुच्चय बोधक 'च' आदि का लोप करके एक नया पद बनाया जाता है। उदाहरण के लिए, 'गायने कुशला' से 'गायनकुशला' बनता है।
व्याख्या:
समास का अर्थ संक्षेपण होता है जिसमें शब्दों के बीच के विभक्ति चिह्न और समुच्चय बोधक 'च' को हटा कर एक नया पद बनाना शामिल है। इससे भाषा संक्षिप्त और प्रभावशाली बनती है। उदाहरण स्वरूप, 'राज: पुरुष:' से 'राजपुरुष:' बनाना।
Q6.निम्नलिखित में से कौन-सा समास अव्ययीभाव समास का उदाहरण है? A) राजपुरुष: B) यथाशक्ति C) पितृयुक्त: D) चतुर्मुख:
उत्तर:
यथाशक्ति
व्याख्या:
अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और समस्त पद अव्यय रूप में होता है। 'यथाशक्ति' में पहला पद 'यथा' अव्यय है, अतः यह अव्ययीभाव समास है। अन्य विकल्प तत्पुरुष या बहुव्रीहि समास के उदाहरण हैं।
Q7.अव्ययीभाव समास के उदाहरणों को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका पर ध्यान दें: यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य निर्विघ्नम् = विघ्नानाम् अभाव: उपगङ्गम् = गङ्गाया: समीपम् अनुरूपम् = रूपस्य योग्यम् इस तालिका के अनुसार, अव्ययीभाव समास में क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और समस्त पद नपुंसकलिङ्ग अव्यय रूप में होता है। इसमें पदों के बीच विभक्ति संबंध नहीं होता। उदाहरण के लिए, 'यथाशक्ति' का अर्थ 'शक्तिम् अनतिक्रम्य' होता है।
व्याख्या:
तालिका में दिखाए गए उदाहरणों से पता चलता है कि अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और समस्त पद अव्यय रूप में प्रयुक्त होते हैं। ये समास किसी क्रिया, स्थिति या गुण को सूचित करते हैं। विभक्ति लोप होता है और पद नपुंसकलिङ्ग में होते हैं।
Q8.तत्पुरुष समास में प्रायः किस पद की प्रधानता होती है? A) पूर्वपद B) उत्तरपद C) दोनों पदों की समान प्रधानता D) किसी अन्य पद की प्रधानता
उत्तर:
उत्तरपद
व्याख्या:
तत्पुरुष समास में प्रायः उत्तर पद की प्रधानता होती है। इसका अर्थ है कि समास पद में उत्तर पद मुख्य होता है और पूर्व पद उससे संबद्ध होता है।