NCERTCh 9निःशुल्क

Chapter 9

🎓 Class 12📖 Bhaswati📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 8अध्याय 9 / 10Chapter 10

Chapter 9अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

कार्याकार्यव्यवस्थिति:

व्याख्या

कार्याकार्यव्यवस्थिति:

यह अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता के षोडश अध्याय से संकलित है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मोह और संशय से उबारने के लिए उपदेश दिए हैं। इस अध्याय का मूल उद्देश्य कार्य और अकर्म के विवेकपूर्ण निर्णय की स्थिति को स्पष्ट करना है। अध्याय में दैवी संपदा और आसुरी संपदा के भेद को समझाया गया है, जो मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति और पतन के कारण बनते हैं। दैवी संपदा वे गुण हैं जो मनुष्य को संयमित, शांतिप्रिय और मोक्ष की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी संपदा के दोष मनुष्य को अधर्म और पाप की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार कार्याकार्यव्यवस्था का ज्ञान मनुष्य को सही मार्ग पर चलने में सहायता करता है। अध्याय के श्लोक सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक हैं, जो आज भी सभी के लिए प्रासंगिक हैं।

  • अध्याय का स्रोत श्रीमद्भगवद्गीता के षोडश अध्याय से है।
  • कार्य और अकर्म के विवेकपूर्ण निर्णय की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
  • दैवी संपदा और आसुरी संपदा के गुणों और दोषों का भेद स्पष्ट किया गया है।
  • दैवी संपदा से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • आसुरी संपदा से मनुष्य अधर्म और पाप की ओर जाता है।
  • यह ज्ञान आज भी सभी के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।
  • 📌 कार्याकार्यव्यवस्था: कार्य और अकर्म के बीच विवेकपूर्ण निर्णय।
  • 📌 दैवी संपदा: आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक गुण।
  • 📌 आसुरी संपदा: अधर्म और पाप की ओर ले जाने वाले दोष।

श्रीभगवानुवाच (श्लोक 1-3): दैवी संपदा का वर्णन

व्याख्या

श्रीभगवानुवाच (श्लोक 1-3): दैवी संपदा का वर्णन

श्रीभगवानुवाच के श्लोक 1 से 3 तक भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी संपदा के 16 गुणों का विस्तार से वर्णन किया है। ये गुण मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति, संयम, और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, आर्जव, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, शान्ति, अपैशुन्यम्, दया, अलोलुप्त्वं, मार्दव, हीरचापलम्, तेजः, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोहो, नातिमानिता ये सभी दैवी संपदा के अंग हैं। ये गुण मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करते हैं और उसे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठने में सहायता करते हैं। दैवी संपदा से युक्त व्यक्ति संयमित, शांतिप्रिय, और धर्मपरायण होता है, जो मोक्ष की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।

  • दैवी संपदा के 16 गुणों का वर्णन।
  • दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, आर्जव आदि गुण।
  • अहिंसा, सत्य, अक्रोध, शान्ति, अपैशुन्यम् जैसे नैतिक गुण।
  • दैवी संपदा मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाती है।
  • ये गुण अंतःकरण की शुद्धि करते हैं।
  • दैवी संपदा से युक्त व्यक्ति संयमित और धर्मपरायण होता है।
  • 📌 दान: परोपकार के लिए वस्तु या धन का त्याग।
  • 📌 दम: इन्द्रियों का संयम।
  • 📌 यज्ञ: ईश्वर की पूजा और समर्पण।

आसुरी संपदा (श्लोक 4-6): दोषों का वर्णन

व्याख्या

आसुरी संपदा (श्लोक 4-6): दोषों का वर्णन

श्रीभगवानुवाच के श्लोक 4 से 6 तक आसुरी संपदा के दोषों का वर्णन किया गया है। आसुरी संपदा में दम्भ (ढोंग), दप (क्रूरता), अभिमान (घमंड), क्रोध, पारुष्य (कठोरता), अज्ञान आदि दोष सम्मिलित हैं। ये दोष मनुष्य को अधर्म और पाप की ओर ले जाते हैं। आसुरी संपदा व

अभ्यास प्रश्नChapter 9

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. प्रश्नानामुत्तराणि एकपदेन लिखत- (क) दैवी संपद् कस्मै मता? (ख) कामभोगेषु प्रसक्ता: कुत्र पतन्ति? (ग) ईश्वर: नराधमान् कासु योनिषु क्षिपति? (घ) त्रिविधं कस्य द्वारम्?

उत्तर:

(क) दैवी संपद् – विमोक्षाय मता। (ख) कामभोगेषु प्रसक्ता: – नरके पतन्ति। (ग) ईश्वर: नराधमान् – आसुरीषु योनिषु क्षिपति। (घ) त्रिविधं – नरकस्य द्वारम्।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द में देना है: (क) दैवी संपद् किसके लिए मानी गई है? – विमोक्ष (मुक्ति) के लिए। (ख) जो लोग काम और भोग में लगे रहते हैं, वे कहाँ गिरते हैं? – नरक में। (ग) ईश्वर किन्हें और किस योनि में डालता है? – नराधमों को आसुरी योनि में। (घ) तीन प्रकार का क्या द्वार है? – नरक का द्वार।

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Q2.2. प्रश्नानामुत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत- (क) जगत: क्षयाय के प्रभवन्ति? (ख) अज्ञानविमोहिता: जना: किं विचारयन्ति? (ग) मनुष्य: किं त्यजेत्? (घ) नरकेश्चुवौ के पतन्ति?

उत्तर:

(क) अल्पबुद्धय: उग्रकर्माण: जगत: क्षयाय प्रभवन्ति। (ख) अज्ञानविमोहिता: जना: विचारयन्ति कि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। (ग) मनुष्य: काम, क्रोध और लोभ त्यजेत्। (घ) अनेकचित्तविभ्रान्ता: मोहजालसमावृता: नरकेश्चुवौ पतन्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पूर्ण वाक्य में देना है: (क) जगत के विनाश के लिए कौन उत्पन्न होते हैं? – अल्पबुद्धि और उग्रकर्म करने वाले। (ख) अज्ञानवश में लोग क्या सोचते हैं? – मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। (ग) मनुष्य को क्या त्यागना चाहिए? – काम, क्रोध और लोभ। (घ) नरक में कौन गिरते हैं? – जिनका चित्त अनेक प्रकार से भ्रमित है, जो मोह के जाल में फँसे हैं।

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Q3.3. रेखांकितपदमाधृय प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) भूतेषु दया एव दैवी सम्पद्। (ख) आसुरी सम्पद् निबन्धाय मता। (ग) आसुरा: जना: प्रवृत्तिं निवृत्तिं च न विदु:। (घ) मूढा: जन्मनि जन्मनि हरिमप्राच्यैव अधर्मा गतिं यान्ति।

उत्तर:

(क) भूतेषु दया किसे कहा गया है? – दैवी सम्पद्। (ख) किस सम्पत्ति को बन्धन का कारण माना गया है? – आसुरी सम्पद्। (ग) कौन प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते? – आसुरी जन। (घ) मूढ़ लोग जन्म-जन्मांतर में किस गति को प्राप्त होते हैं? – अधर्म की गति।

व्याख्या:

प्रत्येक रेखांकित पद के आधार पर प्रश्न बनाना है और उत्तर देना है। (क) भूतेषु दया – दैवी सम्पद् है। (ख) आसुरी सम्पद् – निबन्ध (बन्धन) का कारण है। (ग) आसुरी जन – प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते। (घ) मूढ़ – जन्म-जन्म में अधर्म की गति को प्राप्त होते हैं।

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Q4.4. शुद्धकथनानां समक्षम् ‘आम्’ अशुद्धकथनानां समक्षं च ‘न’ इति लिखत- (क) नरकस्य द्वारम् पञ्चविधम्। (ख) आसुरीवृत्तियुक्ता: जना: दम्भेनाविधिपूर्वकं यजन्ते। (ग) नष्टात्मान: अल्पबुद्धय: जगत: हिताय प्रभवन्ति। (घ) तेज: क्षमा धृति: इत्यादीनि आसुरीसंपद: अंगभूतानि। (ड) दम्भ: दर्प: अभिमानश्च दैवीसंपद: अंगभूतानि। (च) अज्ञानविमोहिता: जना: कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया इति चिन्तयन्ति।
A.आम्
B.

उत्तर:

(क) न (ख) आम् (ग) न (घ) न (ड) न (च) आम्

व्याख्या:

प्रत्येक कथन के सत्य (आम्) या असत्य (न) होने का निर्णय: (क) नरक के द्वार तीन हैं, पाँच नहीं – न (ख) आसुरी वृत्ति वाले लोग दम्भपूर्वक, अविधिपूर्वक यज्ञ करते हैं – आम् (ग) नष्ट आत्मा और अल्पबुद्धि वाले लोग जगत के विनाश के लिए उत्पन्न होते हैं, हित के लिए नहीं – न (घ) तेज, क्षमा, धृति आदि दैवी सम्पत्ति के अंग हैं, आसुरी के नहीं – न (ड) दम्भ, दर्प, अभिमान आदि आसुरी सम्पत्ति के अंग हैं, दैवी के नहीं – न (च) अज्ञानविमोहित लोग ऐसा ही सोचते हैं – आम्

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Q5.5. श्लोकान्वयं पूर्यत- (क) असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी। अन्वय:- मया: शत्रु: हत:, अपरान् हनिष्ये, अहम् अहं भोगी, अहं सिद्ध:, सुखी। (ख) दैवी संपद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः संपद् दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।। अन्वयः- विमोक्षाय:...संपद्, आसुरी (च) निबन्धाय:...। पाण्डव! मा:...दैवी संपदम्:...असि।

उत्तर:

(क) अन्वय: - असौ शत्रु: मया हत:। - अपरान् (शत्रून्) हनिष्ये। - अहम् ईश्वर:। - अहम् भोगी। - अहम् सिद्ध:। - अहम् बलवान्। - अहम् सुखी। (ख) अन्वय: - दैवी संपद् विमोक्षाय (भवति)। - आसुरी संपद् निबन्धाय (भवति)। - पाण्डव! मा शुच:। - दैवी संपद् अभिजात: असि।

व्याख्या:

श्लोक के पदों को व्याकरणानुसार क्रम में सजाना है (अन्वय): (क) शत्रु का वध मुझसे हुआ, अन्य शत्रुओं को भी मारूँगा, मैं ईश्वर हूँ, भोगी हूँ, सिद्ध हूँ, बलवान हूँ, सुखी हूँ। (ख) दैवी सम्पत्ति मुक्ति के लिए है, आसुरी बन्धन के लिए। हे पाण्डव! शोक मत करो, तुम दैवी सम्पत्ति से युक्त हो।

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Q6.6. भावार्थ समुचितपदैः पूर्यत- (क) इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्त्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। श्रीकृष्णः कथयति यत् मूढः अज्ञानविमोहितः जनः:...भवति, किञ्चिद् अल्पमपि प्राप्य:...भवति यत् अद्य मया इदं प्राप्तम् अतः अहम् अन्यम् अपि स्वमनोरथं शीघ्रमेव:...यत् किञ्चिद् ममास्ति ततु मम अस्त्येव परमन्यत् सर्व:...च मम एव भविष्यति। प्राप्तुं समर्थः, धनमैश्वर्य, आत्माभिमानी, अतिलोलुपः (ख) त्रिविधं नरकस्यैदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजैत्। कर्तव्याकर्तव्यं:...भगवान् श्रीकृष्णः अजुनस्य माध्यमेन अस्मान् सर्वान :...यत् कामः, क्रोधः, ... एतानि त्रीणि नरकस्य द्वाररूपाणि अतः यः जनः:...नाशं नेच्छति अपि तु स्वकीयं कल्याणमिच्छति सः एतानि द्वाराणि:...सर्वप्रयत्नैः च एतेषां त्रयाणां त्यागं कुर्यात् येनैतानि त्रीणि द्वाराणि सदैव तस्य कृते:...तिष्ठेयुः सः च उन्नतिपथे अग्रसरो भवेत्। नोद्घाटयेत्, लोभश्च, आत्मनः, वर्णयन्, पिहितानि, बोधयति

उत्तर:

(क) श्रीकृष्ण कहते हैं कि मूढ़, अज्ञानविमोहित जन आत्माभिमानी, अतिलोलुपः, प्राप्तुं समर्थः, धनमैश्वर्य में लिप्त हो जाता है। वह थोड़ा सा भी पाकर अत्यधिक प्रसन्न होता है कि आज मैंने यह प्राप्त किया, अब शीघ्र ही अन्य मनोरथ भी पूरे कर लूँगा। जो कुछ मेरा है, वह तो है ही, और भी सब कुछ मेरा ही होगा। (ख) कर्तव्य-अकर्तव्य का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सबको बोधयति (समझाते) हैं कि काम, क्रोध, लोभश्च – ये तीन नरक के द्वार हैं। जो व्यक्ति आत्मनः (अपने) नाश को नहीं चाहता, बल्कि अपना कल्याण चाहता है, उसे चाहिए कि वह इन तीनों द्वारों को सर्वप्रयत्न से पिहितानि (बन्द) रखे, अर्थात् नोद्घाटयेत् (न खोले)। इन तीनों का त्याग कर वह उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।

व्याख्या:

भावार्थ को उपयुक्त शब्दों से पूरित करना है: (क) मूढ़ व्यक्ति आत्माभिमानी, अतिलोलुप, प्राप्ति में समर्थ और धन-ऐश्वर्य में लिप्त होता है। (ख) भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम, क्रोध, लोभ – ये नरक के द्वार हैं, जो अपने नाश को नहीं चाहता, उसे चाहिए कि इन द्वारों को बन्द रखे (नोद्घाटयेत्), अर्थात् इनका त्याग करे।

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Q7.7. समास-विग्रहं समस्तपदं वा लिखित्वा समासस्य नाम अपि लिखत यथा सत्त्वसंशुद्धिः- सत्त्वानां संशुद्धिः- षष्ठी तत्पुरुष (क) अज्ञानम्- (ख) उग्रकर्माणः- (ग) मनोरथम्- (घ) नराधमान्- (ङ) त्रिविधम्-

उत्तर:

(क) अज्ञानम् – अज्ञानम् (अ + ज्ञानम्) – बहुव्रीहि समास (ख) उग्रकर्माणः – उग्राणि कर्माणि येषां ते – बहुव्रीहि समास (ग) मनोरथम् – मनसः रथः – षष्ठी तत्पुरुष समास (घ) नराधमान् – नृणां अधमाः – षष्ठी तत्पुरुष समास (ङ) त्रिविधम् – त्रयाणां विधः – षष्ठी तत्पुरुष समास

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का समास-विग्रह और समास का नाम लिखना है: (क) अज्ञानम् – जिसमें ज्ञान नहीं है (बहुव्रीहि) (ख) उग्रकर्माणः – जिनके कर्म उग्र हैं (बहुव्रीहि) (ग) मनोरथम् – मन का रथ (षष्ठी तत्पुरुष) (घ) नराधमान् – मनुष्यों में अधम (षष्ठी तत्पुरुष) (ङ) त्रिविधम् – तीन प्रकार का (षष्ठी तत्पुरुष)

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Q8.8. वाच्यपरिवर्तनं कृत्वा लिखत- यथा- इदमद्य मया लब्धम्- इदमद्य अहं लब्धवान्/लब्धवती। (क) अहं तान् आसुरीषु योनिषु क्षिपामि- (ख) असौ मया हत:- (ग) अल्पबुद्धय: उग्रकर्माण: जगत: क्षयाय प्रभवन्ति। (घ) मया यक्ष्यते दीयते च- (ङ) अनेकचित्तविभ्रान्ता: मोहजालसमावृता: नरकेश्चुवौ पतन्ति।

उत्तर:

(क) अहं तान् आसुरीषु योनिषु क्षिपामि – तान् आसुरीषु योनिषु अहं क्षिपामि। (कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य) (ख) असौ मया हत: – असौ मया हतः (कर्तृवाच्य), मया असौ हतः (कर्मवाच्य) (ग) अल्पबुद्धय: उग्रकर्माण: जगत: क्षयाय प्रभवन्ति। – जगत: क्षयाय अल्पबुद्धय: उग्रकर्माण: प्रभवन्ति। (घ) मया यक्ष्यते दीयते च – अहं यक्ष्यामि दीयामि च। (ङ) अनेकचित्तविभ्रान्ता: मोहजालसमावृता: नरकेश्चुवौ पतन्ति। – नरकेश्चुवौ अनेकचित्तविभ्रान्ता: मोहजालसमावृता: पतन्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्य का वाच्य (voice) बदलना है: (क) कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य या विपरीत। (ख) कर्तृवाच्य/कर्मवाच्य में परिवर्तन। (ग) वाक्य में कर्ता-कर्म का स्थान बदलना। (घ) कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य। (ङ) वाक्य में कर्ता-कर्म का स्थान बदलना।

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