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Chapter 8

🎓 Class 11📖 Tabla evam Pakhawaj📖 11 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~17 मिनट
Chapter 7अध्याय 8 / 8

Chapter 8अध्ययन नोट्स

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तबला एवं पखावज वाद्यों के घरानों का वर्णन

व्याख्या

तबला एवं पखावज वाद्यों के घरानों का वर्णन

भारत में संगीत का इतिहास राजाओं के दरबारों से जुड़ा हुआ है। जब राजाओं का शासन समाप्त हुआ और अंग्रेजों का शासन स्थापित हुआ, तब संगीतज्ञों और कलाकारों ने अपने परिवारों और शिष्यों को अलग-अलग स्थानों पर प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस प्रकार विभिन्न संगीत शैलियों और वादन विधाओं का विकास हुआ। जब किसी प्रतिभाशाली कलाकार द्वारा किसी विशिष्ट शैली का निर्माण होता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उसके वंश और शिष्य परंपरा में संरक्षित रहती है, तो उसे घराना कहा जाता है। उत्तर भारतीय संगीत में घरानों की शुरुआत मुगल काल के अंतिम दौर से मानी जाती है। घरानों ने संगीत की शैलीगत विशेषताओं को संरक्षित करने, प्रचार-प्रसार करने और संगीत की विविधता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तबला वाद्य का इतिहास लगभग 350 वर्ष पुराना है। इस दौरान छह प्रमुख तबला घराने विकसित हुए, जिनकी अपनी विशिष्ट वादन शैलियाँ हैं। इन घरानों की वादन शैलियों को बाज कहा जाता है। बाजों को दो मुख्य भागों में बांटा गया है: पश्चिम बाज (दिल्ली और अजराड़ा घराने) और पूर्व बाज (लखनऊ, फर्रुखाबाद, बनारस घराने)। इसके अतिरिक्त पंजाब घराने का विकास स्वतंत्र रूप से हुआ। प्रत्येक घराने की अपनी विशिष्ट शैली, ताल-प्रयोग, और तकनीक होती है, जो तबले के साहित्य को समृद्ध बनाती है। पखावज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्रमुख ताल वाद्य है, जिसके भी कई प्रसिद्ध घराने हैं। पखावज के घरानों की वादन शैली और ताल-प्रयोगों में विविधता देखने को मिलती है। इस प्रकार तबला और पखावज के घराने भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा के संरक्षक हैं। **Table on page 8 (20×10)** | | बि | हू | ही | | का | ल | बे | लि | या | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | | | ग | र | बा | | त | | | | | | | | | | | रा | स | ली | ला | | | धु | प | द | ति | ल्ला | ना | | | व | | | गो | | | | | | | | नी | | बा | र | ह | मा | सा | | धू | म | र | रा | | | बं | | डां | द | | जा | | ता | ग | | | द | | डि | रा | | व | र्ण | न | म् | | लां | गु | रि | या | | हो | ली | | म् | | | | | | क | ज | री | | | | | | आ | वृ | त्ति | स | | | ठे | ल | | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | व | बि | ष | म | ती | | का | य | दा | | त | | टु | | ञ | स्व | | | | | न | प | क | ड़ | ता | र | ता | ली | | | मु | ख | ड़ा | | ल | | प | | | | | | अ | पे | श | का | र | षा | स | | | | व | आ | न्दो | ल | नं | ड़ | म्पृ | | | आ | रो | ह | | औ | ड़ | व | र्ण | | अ | नो | ह | त | | मो | ह | रा | ग | **Table on page 8 (10×10)** | | क | | | वा | य | लि | न | क्का | रा | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | हा | र | मो | नि | य | म | मं | | | | | | ता | | सि | | | जी | | | इ | | ढो | ल | क | ता | न | पु | रा | | | स | | | पु | ष्क | र | | | इ | क | ता | रा | | त | ब | ला | | मृ | ना | प | खा | ब | ज | | बि | | | | दं | द | मो | | ना | ल | | ल | | धुँ | ना | ग | स्व | र | म् | | त | | | खो | घ | ट | मृ | र | चं | | | रं | | दि | ल | रू | बा | | मृ | ग | | | ग |

  • संगीत घरानों की स्थापना विशिष्ट शैली और परंपरा के आधार पर होती है।
  • तबला के छह प्रमुख घराने हैं: दिल्ली, अजराड़ा, लखनऊ, फर्रुखाबाद, बनारस, और पंजाब।
  • घरानों की वादन शैली को बाज कहा जाता है, जो दो मुख्य भागों में बंटी है: पश्चिम बाज और पूर्व बाज।
  • पखावज के भी कई प्रमुख घराने हैं, जो अपनी विशिष्ट वादन शैली के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • घरानों ने संगीत की शैलीगत विविधता को संरक्षित और विकसित किया।
  • घराने संगीत की तकनीक, ताल-प्रयोग और भाव-प्रकाशन की विधाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित करते हैं।
  • 📌 घराना: संगीत की विशिष्ट शैली और परंपरा जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है।
  • 📌 बाज: तबला वादन की शैलीगत विशेषताएँ।
  • 📌 ताल-प्रयोग: ताल के विभिन्न रूपों और संयोजनों का उपयोग।

दिल्ली घराना

व्याख्या

दिल्ली घराना

दिल्ली घराना तबला वादन का प्रथम और सबसे प्राचीन घराना माना जाता है। इसकी स्थापना मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीले के शासन काल में उस्ताद सिद्धार खाँ डाड़ी ने की। उन्होंने अपने पुत्रों और शिष्यों को तबला वादन की शिक्षा दी और इस घराने को आगे बढ़ाया। इस घराने की वादन शैली को दिल्ली बाज कहा जाता है, जिसे 'दो अंगुलियों का बाज' या 'किनार का बाज' भी कहा जाता है। इस शैली में तिट, धिट, तिरकिट, धाति, धगेनधा, धिन-गिन, तिन-किन आदि बोलों का प्रमुख प्रयोग होता है। दिल्ली घराने में पेशाकार, चतस्त्र जाति के छोटे कायदे और रेला के वादन के लिए यह बाज प्रसिद्ध है। इस घराने के प्रमुख कलाकारों में नत्थू खाँ, महबूब खाँ मिरजकर, गामी खाँ, इनाम अली खाँ, लतीफ अहमद खाँ और शाफात अहमद खाँ शामिल हैं। इन कलाकारों ने दिल्ली घराने की वादन शैली को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। दिल्ली घराने की विशेषता इसकी स्पष्टता, तालबद्धता और बोलों की शुद्धता है, जो तबले की नादात्मकता को बढ़ाती है।

  • दिल्ली घराना तबला वादन का सबसे पहला घराना है।
  • स्थापना उस्ताद सिद्धार खाँ डाड़ी ने की।
  • दिल्ली बाज को 'दो अंगुलियों का बाज' और 'किनार का बाज' भी कहा जाता है।
  • तिट, धिट, तिरकिट, धाति जैसे बोलों का प्रमुख प्रयोग होता है।
  • पेशाकार और छोटे कायदों के लिए प्रसिद्ध।
  • प्रमुख कलाकार: नत्थू खाँ, महबूब खाँ मिरजकर, गामी खाँ, आदि।
  • 📌 दिल्ली बाज: दिल्ली घराने की तबला वादन शैली।
  • 📌 पेशाकार: तबले पर विशेष प्रकार के धीमे और सजग प्रहार।
  • 📌 कायदे: तबला वादन के नियमबद्ध तालिकाएँ।

अजराड़ा घराना

व्याख्या

अजराड़ा घराना

अजराड़ा घराना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के अजराड़ा गाँव से उत्पन्न हुआ। इसके संस्थापक कल्लू खाँ और मीरू खाँ थे, जिन्होंने दिल्ली के उस्ताद सिताब खाँ से तबला वादन की शिक्षा प्राप्त की। अजराड़ा घराना दिल्ली घराने से जुड़ा होने के कारण उसकी अधिक

अभ्यास प्रश्नChapter 8

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. पंजाब घराने के कुछ कलाकारों के नाम बताइए। 2. सामता प्रसाद, राम जी मिश्र और गोपाल मिश्र किस घराने के तबला वादक हैं? 3. घराना शब्द से आप क्या समझते हैं? 4. गुदई महाराज का दूसरा नाम क्या था? 5. बायाँ या डांगे का व्यवहार किस घराने में कलात्मक रूप से किया गया है?

उत्तर:

1. पंजाब घराने के कुछ प्रसिद्ध कलाकार हैं: अनोखे लाल मिश्र, किशन महाराज आदि। 2. सामता प्रसाद, राम जी मिश्र और गोपाल मिश्र बनारस घराने के तबला वादक हैं। 3. घराना शब्द संगीत में एक विशिष्ट शैली या परंपरा को दर्शाता है, जो वाद्य वादन या गायन की विशिष्ट विधा और तकनीक को परिभाषित करता है। यह आमतौर पर एक परिवार या गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ा होता है। 4. गुदई महाराज का दूसरा नाम था - गुदई महाराज। (यदि अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध हो तो उल्लेख करें।) 5. बायाँ या डांगे का व्यवहार दिल्ली घराने में कलात्मक रूप से किया गया है।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर संबंधित घराने और कलाकारों के इतिहास तथा परंपरा पर आधारित है। पंजाब घराने के कलाकारों के नाम और घराने की विशेषताएँ संगीत इतिहास से ज्ञात होती हैं। घराना शब्द की व्याख्या संगीत की परंपरा और शैली के संदर्भ में की जाती है। गुदई महाराज के नाम का उल्लेख संबंधित ग्रंथों में होता है। बायाँ या डांगे की कलात्मकता दिल्ली घराने में प्रमुख है।

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Q2.1. दिल्ली घराने में तबला किस प्रकार बजाया जाता है? 2. पंजाब घराने में तबला वादन की विधि का वर्णन कीजिए। 3. बनारस घराने के तबला वादक किन-किन विधाओं के साथ बजाने की क्षमता रखते हैं? 4. नाथद्वारा घराने के कुछ पखावज वादकों के नाम बताइए।

उत्तर:

1. दिल्ली घराने में तबला बजाने की शैली में स्पष्टता, लयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसमें बायाँ हाथ (डांगा) की कलात्मकता और दायाँ हाथ (बायाँ) की त्वरित गति का समन्वय होता है। इस घराने की वादन शैली में ठोस ताल और परिष्कृत परन प्रमुख होते हैं। 2. पंजाब घराने में तबला वादन की विधि में जोरदार और गतिशील ताल वादन होता है। इस घराने की विशेषता है कि इसमें जोरदार और स्पष्ट ध्वनि उत्पन्न करने के लिए हथेली और उंगलियों का विशेष प्रयोग किया जाता है। यहां के वादक तेज गति और जटिल परनों का प्रयोग करते हैं। 3. बनारस घराने के तबला वादक कथक नृत्य, गायन और अन्य वाद्यों के साथ तालमेल बैठाने में सक्षम होते हैं। वे स्वतंत्र वादन के साथ-साथ संगत वादन में भी दक्ष होते हैं। 4. नाथद्वारा घराने के प्रसिद्ध पखावज वादकों में रमज़ान खाँ, मनमोहन सिंह और एस. के सक्सेना शामिल हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक घराने की वादन शैली और तकनीक उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश से प्रभावित होती है। दिल्ली घराने की शैली में तकनीकी दक्षता और स्पष्टता प्रमुख है, जबकि पंजाब घराने में जोरदार और गतिशील वादन होता है। बनारस घराने के वादक विभिन्न विधाओं के साथ तालमेल बैठाने में सक्षम होते हैं। नाथद्वारा घराने के वादकों के नाम संगीत इतिहास में दर्ज हैं।

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Q3.1. अनोखे लाल मिश्र एवं किशन महाराज पंजाब घराने के तबला वादक हैं। 2. दिल्ली घराने के मूल पुरुष उत्ताद सिद्धार खाँ डाड़ी थे। 3. घराना शब्द राजमहलों से आया है। 4. लतीफ अहमद खाँ बनारस घराने के तबला वादक हैं। 5. दिल्ली घराने का जन्म अकबर के काल में हुआ।

उत्तर:

1. सही - अनोखे लाल मिश्र एवं किशन महाराज पंजाब घराने के प्रसिद्ध तबला वादक हैं। 2. गलत - दिल्ली घराने के मूल पुरुष उत्ताद सिद्धार खाँ डाड़ी नहीं थे। 3. सही - घराना शब्द राजमहलों से आया है, जो संगीत की परंपरा को दर्शाता है। 4. सही - लतीफ अहमद खाँ बनारस घराने के प्रसिद्ध तबला वादक थे। 5. सही - दिल्ली घराने का जन्म अकबर के काल में हुआ था।

व्याख्या:

प्रत्येक कथन की सत्यता संगीत इतिहास और घरानों के विकास के आधार पर जाँची जाती है। पंजाब घराने के कलाकारों के नाम और दिल्ली घराने की उत्पत्ति के काल का उल्लेख ग्रंथों में मिलता है।

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Q4.1. लाला भवानी दास ... घराने के मूल संस्थापक थे। 2. पंडित राम सहाय ... घराने के कलाकार थे। 3. अजराड़ा ... जिले में है। 4. शाफात अहमद खाँ ... घराने के तबला वादक हुए। 5. हसमत खाँ एवं अकरम खाँ ... घराने के विख्यात तबला वादक हैं। 6. ... नाथद्वारा घराने की एक विख्यात परन है।

उत्तर:

1. लाला भवानी दास अजराड़ा घराने के मूल संस्थापक थे। 2. पंडित राम सहाय बनारस घराने के कलाकार थे। 3. अजराड़ा मेरठ जिले में है। 4. शाफात अहमद खाँ दिल्ली घराने के तबला वादक हुए। 5. हसमत खाँ एवं अकरम खाँ पंजाब घराने के विख्यात तबला वादक हैं। 6. 'परन' नाथद्वारा घराने की एक विख्यात परंपरा है।

व्याख्या:

प्रत्येक रिक्त स्थान को संबंधित घराने, कलाकारों और स्थानों के नाम से भरा गया है, जो संगीत इतिहास और घरानों के विवरण पर आधारित हैं।

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Q5.1. उठान, बॉट, लग्गी, कवित, फर्ड, परन आदि का वादन अपने शिक्षक के साथ बैठकर देखिए, समझिए एवं इन्हें सीखने का प्रयत्न कीजिए। विभिन्न कलाकारों को बजाते हुए सुनने से अलग-अलग शैलियों का भी ज्ञान प्राप्त कीजिए। 2. नाथद्वारा घराने के कलाकारों से संपर्क स्थापित कर एक परियोजना तैयार कीजिए, जिसमें घराने के प्रमुख कलाकारों के छायाचित्रों एवं प्रचलित बंदिशों का संकलन सम्मिलित हो।

उत्तर:

1. विद्यार्थी अपने शिक्षक के मार्गदर्शन में उठान, बॉट, लग्गी, कवित, फर्ड, परन आदि ताल वादन की तकनीकें सीखें। विभिन्न कलाकारों के वादन को सुनकर उनकी शैलियों और तकनीकों का अध्ययन करें। 2. नाथद्वारा घराने के कलाकारों से संपर्क स्थापित कर उनके जीवन, संगीत शैली, प्रमुख बंदिशों और छायाचित्रों का संग्रह करें। इस जानकारी को एक परियोजना के रूप में प्रस्तुत करें।

व्याख्या:

यह गतिविधि विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव और शोध के माध्यम से संगीत के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करती है। शिक्षक के मार्गदर्शन से सीखने और कलाकारों से संपर्क स्थापित करने से ज्ञान का विस्तार होता है।

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Q6.घराना शब्द का क्या अर्थ है और तबला वादन में घराने का क्या महत्व है?

उत्तर:

घराना वह विशिष्ट शैली है जो किसी असाधारण प्रतिभाशाली कलाकार द्वारा निर्मित होकर उसकी वंश और शिष्य परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रहती है। तबला वादन में घराना संगीत की शैलीगत विशेषताओं को संरक्षित करने, प्रचार-प्रसार करने और विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

व्याख्या:

घराना किसी विशेष शैली या वादन पद्धति को दर्शाता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रहती है। तबला के घराने संगीत की विविधता और शुद्धता को बनाए रखते हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली घराना तबला वादन की स्पष्टता और तालबद्धता के लिए प्रसिद्ध है।

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Q7.तबला वादन के कितने प्रमुख घराने हैं और उन्हें किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है?
A.A) पाँच घराने; पश्चिम बाज और पूर्व बाज
B.B) छह घराने; पश्चिम बाज और पूर्व बाज
C.C) सात घराने; दिल्ली, लखनऊ, बनारस, पंजाब, अजराड़ा, फर्रुखाबाद, कोलकाता
D.D) चार घराने; दिल्ली, लखनऊ, बनारस, पंजाब

उत्तर:

छह घराने; पश्चिम बाज और पूर्व बाज

व्याख्या:

तबला वादन के छह प्रमुख घराने हैं जिन्हें दो भागों में बांटा गया है: पश्चिम बाज (दिल्ली और अजराड़ा घराने) और पूर्व बाज (लखनऊ, फर्रुखाबाद, बनारस घराने)। पंजाब घराने का विकास स्वतंत्र रूप से हुआ माना जाता है।

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Q8.दिल्ली घराने की वादन शैली को किस नाम से जाना जाता है और इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर:

दिल्ली घराने की वादन शैली को दिल्ली बाज कहा जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं— दो अंगुलियों का बाज या किनार का बाज, तिट, धिट, तिरकिट, धाति, धगेनधा, धिन-गिन, तिन-किन आदि बोलों का प्रयोग, पेशाकार, चतस्त्र जाति के छोटे कायदे और रेला वादन।

व्याख्या:

दिल्ली घराना तबला वादन का प्रथम घराना है। इसकी शैली में स्पष्टता, तालबद्धता और बोलों की शुद्धता प्रमुख है। उदाहरण के लिए, पेशाकार और चतस्त्र जाति के कायदे इस घराने में विशेष महत्व रखते हैं।

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