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Chapter 8

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Chapter 7अध्याय 8 / 12Chapter 9

Chapter 8अध्ययन नोट्स

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काव्य खंड

व्याख्या

काव्य खंड

इस खंड में हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि, संत रैदास के काव्य और उनकी भक्ति परंपरा का परिचय दिया गया है। रैदास का जन्म काशी (वाराणसी) में 15वीं शताब्दी में हुआ था। वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत कवियों में गिने जाते हैं। रैदास ने अपने काव्य में बाह्य आडंबरों को खारिज करते हुए आंतरिक भक्ति और मन की शुद्धता को सच्चा धर्म माना। उनकी भाषा सरल और व्यावहारिक ब्रजभाषा थी, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का मिश्रण था। उनकी रचनाएँ प्रेम, समानता और भाईचारे का संदेश देती हैं। इस खंड में रैदास के दो पद प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को विभिन्न उपमाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। ये पद भक्ति की गहराई, निष्ठा और विश्वास को प्रकट करते हैं। इस खंड में रैदास की भाषा, काव्य शैली, और उनके पदों के भावार्थ को समझने का प्रयास किया गया है।

  • रैदास का जन्म काशी में 15वीं शताब्दी में हुआ।
  • उन्होंने भक्ति को मन की शुद्धता और आंतरिक समर्पण माना।
  • उनकी भाषा सरल ब्रजभाषा थी, जिसमें कई भाषाओं के शब्द शामिल थे।
  • रैदास की रचनाएँ समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं।
  • दो पदों में भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को उपमाओं से दर्शाया गया है।
  • उनकी भक्ति निराकार और सामाजिक समरसता पर आधारित है।
  • 📌 भक्ति आंदोलन: धार्मिक आंदोलन जो आंतरिक भक्ति और सामाजिक समरसता पर आधारित था।
  • 📌 ब्रजभाषा: हिंदी की एक प्राचीन बोली जो मुख्यतः वृंदावन क्षेत्र में बोली जाती है।
  • 📌 उपमा अलंकार: किसी वस्तु की तुलना किसी प्रसिद्ध वस्तु से करना।

रैदास

व्याख्या

रैदास

इस खंड में संत रैदास के जीवन, उनकी भाषा और काव्यशैली का विस्तृत परिचय दिया गया है। रैदास ने अपनी रचनाओं में सरल ब्रजभाषा का प्रयोग किया, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का मिश्रण था। उनकी भक्ति रचनाएँ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी सम्मिलित हैं। रैदास ने बाह्य आडंबरों को खारिज करते हुए आंतरिक भक्ति को सच्चा धर्म माना। उनके पदों में भक्त और आराध्य के बीच गहरा और अटूट संबंध दिखाया गया है। इस खंड में रैदास के दो पद प्रस्तुत हैं जो भक्त और प्रभु के संबंध को विभिन्न उपमाओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं। पहले पद में चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा, बादल-मोर जैसी उपमाएँ हैं जो भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को दर्शाती हैं। दूसरे पद में तीर्थ और ब्रत छोड़कर प्रभु के चरणों की भक्ति को सर्वोपरि माना गया है।

  • रैदास का जीवनकाल 1388-1518 माना जाता है।
  • उन्होंने भक्ति को बाह्य आडंबरों से ऊपर रखा।
  • उनकी भाषा में कई क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द सम्मिलित हैं।
  • उनकी रचनाएँ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं।
  • दो पदों में भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को उपमाओं के माध्यम से दिखाया गया।
  • भक्ति में तीर्थ और ब्रत से अधिक प्रभु के चरणों की भक्ति को महत्व दिया गया।
  • 📌 भक्ति: ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण।
  • 📌 आराध्य: पूजा जाने वाला देवता या ईश्वर।
  • 📌 भक्त: जो ईश्वर की भक्ति करता है।

पद

व्याख्या

पद

इस खंड में रैदास के दो पदों का पूर्ण पाठ दिया गया है। पहले पद में भक्त और आराध्य के बीच गहरे और अविभाज्य संबंध को विभिन्न उपमाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। जैसे चंदन और पानी, दीपक और बाती, मोती और धागा, बादल और मोर का संबंध। ये उपमाएँ भक्त और प्रभु

अभ्यास प्रश्नChapter 8

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. “अब कैसे छूटे राम रट लागी” पंक्ति का भाव है? (क) नाम उच्चारण की कठिनाई (ख) नाम रटकर याद करना (ग) आराध्य का नाम जपना (घ) मित्रों का नाम रटना
A.क) नाम उच्चारण की कठिनाई
B.ख) नाम रटकर याद करना
C.ग) आराध्य का नाम जपना
D.घ) मित्रों का नाम रटना

उत्तर:

इस पंक्ति का भाव है कि भक्त अपने आराध्य के नाम का जप करता है, जिससे उसकी भक्ति प्रगाढ़ होती है। इसलिए सही उत्तर है (ग) आराध्य का नाम जपना।

व्याख्या:

यह पंक्ति भक्ति की भावना को दर्शाती है जहाँ राम के नाम का जप करने की बात की गई है, जो भक्ति का एक प्रमुख अंग है।

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Q2.2. “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है? (क) एकाकार और समरूप (ख) तरल और तीव्र सुगंध (ग) आश्रय और आश्रित (घ) द्रव और ठोस
A.क) एकाकार और समरूप
B.ख) तरल और तीव्र सुगंध
C.ग) आश्रय और आश्रित
D.घ) द्रव और ठोस

उत्तर:

इस पंक्ति में भक्त (पानी) और आराध्य (चंदन) के बीच आश्रय और आश्रित का संबंध दर्शाया गया है। इसलिए सही उत्तर है (ग) आश्रय और आश्रित।

व्याख्या:

चंदन की सुगंध पानी से निकलती है, इसी प्रकार भक्त की भक्ति आराध्य से प्रभावित होती है। यह भक्ति और आराध्य के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है।

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Q3.3. “तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है? (क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है। (ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है। (ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है। (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
A.क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।
B.ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
C.ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
D.घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

उत्तर:

यहाँ रैदास का भाव है कि भक्त (बाती) और आराध्य (दीपक) का मेल जीवन को प्रकाशमान करता है। इसलिए सही उत्तर है (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

व्याख्या:

दीपक और बाती का संबंध ऐसा है कि दोनों मिलकर प्रकाश उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार भक्त और आराध्य का संबंध जीवन को उज्जवल बनाता है।

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Q4.4. “जो तुम तोरो राम मैं नहिं तोरो” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है? (क) परोपकारी भक्ति भाव (ख) आराध्य से अटूट संबंध (ग) सांसारिक मोह (घ) कर्मकांड पर बल
A.क) परोपकारी भक्ति भाव
B.ख) आराध्य से अटूट संबंध
C.ग) सांसारिक मोह
D.घ) कर्मकांड पर बल

उत्तर:

इस पंक्ति में रैदास का आशय है कि यदि आराध्य (राम) नहीं है तो वे भी नहीं हैं, अर्थात आराध्य से उनका अटूट संबंध है। इसलिए सही उत्तर है (ख) आराध्य से अटूट संबंध।

व्याख्या:

यह पंक्ति भक्त की आराध्य के प्रति गहरी निष्ठा और समर्पण को दर्शाती है।

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Q5.5. “तीर्थ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं? (क) तीर्थ और ब्रत आवश्यक नहीं हैं। (ख) तीर्थ और ब्रत सब आवश्यक हैं। (ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है। (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
A.क) तीर्थ और ब्रत आवश्यक नहीं हैं।
B.ख) तीर्थ और ब्रत सब आवश्यक हैं।
C.ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
D.घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

उत्तर:

इस पंक्ति से यह समझा जाता है कि तीर्थ और ब्रत आवश्यक नहीं हैं, बल्कि आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है। इसलिए सही उत्तर है (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

व्याख्या:

रैदास तीर्थ और ब्रत के स्थान पर भक्ति को महत्व देते हैं, जो आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय पाती है।

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Q6.6. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है? (क) “जहाँ जहाँ जाओ तुम्हरी पूजा” (ख) “जाकी जोति बरे दिन राती” (ग) “तुम दीपक, हम बाती” (घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
A.क) “जहाँ जहाँ जाओ तुम्हरी पूजा”
B.ख) “जाकी जोति बरे दिन राती”
C.ग) “तुम दीपक, हम बाती”
D.घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”

उत्तर:

सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा “जहाँ जहाँ जाओ तुम्हरी पूजा” पंक्ति में व्यक्त होती है। इसलिए सही उत्तर है (क) “जहाँ जहाँ जाओ तुम्हरी पूजा”।

व्याख्या:

यह पंक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता और सर्वत्र उपस्थिति को दर्शाती है।

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Q7.नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए। (क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।” (ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हारे चरन कमल एक भरोसां।”

उत्तर:

(क) इस पंक्ति में रैदास कहते हैं कि प्रभु आप घन (बादल) बनो और मैं मोर (मोर) हूँ, जैसे चंद्रमा और चकोर पक्षी का संबंध होता है। यह उपमा भक्ति के गहरे और सुंदर संबंध को दर्शाती है। (ख) इस पंक्ति में कहा गया है कि मैं तीर्थ और व्रत नहीं करता, क्योंकि तुम्हारे चरण कमल ही मेरा एकमात्र भरोसा हैं। इसका भाव है कि भक्ति और आराधना के लिए बाहरी कर्मों से अधिक प्रभु के चरणों में विश्वास आवश्यक है।

व्याख्या:

दोनों पंक्तियाँ भक्ति के भाव और आराध्य के प्रति श्रद्धा को दर्शाती हैं। पहली में उपमा के माध्यम से भक्ति का सौंदर्य और गहराई बताई गई है, दूसरी में बाहरी कर्मों की अपेक्षा प्रभु के प्रति विश्वास को महत्व दिया गया है।

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Q8.1. “जो तुम तोरो राम में नहिं तोरो” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए। 2. रैदास ने तीर्थ और ब्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं? 3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

उत्तर:

1. इस पंक्ति में रैदास यह व्यक्त करते हैं कि उनका अस्तित्व और पहचान अपने आराध्य राम से जुड़ी है। यदि राम नहीं हैं तो वे भी नहीं हैं। यह अटूट निष्ठा और समर्पण का भाव है, जो भक्ति की गहराई को दर्शाता है। 2. रैदास ने तीर्थ और ब्रत के स्थान पर भक्ति को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। वे मानते हैं कि बाहरी कर्मों से अधिक प्रभु के प्रति सच्चा विश्वास और प्रेम आवश्यक है। भक्ति के आधार में श्रद्धा, समर्पण, और प्रेम प्रमुख होते हैं। 3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को विभिन्न प्रतीकों से व्यक्त किया गया है जैसे—चंदन और पानी (सुगंध और स्रोत), दीपक और बाती (प्रकाश और प्रकाश का स्रोत), मोती और धागा (मूल्यवान वस्तु और उसका आधार), चंद्रमा और चकोरा (प्रेम और आसक्ति)। ये उपमाएँ भक्ति के गहरे और अनन्य संबंध को दर्शाती हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर भक्ति और आराध्य के बीच गहरे संबंध और भक्ति के महत्व को स्पष्ट करता है। उपमाओं के माध्यम से भावों को सुंदरता से प्रस्तुत किया गया है।

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