Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
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स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ का परिचय
व्याख्यास्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ का परिचय
भारतीय संगीत में स्वर और ताल की लिपि पद्धतियाँ संगीत की संरचना और प्रस्तुति को व्यवस्थित रूप से अभिव्यक्त करने का माध्यम हैं। स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ संगीत के विभिन्न तत्वों जैसे स्वर (संगीत के मूल ध्वनि तत्व) और ताल (लयबद्धता) को लिखित रूप में प्रस्तुत करती हैं। संगीत के क्रियात्मक पक्ष को स्वर और ताल सहित लिखने की विधि को स्वरलिपि कहा जाता है। इसका मूल उद्देश्य संगीत के क्रियात्मक पक्ष का प्रलेखन एवं संरक्षण करना है ताकि संगीत की रचनाएँ और प्रदर्शन स्थायी रूप से संरक्षित हो सकें। प्राचीन काल से ही स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ विद्यमान थीं, किन्तु वे पूर्ण नहीं थीं। आधुनिक युग में पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे और पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने इन पद्धतियों का वैज्ञानिक और प्रामाणिक रूप से विकास किया। आज उत्तर भारत में भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति विशेष रूप से प्रचलित है। स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ संगीत के स्वर और ताल को स्पष्ट, व्यवस्थित और स्थायी रूप में अभिव्यक्त करती हैं, जिससे संगीत शिक्षा, रचना और प्रस्तुति में सहायता मिलती है। **Table on page 1 (3×12)** | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | नी | - | सं | नी | - | प | नी | ग | - | प | नी | - | | हीं | s | s | ग | s | ई | s | सुं | s | द | र | s |
- स्वर-ताल लिपि पद्धति संगीत के स्वर और ताल को लिखित रूप में प्रस्तुत करती है।
- इसका उद्देश्य संगीत के क्रियात्मक पक्ष का संरक्षण और प्रलेखन है।
- प्राचीन काल से स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ थीं, पर आधुनिक रूप भातखण्डे और पलुस्कर ने विकसित की।
- उत्तर भारत में भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति प्रमुख है।
- स्वरलिपि से संगीत की बारीकियाँ लिखित रूप में अभिव्यक्त होती हैं।
- यह पद्धति संगीत शिक्षा और प्रस्तुति में सहायक है।
- 📌 स्वरलिपि: संगीत के स्वर और ताल को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने की विधि।
- 📌 स्वर: संगीत के मूल ध्वनि तत्व।
- 📌 ताल: संगीत की लयबद्धता।
उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित स्वर-ताल लिपि पद्धति
व्याख्याउत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित स्वर-ताल लिपि पद्धति
उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वर और ताल को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने के लिए स्वर-ताल लिपि पद्धति का विकास हुआ। इसे स्वरलिपि कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य संगीत के क्रियात्मक पक्ष को व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप से लिखित रूप देना है। हालांकि संगीत की बारीकियाँ केवल गुरुमुख से ही सीखी जा सकती हैं, फिर भी स्वरलिपि से संगीत संरक्षित और प्रचारित किया जा सकता है। प्राचीन और मध्यकालीन काल में भी स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ थीं, लेकिन वे पूर्ण नहीं थीं। आधुनिक स्वर-ताल लिपि पद्धति के विकास में पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे और पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का विशेष योगदान है। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन और संगीतज्ञों से संवाद कर वैज्ञानिक स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ विकसित कीं। भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित है। इस पद्धति में स्वर और ताल के लिए विशिष्ट चिह्न और संकेत बनाए गए हैं, जो संगीत की लय, मात्रा और स्वर के प्रकार को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
- स्वरलिपि का उद्देश्य संगीत के क्रियात्मक पक्ष का प्रलेखन है।
- गायन-वादन की बारीकियाँ गुरुमुख से ही सीखना आवश्यक है।
- प्राचीन काल में स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ थीं, पर वे अपूर्ण थीं।
- पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे और पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने आधुनिक स्वर-ताल लिपि विकसित की।
- भातखण्डे पद्धति उत्तर भारत में प्रमुख है।
- स्वर-ताल लिपि में स्वर और ताल के लिए विशेष चिह्न होते हैं।
- 📌 स्वरलिपि: संगीत के स्वर और ताल को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने की विधि।
- 📌 शुद्ध स्वर: बिना विकृति के मूल स्वर।
- 📌 कोमल स्वर: स्वर का निम्न स्वरूप।
भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति
व्याख्याभातखण्डे स्वरलिपि पद्धति
पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा विकसित स्वरलिपि पद्धति भारतीय शास्त्रीय संगीत की संरचना को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने का एक वैज्ञानिक तरीका है। इस पद्धति में स्वर और ताल के लिए विशिष्ट चिह्न बनाए गए हैं। स्वर चिह्नों में शुद्ध स्वरों को बिना
अभ्यास प्रश्न — Chapter 7
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति में अपने पाठ्यक्रम के किसी राग के द्रुत ख्याल की बंदिश लिखिए।
उत्तर:
भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति में द्रुत ख्याल की बंदिश लिखने के लिए पहले उस राग की स्वर संरचना को समझना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, राग भैरव के द्रुत ख्याल की बंदिश इस प्रकार लिखी जा सकती है: सा रे ग म प ध नि सां, सां नि ध प म ग रे सा यह बंदिश भातखण्डे स्वरलिपि के अनुसार सरल और स्पष्ट रूप में लिखी जाती है। द्रुत ख्याल में गति तेज होती है, इसलिए मात्रा और ताल का ध्यान रखते हुए बंदिश लिखनी चाहिए।
व्याख्या:
भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति में स्वर और ताल को लिपिबद्ध करने की एक वैज्ञानिक विधि है। द्रुत ख्याल की बंदिश लिखते समय राग के स्वरों का सही चयन, ताल की मात्रा, और गति का ध्यान रखना आवश्यक है। इस पद्धति में स्वर को अक्षरों द्वारा और ताल को चिह्नों द्वारा दर्शाया जाता है।
Q2.2. अपने पाठ्यक्रम के किन्ही दो रागों के द्रुत ख्याल में आठ मात्रा की चार तानें लिखिए।
उत्तर:
द्रुत ख्याल में तानें लिखने के लिए राग के स्वर और ताल की समझ आवश्यक है। उदाहरण के लिए: राग यमन की तानें (8 मात्रा की): 1) सा रे ग म प ध नि सां 2) सां नि ध प म ग रे सा 3) ग म प ध नि सां ध प 4) म प ध नि सां ध प म राग भैरव की तानें (8 मात्रा की): 1) सा रे ग म प ध नि सां 2) सां नि ध प म ग रे सा 3) प ध नि सां ध प म ग 4) ध नि सां ध प म ग रे इन तानों को भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति के अनुसार लिखना चाहिए, जिसमें स्वर अक्षरों द्वारा और ताल चिह्नों द्वारा दर्शाए जाते हैं।
व्याख्या:
तानें द्रुत ख्याल की गति और स्वर की सजावट होती हैं। आठ मात्रा की तानें ताल के अनुसार व्यवस्थित की जाती हैं। प्रत्येक तान में स्वर की श्रृंखला और ताल की मात्रा का ध्यान रखा जाता है। भातखण्डे स्वरलिपि में इसे स्पष्ट रूप से लिखा जाता है।
Q3.3. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ताल-लिपि पद्धति के प्रमुख चिह्नों को समझाइए।
उत्तर:
विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ताल-लिपि पद्धति में ताल के विभिन्न भागों को दर्शाने के लिए विशेष चिह्नों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख चिह्न निम्नलिखित हैं: 1) ०० - ताल की शुरुआत या सम 2) + - ताल के विभाजन को दर्शाता है 3) 9 - ताल की एक विशेष मात्रा या जोड़ 4) × - ताल में ठहराव या विराम इन चिह्नों का प्रयोग ताल की लयबद्धता और संरचना को स्पष्ट रूप से दर्शाने के लिए किया जाता है। यह पद्धति ताल की जटिलताओं को सरलता से समझने और लिखने में सहायक होती है।
व्याख्या:
ताल-लिपि पद्धति में चिह्न ताल के विभिन्न हिस्सों को चिन्हित करते हैं, जिससे संगीतकार ताल की गति, मात्रा और विराम को समझ पाते हैं। विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने इन चिह्नों को विकसित कर ताल की लिपि को व्यवस्थित किया।
Q4.4. भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति में शुद्ध व विकृत स्वरों को लिखने की विधि उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति में शुद्ध स्वर और विकृत स्वर को अलग-अलग चिह्नों और संकेतों द्वारा लिखा जाता है। शुद्ध स्वर: ये वे स्वर होते हैं जो राग के मूल स्वर होते हैं, जैसे सा, रे, ग, म, प, ध, नि। इन्हें सामान्य अक्षरों से लिखा जाता है। विकृत स्वर: ये वे स्वर होते हैं जो राग में अलंकार या विशेष प्रभाव के लिए प्रयोग किए जाते हैं, जैसे रे का कमाल, ग का तिरछा स्वर आदि। इन्हें अक्षरों के ऊपर या नीचे विशेष चिह्न लगाकर लिखा जाता है। उदाहरण: शुद्ध स्वर - सा, रे, ग विकृत स्वर - रे (कमाल स्वर) को रे के ऊपर एक छोटा चिह्न लगाकर दर्शाया जाता है। इस प्रकार भातखण्डे स्वरलिपि में स्वर की शुद्धता और विकृति को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाता है।
व्याख्या:
स्वरलिपि में स्वर की शुद्धता और विकृति को अलग-अलग चिह्नों से दर्शाना आवश्यक होता है ताकि संगीत की प्रस्तुति सटीक हो। भातखण्डे ने इस पद्धति को सरल और स्पष्ट बनाया है।
Q5.5. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर स्वरलिपि पद्धति में मंद्र, मध्य व तार सप्तक के स्वरों को लिखने की विधि पर उदाहरण सहित प्रकाश डालिए।
उत्तर:
विष्णु दिगम्बर पलुस्कर स्वरलिपि पद्धति में सप्तक के तीन भागों - मंद्र सप्तक, मध्य सप्तक और तार सप्तक के स्वरों को अलग-अलग चिह्नों और संकेतों द्वारा लिखा जाता है। 1) मंद्र सप्तक: यह सबसे नीचा सप्तक होता है। इसे स्वर के नीचे एक विशेष रेखा या चिह्न लगाकर दर्शाया जाता है। 2) मध्य सप्तक: यह सामान्य सप्तक होता है, जिसमें स्वर सामान्य अक्षरों से लिखा जाता है। 3) तार सप्तक: यह उच्च सप्तक होता है। इसे स्वर के ऊपर एक विशेष चिह्न लगाकर दर्शाया जाता है। उदाहरण: मंद्र सप्तक का सा - सा के नीचे एक रेखा मध्य सप्तक का सा - सामान्य सा तार सप्तक का सा - सा के ऊपर एक रेखा इस प्रकार, पलुस्कर स्वरलिपि में सप्तक की स्पष्ट पहचान होती है, जिससे संगीत की प्रस्तुति में सुविधा होती है।
व्याख्या:
सप्तक के विभिन्न भागों को अलग-अलग चिह्नों से दर्शाना आवश्यक होता है ताकि स्वर की ऊँचाई और गहराई स्पष्ट हो। पलुस्कर ने इस पद्धति को व्यवस्थित किया जिससे संगीत की लिपि सरल और सटीक बनी।
Q6.6. निम्नलिखित चिह्नों को पहचानिए। चिह्न जिस पद्धति में प्रयोग किए जाते हैं उनका नाम दीजिए 1. ०० 2. + 3. 9 4. × 5. मैंग 6. गोरें 7. निध्रुप 8. —
उत्तर:
1. ०० - यह चिह्न विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ताल-लिपि पद्धति में ताल की शुरुआत या सम को दर्शाता है। 2. + - यह चिह्न ताल के विभाजन को दर्शाने के लिए प्रयोग होता है, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ताल-लिपि में। 3. 9 - यह चिह्न ताल की एक विशेष मात्रा या जोड़ को दर्शाता है, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ताल-लिपि में। 4. × - यह चिह्न ताल में विराम या ठहराव को दर्शाता है, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ताल-लिपि में। 5. मैंग - यह चिह्न भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति में प्रयोग होता है, जो स्वर के विशेष प्रकार को दर्शाता है। 6. गोरें - यह चिह्न भी भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति का हिस्सा है, जो स्वर की विकृति या अलंकार को दर्शाता है। 7. निध्रुप - यह चिह्न विष्णु दिगम्बर पलुस्कर स्वरलिपि पद्धति में प्रयोग होता है, जो स्वर की विशेषता को दर्शाता है। 8. — (डैश) - यह चिह्न ताल या स्वर के बीच विराम या विस्तार को दर्शाने के लिए प्रयोग होता है, दोनों पद्धतियों में उपयोग हो सकता है।
व्याख्या:
प्रत्येक चिह्न का प्रयोग संबंधित स्वरलिपि या ताल-लिपि पद्धति में ताल, स्वर, विराम, विभाजन आदि को स्पष्ट रूप से दर्शाने के लिए किया जाता है। विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और भातखण्डे दोनों ने अपनी-अपनी पद्धतियों में इन चिह्नों का विकास किया।
Q7.स्वरलिपि पद्धति क्या है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
स्वरलिपि पद्धति संगीत के क्रियात्मक पक्ष को स्वर और ताल सहित लिखने की विधि है। इसका मुख्य उद्देश्य संगीत की रचनाओं और प्रदर्शन को लिखित रूप में संरक्षित एवं प्रचारित करना है।
व्याख्या:
स्वरलिपि पद्धति वह विधि है जिसमें संगीत के स्वर और ताल को विशेष चिह्नों द्वारा लिखित रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसका उद्देश्य संगीत की रचनाओं को स्थायी रूप से संरक्षित करना और संगीत शिक्षा में सहायता प्रदान करना है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारतीय संगीत में भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति इसका प्रमुख उदाहरण है।
Q8.उत्तर भारतीय संगीत में स्वर-ताल लिपि पद्धति के विकास में किन दो प्रमुख संगीतज्ञों का योगदान है?
उत्तर:
पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे और पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर
व्याख्या:
उत्तर भारतीय संगीत में स्वर-ताल लिपि पद्धति के वैज्ञानिक और प्रामाणिक विकास में पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे और पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर और संगीतज्ञों से संवाद कर आधुनिक स्वर-ताल लिपि पद्धतियाँ विकसित कीं।
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Sangeet · Class 11