Chapter 6
Chapter 6 — अध्ययन नोट्स
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पाठ परिचय
व्याख्यापाठ परिचय
यह पाठ 'उषःकालीन संवाद' बल्लाल सेन द्वारा रचित 'भोजप्रबन्ध' के 'भोजराजस्य राज्यप्राप्तिप्रबन्ध' अंश का संक्षिप्त एवं सम्पादित रूप है। इस पाठ में मनुष्य के मन में जब लोभ व स्वार्थ की भावना घर कर जाती है, तब वह अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए निष्ठुर और घृणित कार्य करने से भी नहीं हिचकिचाता। कथा धाराराज्य के राजा सिन्धुल के परिवेश में घटित होती है, जहाँ वृद्धावस्था में राजा अपने पुत्र भोज और अनुज मुज्ज के भविष्य के विषय में चिंतित रहते हैं। राजा को आशंका होती है कि यदि राज्य भोज को सौंपा गया तो मुज्ज उसकी हत्या कर सकता है। इस प्रकार की परिस्थिति में मुज्ज द्वारा भोज की हत्या की योजना बनती है, परन्तु भोज मृत्यु के समय मुज्ज को एक श्लोक के माध्यम से संसार की नश्वरता का संदेश देते हैं। इस श्लोक में मांन्धाता, रावण, युधिष्ठिर जैसे पौराणिक पात्रों का उदाहरण देकर यह बताया गया है कि संसार में कोई भी स्थायी नहीं है। इस श्लोक को पढ़कर मुज्ज का मन बदल जाता है और वह वैराग्य की ओर अग्रसर होता है। अंततः भोज का पुनर्जीवन होता है और न्याय की स्थापना होती है। इस प्रकार यह पाठ न केवल संस्कृत साहित्य का अमूल्य हिस्सा है, बल्कि जीवन के गूढ़ सत्य को भी प्रस्तुत करता है।
- पाठ 'भोजप्रबन्ध' के 'भोजराजस्य राज्यप्राप्तिप्रबन्ध' का संक्षिप्त रूप है।
- लोभ के कारण मनुष्य निष्ठुर और घृणित कार्य कर सकता है।
- राजा सिन्धुल को पुत्र भोज और मुज्ज के भविष्य की चिंता है।
- मुज्ज भोज की हत्या की योजना बनाता है।
- भोज मृत्यु के समय संसार की नश्वरता का संदेश देते हैं।
- मुज्ज का मन परिवर्तन होकर वह वैराग्य की ओर बढ़ता है।
- भोज का पुनर्जीवन और न्याय की स्थापना होती है।
- 📌 भोजप्रबन्ध - बल्लाल सेन द्वारा रचित संस्कृत साहित्य का अंश।
- 📌 लोभ - स्वार्थ की अतिशय इच्छा।
- 📌 वैराग्य - सांसारिक वस्तुओं से मोह त्याग।
पाठ का घटनाक्रम
व्याख्यापाठ का घटनाक्रम
कथा धाराराज्य के राजा सिन्धुल से प्रारंभ होती है, जो अपनी प्रजा की सेवा में लीन रहते हैं। वृद्धावस्था में उनके मन में चिंता उत्पन्न होती है कि राज्य किसके हाथ में सौंपा जाए। उनके दो पुत्र हैं- बड़ा भोज और अनुज मुज्ज। राजा को डर है कि यदि राज्य भोज को दिया गया तो मुज्ज, जो राज्यलाभ की लालसा से भरा है, अपने स्वार्थ के लिए भोज की हत्या कर सकता है। अतः वे सोचते हैं कि राज्य मुज्ज को देना उचित होगा। इस निर्णय के पश्चात राजा दिवंगत हो जाते हैं और राज्य मुज्ज के अधीन आ जाता है। मुज्ज मुख्य मंत्री बुद्धिसागर को दूर कर देता है और अपने प्रभावी व्यापारिक उपायों से राज्य पर नियंत्रण स्थापित करता है। एक दिन सभा में एक ज्योतिष शास्त्रज्ञ ब्राह्मण आता है और राजा से भोज की जन्मपत्रिका बनाने का आग्रह करता है। मुज्ज भोज की जन्मपत्रिका देखकर अत्यंत चिंतित हो जाता है क्योंकि उसमें भोज के भविष्य की शुभता और राज्य प्राप्ति का संकेत मिलता है। इससे मुज्ज के मन में भोज के प्रति द्वेष और भय उत्पन्न होता है।
- धाराराज्य के राजा सिन्धुल वृद्धावस्था में राज्य के भविष्य को लेकर चिंतित।
- राजा के दो पुत्र हैं- भोज (बड़ा) और मुज्ज (छोटा)।
- राजा सोचते हैं कि मुज्ज राज्य को संभाले क्योंकि भोज की सुरक्षा खतरे में है।
- राजा दिवंगत हो जाते हैं, राज्य मुज्ज के अधीन आ जाता है।
- मुज्ज मुख्य मंत्री बुद्धिसागर को दूर करता है।
- सभा में ब्राह्मण द्वारा भोज की जन्मपत्रिका प्रस्तुत की जाती है।
- जन्मपत्रिका देखकर मुज्ज चिंतित और भयभीत हो जाता है।
- 📌 धाराराज्य - कथा का काल्पनिक राज्य।
- 📌 मुख्यमात्य बुद्धिसागर - राज्य का प्रभावशाली मंत्री।
- 📌 जन्मपत्रिका - व्यक्ति के जन्मकाल पर आधारित भविष्यवाणी।
भोज की हत्या की योजना
व्याख्याभोज की हत्या की योजना
मुज्ज ने भोज की हत्या के लिए वत्सराज नामक एक विश्वसनीय सेवक को बुलवाया। उसने वत्सराज को आदेश दिया कि भोज को रात्रि में वन में ले जाकर मार डाले और उसका सिर प्रमाण स्वरूप लेकर आए। वत्सराज राजा की आज्ञा का पालन करने के लिए तैयार हो गया, परन्तु जब वह भोज
अभ्यास प्रश्न — Chapter 6
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. एकपदेन उत्तरत- (क) धाराराज्ये को राजा प्रजा: पर्यपालयत्? (ख) सिन्धुल: कस्मै राज्यम् अयच्छत्? (ग) सिन्धुल: कस्य उत्सङ्गे भोजं मुमोच? (घ) मुज्ज: कं मुख्यामात्यं दूरीकृतवान्? (ङ) क: विच्छायवदन: अभूत्? (च) मुज्ज: कं समाकारितवान्? (छ) वत्सराज: भोजं रथे निवेश्य कुत्र नीतवान्? (ज) कृतयुगालढ्वारभूत: क: आसीत्? (झ) महोदधौ सेतु: केन रचित:? (ञ) क: वहौ प्रवेशं निश्चितवान्?
उत्तर:
1. एकपदेन उत्तरत- (क) धाराराज्ये राजा सिन्धुल: प्रजा: पर्यपालयत्। (ख) सिन्धुल: भोजस्य राज्यम् अयच्छत्। (ग) सिन्धुल: मुञ्जस्य उत्सङ्गे भोजं मुमोच। (घ) मुज्ज: मुख्यामात्यं भोजं दूरीकृतवान्। (ङ) विच्छायवदन: मुञ्ज: अभूत्। (च) मुज्ज: भोजं समाकारितवान्। (छ) वत्सराज: भोजं रथे निवेश्य राज्ञि नीतवान्। (ज) कृतयुगालढ्वारभूत: मुञ्ज: आसीत्। (झ) महोदधौ सेतु: मुञ्जेन रचित:। (ञ) वहौ प्रवेशं मुञ्ज: निश्चितवान्।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द या एक पद में दिया गया है, जो पाठ के अनुसार है। उदाहरण के लिए, धाराराज्ये राजा सिन्धुल: प्रजा: पर्यपालयत्, यह पाठ में स्पष्ट है। इसी प्रकार अन्य प्रश्नों के उत्तर भी पाठ के अनुसार संक्षेप में दिए गए हैं।
Q2.2. पूर्णवाक्येन उत्तरत- (क) भोज: कस्य पुत्र: आसीत्? (ख) सिन्धुल: किं विचारयामास? (ग) सभायां कौदृश: ब्राह्मण: आगतवान्? (घ) क: भोजस्य जन्मपत्रिकां निर्मितवान्? (ङ) मुज्ज: किम् अचिन्त्यत्? (च) वत्सराज: भोजं कुत्र नीतवान्? (छ) वत्सराज: कम् अनमत्? (ज) मुज्ज: कापालिकं किम् उक्तवान्?
उत्तर:
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत- (क) भोज: सिन्धुलस्य पुत्र: आसीत्। (ख) सिन्धुल: भोजस्य राज्यं विचारयामास। (ग) सभायां एक: ब्राह्मण: आगतवान्। (घ) मुञ्ज: भोजस्य जन्मपत्रिकां निर्मितवान्। (ङ) मुञ्ज: भोजस्य विनाशार्थं उपायं अचिन्तयत्। (च) वत्सराज: भोजं गृहाभ्यन्तरे नीतवान्। (छ) वत्सराज: मुञ्जस्य उपायं अनमत्। (ज) मुञ्ज: कापालिकं दण्डवत् प्राणमत् उक्तवान्।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पूर्ण वाक्य में दिया गया है, जो पाठ के अनुसार है। उदाहरण के लिए, भोज: सिन्धुलस्य पुत्र: आसीत्। इसी प्रकार अन्य प्रश्नों के उत्तर भी पाठ के अनुसार पूर्ण वाक्य में संक्षेपित हैं।
Q3.3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) सिन्धुलस्य भोज: पुत्र: अभवत्। (ख) सिन्धुल: राज्यं मुज्जाय अयच्छत्। (ग) एकदा एक: ब्राह्मण: सभायाम् आगच्छत्। (घ) मुञ्ज: भोजस्य जन्मपत्रिकाम् अदर्शयत्। (ङ) वत्सराज: भोजं गृहाभ्यन्तरे ररक्ष। (च) मुञ्ज: वहृनौ प्रवेशं निश्चितवान्। (छ) मुञ्ज: सभामागतं कापालिकं दण्डवत् प्राणमत्। (ज) भोज: चिरं प्रजा: पालितवान्।
उत्तर:
3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) सिन्धुलस्य भोज: पुत्र: अभवत्। प्रश्न: सिन्धुलस्य पुत्र: क: आसीत्? (ख) सिन्धुल: राज्यं मुज्जाय अयच्छत्। प्रश्न: सिन्धुल: कं राज्यं अयच्छत्? (ग) एकदा एक: ब्राह्मण: सभायाम् आगच्छत्। प्रश्न: एकदा क: सभायाम् आगच्छत्? (घ) मुञ्ज: भोजस्य जन्मपत्रिकाम् अदर्शयत्। प्रश्न: मुञ्ज: कस्य जन्मपत्रिकाम् अदर्शयत्? (ङ) वत्सराज: भोजं गृहाभ्यन्तरे ररक्ष। प्रश्न: वत्सराज: भोजं कुत्र ररक्ष? (च) मुञ्ज: वहृनौ प्रवेशं निश्चितवान्। प्रश्न: मुञ्ज: कस्य वहृनौ प्रवेशं निश्चितवान्? (छ) मुञ्ज: सभामागतं कापालिकं दण्डवत् प्राणमत्। प्रश्न: मुञ्ज: कं दण्डवत् प्राणमत्? (ज) भोज: चिरं प्रजा: पालितवान्। प्रश्न: भोज: किम् चिरं कृतवान्?
व्याख्या:
प्रत्येक रेखाङ्कित पद के आधार पर प्रश्न बनाए गए हैं। उदाहरण के लिए, 'सिन्धुलस्य भोज: पुत्र: अभवत्।' से प्रश्न 'सिन्धुलस्य पुत्र: क: आसीत्?' बनाया गया है। इसी प्रकार अन्य पदों से प्रश्न निर्माण किया गया है।
Q4.4. प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत- यथा - ज्ञात्वा उपसर्ग: धातु: प्रत्यय: ज्ञा - ज्ञा क्त्वा (क) आलोक्य (ख) संवीक्ष्य (ग) अपहाय (घ) दत्तम् (ङ) विचार्य (च) निशम्य (छ) समागम्य (ज) विधाय (झ) भोक्तव्य (ञ) सम्प्रेष्य
उत्तर:
4. प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत- प्रत्येक शब्द का विभाजन इस प्रकार है: (क) आलोक्य = उपसर्ग: आ + धातु: लोक् + प्रत्यय: क्त्वा (ख) संवीक्ष्य = उपसर्ग: सं + धातु: वीक्ष् + प्रत्यय: य (ग) अपहाय = उपसर्ग: अप + धातु: हा + प्रत्यय: य (घ) दत्तम् = धातु: दा + प्रत्यय: त् + म् (ङ) विचार्य = उपसर्ग: वि + धातु: चर् + प्रत्यय: य (च) निशम्य = उपसर्ग: नि + धातु: शम् + प्रत्यय: य (छ) समागम्य = उपसर्ग: सम् + धातु: गम् + प्रत्यय: य (ज) विधाय = धातु: विद् + प्रत्यय: धा + य (झ) भोक्तव्य = धातु: भुज् + प्रत्यय: त्व + य (ञ) सम्प्रेष्य = उपसर्ग: सम् + धातु: प्रेष् + प्रत्यय: य प्रत्येक शब्द को उपसर्ग, धातु और प्रत्यय में विभाजित किया गया है।
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द को तीन भागों में विभाजित किया गया है: उपसर्ग, धातु, और प्रत्यय। उदाहरण के लिए, 'ज्ञात्वा' में ज्ञा उपसर्ग नहीं है, ज्ञा धातु है, क्त्वा प्रत्यय है। इसी प्रकार अन्य शब्दों का विभाजन किया गया है।
Q5.5. प्रकृति-प्रत्ययं नियुज्य शव्वं लिखत- यथा - आ + सीद् + ल्यप् = आसाद्य (क) जीव् + शतृ (ख) मू + क्त (ग) चिन्त् + क्त्वा (घ) हन् + तव्यत् (ड) आ + नी + तव्यत् (च) नि + शम् + ल्यप् (छ) नम् + क्त्वा (ज) आ + कर्ण् + ल्यप् (झ) नि + शिप् + ल्यप् (ञ) मन् + क्त्वा (ट) ज्ञा + क्त्वा (ठ) नी + क्तवतु (ड) आ + पद् + क्त (ढ) हन् + क्तवतु (ण) आ + दिश् + क्त
उत्तर:
5. प्रकृति-प्रत्ययं नियुज्य शव्वं लिखत- (क) जीव् + शतृ = जीवित (ख) मू + क्त = मूक्त (ग) चिन्त् + क्त्वा = चिंतित्वा (घ) हन् + तव्यत् = हन्तव्य (ड) आ + नी + तव्यत् = आनितव्य (च) नि + शम् + ल्यप् = निशाद्य (छ) नम् + क्त्वा = नमित्वा (ज) आ + कर्ण् + ल्यप् = आकराद्य (झ) नि + शिप् + ल्यप् = निशिप्त्य (ञ) मन् + क्त्वा = मन्तित्वा (ट) ज्ञा + क्त्वा = ज्ञातित्वा (ठ) नी + क्तवतु = नीतवतु (ड) आ + पद् + क्त = आपद् (ढ) हन् + क्तवतु = हन्तवतु (ण) आ + दिश् + क्त = आदिष्ट
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द में उपसर्ग, धातु और प्रत्यय को मिलाकर नया शब्द बनाया गया है। उदाहरण के लिए, आ + सीद् + ल्यप् = आसाद्य। इसी प्रकार अन्य शब्दों का निर्माण किया गया है।
Q6.6. उचित अर्थेन सह मेलनं कुरुत- यथा- वसुमती - पृथ्वी (क) निशीथे - गमिष्यति (ख) प्रणिपत्य - समुद्रे (ग) निशम्य - राजौ (घ) पाश्वै - प्रणम्य (ङ) विपिने - श्रुत्वा (च) दशास्यान्तक: - समीपे (छ) दिवम् - वने (ज) अधीत्य - राम: (झ) महोदधौ - स्वर्गम् (ञ) यास्यति - पठित्वा
उत्तर:
6. उचित अर्थेन सह मेलनं कुरुत- (क) निशीथे गमिष्यति - निशीथे (रात्रि के समय) वह गमिष्यति। (ख) प्रणिपत्य समुद्रे - समुद्रे प्रणिपत्य (नमस्कार करके)। (ग) निशम्य राजौ - राजौ निशम्य (देखकर)। (घ) पाश्वै प्रणम्य - पाश्वै (पार्श्व में) प्रणम्य (नमस्कार करके)। (ङ) विपिने श्रुत्वा - विपिने (वन में) श्रुत्वा (सुनकर)। (च) दशास्यान्तक: समीपे - दशास्यान्तक: (दिन के अंत में) समीपे (पास)। (छ) दिवम् वने - दिवम् (दिन) वने (वन में)। (ज) अधीत्य राम: - राम: अधीत्य (पढ़कर)। (झ) महोदधौ स्वर्गम् - महोदधौ (महासागर में) स्वर्गम् (स्वर्ग)। (ञ) यास्यति पठित्वा - यास्यति (जाएगा) पठित्वा (पढ़कर)।
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द युग्म को उचित अर्थ के अनुसार जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए, निशीथे गमिष्यति का अर्थ है 'रात्रि के समय वह जाएगा'। इसी प्रकार अन्य शब्दों का मेल अर्थ के अनुसार किया गया है।
Q7.7. मञ्जूषायां प्रदत्तै: अव्ययशब्दै: रिक्तस्थानानि पूर्यत- तु एव तदा किमर्थम् पुरा चिरम् ... सिन्धुल: नाम राजा आसीत्। स: ... प्रजा: पर्यपालयत्। वृद्धावस्थायां तस्य एक: पुत्र: अभवत्। ... स: अचिन्तयत् ... न स्वपुत्रं भ्रातु: मुञ्जस्य उत्सङ्गे समर्पयामि। सिन्धुल: पुत्रं मुञ्जस्य उत्सङ्गे समर्प्य ... परलोकम् अगच्छत्। सिन्धुले दिवङ्गते मुञ्जस्य मनसि लोभ: समुत्पन्न:। लोभाविष्ट: स: ... भोजस्य विनाशार्थम् उपायं चिन्तितवान्।
उत्तर:
7. मञ्जूषायां प्रदत्तै: अव्ययशब्दै: रिक्तस्थानानि पूर्यत- (1) तु एव तदा किमर्थम् पुरा चिरम् (2) सिन्धुल: नाम राजा आसीत्। स: तदा प्रजा: पर्यपालयत्। (3) वृद्धावस्थायां तस्य एक: पुत्र: अभवत्। स: अचिन्तयत् न स्वपुत्रं भ्रातु: मुञ्जस्य उत्सङ्गे समर्पयामि। (4) सिन्धुल: पुत्रं मुञ्जस्य उत्सङ्गे समर्प्य तत: परलोकम् अगच्छत्। (5) सिन्धुले दिवङ्गते मुञ्जस्य मनसि लोभ: समुत्पन्न:। (6) लोभाविष्ट: स: भोजस्य विनाशार्थम् उपायं चिन्तितवान्।
व्याख्या:
रिक्त स्थानों में उपयुक्त अव्यय शब्दों को भरकर वाक्य पूर्ण किए गए हैं। पाठ के अनुसार सही अव्यय शब्दों का चयन किया गया है।
Q8.8. उदाहरणानुसारं लिखत- (क) यथा - पर्यपालयत् उपसर्ग: भ्रातु: लकार: पुरुष: वचनम् परि पाल् लङ् प्रथम पुरुष एकवचन (1) प्रयच्छामि (2) व्यचिन्तयत् (3) यास्यति (4) मारयिष्यति (5) कथयन्ति (6) भवति (7) असि (ख) यथा - आत्मन: शब्द: लिङ्ग: विभक्ति: वचनम् आत्मन् पुल्लिङ्ग: षष्ठी एकवचनम् (1) पुत्राय (2) लोका: (3) वच: (4) भूमौ (5) श्रीमता (6) महोदधौ (7) वहनौ
उत्तर:
8. उदाहरणानुसारं लिखत- (क) पर्यपालयत् - उपसर्ग: परि - भ्रातु: पाल् - लकार: लङ् - पुरुष: प्रथम - वचनम्: एकवचन (1) प्रयच्छामि - उपसर्ग: प्र + धातु: यच्छ् + लकार: लट् + प्रथम पुरुष + एकवचन (2) व्यचिन्तयत् - उपसर्ग: वि + धातु: चिन्त् + लकार: लङ् + तृतीय पुरुष + एकवचन (3) यास्यति - उपसर्ग: ना (नहीं) + धातु: या + लकार: लट् + तृतीय पुरुष + एकवचन (4) मारयिष्यति - उपसर्ग: मा + धातु: रि + लकार: लिट् + तृतीय पुरुष + एकवचन (5) कथयन्ति - उपसर्ग: का + धातु: थ + लकार: लट् + तृतीय पुरुष + बहुवचन (6) भवति - उपसर्ग: भ + धातु: वि + लकार: लट् + तृतीय पुरुष + एकवचन (7) असि - उपसर्ग: ना + धातु: सि + लकार: लट् + द्वितीय पुरुष + एकवचन (ख) आत्मन: (1) पुत्राय - पुल्लिङ्ग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन (2) लोका: - पुल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (3) वच: - पुल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (4) भूमौ - पुल्लिङ्ग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन (5) श्रीमता - स्त्रीलिङ्ग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन (6) महोदधौ - पुल्लिङ्ग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन (7) वहनौ - पुल्लिङ्ग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द का उपसर्ग, धातु, लकार, पुरुष और वचन का निर्धारण किया गया है। साथ ही, विभक्ति और लिङ्ग का भी निर्धारण किया गया है। उदाहरण के लिए, 'पर्यपालयत्' में उपसर्ग 'परि', धातु 'पाल्', लकार 'लङ्', प्रथम पुरुष, एकवचन है।