Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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ताल-लिपि पद्धति का परिचय
अवधारणाताल-लिपि पद्धति का परिचय
भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल-लिपि पद्धति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ अनुभवों और विचारों को भविष्य के लिए संचित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई, जिसके परिणामस्वरूप लिपि का विकास हुआ। संगीत को लिपिबद्ध करना संगीत रचनाओं को संरक्षण प्रदान करने के समान है। ताल-लिपि पद्धति ताल के विभिन्न ठेकों और उनके स्वरूपों को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने का माध्यम है। इस पद्धति के माध्यम से ताल की लय, गति, मात्रा और ठेकों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे संगीत की संरचना को समझना और सीखना सरल हो जाता है। पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने इस क्षेत्र में विशेष योगदान दिया और ताल-स्वर लिपि पद्धति का निर्माण किया, जो उत्तर भारतीय संगीत में सबसे अधिक प्रचलित है। इस पद्धति में ताल की प्रथम मात्रा को सम (×) और खाली को (0) चिह्नित किया जाता है। ताल के विभागों को अलग करने के लिए '1' चिह्न का प्रयोग होता है तथा ताली की संख्या भी लिखी जाती है। इस पद्धति से संगीत के अध्ययन और प्रस्तुति में स्पष्टता आती है। **Table on page 1 (2×3)** | तिं तिं ना | धी ना | धी ना | | --- | --- | --- | | ☒ | 1 | 2 | **Table on page 15 (3×14)** | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | क | ... | ... | धि | ट | धा | ... | ग | ... | ... | ति | ट | ... | ... | | × | | | | | ... | | | | | 3 | | | | **Table on page 15 (3×16)** | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | धा | धिं | ... | ... | धा | ... | ... | ... | ... | ... | ति | ता | ता | ... | ... | धा | | 1 | | | | 2 | | | | ... | | | | 3 | | | | **Table on page 15 (3×12)** | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | धिं | ... | धागे | ... | त | ना | ... | ... | ... | तिरकिट | ... | ना | | × | | ... | | ... | | 0 | | ... | | 4 | | **Table on page 15 (3×10)** | 1 | 2 | ... | ... | ... | 6 | 7 | ... | ... | ... | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | धी | ना | धी | धी | ... | ती | ... | धी | ... | ना | | ... | | 2 | | | ... | | 3 | | | **Table on page 15 (3×7)** | ... | ... | ... | 4 | 5 | 6 | 7 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | ती | ती | ना | ... | ... | धी | ... | | ... | | | ... | | 2 | | **Table on page 15 (3×6)** | 1 | 2 | 3 | ... | 5 | 6 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | धा | ... | ना | धा | ती | ... | | × | | | ... | | |
- ताल-लिपि पद्धति संगीत की लय, गति और मात्रा को लिखित रूप में व्यक्त करती है।
- पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने इस पद्धति का विकास किया।
- ताल की प्रथम मात्रा को सम (×) और खाली को (0) चिह्नित किया जाता है।
- ताल के विभागों को '1' चिह्न से अलग किया जाता है।
- ताली की संख्या भी ताल-लिपि में लिखी जाती है।
- 📌 ताल-लिपि पद्धति: ताल के ठेकों और लय को लिखित रूप में अभिव्यक्त करने की प्रणाली।
- 📌 सम (×): ताल की प्रथम मात्रा को दर्शाने वाला चिह्न।
- 📌 खाली (0): ताल में ठहराव या विराम को दर्शाने वाला चिह्न।
ताल-लिपि पद्धति का इतिहास एवं विकास
व्याख्याताल-लिपि पद्धति का इतिहास एवं विकास
भारतीय संगीत में ताल-लिपि पद्धति का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। प्रारंभ में ताल का ज्ञान मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होता था। नाट्यशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों में ताल की चर्चा हुई है, जहाँ लघु, गुरु और प्लुत मात्राओं को क्रमशः 1, 2 और 3 मात्राओं के रूप में चिह्नित किया गया था। मध्यकाल में मतंग और शारंगदेव जैसे विद्वानों ने संगीत शास्त्रों का विकास किया। आधुनिक काल में अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में मौलाबख्श, सौरेंद्र मोहन टैगोर, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और विष्णु नारायण भातखंडे जैसे विद्वानों ने संगीत को लिपिबद्ध करने के लिए विभिन्न पद्धतियाँ विकसित कीं। विशेष रूप से पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने सरल और वैज्ञानिक ताल-लिपि पद्धति का निर्माण किया, जिसने संगीत शिक्षा को व्यवस्थित और सुलभ बनाया। भातखंडे ने देश के विभिन्न भागों में भ्रमण कर प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन किया और संगीत के विद्वानों से ज्ञान प्राप्त किया। उनके प्रयासों से संगीत विद्यालयों की स्थापना हुई और संगीत की लिपि पद्धति का प्रचार-प्रसार हुआ। **Table on page 4 (2×4)** | वैदिक | लघु | गुरु | प्लुत | | --- | --- | --- | --- | | मात्रा काल | 1 मात्रा | 2 मात्रा | 3 मात्रा |
- प्रारंभिक काल में ताल का ज्ञान मौखिक परंपरा से संचरित होता था।
- नाट्यशास्त्र में लघु, गुरु और प्लुत मात्राओं के चिह्न दिए गए।
- मध्यकाल में मतंग और शारंगदेव ने संगीत शास्त्रों का विकास किया।
- अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में आधुनिक ताल-लिपि पद्धतियाँ विकसित हुईं।
- पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने सरल और वैज्ञानिक ताल-लिपि पद्धति बनाई।
- भातखंडे के प्रयासों से संगीत विद्यालयों की स्थापना हुई।
- 📌 लघु मात्रा: एक मात्राकाल।
- 📌 गुरु मात्रा: दो मात्राकाल।
- 📌 प्लुत मात्रा: तीन मात्राकाल।
तालों का उनके ठेकों सहित विवरण
व्याख्यातालों का उनके ठेकों सहित विवरण
ताल संगीत में समय नापने का एक महत्वपूर्ण साधन है, जो विभिन्न मात्राओं, विभागों, ताली और खाली के योग से बनता है। ताल संगीत को अनुशासित करता है और उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है। उत्तर भारतीय संगीत में तालों के ठेकों का विशेष महत्व है, जो ताल की
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. झपताल में पाँचवीं मात्रा पर कौन-सा बोल है? (क) ती (ख) ना (ग) धी (घ) धीना
उत्तर:
झपताल में पाँचवीं मात्रा पर 'धी' बोल होता है। इसलिए सही उत्तर है (ग) धी।
व्याख्या:
झपताल के ताल में पाँचवीं मात्रा पर 'धी' बोल आता है। ताल के बोलों को ध्यान से देखकर यह निष्कर्ष निकाला जाता है।
Q2.2. एकताल में कितने विभाग होते हैं? (क) 12 (ख) छह (ग) तीन (घ) दो
उत्तर:
एकताल में छह विभाग होते हैं। इसलिए सही उत्तर है (ख) छह।
व्याख्या:
एकताल की संरचना में कुल छह विभाग होते हैं, जो ताल की मात्राओं को विभाजित करते हैं।
Q3.3. दादरा में कितनी मात्राएँ हैं? (क) दो (ख) तीन (ग) चार (घ) छह
उत्तर:
दादरा ताल में छह मात्राएँ होती हैं। इसलिए सही उत्तर है (घ) छह।
व्याख्या:
दादरा ताल की संरचना में कुल छह मात्राएँ होती हैं, जो ताल की लय को दर्शाती हैं।
Q4.4. कहरवा ताल में कितने ताल के चिह्न होते हैं? (क) पाँच (ख) एक (ग) तीन (घ) दो
उत्तर:
कहरवा ताल में दो ताल के चिह्न होते हैं। इसलिए सही उत्तर है (घ) दो।
व्याख्या:
कहरवा ताल की लय में दो प्रमुख ताल चिह्न होते हैं जो ताल की संरचना को दर्शाते हैं।
Q5.5. रूपक ताल का सम कहाँ दिखाया जाता है? (क) पहली मात्रा (ख) चौथी मात्रा (ग) तीसरी मात्रा (घ) छठी मात्रा
उत्तर:
रूपक ताल का सम चौथी मात्रा पर दिखाया जाता है। इसलिए सही उत्तर है (ख) चौथी मात्रा।
व्याख्या:
रूपक ताल की संरचना में सम (ताल की शुरुआत) चौथी मात्रा पर होता है, जो ताल की लय को व्यवस्थित करता है।
Q6.6. दादरा ताल में कितने विभाग होते हैं? (क) तीन (ख) दो (ग) चार (घ) एक
उत्तर:
दादरा ताल में दो विभाग होते हैं। इसलिए सही उत्तर है (ख) दो।
व्याख्या:
दादरा ताल की लय में दो विभाग होते हैं, जो ताल की मात्राओं को विभाजित करते हैं।
Q7.7. तीनताल कितनी मात्राओं का होता है? (क) 12 (ख) आठ (ग) 16 (घ) 18
उत्तर:
तीनताल 16 मात्राओं का होता है। इसलिए सही उत्तर है (ग) 16।
व्याख्या:
तीनताल की संरचना में कुल 16 मात्राएँ होती हैं, जो ताल की लय को दर्शाती हैं।
Q8.रिवर्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 1. ताल का नाम ____________________________________________________________ | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | क | ... | ... | धि | ट | धा | ... | ग | ... | ... | ति | ट | ... | ... | | × | | | | | ... | | | | | 3 | | | |
उत्तर:
ताल का नाम झपताल है। ताल के बोलों को देखकर और ताल के चिह्नों से यह पता चलता है कि यह झपताल है।
व्याख्या:
ताल के बोलों और चिह्नों के आधार पर ताल की पहचान की जाती है। ताल के स्वरूप को देखकर यह झपताल है।
Tabla evam Pakhawaj के सभी 8 अध्याय
Sangeet · Class 11