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Chapter 5

🎓 Class 11📖 Hindustani Sangeet Gayan Evam Vadan📖 11 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~17 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 10Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 11 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

हिंदुस्तानी संगीत में राग पद्धति का प्रारंभिक विकास

व्याख्या

हिंदुस्तानी संगीत में राग पद्धति का प्रारंभिक विकास

हिंदुस्तानी संगीत की राग पद्धति का विकास प्राचीन काल से प्रारंभ हुआ। इसका इतिहास वेदों और उपनिषदों के समय से जुड़ा हुआ है, जहाँ संगीत को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग माना जाता था। वेदों में संगीत को मंत्रों के उच्चारण के साथ जोड़ा गया था, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता स्पष्ट होती है। इसके बाद, विभिन्न कालों में संगीत के स्वरूप में परिवर्तन होते हुए राग पद्धति का विकास हुआ। प्रारंभिक काल में संगीत के स्वर और ताल की संरचना पर विशेष ध्यान दिया गया। मूर्छना की अवधारणा इसी काल में विकसित हुई, जो स्वर संयोजन की वह पद्धति है जिससे राग का स्वरूप निर्धारित होता है। मूर्छना के माध्यम से स्वर संयोजन की विविधताएं उत्पन्न हुईं, जिससे रागों की संख्या और उनकी विशेषताएं बढ़ीं। साथ ही, संगीत की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका भी इस काल में स्पष्ट हुई, जहाँ विभिन्न जातियों और समुदायों ने संगीत के विकास में योगदान दिया। इस प्रकार, हिंदुस्तानी संगीत की राग पद्धति का प्रारंभिक विकास एक लंबी प्रक्रिया थी, जिसमें धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक तत्वों का समावेश था।

  • हिंदुस्तानी संगीत की राग पद्धति का विकास प्राचीन वेदों और उपनिषदों से शुरू हुआ।
  • संगीत को धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन का अभिन्न अंग माना गया।
  • मूर्छना की अवधारणा प्रारंभिक काल में विकसित हुई।
  • स्वर और ताल की संरचना पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश ने संगीत के विकास में भूमिका निभाई।
  • 📌 राग: संगीत का वह स्वरूप जिसमें विशिष्ट स्वर संयोजन और भाव होते हैं।
  • 📌 मूर्छना: स्वर संयोजन की वह पद्धति जिससे राग का स्वरूप निर्धारित होता है।

मूर्छना और स्वर रचना

व्याख्या

मूर्छना और स्वर रचना

मूर्छना का अर्थ है स्वर संयोजन की वह पद्धति जिससे राग का स्वरूप निर्धारित होता है। हिंदुस्तानी संगीत में मूर्छना का विशेष महत्व है क्योंकि यह रागों के स्वरूप को परिभाषित करती है। मूर्छना के आधार पर ही संगीत में विभिन्न रागों का निर्माण होता है। मूर्छना में आरंभ स्वर को आधार मानकर स्वर रचना की जाती है, जिससे राग की विशिष्टता और पहचान बनती है। मूर्छना के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनके नाम और स्वर रचना अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए, उत्तरायता मूर्छना का आरंभ स्वर 'स' होता है और इसका स्वर संयोजन 'स नि ध प म ग रे' होता है। इसी प्रकार अश्वक्रान्ता मूर्छना का आरंभ स्वर 'ग' है और इसका स्वर संयोजन 'ग रे स नि ध प म' होता है। मूर्छना की यह विविधता संगीत की भावना और रागों की विविधता को बढ़ाती है। स्वर रचना में मूर्छना के स्वर क्रम का पालन किया जाता है, जिससे राग का स्वरूप स्पष्ट होता है। इस प्रकार मूर्छना और स्वर रचना हिंदुस्तानी संगीत की राग पद्धति के मूल आधार हैं। **Table on page 5 (3×3)** | आरंभ स्वर | मूर्छना का नाम | स्वर रचना | | --- | --- | --- | | स | उत्तरायता | स नि ध प म ग रे | | ग | अश्वक्रान्ता | ग रे स नि ध प म | **Table on page 5 (3×3)** | आरंभ स्वर | मूर्छना का नाम | स्वर रचना | | --- | --- | --- | | म | सोवोरी | म ग रे स नि ध प | | नि | मार्गी | नि ध प म ग रे स | **Table on page 17 (11×2)** | थाट | स्वर | | --- | --- | | बिलावल | स _________ ग म _________ | | ________________________ | स रे ग म प ध नि सं | | भैरव | स रे _____________ नि सं | | खमाज | स _____________ सं | | ________________________ | स रे ग म प ध नि सं | | आसावरी | स _________ म प _________ सं | | ________________________ | स रे ग म प ध नि सं | | मारवा | __________ रे _________ | | पूर्वी | __________ ध नि सं | | भैरवी | __________ |

  • मूर्छना स्वर संयोजन की वह पद्धति है जिससे राग का स्वरूप निर्धारित होता है।
  • मूर्छना के आधार पर रागों का निर्माण होता है।
  • प्रत्येक मूर्छना का एक आरंभ स्वर और विशिष्ट स्वर रचना होती है।
  • उत्तरायता और अश्वक्रान्ता मूर्छना इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  • मूर्छना की विविधता से संगीत में रागों की विविधता उत्पन्न होती है।
  • 📌 मूर्छना: स्वर संयोजन की पद्धति जो राग के स्वरूप को परिभाषित करती है।
  • 📌 स्वर रचना: मूर्छना के आधार पर स्वर का क्रम।

रागों का स्वरूप और वर्गीकरण

व्याख्या

रागों का स्वरूप और वर्गीकरण

राग हिंदुस्तानी संगीत का मूल आधार हैं। प्रत्येक राग का अपना विशिष्ट स्वरूप होता है, जो उसके मूर्छना और स्वर रचना पर निर्भर करता है। रागों को उनके स्वरूप, समय, और भाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। स्वरूप के आधार पर रागों को उनके आरोह (चढ़ाव) और अवर

अभ्यास प्रश्नChapter 5

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. गान के दो भेद कौन से हैं?

उत्तर:

गान के दो भेद हैं— निबद्ध गान और अनिबद्ध गान। निबद्ध गान वह होता है जिसमें ताल और छंद का पालन किया जाता है, जैसे ध्रुपद, धमार आदि। अनिबद्ध गान में ताल का पालन नहीं होता, जैसे आलाप, ठुमरी आदि।

व्याख्या:

गान के प्रकारों को उनकी तालबद्धता के आधार पर दो भागों में बांटा जाता है। निबद्ध गान में ताल और छंद का नियम होता है, जबकि अनिबद्ध गान में ये नियम नहीं होते।

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Q2.2. रामायण के समय कौन से ग्राम राग थे?

उत्तर:

रामायण के समय ग्राम रागों का प्रचलन था। ग्राम राग वे राग होते थे जो ग्राम अर्थात् स्वर समूहों पर आधारित होते थे। इन रागों का उपयोग प्राचीन संगीत में होता था।

व्याख्या:

प्राचीन काल में संगीत के स्वर समूहों को ग्राम कहा जाता था, और उन पर आधारित रागों को ग्राम राग कहा गया। रामायण काल में इसी प्रकार के राग प्रचलित थे।

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Q3.3. मार्गी संगीत को विस्तार से समझाइए।

उत्तर:

मार्गी संगीत वह संगीत है जो शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों और सिद्धांतों के अनुसार रचित और प्रस्तुत किया जाता है। इसमें स्वर, ताल, लय, और राग के नियमों का कड़ाई से पालन होता है। मार्गी संगीत का उद्देश्य शास्त्रीय संगीत की शुद्धता और गंभीरता को बनाए रखना होता है।

व्याख्या:

मार्गी संगीत शास्त्रोक्त संगीत है जो शास्त्रों के नियमों का पालन करता है। यह संगीत शुद्ध और व्यवस्थित होता है, जिसमें राग-ताल की परंपरागत संरचना होती है।

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Q4.4. जातियों से क्या अभिप्राय था?

उत्तर:

जातियों से अभिप्राय था संगीत की विभिन्न श्रेणियाँ या वर्ग जिनमें स्वर, ताल, और रागों का वर्गीकरण किया जाता था। यह वर्गीकरण संगीत के स्वरूप और शैली को समझने में सहायक था।

व्याख्या:

प्राचीन संगीत में जाति शब्द का प्रयोग विभिन्न स्वर समूहों या संगीत के प्रकारों के लिए किया जाता था, जो संगीत की विविधता को दर्शाता था।

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Q5.5. देशी संगीत के प्रचलित होने के क्या प्रमुख कारण हैं? अपने शब्दों में बताइए।

उत्तर:

देशी संगीत के प्रचलित होने के प्रमुख कारण हैं— स्थानीय जनरुचि, क्षेत्रीय सांस्कृतिक प्रभाव, सरलता एवं सहजता, और जनसामान्य के बीच लोकप्रियता। देशी संगीत में शास्त्रीय नियमों की कठोरता नहीं होती, जिससे यह आम जनता के बीच अधिक लोकप्रिय हुआ।

व्याख्या:

देशी संगीत स्थानीय संस्कृति और जनरुचि के अनुरूप विकसित हुआ, इसलिए यह आम लोगों में अधिक प्रिय हुआ। इसकी सरलता और सहजता ने इसे व्यापक रूप से स्वीकार्य बनाया।

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Q6.6. महाभारत के समय मूच्छना से क्या अभिप्राय था?

उत्तर:

महाभारत के समय मूच्छना का अभिप्राय था स्वर के ऊपर उठना या स्वर को ऊपर की ओर खींचना। यह संगीत में स्वर की विशेषता को दर्शाता था।

व्याख्या:

मूच्छना शब्द का प्रयोग स्वर की ऊंचाई या स्वर के ऊपर उठने की क्रिया के लिए किया जाता था, जो संगीत की अभिव्यक्ति में महत्वपूर्ण था।

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Q7.7. प्राचीन काल में निम्नलिखित स्वरों के लिए प्रयुक्त की गई शब्दावली बताइए— (क) दो स्वर (ख) एक स्वर (ग) तीन स्वर (घ) चार स्वर

उत्तर:

प्राचीन काल में स्वरों के लिए शब्दावली इस प्रकार थी— (क) दो स्वर— द्विस्वर (ख) एक स्वर— एकस्वर (ग) तीन स्वर— त्रिस्वर (घ) चार स्वर— चतुस्वर

व्याख्या:

स्वरों की संख्या के अनुसार प्राचीन संगीत में इन्हीं शब्दों का प्रयोग होता था जो स्वर समूहों को दर्शाते थे।

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Q8.8. मार्गी-देशी संगीत के अंतर को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

मार्गी संगीत शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करता है, जिसमें स्वर, ताल, और राग की शुद्धता होती है। देशी संगीत स्थानीय जनरुचि और क्षेत्रीय प्रभावों से प्रभावित होता है, जिसमें शास्त्रीय नियमों की कठोरता नहीं होती। मार्गी संगीत गंभीर और शास्त्रीय होता है, जबकि देशी संगीत सरल और लोकप्रिय होता है।

व्याख्या:

मार्गी और देशी संगीत के बीच मुख्य अंतर नियमों के पालन और शैली में होता है। मार्गी संगीत शास्त्रीय होता है, देशी संगीत क्षेत्रीय और लोक संगीत होता है।

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