Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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धातुरूप सामान्य परिचय
व्याख्याधातुरूप सामान्य परिचय
संस्कृत भाषा में क्रियापद का मूल रूप धातु कहलाता है। धातु वह शब्द है जिससे किसी कार्य के होने या करने का बोध होता है। उदाहरण के लिए वाक्य "राम: पुस्तकं पठति" में 'पठ' धातु है, जो पढ़ने की क्रिया को दर्शाता है। संस्कृत साहित्य में अनेक धातुएँ हैं, जिन्हें 10 गणों में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक गण का नाम उस गण में आने वाली प्रथम धातु के आधार पर रखा गया है, जैसे भ्वादिगण का आधार 'भू' धातु है। ये 10 गण हैं: भ्वादिगण, अदादिगण, जुहोत्यादिगण, दिवादिगण, स्वादिगण, रुधादिगण, तुदादिगण, तनादिगण, क्रयादिगण, और चुरादिगण। इस वर्गीकरण से धातुओं का अध्ययन व्यवस्थित होता है और व्याकरण की समझ गहरी होती है।
- धातु क्रियापद का मूल रूप होता है।
- धातु से क्रिया के होने या करने का बोध होता है।
- संस्कृत में धातुओं का वर्गीकरण 10 गणों में किया गया है।
- प्रत्येक गण का नाम उस गण की प्रथम धातु पर आधारित होता है।
- धातुओं के अध्ययन से संस्कृत व्याकरण की समझ सुदृढ़ होती है।
- 📌 धातु: क्रियापद का मूल रूप जो क्रिया के होने का बोध कराता है।
- 📌 गण: धातुओं का वर्गीकरण जिसमें प्रत्येक वर्ग की प्रथम धातु के नाम पर नामकरण होता है।
परस्मैपदी, आत्मनेपदी एवं उभयपदी धातु
व्याख्यापरस्मैपदी, आत्मनेपदी एवं उभयपदी धातु
संस्कृत व्याकरण में धातुओं को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: परस्मैपदी, आत्मनेपदी और उभयपदी। परस्मैपदी धातु वे होती हैं जिनकी क्रिया कर्म पर होती है, जैसे 'पठति', 'लिखति'। इनका वर्तमानकाल रूप 'ति', 'त', 'अन्ति' होता है। आत्मनेपदी धातुओं में वर्तमानकाल रूप 'ते', 'इते', 'अन्ते' होता है, जैसे 'सेवते', 'सेवेते', 'सेवन्ते'। कुछ धातुएँ उभयपदी होती हैं, जिनमें दोनों प्रकार के रूप पाए जाते हैं, जैसे 'कृ', 'ब्रू', 'पच'। उभयपदी धातुओं में यदि क्रिया का फल कर्तृगामी हो तो आत्मनेपदी रूप और परगामी हो तो परस्मैपदी रूप का प्रयोग होता है। इस वर्गीकरण से क्रियाओं के रूपों का सही प्रयोग संभव होता है।
- धातु तीन प्रकार की होती हैं: परस्मैपदी, आत्मनेपदी, उभयपदी।
- परस्मैपदी धातुओं के वर्तमानकाल रूप: 'ति', 'त', 'अन्ति'।
- आत्मनेपदी धातुओं के वर्तमानकाल रूप: 'ते', 'इते', 'अन्ते'।
- उभयपदी धातुओं में दोनों प्रकार के रूप पाए जाते हैं।
- उभयपदी धातुओं में क्रिया फल के अनुसार रूप का चयन होता है।
- 📌 परस्मैपदी: कर्म पर होने वाली क्रिया वाली धातु।
- 📌 आत्मनेपदी: कर्ता पर होने वाली क्रिया वाली धातु।
- 📌 उभयपदी: दोनों प्रकार के रूपों वाली धातु।
संस्कृत के लकार और उनके प्रयोग
व्याख्यासंस्कृत के लकार और उनके प्रयोग
संस्कृत व्याकरण में काल, विधि, और मनोभाव के आधार पर दस प्रकार के लकार होते हैं। ये लकार क्रियाओं के विभिन्न कालों और भावों को व्यक्त करते हैं। प्रमुख लकार हैं: लट् (वर्तमानकाल), लिट् (ऐतिहासिक काल), लुट् (भविष्यत् काल, जो अभी नहीं हुआ), लूट् (सामान्य
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.प्र. 1. कोष्ठके प्रदत्तधातो: निर्दिष्टलकारे समुचितप्रयोगेण वाक्यानि पूर्यत— i) बालका: पुस्तकानि ... । (पट्-लट्) ii) पुस्तकानि पठित्वा ते विद्वांस: ... । (भू-लूट्) iii) यूयम् उद्धाने कदा ... । (क्रीड्-लड्) iv) किम् आवाम् अद्य ... । (भ्रम्-लोट्) v) त्वम् ध्यानेन पाठं ... । (पट्-विधिलिङ्) vi) साधव: तप: ... । (तप्-लट्) vii) वयम् उत्तमान् अड्कान् ... । (लभ्-लूट्) viii) नाटकं दृष्ट्वा सर्वे ... । (मुद्-लड्) ix) पितरं वार्धक्ये पुत्र: अवश्यं ... । (सेव्-लोट्) x) हे प्रभो ! संसारे कोऽपि भिक्षां न ... । (याच्-विधिलिङ्)
उत्तर:
प्र. 1 के प्रत्येक वाक्य में निर्दिष्ट धातु को दिए गए लकार में प्रयोग करते हुए वाक्य पूर्ण करें: (i) बालका: पुस्तकानि पठन्ति । (पट्-लट्) व्याख्या: 'पट्' धातु का लट् लकार वर्तमान काल सूचित करता है। (ii) पुस्तकानि पठित्वा ते विद्वांस: अभवन् । (भू-लूट्) व्याख्या: 'भू' धातु का लूट् लकार भूतकाल सूचित करता है। (iii) यूयम् उद्धाने कदा क्रीडथ । (क्रीड्-लड्) व्याख्या: 'क्रीड्' धातु का लड् लकार भविष्यत्काल सूचित करता है। (iv) किम् आवाम् अद्य भ्रमामः । (भ्रम्-लोट्) व्याख्या: 'भ्रम्' धातु का लोट् लकार आज्ञा सूचित करता है। (v) त्वम् ध्यानेन पाठं पठसि । (पट्-विधिलिङ्) व्याख्या: 'पट्' धातु का विधिलिङ् लकार आज्ञा सूचित करता है। (vi) साधव: तप: कुर्वन्ति । (तप्-लट्) व्याख्या: 'तप्' धातु का लट् लकार वर्तमान काल सूचित करता है। (vii) वयम् उत्तमान् अड्कान् लब्धुम् इच्छामः । (लभ्-लूट्) व्याख्या: 'लभ्' धातु का लूट् लकार भूतकाल सूचित करता है। (viii) नाटकं दृष्ट्वा सर्वे मुदिताः आसन् । (मुद्-लड्) व्याख्या: 'मुद्' धातु का लड् लकार भविष्यत्काल सूचित करता है। (ix) पितरं वार्धक्ये पुत्र: अवश्यं सेवते । (सेव्-लोट्) व्याख्या: 'सेव्' धातु का लोट् लकार आज्ञा सूचित करता है। (x) हे प्रभो ! संसारे कोऽपि भिक्षां न याचते । (याच्-विधिलिङ्) व्याख्या: 'याच्' धातु का विधिलिङ् लकार आज्ञा सूचित करता है।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में दिए गए धातु को निर्दिष्ट लकार में प्रयोग कर वाक्य पूर्ण करना है। लकार के अनुसार क्रिया रूप बदलता है। उदाहरण स्वरूप, लट् वर्तमान काल सूचित करता है, लूट् भूतकाल, लड् भविष्यत्काल, लोट् आज्ञा, विधिलिङ् आज्ञा आदि। इस प्रकार सभी वाक्यों को सही रूप में पूर्ण किया गया है।
Q2.प्र. 2. कोष्ठकात् समुचितं क्रियापदं चित्वा वाक्यानि पूर्यत— i) अद्य युवाम् विद्यालयं किमर्थं न ... ? (अगच्छताम्/ अगच्छतम्/अगच्छत) ii) पुरा जना: संस्कृतभाषया ... । (भाषन्ते/भाषामहे/ अभाषन्त) iii) यूयम् कं पाठम् ... ? (अपठत/ अपठत्/ अपठन्) iv) जीवा: सर्वेऽत्र ... भावयन्त: परस्परम् । (मोदताम्/ मोदेताम्/ मोदन्ताम्) v) कक्षायाम् सर्वे ध्यानेन ... । (पठतु/ पठताम्/ पठन्तु) vi) प्रभो मह्यम् बुद्धिम् ... । (यच्छ/ यच्छतम्/ यच्छत) vii) वयं सदैव सुधीरा: सुवीरा: च ... । (भवेव/ भवेम/ भवेयम्) viii) त्वं सायं कुत्र ... ? (गमिष्यसि/ गमिष्यथ:/ गमिष्यथ) ix) विद्वान् सर्वत्र ... । (पूज्यन्ते/ पूज्येते/ पूज्यते) x) अद्यत्वे समाचारपत्रस्य महत्त्वं सर्वे ... । (जानाति/ जानन्ति/ जानासि)
उत्तर:
प्र. 2 के प्रत्येक वाक्य में कोष्ठक में दिए गए विकल्पों में से समुचित क्रियापद चुनकर वाक्य पूर्ण करें: i) अद्य युवाम् विद्यालयं किमर्थं न अगच्छताम् ? व्याख्या: 'अगच्छताम्' लोट् लकार द्वितीय पुरुष द्विवचन रूप है, जो आज्ञा सूचित करता है। ii) पुरा जना: संस्कृतभाषया भाषन्ते । व्याख्या: 'भाषन्ते' लट् लकार बहुवचन रूप है, वर्तमान काल सूचित करता है। iii) यूयम् कं पाठम् अपठत् ? व्याख्या: 'अपठत्' लिट् लकार द्वितीय पुरुष द्विवचन रूप है, भूतकाल सूचित करता है। iv) जीवा: सर्वेऽत्र मोदताम् भावयन्त: परस्परम् । व्याख्या: 'मोदताम्' लोट् लकार बहुवचन रूप है, आज्ञा सूचित करता है। v) कक्षायाम् सर्वे ध्यानेन पठन्तु । व्याख्या: 'पठन्तु' लोट् लकार बहुवचन रूप है, आज्ञा सूचित करता है। vi) प्रभो मह्यम् बुद्धिम् यच्छ । व्याख्या: 'यच्छ' लोट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन रूप है, आज्ञा सूचित करता है। vii) वयं सदैव सुधीरा: सुवीरा: च भवेयम् । व्याख्या: 'भवेयम्' लिट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन रूप है, संभावित काल सूचित करता है। viii) त्वं सायं कुत्र गमिष्यसि ? व्याख्या: 'गमिष्यसि' लड् लकार द्वितीय पुरुष एकवचन रूप है, भविष्यत्काल सूचित करता है। ix) विद्वान् सर्वत्र पूज्यन्ते । व्याख्या: 'पूज्यन्ते' लट् लकार बहुवचन रूप है, वर्तमान काल सूचित करता है। x) अद्यत्वे समाचारपत्रस्य महत्त्वं सर्वे जानन्ति । व्याख्या: 'जानन्ति' लट् लकार बहुवचन रूप है, वर्तमान काल सूचित करता है।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में दिए गए विकल्पों में से व्याकरण और लकार के अनुसार सही क्रियापद चुनना है। लकार और पुरुष के अनुसार क्रियापद का रूप निर्धारित होता है। उदाहरण स्वरूप, लट् वर्तमान काल, लिट् भूतकाल, लड् भविष्यत्काल, लोट् आज्ञा आदि। इस प्रकार सभी वाक्यों को सही विकल्प से पूर्ण किया गया है।
Q3.संस्कृत में जिस शब्द द्वारा किसी कार्य के होने या करने का बोध होता है, उसे क्या कहा जाता है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
धातु वह शब्द है जिससे किसी कार्य के होने या करने का बोध होता है। उदाहरण के लिए, वाक्य 'राम: पुस्तकं पठति' में 'पठ' धातु है जो पढ़ने की क्रिया को दर्शाता है।
व्याख्या:
धातु संस्कृत भाषा में क्रियापद का मूल रूप होता है, जो क्रिया के होने या करने का संकेत देता है। उदाहरण से स्पष्ट होता है कि 'पठ' धातु है, जिससे 'पठति' क्रिया रूप बनता है।
Q4.संस्कृत धातुओं के गणों का वर्गीकरण कितने प्रकार का है और उनके नामकरण का आधार क्या होता है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
संस्कृत धातुओं को 10 गणों में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक गण का नाम उस गण में आने वाली प्रथम धातु के आधार पर रखा जाता है। उदाहरण के लिए, भ्वादिगण का आधार 'भू' धातु है और चुरादिगण का आधार 'चुरू' धातु है।
व्याख्या:
धातुओं के वर्गीकरण से व्याकरण की समझ गहरी होती है। 10 गण हैं: भ्वादिगण, अदादिगण, जुहोत्यादिगण, दिवादिगण, स्वादिगण, रुधादिगण, तुदादिगण, तनादिगण, क्रयादिगण, चुरादिगण। नामकरण उनके प्रथम धातु पर आधारित होता है।
Q5.परस्मैपदी, आत्मनेपदी और उभयपदी धातुओं में क्या भेद होता है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परस्मैपदी धातु वे होती हैं जिनकी क्रिया कर्म पर होती है और वर्तमानकाल में 'ति', 'त', 'अन्ति' रूप होते हैं, जैसे 'पठति'। आत्मनेपदी धातु में 'ते', 'इते', 'अन्ते' रूप होते हैं, जैसे 'सेवते'। उभयपदी धातुओं में दोनों प्रकार के रूप होते हैं, जैसे 'कृ' धातु।
व्याख्या:
परस्मैपदी क्रिया कर्म पर होती है और आत्मनेपदी क्रिया कर्ता के लिए होती है। उभयपदी धातु दोनों प्रकार के रूप धारण करती है। उदाहरण से यह भेद स्पष्ट होता है।
Q6.संस्कृत में लकारों की संख्या कितनी है? लट् लकार और लिट् लकार के प्रयोग का भेद स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संस्कृत में कुल दस लकार होते हैं। लट् लकार वर्तमानकाल को व्यक्त करता है, जैसे 'राम: पठति'। लिट् लकार ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करता है, जो हमारे सामने न घटी हों, जैसे 'राम: रावणं जघान'।
व्याख्या:
लकार काल और मनोभाव व्यक्त करते हैं। लट् वर्तमानकाल के लिए और लिट् ऐतिहासिक घटनाओं के लिए प्रयोग होता है। दोनों का प्रयोग काल के आधार पर भिन्न होता है।
Q7.लुट् लकार और लूट् लकार में क्या अंतर है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
लुट् लकार भविष्यत् काल की क्रिया को व्यक्त करता है जो अभी नहीं हुई हो, जैसे 'श्व: प्रधानमंत्री रूसदेशं गन्ता'। लूट् लकार सामान्य भविष्यत् काल की घटनाओं को दर्शाता है, जैसे 'स: लेखं लेखिष्यति'।
व्याख्या:
दोनों लकार भविष्यत् काल के लिए हैं, पर लुट् काल अभी न हुआ हो, जबकि लूट् सामान्य भविष्यत् काल को दर्शाता है। उदाहरण से यह भेद स्पष्ट होता है।
Q8.लोट् लकार का प्रयोग किस लिए होता है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
लोट् लकार आज्ञा देने के भाव को प्रकट करने के लिए प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए, 'स: गृहकार्यं करोतु'।
व्याख्या:
लोट् लकार द्वारा आदेश या आज्ञा व्यक्त की जाती है, जो क्रिया के भाव को स्पष्ट करता है। उदाहरण से इसका प्रयोग समझा जा सकता है।