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Chapter 4

🎓 Class 12📖 Manovigyan📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 3अध्याय 4 / 7Chapter 5

Chapter 4अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय

व्याख्या

परिचय

इस अध्याय में हम मनोवैज्ञानिक विकारों की अवधारणा, उनके कारण, प्रकार, लक्षण और उपचार की विस्तृत जानकारी प्राप्त करेंगे। मनोवैज्ञानिक विकार वे अवस्थाएँ हैं जिनमें व्यक्ति की सोच, भावना, व्यवहार या सामाजिक कार्यक्षमता में बाधा आती है। जीवन में तनाव, दबाव और कठिनाइयाँ सभी को प्रभावित करती हैं, लेकिन कुछ व्यक्तियों में ये समस्याएँ अत्यधिक गंभीर रूप ले लेती हैं, जिससे उनका सामान्य जीवन प्रभावित होता है। मनोवैज्ञानिक विकारों का अध्ययन लगभग 2500 वर्षों से होता आ रहा है, जिसमें विभिन्न संस्कृतियों और समयों में इनके कारणों और उपचारों को समझने का प्रयास किया गया है। इस अध्याय में हम इन विकारों के सामाजिक, जैविक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझेंगे।

  • मनोवैज्ञानिक विकार व्यक्ति के सोच, भावना, व्यवहार और सामाजिक कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं।
  • जीवन की समस्याओं के प्रति तीव्र प्रतिक्रिया मनोवैज्ञानिक विकारों का कारण बन सकती है।
  • मनोवैज्ञानिक विकारों का अध्ययन 2500 वर्षों से होता आ रहा है।
  • अध्याय में विकारों के कारण, लक्षण, वर्गीकरण और उपचार पर चर्चा की जाएगी।
  • 📌 मनोवैज्ञानिक विकार: सोच, भावना, व्यवहार या सामाजिक कार्यक्षमता में बाधा उत्पन्न करने वाली मानसिक अवस्थाएँ।
  • 📌 अपसामान्य व्यवहार: सामान्य से भिन्न, कष्टप्रद और दुरनुकूलक व्यवहार।

अपसामान्यता तथा मनोवैज्ञानिक विकार के संप्रत्यय

अवधारणा

अपसामान्यता तथा मनोवैज्ञानिक विकार के संप्रत्यय

अपसामान्यता का अर्थ है सामान्य से हटकर व्यवहार करना। मनोवैज्ञानिक विकारों को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि कौन-सा व्यवहार सामान्य है और कौन-सा असामान्य। इसके लिए चार मापदंड महत्वपूर्ण हैं: विसामान्यता (सामाजिक मानकों से विचलन), कष्ट (व्यक्ति या दूसरों के लिए कष्टप्रद होना), अपक्रिया (दैनिक जीवन में कार्य करने में बाधा) और खतरा (व्यक्ति या समाज के लिए जोखिम)। सामाजिक मानकों के अनुसार व्यवहार का मूल्यांकन किया जाता है, जो संस्कृति, इतिहास और सामाजिक मूल्यों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, आक्रामक व्यवहार कुछ समाजों में स्वीकार्य हो सकता है जबकि अन्य में अपसामान्य। इसके अलावा, दुरनुकूलक व्यवहार का मापदंड भी महत्वपूर्ण है, जिसमें देखा जाता है कि व्यवहार व्यक्ति के कल्याण और विकास में बाधक तो नहीं। मनोवैज्ञानिक विकारों को समझने के लिए जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोणों का समन्वय आवश्यक है।

  • अपसामान्यता का अर्थ सामान्य से हटकर व्यवहार।
  • चार मापदंड: विसामान्यता, कष्ट, अपक्रिया, खतरा।
  • सामाजिक मानक और संस्कृति अपसामान्यता को प्रभावित करते हैं।
  • दुरनुकूलक व्यवहार व्यक्ति के कल्याण के लिए हानिकारक होता है।
  • मनोवैज्ञानिक विकारों के लिए जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक महत्वपूर्ण।
  • 📌 विसामान्यता: सामाजिक मानकों से विचलित व्यवहार।
  • 📌 दुरनुकूलक व्यवहार: ऐसा व्यवहार जो व्यक्ति के विकास और कल्याण में बाधा उत्पन्न करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

व्याख्या

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मनोवैज्ञानिक विकारों को समझने के लिए उनके ऐतिहासिक दृष्टिकोण को जानना आवश्यक है। प्राचीन काल में अपसामान्य व्यवहार को अलौकिक शक्तियों, जैसे भूत-प्रेत या शैतान का प्रभाव माना जाता था, जिसके लिए झाड़-फूँक और प्रार्थना का सहारा लिया जाता था। जैविक उपागम

अभ्यास प्रश्नChapter 4

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. अवसाद और उन्माद से संबंधित लक्षणों की पहचान कीजिए।

उत्तर:

अवसाद (डिप्रेशन) के लक्षणों में उदासी, निराशा, ऊर्जा की कमी, आत्मग्लानि, नींद और भूख में परिवर्तन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, और आत्महत्या के विचार शामिल हैं। उन्माद (मेनिया) के लक्षणों में अत्यधिक उत्साह, ऊर्जा, आत्मविश्वास, कम नींद की आवश्यकता, विचारों की तेज़ी, और आवेगपूर्ण व्यवहार शामिल होते हैं।

व्याख्या:

अवसाद और उन्माद दोनों मानसिक विकारों के प्रमुख लक्षणों को समझना आवश्यक है। अवसाद में व्यक्ति उदासीन और निराश रहता है जबकि उन्माद में अत्यधिक उत्साह और ऊर्जा दिखाई देती है।

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Q2.2. अतिक्रियाशील वाले बच्चों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

अतिक्रियाशील बच्चे अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, वे भावनात्मक रूप से तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं, आसानी से चिढ़ जाते हैं, और सामाजिक परिस्थितियों में असहज महसूस कर सकते हैं। वे अक्सर चिंता, भय या आक्रामकता दिखाते हैं। उनकी प्रतिक्रिया सामान्य से अधिक होती है और वे तनावपूर्ण परिस्थितियों में असामान्य व्यवहार कर सकते हैं।

व्याख्या:

अतिक्रियाशीलता का अर्थ है कि बच्चे की प्रतिक्रिया सामान्य से अधिक तीव्र होती है, जिससे उनकी सामाजिक और शैक्षिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ता है।

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Q3.3. मद्य जैसे मादक द्रव्य के सेवन के क्या परिणाम होते हैं ?

उत्तर:

मद्यपान के परिणामों में शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रभाव शामिल हैं। शारीरिक प्रभावों में लीवर रोग, हृदय रोग, तंत्रिका तंत्र की क्षति, और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं। मानसिक प्रभावों में स्मृति ह्रास, निर्णय क्षमता में कमी, अवसाद और चिंता शामिल हैं। सामाजिक प्रभावों में पारिवारिक कलह, कार्यस्थल पर समस्या, और सामाजिक अलगाव शामिल हैं।

व्याख्या:

मादक द्रव्य का सेवन व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करता है, जिससे न केवल स्वास्थ्य बल्कि सामाजिक और मानसिक स्थिति भी प्रभावित होती है।

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Q4.4. क्या विकृत शरीर प्रतिमा भोजन विकार को जन्म दे सकती है? इसके विभिन्न रूपों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर:

हाँ, विकृत शरीर प्रतिमा भोजन विकारों का एक प्रमुख कारण हो सकती है। व्यक्ति अपने शरीर को वास्तविकता से अलग और नकारात्मक रूप में देखता है, जिससे भोजन संबंधी अस्वस्थ व्यवहार उत्पन्न होते हैं। भोजन विकारों के प्रमुख रूप हैं: (i) अनार्क्सिया नर्वोसा (भोजन का अत्यधिक परहेज), (ii) बुलिमिया नर्वोसा (अत्यधिक भोजन करना और उसके बाद उल्टी करना), और (iii) बिंज ईटिंग डिसऑर्डर (अत्यधिक मात्रा में भोजन करना)।

व्याख्या:

शरीर की विकृत धारणा व्यक्ति को अस्वस्थ भोजन व्यवहार की ओर ले जाती है, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक है।

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Q5.5. “चिकित्सक व्यक्ति के शारीरिक लक्षणों को देखकर बीमारी का निदान करते हैं।” मनोवैज्ञानिक विकारों का निदान किस प्रकार किया जाता है?

उत्तर:

मनोवैज्ञानिक विकारों का निदान चिकित्सक द्वारा रोगी के व्यवहार, मानसिक स्थिति, लक्षणों और इतिहास के आधार पर किया जाता है। इसके लिए विभिन्न नैदानिक उपकरण जैसे DSM-5 और ICD-10 का उपयोग किया जाता है। निदान में मनोवैज्ञानिक परीक्षण, साक्षात्कार, और पर्यवेक्षण शामिल होते हैं। शारीरिक लक्षणों के बजाय मानसिक और व्यवहारिक लक्षणों पर ध्यान दिया जाता है।

व्याख्या:

मनोवैज्ञानिक विकारों का निदान शारीरिक रोगों से भिन्न होता है, इसलिए विशेषज्ञों को विशेष परीक्षण और मापदंडों का उपयोग करना पड़ता है।

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Q6.6. मनोप्रतित और बाध्यता के बीच विभेद स्थापित कीजिए।

उत्तर:

मनोप्रतित (Delusion) एक गलत विश्वास होता है जो व्यक्ति की वास्तविकता की समझ से भिन्न होता है और जिसे व्यक्ति बदलने के लिए तैयार नहीं होता। बाध्यता (Compulsion) एक आवृत्तिमूलक व्यवहार या मानसिक क्रिया होती है जिसे व्यक्ति अनिवार्य रूप से करता है, जैसे बार-बार हाथ धोना। मनोप्रतित विचार होते हैं, जबकि बाध्यता क्रियाएँ होती हैं।

व्याख्या:

मनोप्रतित और बाध्यता दोनों मानसिक विकारों के लक्षण हैं, परन्तु मनोप्रतित विचारों से संबंधित है और बाध्यता व्यवहार से।

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Q7.7. क्या विसामान्य व्यवहार का एक दीर्घकालिक प्रतिरूप अपसामान्य समझा जा सकता है? इसकी व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

हाँ, यदि किसी विसामान्य व्यवहार का प्रतिरूप लंबे समय तक बना रहता है और वह व्यक्ति के सामाजिक, शैक्षिक या कार्यात्मक जीवन में बाधा उत्पन्न करता है, तो उसे अपसामान्य माना जा सकता है। अपसामान्य व्यवहार वह होता है जो सामाजिक मानकों से विचलित हो और व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करे।

व्याख्या:

समय के साथ व्यवहार की प्रकृति और उसका प्रभाव यह निर्धारित करता है कि वह अपसामान्य है या नहीं।

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Q8.8. लोगों के बीच बात करते समय रोगी बारंबार विषय परिवर्तन करता है, क्या यह मनोविदलता का सकारात्मक या नकारात्मक लक्षण है? मनोविदलता के अन्य लक्षणों तथा उप-प्रकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

रोगी का बार-बार विषय परिवर्तन करना मनोविदलता का सकारात्मक लक्षण है, क्योंकि यह विचारों की तेज़ी और असंगति को दर्शाता है। मनोविदलता के अन्य लक्षणों में विचारों का विच्छेदन, असंगत भाषण, और व्यवहार में असामान्यता शामिल हैं। उप-प्रकारों में सकारात्मक लक्षण (जैसे भ्रम, मतिभ्रम) और नकारात्मक लक्षण (जैसे भावहीनता, सामाजिक अलगाव) आते हैं।

व्याख्या:

मनोविदलता के लक्षण सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकते हैं, और विषय परिवर्तन सकारात्मक लक्षणों में आता है।

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