Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
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परिचय
व्याख्यापरिचय
हम सभी ने अपने और दूसरों के व्यवहारों को समझने और उनका मूल्यांकन करने का प्रयास किया है। विभिन्न परिस्थितियों में हम अपने व्यवहारों में भिन्नताएँ देखते हैं और दूसरों से अपने संबंधों को लेकर प्रश्न उठते हैं। मनोवैज्ञानिकों ने इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए 'आत्म' और 'व्यक्तित्व' की अवधारणाओं का विकास किया है। आत्म और व्यक्तित्व दोनों ही हमारे अस्तित्व और अनुभवों को परिभाषित करते हैं। आत्म वह मानसिक छवि है जो व्यक्ति अपने बारे में बनाता है, जबकि व्यक्तित्व वह स्थिर और विशिष्ट व्यवहारिक विशेषताएँ हैं जो व्यक्ति को दूसरों से अलग बनाती हैं। इस अध्याय में हम आत्म एवं व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं, उनके प्रकार, अध्ययन के उपागम, तथा व्यक्तित्व के मूल्यांकन की विधियों को विस्तार से समझेंगे।
- व्यवहारों की भिन्नता और स्थिरता को समझने के लिए आत्म और व्यक्तित्व की अवधारणा आवश्यक है।
- आत्म व्यक्ति की स्वयं के प्रति जागरूकता और धारणा है।
- व्यक्तित्व व्यक्ति के स्थिर और विशिष्ट व्यवहारों का समूह है।
- आत्म एवं व्यक्तित्व का अध्ययन हमें स्वयं और दूसरों को बेहतर समझने में सहायता करता है।
- 📌 आत्म: व्यक्ति की स्वयं के प्रति धारणा और जागरूकता।
- 📌 व्यक्तित्व: व्यक्ति के स्थिर और विशिष्ट व्यवहारों का समुच्चय।
आत्म एवं व्यक्तित्व
व्याख्याआत्म एवं व्यक्तित्व
आत्म एवं व्यक्तित्व वे विशिष्ट तरीके हैं जिनके माध्यम से हम अपने अस्तित्व को परिभाषित करते हैं और अपने अनुभवों को व्यवस्थित करते हैं। आत्म व्यक्ति की स्वयं के प्रति धारणा होती है, जो सामाजिक अंतःक्रिया और अनुभवों से विकसित होती है। व्यक्तित्व वह स्थिर और विशिष्ट व्यवहारिक विशेषताएँ हैं जो व्यक्ति को अन्य लोगों से अलग बनाती हैं। व्यक्ति के व्यवहार में विभिन्न परिस्थितियों में भिन्नता होती है, लेकिन एक व्यक्ति का व्यवहार सामान्यतः स्थिर रहता है। इस स्थिरता को व्यक्तित्व कहा जाता है। आत्म और व्यक्तित्व घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं; आत्म व्यक्तित्व के मूल में स्थित होता है। आत्म एवं व्यक्तित्व की समझ से हम अपने और दूसरों के व्यवहारों को विभिन्न परिस्थितियों में समझ सकते हैं।
- आत्म वह मानसिक छवि है जो व्यक्ति अपने बारे में बनाता है।
- व्यक्तित्व व्यक्ति के स्थिर और विशिष्ट व्यवहारों का प्रतिनिधित्व करता है।
- व्यवहार में भिन्नता के बावजूद व्यक्तित्व स्थिर रहता है।
- आत्म एवं व्यक्तित्व के अध्ययन से सामाजिक अंतःक्रिया की समझ बढ़ती है।
- 📌 व्यक्तित्व: व्यक्ति के स्थिर व्यवहारों का समूह।
- 📌 आत्म: स्वयं के प्रति व्यक्ति की धारणा।
आत्म का संप्रत्यय
व्याख्याआत्म का संप्रत्यय
आत्म का संप्रत्यय व्यक्ति की स्वयं के प्रति जागरूकता और उसके बारे में धारणा है। बाल्यावस्था में आत्म की धारणा विकसित होती है, जो सामाजिक अंतःक्रिया, अनुभवों और दूसरों के साथ संबंधों से प्रभावित होती है। नवजात शिशु के पास आत्म की कोई धारणा नहीं होती,
अभ्यास प्रश्न — Chapter 2
15 विस्तृत उत्तर सहित अभ्यास प्रश्न
Q1.आत्म और व्यक्तित्व की अवधारणा में क्या संबंध होता है?
उत्तर:
आत्म व्यक्तित्व का मूल रूप होता है
व्याख्या:
आत्म और व्यक्तित्व घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। आत्म व्यक्ति के अस्तित्व का वह मानसिक पक्ष है जो व्यक्तित्व के मूल में स्थित होता है और व्यक्तित्व वह स्थिर व्यवहारिक विशेषताएँ हैं जो व्यक्ति को दूसरों से अलग बनाती हैं।
Q2.आत्म की धारणा कब विकसित होती है और किन कारकों से प्रभावित होती है?
उत्तर:
आत्म की धारणा बाल्यावस्था में विकसित होती है। यह धारणा सामाजिक अंतःक्रिया, अनुभवों और महत्वपूर्ण लोगों जैसे माता-पिता, मित्रों एवं शिक्षकों के प्रभाव से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए बच्चे की आत्म की समझ उसके परिवार और सामाजिक वातावरण से बनती है।
व्याख्या:
आत्म की धारणा नवजात शिशु में नहीं होती, लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी आत्म की समझ विकसित होती है। यह विकास सामाजिक अंतःक्रिया और अनुभवों के माध्यम से होता है। माता-पिता, मित्र और शिक्षक इस विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
Q3.निम्नलिखित में से कौन सा वाक्य 'व्यक्तिगत अनन्यता' को दर्शाता है?
उत्तर:
मैं एक मेहनती विद्यार्थी हूँ
व्याख्या:
व्यक्तिगत अनन्यता व्यक्ति के उन गुणों को दर्शाती है जो उसे दूसरों से अलग बनाते हैं, जैसे कि मेहनती होना। जबकि सामाजिक अनन्यता व्यक्ति के सामाजिक या सांस्कृतिक समूह से संबंधित होती है, जैसे धर्म या क्षेत्र।
Q4.आत्मगत और वस्तुगत आत्म में क्या भेद है? एक उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
आत्मगत आत्म वह है जो कुछ करता है, जैसे मैं एक नर्तक हूँ। वस्तुगत आत्म वह है जिस पर कुछ किया जाता है, जैसे मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे आसानी से आहत किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जब कोई कहता है 'मैं जानता हूँ कि मैं कौन हूँ', तो वह आत्मगत और वस्तुगत दोनों रूपों का वर्णन करता है।
व्याख्या:
आत्मगत आत्म क्रिया करने वाला पक्ष है, जो स्वयं को जानने की प्रक्रिया में सक्रिय रहता है। वस्तुगत आत्म वह है जिसे देखा या समझा जाता है। ये दोनों रूप आत्म की द्वैध प्रकृति को दर्शाते हैं।
Q5.व्यक्तिगत आत्म और सामाजिक आत्म में क्या मुख्य अंतर होता है?
उत्तर:
व्यक्तिगत आत्म व्यक्ति के अपने बारे में अनुभव से जुड़ा होता है, जबकि सामाजिक आत्म दूसरों के संबंध में होता है
व्याख्या:
व्यक्तिगत आत्म व्यक्ति के स्वयं के अनुभवों, उपलब्धियों और स्वतंत्रता से जुड़ा होता है। सामाजिक आत्म दूसरों के साथ संबंध, सहयोग और भागीदारी जैसे सामाजिक पक्षों पर आधारित होता है।
Q6.आत्म-संप्रत्यय (self-concept) क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
आत्म-संप्रत्यय वह धारणा है जो व्यक्ति अपने बारे में रखता है, जैसे अपनी क्षमताओं और गुणों के बारे में विचार। उदाहरण के लिए, एक छात्र अपने खेल कौशल को लेकर सकारात्मक धारणा रख सकता है जबकि गणित में कमजोर हो सकता है।
व्याख्या:
आत्म-संप्रत्यय व्यक्ति के स्वयं के गुणों, क्षमताओं और सामाजिक पहचान के बारे में उसकी धारणा है। यह सकारात्मक या नकारात्मक हो सकती है और विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है।
Q7.आत्म-सम्मान किसे कहते हैं और इसके चार मुख्य क्षेत्र कौन से हैं?
उत्तर:
आत्म-सम्मान व्यक्ति के अपने मूल्य और योग्यता के प्रति निर्णय या आकलन को कहते हैं। इसके चार मुख्य क्षेत्र हैं: शैक्षिक क्षमता, सामाजिक क्षमता, शारीरिक/खेलकूद क्षमता और शारीरिक रूप। उदाहरण के लिए, एक बच्चा खेलों में अच्छा प्रदर्शन कर उच्च सामाजिक आत्म-सम्मान प्राप्त कर सकता है।
व्याख्या:
आत्म-सम्मान व्यक्ति के स्वयं के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक मूल्यांकन का परिणाम होता है। यह विभिन्न क्षेत्रों में विकसित होता है और व्यक्ति के व्यवहार और सामाजिक स्वीकार्यता को प्रभावित करता है।
Q8.आत्म-सक्षमता (self-efficacy) की अवधारणा क्या है और यह कैसे विकसित होती है?
उत्तर:
आत्म-सक्षमता वह विश्वास है कि व्यक्ति अपने जीवन की परिस्थितियों को स्वयं नियंत्रित कर सकता है। यह सामाजिक अधिगम सिद्धांत पर आधारित है और सकारात्मक अनुभव, प्रतिरूपों और अनुकरण के माध्यम से विकसित होती है। उदाहरण के लिए, बच्चे जो सकारात्मक मॉडल देखते हैं, उनमें आत्म-सक्षमता बढ़ती है।
व्याख्या:
आत्म-सक्षमता लोगों को अपने व्यवहारों को नियंत्रित करने और चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है। बंदूरा के अनुसार यह विश्वास व्यवहार के चयन और जोखिम उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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