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Chapter 4

🎓 Class 11📖 Jeev Vigyan📖 21 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~32 मिनट
Chapter 3अध्याय 4 / 19Chapter 5

Chapter 4अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 21 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

4.1 वर्गीकरण का आधार

व्याख्या

4.1 वर्गीकरण का आधार

प्राणि जगत में पाए जाने वाले जीवों की संरचना, आकार और जीवन प्रक्रियाओं में विविधता होती है। लगभग दस लाख से अधिक प्राणियों का वर्णन हो चुका है, इसलिए उनका सही वर्गीकरण अत्यंत आवश्यक है। वर्गीकरण का आधार जीवों की कोशिका व्यवस्था, शारीरिक सममिति, शरीर गुहा (प्रगुहा) की उपस्थिति, पाचन तंत्र, परिसंचरण तंत्र, और जनन तंत्र की संरचना होती है। प्राणियों के संगठन के स्तर के आधार पर उन्हें कोशिकीय, ऊतक, अंग और अंग तंत्र स्तर के जीवों में बांटा जाता है। कोशिकीय स्तर के जीवों में कोशिकाएं स्वतंत्र होती हैं जैसे स्पंज। ऊतक स्तर के जीवों में कोशिकाएं समूह बनाकर ऊतक बनाती हैं जैसे सिलेन्ट्रेटा। अंग स्तर के जीवों में ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं, और अंग तंत्र स्तर के जीवों में अंग मिलकर तंत्र बनाते हैं, जो विशिष्ट कार्य करते हैं जैसे ऐनेलिड, आर्थोपोड आदि। सममिति के आधार पर जीवों को असममिति, अरीय सममिति और द्विपार्श्व सममिति में वर्गीकृत किया जाता है। असममिति वाले जीवों में शरीर को किसी भी अक्ष से बराबर भागों में विभाजित नहीं किया जा सकता। अरीय सममिति वाले जीवों में शरीर को किसी भी अक्ष से दो समान भागों में बांटा जा सकता है। द्विपार्श्व सममिति में शरीर को केवल एक अक्ष से दो समान भागों में बांटा जा सकता है। भ्रूणीय स्तर के आधार पर जीवों को द्विकोरिक (दो भ्रूणीय स्तर - एक्टोडर्म और एंडोडर्म) और त्रिकोरिक (तीन भ्रूणीय स्तर - एक्टोडर्म, मेसोडर्म और एंडोडर्म) में बांटा जाता है। प्रगुहा (सीलोम) की उपस्थिति भी वर्गीकरण में महत्वपूर्ण है। प्रगुहा वह शरीर गुहा है जो मेसोडर्म से घिरी होती है। प्रगुही जीवों में अंगों का विकास और कार्य अधिक जटिल होता है। कूटगुहिक जीवों में गुहा पूरी तरह मेसोडर्म से आच्छादित नहीं होती, जबकि अगुही जीवों में शरीर में कोई गुहा नहीं होती। खंडीभवन (सेगमेंटेशन) भी वर्गीकरण का आधार है, जिसमें शरीर खंडों में विभाजित होता है। पृष्ठरज्जु (नोटोकोर्ड) की उपस्थिति से जीवों को रज्जुकी और अरज्जुकी में बांटा जाता है। रज्जुकी जीवों में पृष्ठरज्जु होती है जो मेरुदंड का प्रारंभिक रूप होती है।

  • प्राणियों का वर्गीकरण उनकी कोशिका व्यवस्था, सममिति, प्रगुहा, पाचन तंत्र, परिसंचरण तंत्र और जनन तंत्र के आधार पर किया जाता है।
  • संगठन के स्तर: कोशिकीय, ऊतक, अंग, और अंग तंत्र स्तर।
  • सममिति के प्रकार: असममिति, अरीय सममिति, द्विपार्श्व सममिति।
  • भ्रूणीय स्तर के आधार पर द्विकोरिक और त्रिकोरिक जीव।
  • प्रगुहा (सीलोम) की उपस्थिति से प्रगुही, कूटगुहिक और अगुही जीव।
  • खंडीभवन और पृष्ठरज्जु भी वर्गीकरण के महत्वपूर्ण आधार हैं।
  • 📌 कोशिकीय स्तर: जीवों में कोशिकाएं स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
  • 📌 ऊतक स्तर: कोशिकाएं समूह बनाकर ऊतक बनाती हैं।
  • 📌 अंग स्तर: ऊतक मिलकर अंग बनाते हैं।

4.2 प्राणियों का वर्गीकरण

व्याख्या

4.2 प्राणियों का वर्गीकरण

प्राणियों का वर्गीकरण उनके संगठन स्तर, सममिति, भ्रूणीय स्तर, प्रगुहा, खंडीभवन, पाचन तंत्र, परिसंचरण तंत्र, श्वसन तंत्र और अन्य विशेष लक्षणों के आधार पर किया जाता है। इस अध्याय में प्राणि जगत के प्रमुख संघों का वर्णन किया गया है। संघ पोरीफेरा (स्पंज) सबसे सरल बहुकोशिकीय जीव हैं, जिनका शरीर कोशिकीय स्तर पर संगठित होता है। इनके शरीर में जल परिवहन के लिए नाल तंत्र होता है। ये असममिति वाले होते हैं और इनमें कोई प्रगुहा नहीं होती। संघ सिलेन्ट्रेटा (नाइडेरिया) में शरीर ऊतक स्तर का होता है, ये अरीय सममिति वाले जीव होते हैं। इनके शरीर में दो भ्रूणीय स्तर होते हैं और इनमें पाचन तंत्र अपूर्ण होता है। इनके शरीर में निडोब्लास्ट नामक दंश कोशिकाएं होती हैं। संघ टीनोफोर के प्राणी समुद्री होते हैं, अरीय सममिति वाले और द्विकोरिक होते हैं। इनमें आठ कंकट पट्टिकाएं होती हैं जो चलन में सहायता करती हैं। संघ प्लेटीहेल्मिंथीज (चपटे कृमि) द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक और अप्रगुही जीव होते हैं। इनके पाचन तंत्र अपूर्ण होते हैं और ये प्रायः परजीवी होते हैं। संघ ऐस्केलिमिथीज (गोल कृमि) द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक और कूटप्रगुही जीव होते हैं। इनके पाचन तंत्र पूर्ण होते हैं। संघ ऐनेलिडा के जीव द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, प्रगुही और खंडीभवन वाले होते हैं। इनके शरीर खंडों में विभाजित होते हैं। संघ आर्थोपोडा प्राणि जगत का सबसे बड़ा संघ है, जिसमें कीट भी सम्मिलित हैं। ये द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, प्रगुही और खंडीभवन वाले होते हैं। इनके शरीर पर काइटिन का बाह्य कंकाल होता है। संघ मोलस्का के प्राणी द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, प्रगुही और अंगतंत्र स्तर के जीव होते हैं। इनके शरीर कोमल होता है और कैल्सियम के कवच से ढका होता है। संघ एकाइनोडर्मेटा के जीव समुद्री, अरीय सममिति, त्रिकोरिक, प्रगुही और अंगतंत्र स्तर के होते हैं। इनमें जल संवहन तंत्र होता है। संघ हेमीकार्डेटा के जीव समुद्री, द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, प्रगुही और अंगतंत्र स्तर के होते हैं। ये कृमि सदृश होते हैं। संघ कॉर्डेटा (रज्जुकी) के जीव द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, प्रगुही और अंगतंत्र स्तर के होते हैं। इनमें पृष्ठरज्जु, खोखली तंत्रिका रज्जु, क्लोम छिद्र और युग्मित ग्रसनी क्लोम होते हैं। कॉर्डेटा संघ को उपसंघों में बांटा गया है: यूरोकॉर्डेटा (ट्यूनिकेटा), सेफेलोकॉर्डेटा और वर्टीब्रेटा। वर्टीब्रेटा को भी कई वर्गों में बांटा गया है जैसे साइक्लोस्टोमेटा, कांड्रोक्थीज, ऑस्टिक्थीज, एम्फीबिया, सरीसृप, एवीज और स्तनधारी।

  • प्राणियों के संघ संगठन स्तर, सममिति, भ्रूणीय स्तर, प्रगुहा, खंडीभवन आदि पर आधारित हैं।
  • पोरिफेरा में कोशिकीय स्तर का संगठन, असममिति और नाल तंत्र होता है।
  • सिलेन्ट्रेटा में ऊतक स्तर, अरीय सममिति और अपूर्ण पाचन तंत्र होता है।
  • प्लेटीहेल्मिंथीज द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, अप्रगुही और अपूर्ण पाचन तंत्र वाले होते हैं।
  • आर्थोपोडा सबसे बड़ा संघ है, जिसमें काइटिन का बाह्य कंकाल और संधियुक्त पाद होते हैं।
  • कॉर्डेटा संघ में पृष्ठरज्जु, खोखली तंत्रिका रज्जु और क्लोम छिद्र होते हैं।
  • 📌 पोरिफेरा: बहुकोशिकीय, कोशिकीय स्तर का संगठन, असममिति वाले जीव।
  • 📌 सिलेन्ट्रेटा (नाइडेरिया): ऊतक स्तर, अरीय सममिति, दंश कोशिकाएं।
  • 📌 प्लेटीहेल्मिंथीज: द्विपार्श्व सममिति, त्रिकोरिक, अप्रगुही, अपूर्ण पाचन।

4.2.1 संघ पोरीफेरा (Porifera)

व्याख्या

4.2.1 संघ पोरीफेरा (Porifera)

पोरिफेरा संघ के जीव जिन्हें सामान्यतः स्पंज कहा जाता है, बहुकोशिकीय होते हैं और कोशिकीय स्तर के संगठन वाले सबसे सरल प्राणी हैं। ये मुख्यतः समुद्री और कुछ मीठे पानी में पाए जाते हैं। स्पंज असममिति वाले जीव होते हैं, अर्थात् इनका शरीर किसी भी अक्ष से द

अभ्यास प्रश्नChapter 4

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.एंजियोस्पर्म ,प्लांट किंगडम की प्रमुख वनस्पति हैं क्योंकि
A.क) मनुष्य द्वारा पालतू बनाने का कार्य
B.ख) विभिन्न आवासों में अनुकूलन
C.ग) स्व-परागण गुण
D.घ) बड़ी संख्या में बीज उत्पादन की संपत्ति

उत्तर:

ख) विभिन्न आवासों में अनुकूलन

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Q2.जिगोटिक अर्धसूत्रीविभाजन किस पोधे की विशेषता है ?
A.क) फुकूस
B.ख) फुनारिया
C.ग) मर्चान्टिया
D.घ) च्लाम्यदोमोनस

उत्तर:

ख) फुनारिया

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Q3.टेरिडोफाइट काई से कैसे भिन्न होते हैं ?
A.क) स्वतंत्र गैमेटोफाइट
B.ख) आश्रित गैमेटोफाइट
C.ग) फ्लैगेलेट एथेरोज़ोइड्स
D.घ) स्वतंत्र और प्रमुख स्पोरोफाइट

उत्तर:

घ) स्वतंत्र और प्रमुख स्पोरोफाइट

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Q4.केंचुए में कितनी आंखें होती हैI
A.क) 1
B.ख) 2
C.ग) बहुत
D.घ) कोई नेत्र नहीं

उत्तर:

घ) कोई नेत्र नहीं

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Q5.निम्न में से कौन कीट नहीं है
A.क) तितली
B.ख) तिलचट्टा
C.ग) मच्छर
D.घ) मकड़ी

उत्तर:

घ) मकड़ी

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Q6.यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?

उत्तर:

यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में अनेक परेशानियाँ उत्पन्न होंगी। वर्गीकरण के लिए प्राणियों के शरीर रचना, विकास, जीवन चक्र, पाचन, श्वसन, प्रजनन आदि लक्षणों का ज्ञान आवश्यक होता है। बिना इन लक्षणों के, प्राणियों को सही समूह में वर्गीकृत करना कठिन होगा क्योंकि समान लक्षणों के आधार पर ही प्राणी एक समूह में रखे जाते हैं। इससे प्राणियों की पहचान, अध्ययन और उनके बीच संबंध स्थापित करना असंभव हो जाएगा।

व्याख्या:

प्राणियों के वर्गीकरण में मूलभूत लक्षणों का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि ये लक्षण प्राणियों के बीच समानताएँ और भिन्नताएँ दर्शाते हैं। बिना इनके, वर्गीकरण की प्रक्रिया अधूरी और त्रुटिपूर्ण होगी।

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Q7.यदि आपको एक नमूना (स्पेसिमेन) दे दिया जाए तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएंगे?

उत्तर:

वर्गीकरण हेतु निम्नलिखित कदम अपनाएंगे: 1. नमूने की बाह्य संरचना का निरीक्षण करना (आकार, रंग, शरीर भाग आदि)। 2. शरीर रचना और अंगों की जाँच करना (जैसे पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र)। 3. प्रजनन प्रणाली और विकास चक्र का अध्ययन करना। 4. जीवन चक्र और व्यवहार का अवलोकन करना। 5. आवश्यकतानुसार सूक्ष्मदर्शी से कोशिकीय संरचना का अध्ययन करना। 6. प्राप्त जानकारी के आधार पर प्राणी को उपयुक्त वर्ग, गण, कुल आदि में वर्गीकृत करना।

व्याख्या:

वर्गीकरण के लिए प्राणी के सभी महत्वपूर्ण लक्षणों का अध्ययन आवश्यक होता है ताकि उसे सही समूह में रखा जा सके।

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Q8.देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?

उत्तर:

देहगुहा (कोएलोम) और प्रगुहा (प्सूडोकोएलोम) की उपस्थिति या अनुपस्थिति प्राणियों के वर्गीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। - देहगुहा वाले प्राणी (जैसे ऐनेलिडा) में शरीर के अंगों के बीच एक पूर्ण गुहा होती है जो अंगों को स्वतंत्रता और लचीलापन देती है। - प्रगुहा वाले प्राणियों (जैसे आर्थोपोडा) में यह गुहा आंशिक या असंपूर्ण होती है। इस आधार पर प्राणियों को उनके देहगुहा प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, जिससे उनके विकासक्रम और संरचनात्मक जटिलता का पता चलता है।

व्याख्या:

देहगुहा और प्रगुहा की उपस्थिति से प्राणियों के शरीर की संरचना और विकास की जानकारी मिलती है, जो वर्गीकरण में सहायक होती है।

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