Chapter 4
Chapter 4 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
गीत की परिभाषा एवं स्वर एवं लयबद्ध रचना
व्याख्यागीत की परिभाषा एवं स्वर एवं लयबद्ध रचना
हिंदुस्तानी संगीत में गीत एक ऐसी रचना होती है जो स्वर (संगीत के सुर) और लयबद्ध या तालबद्ध शब्दों से निर्मित होती है। गीत का मुख्य उद्देश्य भावपूर्ण अभिव्यक्ति है, चाहे रचना में प्रयुक्त शब्द सार्थक हों या निरर्थक। गीत की रचना में भाव, अभिव्यक्ति का आकर्षण तथा मनोरंजन का तत्व उत्पन्न करने के लिए विभिन्न सांगीतिक तत्वों का समावेश होता है। ये सांगीतिक तत्व अलग-अलग प्रयोगों के आधार पर विभिन्न गायन एवं वादन विधाओं के रूप में पहचाने जाते हैं। जैसे ध्रुपद, धमार, ख्याल, टुमरी, टप्पा, तराना, चतुरंग, लक्षणगीत, भजन, कव्वाली आदि। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि संस्कृत के मंत्रों को गाकर ईश्वर की आराधना करते थे। धीरे-धीरे लय, ताल, छंद आदि के नियमों के आधार पर श्लोक, स्तोत्र, जातिगान, प्रबंध आदि के रूप में सांगीतिक विधाएँ विकसित हुईं। समय के साथ इन विधाओं में नवीनता आई और नई-नई गायन एवं वादन विधाएँ विकसित होती रहीं। आधुनिक समय में भी प्राचीन विधाओं के प्रभाव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। गीत की रचना में स्वर, लय, ताल, शब्द, अलंकार, यति आदि का समुचित संयोजन होता है जो गीत को प्रभावशाली बनाता है। गीत की यह विशेषताएँ उसे संगीत की विभिन्न विधाओं में अलग-अलग रूप प्रदान करती हैं।
- गीत स्वर और लयबद्ध शब्दों से निर्मित रचना होती है।
- गीत का उद्देश्य भावपूर्ण अभिव्यक्ति और मनोरंजन है।
- सांगीतिक तत्वों के भिन्न प्रयोग से विभिन्न गायन एवं वादन विधाएँ बनती हैं।
- प्राचीन काल में मंत्रों से आरंभ होकर विभिन्न सांगीतिक विधाएँ विकसित हुईं।
- नई विधाएँ समय-समय पर विकसित होती रही हैं।
- आधुनिक विधाओं में प्राचीन विधाओं का प्रभाव स्पष्ट है।
- 📌 गीत: स्वर एवं लयबद्ध शब्दों से निर्मित भावपूर्ण रचना।
- 📌 स्वर: संगीत के सुर।
- 📌 ताल: संगीत में समय मापन का चक्र।
ध्रुपद
व्याख्याध्रुपद
ध्रुपद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन और गंभीर गायन विधा है। इसका नाम दो शब्दों 'ध्रु' और 'पद' से बना है, जिसका अर्थ है ऐसा पद जो अटल और स्थिर हो। ध्रुपद का शाब्दिक अर्थ है ईश्वर की उपासना में गाया जाने वाला पद्य। महान संगीतकार तानसेन के अनुसार ध्रुपद चार तुकों से युक्त, शुद्ध अक्षरों वाली और नवरसों से युक्त रचना होती है। ध्रुपद की बंदिशें प्रायः हिंदी, उर्दू तथा ब्रजभाषा में होती हैं, जिसमें हिंदी की बंदिशें अधिक प्रचलित हैं। प्राचीन काल में ध्रुपद गायकों को 'कलावंत' कहा जाता था। यह गायकी दमदार आवाज़, गमक और मीड़ के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध है। ध्रुपद की गायकी में कंठ और फेफड़ों पर विशेष जोर पड़ता है। ध्रुपद की संगत में पखावज प्रमुख वाद्य है, हालांकि वर्तमान में तबले का भी प्रयोग होता है। ध्रुपद के साथ बजाए जाने वाले तालों में चौताल, सूलताल, तीव्रा, ब्रह्मताल आदि शामिल हैं। ध्रुपद की बंदिश के चार भाग होते हैं: स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग। ध्रुपद की चार शैलियाँ या वाणियाँ हैं: खंडार, नौहार, डागुर और गोबरहार। गायन की शुरुआत नोम-तोम जैसे बोलों से मंद्र, मध्य और तार सप्तक में आलाप से होती है। इसके बाद बंदिश गाई जाती है। ध्रुपद गायन में विभिन्न लयकारियाँ जैसे आड़, दुगुन, तिगुन, चौगुन, छहगुन, अठगुन आदि का प्रयोग होता है। ध्रुपद में मुकीं और तानें वर्जित होती हैं। भावों में वीर, रौद्र, शांत, शृंगार, करुण और भक्ति रस प्रमुख हैं। प्रसिद्ध ध्रुपद गायकों में उस्ताद वासिफुद्दीन डागर, बहराम खान, बंदे खान, जाकिरुद्दीन मल्लिक आदि शामिल हैं।
- ध्रुपद का अर्थ है स्थिर और अटल पद जो ईश्वर की उपासना में गाया जाता है।
- ध्रुपद गायकी में गमक और मीड़ का विशेष प्रयोग होता है।
- मुख्य वाद्य पखावज है, परन्तु तबले का भी उपयोग होता है।
- ध्रुपद की चार शैलियाँ हैं: खंडार, नौहार, डागुर और गोबरहार।
- गायन में नोम-तोम से आलाप प्रारंभ होता है, फिर बंदिश गाई जाती है।
- ध्रुपद में मुकीं और तानें वर्जित होती हैं।
- 📌 ध्रुपद: हिंदुस्तानी संगीत की प्राचीन गंभीर गायन विधा।
- 📌 गमक: स्वर में झंकार या कंपन।
- 📌 मीड़: सुरों के बीच का झुकाव।
ख्याल
व्याख्याख्याल
ख्याल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे लोकप्रिय और लचीली गायन विधा है। 'ख्याल' का अर्थ है 'कल्पना' या 'विचार'। इस शैली में गायक बंदिश के शब्दों के साथ राग के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए आलाप, तान, बोलतान, कण और मुक्ती जैसे तत्वों का प्रयोग करता ह
अभ्यास प्रश्न — Chapter 4
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. भारत के अलावा किस देश में तराना गाया जाता है? कलाकार का नाम, एक तराना के शब्द स्वर एवं लय पर विचार करें। 2. किसी भी राग में, तीनताल में एक सरगम गीत की रचना करें।
उत्तर:
1. भारत के अलावा तराना पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों में भी गाया जाता है। प्रसिद्ध कलाकारों में उस्ताद अमजद अली खान, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पंडित भीमसेन जोशी आदि का नाम लिया जा सकता है। तराना के शब्द सामान्यतः सार, ता, ना, दम आदि होते हैं जो लय के अनुसार गाए जाते हैं। लय में तीव्रता और ताल का पालन होता है। 2. उदाहरण स्वरूप राग यमन में तीनताल में सरगम गीत: स्थायी: सा रे ग म प ध नि सां अंतरा: नि ध प म ग रे सा यह सरगम गीत तीनताल की 16 मात्राओं में व्यवस्थित है और राग यमन के स्वर अनुसार रचित है।
व्याख्या:
प्रश्न 1 में तराना के प्रचलन वाले देशों और कलाकारों का उल्लेख करना है तथा तराना के शब्द और लय की व्याख्या करनी है। प्रश्न 2 में किसी राग के अनुसार तीनताल में सरगम गीत बनाना है, जिसमें स्वर और ताल का समन्वय हो।
Q2.1. ध्रुपद गायन शैली की उत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए उसकी विशेषताओं को विस्तार से समझाइए। 2. स्वस्मालिका किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए। 3. ख्याल गायन शैली का प्रणेता किन्हें माना जाता है? इस गायन शैली के क्रमिक विकास का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। 4. लक्षण गीत में प्रायः राग के किन लक्षणों का उल्लेख होता है? सोदाहरण समझाइए। 5. गत किसे कहते हैं? गत के प्रकारों को विस्तारपूर्वक लिखिए। 6. शास्त्रीय संगीत में तराना गायन शैली की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1. ध्रुपद गायन शैली की उत्पत्ति प्राचीन काल में हुई मानी जाती है। यह शैली मुख्यतः मंदिरों और दरबारों में प्रचलित थी। इसकी विशेषताएँ हैं - गंभीरता, स्थिरता, और शुद्धता। ध्रुपद में स्वर की शुद्धता और ताल की सटीकता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह शैली पखावज के साथ गाई जाती है और इसमें वाणी, मिजाज, और प्राकृति की चार शैलियाँ होती हैं। 2. स्वस्मालिका वह रचना होती है जिसमें राग के तीनों सप्तकों (मंद, मध्यम, तीव्र) में स्वर व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि राग में सा, रे, ग, म, प, ध, नि स्वर हैं, तो स्वस्मालिका में इन्हें तीनों सप्तकों में क्रमवार गाया जाता है जिससे राग की सम्पूर्णता समझ में आती है। 3. ख्याल गायन शैली के प्रणेता को आमतौर पर सुल्तान हुसैन शाह शाक्ती माना जाता है। ख्याल शैली का विकास मध्यकालीन भारत में हुआ। यह शैली अधिक लचीली, भावपूर्ण और अलंकारपूर्ण होती है। ख्याल में विलंबित और द्रुत दोनों प्रकार के ख्याल गाए जाते हैं। इस शैली में तान, अलाप, और बंदिश का विशेष महत्व है। 4. लक्षण गीत में राग के वादी, संवादी स्वर, राग का समय, और राग की विशेषताएँ जैसे आरोह-अवरोह आदि का उल्लेख होता है। उदाहरण के लिए, एक लक्षण गीत में कहा जा सकता है कि राग यमन का वादी स्वर ग और संवादी स्वर नि है, तथा इसे शाम के समय गाया जाता है। 5. गत वह संगीत की वह गति या चाल होती है जिसमें स्वर और ताल के बीच तालमेल होता है। गत के प्रकार होते हैं - सरल गत, जटिल गत, और विलंबित गत। सरल गत में ताल की गति समान रहती है, जटिल गत में गति में परिवर्तन होता है, और विलंबित गत में गति धीमी होती है। 6. तराना गायन शैली शास्त्रीय संगीत में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें शब्दों के बजाय ता, ना, री, दम जैसे अक्षरों का प्रयोग होता है। तराना में तान और गति का विशेष महत्व होता है। यह शैली कलाकार की तकनीकी दक्षता और स्वर नियंत्रण को दर्शाती है।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर विस्तारपूर्वक दिया गया है। ध्रुपद की उत्पत्ति, स्वस्मालिका की परिभाषा, ख्याल शैली के प्रवर्तक और विकास, लक्षण गीत के तत्व, गत के प्रकार, तथा तराना की महत्ता को क्रमवार समझाया गया है।
Q3.सही या गलत बताइए— 1. ध्रुपद शैली का गायन प्रायः पखावज जैसे गंभीर वाद्य के साथ किया जाता है। (सही/गलत) 2. प्राचीन काल में भारतीय संगीत में केवल दो प्रकार की गीतियाँ प्रचलित थीं। (सही/गलत) 3. ख्याल गायन के अंतर्गत द्रुत ख्याल विलंबित लय में गाया जाता है। (सही/गलत) 4. तानरस खाँ एवं नत्थू खाँ के तराने अत्यंत प्रचलित हैं। (सही/गलत) 5. राग के चलन को ध्यान में रखकर तीनों सप्तकों में रची गई स्वस्मालिका राग को स्पष्ट रूप से समझने में मदद करती है। (सही/गलत) 6. ध्रुपद की चार शैलियाँ थीं जिन्हें वाणी कहते थे। (सही/गलत) 7. ऐसी मान्यता है कि जौनपुर के बादशाह सुल्तान हुसैन शाक्ती ने ख्याल शैली का आविष्कार किया। (सही/गलत) 8. झूमरा और तिलवाड़ा तालों का प्रयोग ध्रुपद गायन के साथ किया जाता है। (सही/गलत)
उत्तर:
1. सही - ध्रुपद शैली में पखावज का प्रयोग होता है क्योंकि यह गंभीर और स्थिरता प्रदान करता है। 2. गलत - प्राचीन काल में भारतीय संगीत में अनेक प्रकार की गीतियाँ प्रचलित थीं, केवल दो नहीं। 3. गलत - द्रुत ख्याल तेज लय में गाया जाता है, विलंबित लय में विलंबित ख्याल गाया जाता है। 4. सही - तानरस खाँ और नत्थू खाँ के तराने बहुत प्रसिद्ध हैं। 5. सही - स्वस्मालिका राग को तीनों सप्तकों में प्रस्तुत करके राग की सम्पूर्णता समझने में मदद मिलती है। 6. सही - ध्रुपद की चार शैलियाँ वाणी कहलाती थीं। 7. सही - ऐसी मान्यता है कि सुल्तान हुसैन शाह शाक्ती ने ख्याल शैली की स्थापना की। 8. गलत - झूमरा और तिलवाड़ा तालों का प्रयोग ख्याल गायन में अधिक होता है, ध्रुपद में नहीं।
व्याख्या:
प्रत्येक कथन का सही या गलत होना संबंधित संगीत शास्त्र के सन्दर्भ में स्पष्ट किया गया है।
Q4.रिवत्त स्थानों की पूर्ति कीजिए— 1. प्राचीन काल में ध्रुपद गायकों को _________________ कहा जाता था। 2. अभ्य नारायण मल्लिक _________________ गायन शैली के प्रमुख कलाकार हैं। 3. सुल्तान हुसैन शाह शकॉ को _________________ गायन शैली का प्रवर्तक माना जाता है। 4. राग में प्रयोग की जाने वाली स्वरों की तालबद्ध रचना को _________________ कहते हैं। 5. मधादनुल मुसीकी नामक ग्रंथ में वाणियों ध्रुपद की _________________ उल्लेख मिलता है। 6. तिलवाड़ा, झूमरा आदि तालों के साथ प्रायः _________________ ख्याल गाए जाते हैं। 7. _________________ नामक तालबद्ध रचना में बंदिश के बोल नहीं होते, केवल स्वर होते हैं। 8. जिस रचना में राग के वादी-संवादी, गायन समय तथा अन्य लक्षण का वर्णन हो उसे _________________ कहते हैं।
उत्तर:
1. ध्रुपदिया 2. ध्रुपद 3. ख्याल 4. स्वस्मालिका 5. चार वाणियों का 6. विलंबित 7. आलाप 8. लक्षण गीत
व्याख्या:
प्रत्येक रिक्त स्थान में संबंधित शब्द भरने से संगीत के विभिन्न पहलुओं की समझ स्पष्ट होती है।
Q5.विभाग 'अ' के शब्दों का 'आ' विभाग में दिए गए शब्दों से मिलान करें— | अ | | आ | | --- | --- | --- | | (क) | वसिफुद्दीन डागर | 1. तराने के बोल | | (ख) | झूमरा | 2. ख्याल गायिका | | (ग) | तदारे दा नि | 3. ध्रुपद | | (घ) | सरगम गीत | 4. विलंबित ताल | | (ङ) | केसरबाई केरकर | 5. स्वरमालिका |
उत्तर:
(क) वसिफुद्दीन डागर - 3. ध्रुपद (ख) झूमरा - 4. विलंबित ताल (ग) तदारे दा नि - 1. तराने के बोल (घ) सरगम गीत - 5. स्वरमालिका (ङ) केसरबाई केरकर - 2. ख्याल गायिका
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द को उसके संबंधित संगीत तत्व या व्यक्ति से जोड़ा गया है।
Q6.स्वर एवं लयबद्ध या तालबद्ध शब्दों से निर्मित रचना को क्या कहते हैं? इस रचना का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर:
गीत
व्याख्या:
स्वर एवं लयबद्ध या तालबद्ध शब्दों से निर्मित रचना को 'गीत' कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भावयुक्त अभिव्यक्ति होती है, चाहे शब्द सार्थक हों या निरर्थक। गीत में अभिव्यक्ति का आकर्षण तथा मनोरंजन का तत्व होता है।
Q7.ध्रुपद शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है और यह गायन शैली किन चार भागों में विभाजित होती है?
उत्तर:
ध्रुपद का शाब्दिक अर्थ है ऐसा पद जो अटल हो और जिसमें वाक्य, वर्ण, अलंकार, लय, यति आदि स्पष्ट हों। ध्रुपद की बंदिश के चार भाग होते हैं— स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग।
व्याख्या:
ध्रुपद शब्द दो शब्दों 'ध्रु' और 'पद' से बना है, जिसका अर्थ है स्थिर और अटल पद। यह गायन शैली चार भागों में विभाजित होती है: स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग। ये भाग गायन की संरचना को व्यवस्थित करते हैं।
Q8.चित्र 4.1 में दिखाए गए उस्ताद वासिफुद्दीन डागर किस गायन शैली के प्रसिद्ध कलाकार हैं? इस शैली की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
ध्रुपद; दमदार आवाज़ और गमक व मीड़ का विशेष प्रयोग
व्याख्या:
चित्र 4.1 में उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ध्रुपद गायन शैली के प्रसिद्ध कलाकार हैं। ध्रुपद गायन में दमदार आवाज़ का प्रयोग होता है और इसमें गमक तथा मीड़ का विशेष महत्व होता है। यह शैली गंभीर और स्थिर होती है।
Hindustani Sangeet Gayan Evam Vadan के सभी 10 अध्याय
Sangeet · Class 11