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Chapter 3

🎓 Class 11📖 Jeev Vigyan📖 12 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~18 मिनट
Chapter 2अध्याय 3 / 19Chapter 4

Chapter 3अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 12 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय

व्याख्या

परिचय

वनस्पति जगत जीवों की वह श्रेणी है जिसमें सभी पौधे आते हैं। ये जीव प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, इसलिए इन्हें स्वपोषी जीव (Autotrophs) कहा जाता है। वनस्पति जगत का वर्गीकरण समय के साथ विकसित हुआ है। पहले फंजाई (कवक), मोनेरा तथा प्रोटिस्टा वर्ग के सदस्य भी वनस्पति जगत में शामिल थे, लेकिन अब उन्हें अलग कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, सायनोबैक्टीरिया, जिन्हें पहले नील हरित शैवाल कहा जाता था, अब शैवाल नहीं माने जाते। वर्तमान में वनस्पति जगत के अंतर्गत मुख्य रूप से पाँच प्रमुख डिविजन माने जाते हैं: शैवाल (Algae), ब्रायोफाइट्स (Bryophytes), टेरिडोफाइट्स (Pteridophytes), जिम्नोस्पर्म्स (Gymnosperms) और एंजियोस्पर्म्स (Angiosperms)। वनस्पति जगत का वर्गीकरण केवल बाह्य रूप, रंग, आकार या पत्तियों की संख्या पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें कोशिका संरचना, प्रजनन प्रणाली, भ्रूण विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे आंतरिक गुणों को भी महत्व दिया जाता है। इससे प्राकृतिक वर्गीकरण की प्रक्रिया विकसित हुई है जो विकासीय संबंधों पर आधारित है। आधुनिक वर्गीकरण में कोशिका विज्ञान, क्रोमोसोम संख्या, रचना और व्यवहार तथा रसायनिक गुणों का भी उपयोग किया जाता है। इस प्रकार वनस्पति जगत का अध्ययन न केवल पौधों के बाहरी रूपों पर आधारित है, बल्कि उनके आंतरिक और आनुवंशिक गुणों को भी ध्यान में रखता है।

  • वनस्पति जगत में सभी स्वपोषी जीव आते हैं जो प्रकाश संश्लेषण करते हैं।
  • पहले फंजाई, मोनेरा और प्रोटिस्टा वर्ग के सदस्य भी वनस्पति में शामिल थे, अब अलग कर दिए गए हैं।
  • वनस्पति जगत के पाँच प्रमुख डिविजन हैं: शैवाल, ब्रायोफाइट, टेरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म।
  • वर्गीकरण में बाहरी और आंतरिक गुणों का समन्वय होता है।
  • आधुनिक वर्गीकरण विकासीय संबंधों और कोशिका विज्ञान पर आधारित है।
  • 📌 वनस्पति जगत: पौधों का समूह जो स्वपोषी होते हैं।
  • 📌 प्रकाश संश्लेषण: पौधों द्वारा सूर्य की ऊर्जा से भोजन बनाना।
  • 📌 स्वपोषी जीव: जो स्वयं अपना भोजन बनाते हैं।

3.1 शैवाल

व्याख्या

3.1 शैवाल

शैवाल (Algae) क्लोरोफिलयुक्त, सरल, थैलसाभ, स्वपोषी और मुख्यतः जलीय जीव होते हैं। ये अलवणीय जल, लवणीय जल और खारे जल में पाए जाते हैं। शैवाल जल के अलावा नमयुक्त पत्थरों, मिट्टी और लकड़ी पर भी पाए जाते हैं। कुछ शैवाल कवक (लाइकेन में) और प्राणियों के शरीर में भी पाए जाते हैं। शैवाल के आकार और माप में अत्यधिक विविधता होती है, जैसे कॉलोनियम (वॉल्वॉक्स) से लेकर तंतुमयी (यूलोथ्रिक्स, स्पाइरोगायरा) तक। कुछ शैवाल जैसे केल्प बहुत विशालकाय होते हैं। शैवाल तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित हैं: क्लोरोफाइसी (हरे शैवाल), फीयोफाइसी (भूरे शैवाल) और रोडोफाइसी (लाल शैवाल)। ये वर्ग उनके वर्णक, कोशिका भित्ति, संचित भोजन और फ्लैजिला की संख्या व स्थिति के आधार पर वर्गीकृत होते हैं। शैवाल कायिक, अलैंगिक और लैंगिक जनन करते हैं। कायिक जनन विखंडन द्वारा होता है, अलैंगिक जनन में चलायमान फ्लैजिलायुक्त जूस्योर (बीजाणु) बनते हैं, जो अंकुरित होकर नए पौधे बनाते हैं। लैंगिक जनन में युग्मकों का संगम होता है, जो समयुग्मकी, असमयुग्मकी या विषमयुग्मकी हो सकता है। शैवाल पृथ्वी पर प्रकाश संश्लेषण के दौरान कुल स्थिरीकृत कार्बनडाइऑक्साइड का लगभग आधा भाग स्थिर करते हैं। वे जलीय पर्यावरण में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाते हैं और खाद्य श्रृंखला का आधार होते हैं। कुछ शैवाल का आर्थिक महत्व भी है, जैसे जिलेडियम और ग्रेसिलेरिया से एंगार प्राप्त होता है, जिसका उपयोग आइसक्रीम और जैली में होता है। क्लोरैला और स्प्रूलाइना प्रोटीन से भरपूर शैवाल हैं, जिनका उपयोग अंतरिक्ष यात्रियों के भोजन के रूप में भी किया जाता है। **Table on page 4 (4×7)** | डिविजन | सामान्य नाम | प्रमुख वर्णक | संचित भोजन | कोशिका भित्ति | फ्लेजिला की संख्या तथा उनकी निवेशन की स्थिति | आवास | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | क्लोरोफाइसी | हरे शैवाल | क्लोरोफिल a, b | स्टार्च | सेल्यूलोज | 2-8, समान, शीर्ष | अलवणजल, लवणीय जल, खारा जल | | फीयोफाइसी | भूरे शैवाल | क्लोरोफिल a, c, प्यूकोजैथिन | मैनीटोल लैमिनेरिन | सेल्यूलोज तथा एलिजिन | 2, असमान, पाश्वर्षीय | अलवणजल, (बहुत कम) खारा जल, लवणीयजल | | रोडोफाइसी | लाल शैवाल | क्लोरोफिल a,d, फाइकोऐरीथिन | फ्लोरिडिऑन स्टार्च | सेल्यूलोज | अनुपस्थित | अलवण जल, (कुछ) खारा जल, लवण जल (अधिकांश) | **Table on page 14 (5×2)** | स्तंभ I (पादप) | स्तंभ II (वर्ग) | | --- | --- | | (अ) क्लैमाइडोमोनॉस | (i) मॉस | | (ब) साइकस | (ii) टेरिडोफाइट | | (स) सिलैंजिनेला | (iii) शैवाल | | (द) स्क्रैगनम | (iv) जिम्नोस्पर्म |

  • शैवाल स्वपोषी, क्लोरोफिलयुक्त और मुख्यतः जलीय जीव हैं।
  • शैवाल तीन वर्गों में विभाजित हैं: क्लोरोफाइसी, फीयोफाइसी, रोडोफाइसी।
  • जनन के तीन प्रकार: कायिक (विखंडन), अलैंगिक (बीजाणु), लैंगिक (युग्मक)।
  • शैवाल जलीय पर्यावरण में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाते हैं।
  • कुछ शैवाल का आर्थिक महत्व है जैसे एंगार, कैरागीन।
  • 📌 शैवाल: सरल संरचना वाले स्वपोषी जलीय पौधे।
  • 📌 थैलस: पौधों का वह अंग जो जड़, तना और पत्तियों से विभेदित नहीं होता।
  • 📌 बीजाणु: अलैंगिक जनन के लिए बनने वाले चलायमान कोशिकाएं।

3.1.1 क्लोरोफाइसी

व्याख्या

3.1.1 क्लोरोफाइसी

क्लोरोफाइसी वर्ग के शैवाल को सामान्यतः हरे शैवाल कहा जाता है। ये एक कोशिकीय, कॉलोनियम या तंतुमयी रूप में हो सकते हैं। इनके क्लोरोप्लास्ट में क्लोरोफिल a और b पाए जाते हैं, जो इन्हें हरे रंग का बनाते हैं। क्लोरोप्लास्ट की आकृति डिस्क, प्लेट, जालिकाकार

अभ्यास प्रश्नChapter 3

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. शैवाल के वर्गीकरण का क्या आधार है?

उत्तर:

शैवाल के वर्गीकरण का आधार उनके रंग, कोशिका की संरचना, जीवनचक्र, और प्रकाश संश्लेषण के पिगमेंट होते हैं। उदाहरण के लिए, शैवाल को मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जाता है: लाल शैवाल (Rhodophyta), हरे शैवाल (Chlorophyta), और भूरे शैवाल (Phaeophyta)। यह वर्गीकरण उनके रंगद्रव्य (pigments) और कोशिका की संरचना पर आधारित होता है।

व्याख्या:

शैवाल के वर्गीकरण में मुख्य रूप से उनके रंगद्रव्य जैसे क्लोरोफिल, कैरोटीन, फिकोएरिथ्रिन आदि को देखा जाता है। इसके अलावा, उनके जीवनचक्र और कोशिका की दीवार की संरचना भी वर्गीकरण में सहायक होती है।

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Q2.2. लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म के जीवन-चक्र में कहाँ और कब निम्नीकरण विभाजन होता है?

उत्तर:

निम्नीकरण विभाजन (Meiosis) निम्नलिखित स्थानों और समय पर होता है: - लिवरवर्ट: स्पोरोफाइट के स्पोरोसाइट कोशिकाओं में स्पोर्स बनाने के लिए। - मॉस: स्पोरोफाइट के स्पोरोसाइट में स्पोर्स बनने के लिए। - फर्न: स्पोरोफाइट के स्पोरोसाइट में स्पोर्स बनने के लिए। - जिम्नोस्पर्म: मेयोसिस बीजाणु (pollen) और अंडाणु (ovule) के निर्माण में होता है। - एंजियोस्पर्म: मेयोसिस बीजाणु और अंडाणु के निर्माण में होता है। इस प्रकार, निम्नीकरण विभाजन स्पोरोफाइट चरण में स्पोर्स बनाने के लिए होता है, जो आगे जाकर गेमेटोफाइट बनाता है।

व्याख्या:

सभी पौधों में निम्नीकरण विभाजन स्पोरोफाइट चरण में होता है, जिससे हाप्लोइड स्पोर्स बनते हैं। ये स्पोर्स गेमेटोफाइट बनाते हैं। जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म में मेयोसिस बीजाणु और अंडाणु के निर्माण में होता है।

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Q3.3. पौधे के तीन वर्गों के नाम लिखो, जिनमें स्त्रीधानी होती है। इनमें से किसी एक के जीवन-चक्र का संक्षिप्त वर्णन करो।

उत्तर:

स्त्रीधानी वाले तीन पौधों के वर्ग हैं: 1. मॉस 2. फर्न 3. जिम्नोस्पर्म जीवन-चक्र (मॉस का संक्षिप्त वर्णन): मॉस में जीवनचक्र में दो चरण होते हैं - स्पोरोफाइट (डिप्लोइड) और गेमेटोफाइट (हाप्लोइड)। - स्पोरोफाइट में स्पोरोसाइट कोशिकाओं में मेयोसिस होता है और स्पोर्स बनते हैं। - ये स्पोर्स गेमेटोफाइट बनाते हैं जो हरे रंग के होते हैं। - गेमेटोफाइट पर स्त्रीधानी (आर्केगोनियम) और पुंधानी (एंथिडियम) होते हैं। - स्त्रीधानी में अंडाणु बनते हैं। - जल की सहायता से शुक्राणु अंडाणु तक पहुँचकर निषेचन करते हैं। - निषेचन के बाद नया स्पोरोफाइट बनता है।

व्याख्या:

मॉस में जीवनचक्र में हाप्लोइड गेमेटोफाइट प्रमुख होता है। स्त्रीधानी अंडाणु बनाती है। निषेचन के बाद डिप्लोइड स्पोरोफाइट बनता है जो स्पोर्स बनाता है। यह चक्र चलता रहता है।

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Q4.4. निम्नलिखित की सूत्रगुणता बताओ: मॉस के प्रथम तंतुक कोशिका; द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केंद्रक, मॉस की पत्तियों की कोशिका; फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएं, मारकेशिया की जेमा कोशिका; एकबीजपत्री की मैरिस्टम कोशिका, लिवरवर्ट के अंडाशय तथा फर्न के युग्मनज।

उत्तर:

सूत्रगुणता (Ploidy) निम्नलिखित है: - मॉस के प्रथम तंतुक कोशिका: हाप्लोइड (n) - द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केंद्रक: डिप्लोइड (2n) - मॉस की पत्तियों की कोशिका: हाप्लोइड (n) - फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएं: हाप्लोइड (n) - मारकेशिया की जेमा कोशिका: हाप्लोइड (n) - एकबीजपत्री की मैरिस्टम कोशिका: डिप्लोइड (2n) - लिवरवर्ट के अंडाशय: डिप्लोइड (2n) - फर्न के युग्मनज: डिप्लोइड (2n)

व्याख्या:

मॉस और फर्न जैसे टेरिडोफाइट में गेमेटोफाइट हाप्लोइड होता है, इसलिए उनकी कोशिकाएं n होती हैं। भ्रूणपोष और मैरिस्टम कोशिकाएं डिप्लोइड होती हैं क्योंकि वे स्पोरोफाइट चरण के हैं।

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Q5.5. शैवाल तथा जिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्व पर टिप्पणी लिखो।

उत्तर:

शैवाल का आर्थिक महत्व: - शैवाल समुद्री खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोगी हैं। - कुछ शैवालों से आयोडीन, एल्जिन, और काराजीन जैसे पदार्थ प्राप्त होते हैं जो औद्योगिक और चिकित्सा क्षेत्र में उपयोगी हैं। - शैवाल जैव ईंधन के स्रोत के रूप में भी अध्ययन किए जा रहे हैं। जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्व: - जिम्नोस्पर्म जैसे पाइन और देवदार के पेड़ लकड़ी, कागज, और रेजिन के लिए उपयोगी हैं। - इनके बीजों से तेल प्राप्त होता है। - ये पेड़ औषधीय और सजावटी पौधों के रूप में भी महत्वपूर्ण हैं।

व्याख्या:

शैवाल और जिम्नोस्पर्म दोनों के आर्थिक महत्व उनके उपयोगिता और उत्पादों के कारण है। शैवाल समुद्री संसाधन हैं जबकि जिम्नोस्पर्म वनों और औद्योगिक कच्चे माल के स्रोत हैं।

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Q6.6. जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं, फिर भी उनका वर्गीकरण अलग-अलग क्यों हैं?

उत्तर:

जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं, लेकिन उनका वर्गीकरण इसलिए अलग है क्योंकि: - जिम्नोस्पर्म के बीज नग्न (नंगे) होते हैं, यानी बीजों को किसी फल या आवरण से ढका नहीं जाता। - एंजियोस्पर्म के बीज फल के अंदर सुरक्षित होते हैं, यानी बीज फल द्वारा आवृत होते हैं। - जिम्नोस्पर्म में फूल नहीं होते जबकि एंजियोस्पर्म में फूल होते हैं। - जिम्नोस्पर्म के पौधे आमतौर पर सदाबहार होते हैं, जबकि एंजियोस्पर्म में विभिन्न प्रकार के पौधे होते हैं।

व्याख्या:

बीजों की संरचना और संरक्षण के आधार पर जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म में अंतर होता है, जो उनके वर्गीकरण को अलग बनाता है।

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Q7.7. विषम बीजाणुता क्या है? इसकी सार्थकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। इसके दो उदाहरण दो।

उत्तर:

विषम बीजाणुता (Heterospory) वह अवस्था है जिसमें पौधे दो प्रकार के बीजाणु बनाते हैं - पुरुष बीजाणु (microspores) और स्त्री बीजाणु (megaspores)। सार्थकता: - विषम बीजाणुता से पौधे में लिंग निर्धारण होता है और निषेचन की प्रक्रिया अधिक नियंत्रित होती है। - यह बीजों के विकास और प्रजनन में सहायक होता है। उदाहरण: 1. सेलागिनेला (Selaginella) 2. मार्शिया (Marsilea)

व्याख्या:

विषम बीजाणुता से पौधों में लिंग विशेषता और प्रजनन की दक्षता बढ़ती है। इससे बीजाणु अलग-अलग प्रकार के बनते हैं जो निषेचन को सुनिश्चित करते हैं।

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Q8.8. उदाहरण सहित निम्नलिखित शब्दावली का संक्षिप्त वर्णन करो: (i) प्रथम तंतु (ii) पुंधानी (iii) स्त्रीधानी (iv) द्विगुणितक (v) बीजाणुपर्ण (vi) समयुग्मकी

उत्तर:

(i) प्रथम तंतु: जीवनचक्र का वह चरण जो सीधे स्पोर्स से विकसित होता है और गेमेटोफाइट बनाता है। उदाहरण: मॉस में प्रथम तंतु। (ii) पुंधानी: पुरुष जननांग जो शुक्राणु बनाता है। उदाहरण: मॉस में एंथिडियम। (iii) स्त्रीधानी: स्त्री जननांग जो अंडाणु बनाता है। उदाहरण: मॉस में आर्केगोनियम। (iv) द्विगुणितक: वह कोशिका जिसमें दो गुणा क्रोमोसोम होते हैं (2n)। (v) बीजाणुपर्ण: बीजाणु को ढकने वाला परत या संरचना। (vi) समयुग्मकी: निषेचन की वह प्रक्रिया जिसमें शुक्राणु और अंडाणु का मेल होता है।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का पौधों के जीवनचक्र और संरचना में विशेष महत्व है। उदाहरणों के साथ समझने से ये अवधारणाएँ स्पष्ट होती हैं।

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