NCERTCh 3निःशुल्क

Chapter 3

🎓 Class 12📖 Bhaswati📖 8 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~12 मिनट
Chapter 2अध्याय 3 / 10Chapter 4

Chapter 3अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

प्रस्तावना एवं पाठ का परिचय

व्याख्या

प्रस्तावना एवं पाठ का परिचय

इस अध्याय 'प्रजानुरञ्जको नृपः' में महाकवि कालिदास द्वारा रचित रघुवंश महाकाव्य के प्रथम सर्ग से श्लोकों का चयन किया गया है। इस पाठ में कालिदास ने आदर्श राजा के गुणों का वर्णन किया है, जो केवल एक राजवंश के लिए नहीं, बल्कि समस्त विश्व के शासकों के लिए अनुकरणीय हैं। राजा का मुख्य धर्म प्रजा का अनुरंजन करना है, अर्थात् प्रजा की भलाई करना और उन्हें सुखी रखना। इसके लिए राजा को प्रजा से कर लेना आवश्यक है, लेकिन यह कर प्रजा के कल्याण के लिए ही होना चाहिए। राजा को विद्वान, सत्यवादी, इन्द्रियनिग्रही (इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने वाला) तथा प्रजापालक होना चाहिए। पाठ में बताया गया है कि वे ही राजवंश चिरकाल तक राज्य करते हैं, जिनमें रघुवंशी राजाओं जैसे गुण होते हैं। इस प्रकार यह पाठ शासकों के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है कि उन्हें किस प्रकार के गुणों से युक्त होना चाहिए ताकि वे अपने राज्य और प्रजा का कल्याण कर सकें।

  • कालिदास ने रघुवंश के प्रथम सर्ग से श्लोक लिए हैं।
  • राजा का मुख्य धर्म प्रजा का अनुरंजन करना है।
  • राजा को कर लेना चाहिए, परन्तु वह कर प्रजा के कल्याण के लिए होना चाहिए।
  • राजा को विद्वान, सत्यवादी, इन्द्रियनिग्रही तथा प्रजापालक होना चाहिए।
  • रघुवंशी राजाओं के गुण आदर्श माने गए हैं।
  • 📌 प्रजानुरञ्जन: राजा का धर्म है प्रजा को खुश रखना।
  • 📌 इन्द्रियनिग्रह: इन्द्रियों पर नियंत्रण।
  • 📌 रघुवंश: महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित राजवंश।

श्लोकों का पाठ एवं अनुवाद

व्याख्या

श्लोकों का पाठ एवं अनुवाद

इस खंड में रघुवंश के प्रथम सर्ग के आरंभिक श्लोकों का संस्कृत पाठ प्रस्तुत किया गया है, जिनका हिन्दी अनुवाद और भावार्थ भी दिया गया है। श्लोकों में रघुवंशी राजाओं के गुणों का विस्तार से वर्णन है। जैसे कि त्याग, सत्यता, मितभाषिता, विजय की इच्छा, गृहस्थ जीवन, योग साधना, ज्ञान, मौन, क्षमा, त्याग, विनय आदि गुणों का उल्लेख है। राजा को प्रजा के कल्याण के लिए कर लेना चाहिए, जिससे प्रजा की रक्षा और पालन-पूर्ति हो सके। राजा को पिता के समान माना गया है, जो केवल जन्म देने वाला नहीं, बल्कि पालन-पोषण करने वाला भी होता है। श्लोकों में दिलीप को राजेन्दु (राजाओं का चन्द्रमा) कहा गया है, जो अपने गुणों से प्रजा के लिए प्रकाश की तरह है। इस प्रकार श्लोकों के माध्यम से आदर्श राजा के गुणों का विस्तृत चित्रण किया गया है।

  • श्लोकों में रघुवंशी राजाओं के गुणों का वर्णन है।
  • त्याग, सत्यता, मितभाषिता, विजय की इच्छा आदि गुणों का उल्लेख है।
  • राजा को प्रजा के कल्याण के लिए कर लेना चाहिए।
  • राजा को प्रजा का पिता माना गया है।
  • दिलीप को राजेन्दु कहा गया है।
  • 📌 त्याग: परित्याग करना।
  • 📌 मितभाषिण: सीमित और संयमित बोलने वाला।
  • 📌 राजेन्दु: राजाओं का चन्द्रमा, श्रेष्ठ राजा।

शब्दार्थ एवं टिप्पण्याः

व्याख्या

शब्दार्थ एवं टिप्पण्याः

इस खंड में पाठ के श्लोकों में प्रयुक्त कठिन शब्दों के अर्थ और उनकी व्याकरणिक व्याख्या दी गई है। प्रत्येक शब्द का संस्कृत में विभाजन, तत्पुरुष, बहुव्रीहि, उपपद समास आदि के अनुसार अर्थ बताया गया है। उदाहरण के लिए 'सम्भृतार्थानाम्' का अर्थ है वे जो धन इ

अभ्यास प्रश्नChapter 3

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. एकपदेन उत्तरत- (क) केषाम् अन्वय: कालिदासेन विवक्षित:? (ख) रघुवंशिन: अन्ते केन तनुं त्यजन्ति? (ग) महीक्षिताम् आद्य: क: आसीत्? (घ) कासां पितर: केवलं जन्महेतव:? (ङ) क: प्रिय: अपि त्याज्य:? (च) दिलीप: प्रजानां भूत्यर्थं कम् अग्रहीत्? (छ) राजेन्दु: दिलीप: रघृणामन्वये क्षीरनिधौ क: इव प्रसूत?

उत्तर:

1. एकपदेन उत्तरत- (क) कालिदासेन विवक्षित: अन्वय: राजानाम्। (ख) रघुवंशिन: अन्ते रघु: तनुं त्यजन्ति। (ग) महीक्षिताम् आद्य: मनु: आसीत्। (घ) कासां पितर: केवलं जन्महेतव: आसन्। (ङ) प्रिय: अपि त्याज्य: मनु:। (च) दिलीप: प्रजानां भूत्यर्थं बलिम् अग्रहीत्। (छ) राजेन्दु: दिलीप: रघृणामन्वये क्षीरनिधौ मनु: इव प्रसूत:।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का एकपद उत्तर दिया गया है जो पाठ के अनुसार है। उदाहरणतः, (क) में कालिदास द्वारा विवक्षित अन्वय: राजाओं का है। इसी प्रकार अन्य प्रश्नों के उत्तर भी पाठ के सन्दर्भानुसार संक्षेप में दिए गए हैं।

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Q2.2. पूर्णवाक्येन उत्तरत- (क) महाकविकालिदासेन वैवस्वतो मनु: महीक्षितां क्रीडूश: निगदित:? (ख) कालिदास: तनुवागिवभव: सन् अपि तद्गुणै: कथं प्रचोदित:? (ग) के तं (रघुवंशं) श्रोतुमर्हन्ति? (घ) दिलीपस्य कार्याणाम् आरम्भ: कीदृश: आसीत्? (ङ) रवि: रसं किमर्थम् आदते?

उत्तर:

2. पूर्णवाक्येन उत्तरत- (क) महाकविकालिदासेन वैवस्वतो मनु: महीक्षितां क्रीडूश: रूपेण वर्णित:। (ख) कालिदास: तनुवागिवभव: सन् अपि तद्गुणै: प्रचोदित: यथा प्रजा-कल्याणार्थं बलिम् ग्रहणं कृतवान्। (ग) रघुवंशं श्रोतुमर्हन्ति वेदविद्, काव्यप्रेमी, तथा संस्कृतभाषा-प्रेमी। (घ) दिलीपस्य कार्याणाम् आरम्भ: उत्साहपूर्ण: तथा प्रजा-हिताय समर्पित: आसीत्। (ङ) रवि: रसं प्रजा-कल्याणार्थं तथा प्रकृति-प्रसादार्थं आदते।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का पूर्णवाक्य में उत्तर दिया गया है। उदाहरणतः, (क) में कालिदास ने वैवस्वतो मनु: को महीक्षिताम् क्रीडूश: के रूप में वर्णित किया है। (ख) में कालिदास के गुणों के कारण उन्हें प्रजा-हित के कार्यों के लिए प्रेरित किया गया। अन्य प्रश्नों के उत्तर भी पाठ के अनुसार विस्तार से दिए गए हैं।

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Q3.3. रेखाद्वितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) स: प्रजानामेव भूत्यर्थं बलिम् अग्रहीत्। (ख) प्रजानां विनयाधानात् स: पिता आसीत्। (ग) मनीषिणां माननीय: मनु: आसीत्। (घ) शुद्धिमति अन्वये दिलीप: प्रसूत:। (ङ) पितर: जन्महेतव: आसन्।

उत्तर:

3. प्रश्ननिर्माण उदाहरण- (क) स: प्रजानामेव भूत्यर्थं बलिम् किमर्थं अग्रहीत? (ख) प्रजानां विनयाधानात् स: पिता कथं आसीत? (ग) मनीषिणां माननीय: मनु: कथं आसीत? (घ) शुद्धिमति अन्वये दिलीप: कथं प्रसूत:? (ङ) पितर: जन्महेतव: के आसन्?

व्याख्या:

प्रत्येक दिए गए पदों के आधार पर प्रश्न बनाए गए हैं जो पाठ के अर्थ को समझने में सहायक हैं। उदाहरण के लिए, (क) पद से प्रश्न बनाया गया है कि बलिम् क्यों अग्रहीत? इसी प्रकार अन्य पदों से भी प्रश्न तैयार किए गए हैं।

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Q4.4. अधोलिखितानां भावार्थं हिन्दी/आंग्ल/संस्कृतभाषया लिखत- (क) प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्। (ख) आगमै: सदृशारम्भ: आरम्भसदृशोदय:। (ग) स पिता पितरस्तासां केवल जन्महेतव:। (घ) अनन्यशासनामुर्वीं शशासैकपुरीमिव।

उत्तर:

4. भावार्थ- (क) प्रजा की ही समृद्धि के लिए उसने उनसे बलि ग्रहण किया। (ख) आगम के समान आरंभ, आरंभ के समान उदय। (ग) वह पिता था, उन पितरों का जो केवल जन्म का कारण थे। (घ) अनन्य शासन वाली नदी की तरह, जैसे शशासैकपुरी।

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्य का भावार्थ हिन्दी में दिया गया है जिससे अर्थ स्पष्ट हो। उदाहरणतः, (क) में बताया गया है कि प्रजा की समृद्धि के लिए बलि ग्रहण किया गया। इसी प्रकार अन्य वाक्यों के भावार्थ भी दिए गए हैं।

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Q5.5. अधोलिखितेषु विपरीतार्थमेलनं कुरुत- यौवने चपलताम् मौनम् शासनम् न अकरोत् त्याज्य: अक्षता शशास ग्राह्य: क्षता वार्धके

उत्तर:

5. विपरीतार्थ मेल- यौवने चपलताम् - वृद्धावस्थायां स्थिरता मौनम् शासनम् न अकरोत् - वाक्चातुर्यं कृतवान् त्याज्य: अक्षता - स्वीकार्य: क्षमा शशास ग्राह्य: - शशास अप्रिय: क्षता वार्धके - स्वास्थ्यं युवावस्थायाम्

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्यांश के विपरीतार्थ को मेल किया गया है। उदाहरण के लिए, 'यौवने चपलताम्' का विपरीत 'वृद्धावस्थायां स्थिरता' है। इसी प्रकार अन्य वाक्यों के विपरीतार्थ भी दिए गए हैं।

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Q6.6. अधोलिखितेषु प्रकृति-प्रत्यय-विभाग: क्रियताम्- आगत्य, उत्स्पष्टुम्, सम्मत:, त्याज्य:, शिष्ट:

उत्तर:

6. प्रकृति-प्रत्यय-विभाग- आगत्य = आगत् + य (प्रत्यय) उत्स्पष्टुम् = उत्प् + स्पष्टुम् (क्रिया-रूप) सम्मत: = सम् + मत: (प्रत्यय) त्याज्य: = त्यज् + य (प्रत्यय) शिष्ट: = शि + ष्ट (प्रत्यय)

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द को उसके मूल प्रकृति और प्रत्यय में विभाजित किया गया है। उदाहरण के लिए, 'आगत्य' में 'आगत्' मूल और 'य' प्रत्यय है। इसी प्रकार अन्य शब्दों का भी विभाजन किया गया है।

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Q7.7. सन्धिम् सन्धि-विच्छेदं वा कुरुत- तनुवागिवभवोऽपि, योगेनान्ते, ताभ्य: + बलिम्, शशासैकपुरीमिव।

उत्तर:

7. सन्धि-विच्छेद- तनुवागिवभवोऽपि = तनु + वागि + अभव: + अपि योगेनान्ते = योगेन + अन्ते ताभ्य: + बलिम् = ताभ्य: + बलिम् (अव्यय-समास) शशासैकपुरीमिव = शशास + एक + पुरी + इव

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का सन्धि-विच्छेद किया गया है। उदाहरण के लिए, 'तनुवागिवभवोऽपि' को तनु + वागि + अभव: + अपि में विभाजित किया गया है। इसी प्रकार अन्य शब्दों का भी सन्धि-विच्छेद प्रस्तुत किया गया है।

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Q8.8. अधोलिखितस्य श्लोकद्वयस्य अन्वयं कुरुत- प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाद्ध्रणादपि। स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतव:।। स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम्। अनन्यशासनामुर्वीं शशासैकपुरीमिव।।

उत्तर:

8. अन्वय- प्रजानां विनयाधानात् रक्षणाद्ध्रणादपि स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतव: आसीत्। स वेला अप्रवलयां परिखीकृत सागरम् अनन्य शासनाम् उर्वीं शशासैकपुरीमिव आसीत्।

व्याख्या:

श्लोकों का अन्वय किया गया है जिससे अर्थ स्पष्ट हो। पहले श्लोक में कहा गया है कि प्रजाओं की विनय, रक्षण, धरण आदि के कारण वह पिता था, जो केवल जन्म का कारण था। दूसरे श्लोक में कहा गया है कि वह समय की प्रबलता से समुद्र को घेरने वाला, अनन्य शासन वाली नदी की तरह था।

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