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Chapter 3

🎓 Class 12📖 Bhartiya Samaj📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 2अध्याय 3 / 7Chapter 4

Chapter 3अध्ययन नोट्स

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सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन

व्याख्या

सामाजिक संस्थाएँ : निरंतरता एवं परिवर्तन

भारतीय समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न वर्गों, समुदायों और सामाजिक संस्थाओं का एक जटिल तंत्र है। सामाजिक संस्थाएँ वे संरचनाएँ हैं जो समाज के सदस्यों के बीच संबंधों को स्थापित करती हैं और समाज के निरंतर संचालन में सहायता करती हैं। ये संस्थाएँ समाज की निरंतरता बनाए रखने के साथ-साथ उसमें परिवर्तन की संभावनाएँ भी उत्पन्न करती हैं। इस अध्याय में हम भारतीय समाज की तीन प्रमुख सामाजिक संस्थाओं — जाति, जनजाति और परिवार — का विस्तार से अध्ययन करेंगे। जाति व्यवस्था भारतीय समाज की प्राचीन और विशिष्ट सामाजिक संस्था है, जो सामाजिक विभाजन, अधिक्रम और सांस्कृतिक नियमों के माध्यम से समाज को संचालित करती है। जनजातीय समुदाय भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने निवासी हैं, जिनकी सामाजिक संरचना और पहचान जाति से भिन्न है। परिवार सामाजिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है, जो व्यक्ति के जन्म, पालन-पोषण और सामाजिककरण का केंद्र है। इस अध्याय के माध्यम से हम इन संस्थाओं की निरंतरता, परिवर्तन, और उनके सामाजिक प्रभावों को समझेंगे।

  • सामाजिक संस्थाएँ समाज के सदस्यों के बीच संबंधों को स्थापित करती हैं।
  • जाति, जनजाति और परिवार भारतीय समाज की प्रमुख सामाजिक संस्थाएँ हैं।
  • सामाजिक संस्थाएँ निरंतरता और परिवर्तन दोनों की प्रक्रिया में भूमिका निभाती हैं।
  • जाति व्यवस्था भारतीय समाज की विशिष्ट और प्राचीन संस्था है।
  • जनजातीय समुदाय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने निवासी हैं।
  • परिवार व्यक्ति के जन्म और सामाजिककरण का मूल केंद्र है।
  • 📌 सामाजिक संस्था: समाज के सदस्यों के बीच स्थापित नियम और संबंधों का तंत्र।
  • 📌 जाति: जन्म आधारित सामाजिक वर्गीकरण।
  • 📌 जनजाति: प्राचीन आदिवासी समुदाय।

3.1 जाति एवं जाति व्यवस्था

व्याख्या

3.1 जाति एवं जाति व्यवस्था

जाति भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्राचीन और विशिष्ट सामाजिक संस्था है, जो हजारों वर्षों से भारतीय समाज का अभिन्न हिस्सा रही है। जाति व्यवस्था केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि मुसलमान, ईसाई और सिख समुदायों में भी इसके प्रभाव देखे जा सकते हैं। अंग्रेजी शब्द 'कास्ट' पुर्तगाली शब्द 'कास्टा' से आया है, जिसका अर्थ है 'विशुद्ध नस्ल'। भारतीय संदर्भ में जाति का अर्थ सामाजिक वर्गीकरण और जन्म आधारित समूह है। प्रारंभिक वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था थी, जिसमें चार प्रमुख वर्ग — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — शामिल थे। जाति व्यवस्था में जन्म से सदस्यता, विवाह संबंधी नियम, खान-पान के नियम, सामाजिक अधिक्रम, उप-जातियाँ, और व्यवसाय से जुड़ी विशेषताएँ शामिल हैं। जाति व्यवस्था सामाजिक विभाजन (पृथक्करण) और सामाजिक पदानुक्रम (अधिक्रम) पर आधारित है। जाति के नियमों में विवाह केवल समान जाति के भीतर होता है, खाने-पीने के नियम सख्त होते हैं, और जाति के अनुसार सामाजिक स्थान निर्धारित होता है। उपनिवेशकाल में ब्रिटिश प्रशासन ने जाति व्यवस्था का सर्वेक्षण और जनगणना की, जिससे जाति की पहचान और अधिक कठोर हुई। स्वतंत्रता के बाद भी जाति व्यवस्था में परिवर्तन हुए, लेकिन यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। राजनीति, शिक्षा, और आर्थिक क्षेत्रों में जाति का प्रभाव आज भी बना हुआ है।

  • जाति जन्म आधारित सामाजिक वर्गीकरण है।
  • प्रारंभिक वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था थी, जिसमें चार वर्ग थे।
  • जाति व्यवस्था में विवाह, खान-पान और व्यवसाय के कठोर नियम होते हैं।
  • जाति सामाजिक अधिक्रम (पदानुक्रम) पर आधारित होती है।
  • ब्रिटिश काल में जाति का सर्वेक्षण और जनगणना हुई।
  • स्वतंत्रता के बाद भी जाति व्यवस्था में परिवर्तन हुए लेकिन समाप्त नहीं हुई।
  • 📌 जाति: जन्म से निर्धारित सामाजिक समूह।
  • 📌 वर्ण व्यवस्था: वैदिक काल की चार सामाजिक वर्गीकरण प्रणाली।
  • 📌 अधिक्रम: सामाजिक पदानुक्रम।

उपनिवेशवाद और जाति

व्याख्या

उपनिवेशवाद और जाति

औपनिवेशिक काल (लगभग 1800 से 1947) में जाति व्यवस्था में गहरा परिवर्तन आया। ब्रिटिश प्रशासन ने शासन की सुविधा के लिए जातियों और जनजातियों का व्यवस्थित सर्वेक्षण किया और जनगणना के माध्यम से जातियों की गणना की। 1901 की जनगणना में जाति के सामाजिक अधिक्रम

अभ्यास प्रश्नChapter 3

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. जाति व्यवस्था में पृथक्करण (separation) और अधिक्रम (hierarchy) की क्या भूमिका है?

उत्तर:

जाति व्यवस्था में पृथक्करण और अधिक्रम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पृथक्करण का अर्थ है जातियों के बीच स्पष्ट भेदभाव और अलगाव, जिससे प्रत्येक जाति अपने सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कार्यों में अलग रहती है। अधिक्रम का अर्थ है जातियों के बीच सामाजिक पदानुक्रम, जहाँ कुछ जातियाँ उच्च स्थान पर होती हैं और कुछ निम्न। यह व्यवस्था सामाजिक नियंत्रण और व्यवस्था बनाए रखने में सहायक होती है।

व्याख्या:

जाति व्यवस्था सामाजिक समूहों को पृथक करती है और उन्हें सामाजिक पदानुक्रम में रखती है। इससे सामाजिक स्थिरता और नियंत्रण सुनिश्चित होता है।

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Q2.2. वे कौन से नियम हैं जिनका पालन करने के लिए जाति व्यवस्था बाध्य करती है? कुछ के बारे में बताइए?

उत्तर:

जाति व्यवस्था में कई नियम होते हैं जिनका पालन करना अनिवार्य होता है, जैसे कि विवाह नियम (समान जाति में विवाह), आचार-विचार के नियम, भोजन संबंधी नियम (शुद्धता और अस्वच्छता के नियम), और सामाजिक व्यवहार के नियम। ये नियम जाति की शुद्धता और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाए गए हैं।

व्याख्या:

जाति व्यवस्था के नियम सामाजिक नियंत्रण के लिए बनाए जाते हैं ताकि जाति की पहचान और सामाजिक पदानुक्रम कायम रहे।

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Q3.3. उपनिवेशववाद के कारण जाति व्यवस्था में क्या-क्या परिवर्तन आए?

उत्तर:

उपनिवेशवाद के कारण जाति व्यवस्था में कई परिवर्तन आए जैसे कि अंग्रेजों द्वारा जाति को औपचारिक रूप से वर्गीकृत करना, जाति आधारित नौकरियों का प्रावधान, जाति के आधार पर सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का बढ़ना, और जाति के राजनीतिक महत्व में वृद्धि। इसके अलावा, आधुनिक शिक्षा और औद्योगिकीकरण ने जाति व्यवस्था को प्रभावित किया।

व्याख्या:

उपनिवेशवाद ने जाति व्यवस्था को औपचारिक और कठोर रूप दिया, जिससे जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक असमानता बढ़ी।

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Q4.4. किन अर्थों में नगरीय उच्च जातियों के लिए जाति अपेक्षाकृत ‘अदृश्य’ हो गई है?

उत्तर:

नगरीय उच्च जातियों के लिए जाति अपेक्षाकृत ‘अदृश्य’ इसलिए हो गई है क्योंकि वे आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से अधिक सशक्त हो गए हैं। वे जाति आधारित सीमाओं को पार कर सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में अधिक स्वतंत्रता से कार्य कर पाते हैं। इसके अलावा, शहरीकरण और आधुनिकता ने जाति की पारंपरिक सीमाओं को कमजोर किया है।

व्याख्या:

शहरी उच्च जातियाँ जाति के बंधनों से मुक्त होकर अधिक सामाजिक गतिशीलता प्राप्त कर चुकी हैं, इसलिए उनके लिए जाति कम महत्वपूर्ण हो गई है।

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Q5.5. भारत में जनजातियों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है?

उत्तर:

भारत में जनजातियों का वर्गीकरण मुख्यतः उनकी भौगोलिक स्थिति, भाषा, संस्कृति, और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर किया गया है। इन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी गई है। वर्गीकरण में आदिवासी, वनवासी, और अन्य जनजातीय समूह शामिल हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में रहते हैं और उनकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान होती है।

व्याख्या:

जनजातियों का वर्गीकरण उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर किया जाता है ताकि उनकी पहचान और संरक्षण सुनिश्चित हो सके।

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Q6.6. ‘जनजातियाँ आदिम समुदाय हैं जो सभ्यता से अछूते रहकर अपना अलग-थलग जीवन व्यतीत करते हैं’, इस दृष्टिकोण के विपक्ष में आप क्या साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहेंगे?

उत्तर:

इस दृष्टिकोण के विपक्ष में यह साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सकता है कि जनजातियाँ भी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित हो रही हैं। वे आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, बाजार अर्थव्यवस्था में भाग ले रही हैं, और राजनीतिक प्रक्रियाओं में सक्रिय हैं। इसके अलावा, जनजातीय समुदायों की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संगठन होते हैं जो उन्हें अलग-थलग नहीं बल्कि समाज का अभिन्न हिस्सा बनाते हैं।

व्याख्या:

जनजातियाँ केवल आदिम नहीं हैं, वे आधुनिकता के साथ तालमेल बिठा रही हैं और समाज के विकास में योगदान दे रही हैं।

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Q7.7. आज जनजातीय पहचानों के लिए जो दावा किया जा रहा है उसके पीछे क्या कारण हैं?

उत्तर:

आज जनजातीय पहचानों के लिए जो दावा किया जा रहा है उसके पीछे कारण हैं: सामाजिक न्याय की मांग, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा, आर्थिक और शैक्षिक अवसरों की प्राप्ति, और राजनीतिक सशक्तिकरण। इसके अलावा, जनजातीय समुदायों को उनके अधिकारों और संसाधनों की रक्षा के लिए भी यह आवश्यक है कि उनकी विशिष्ट पहचान को मान्यता मिले।

व्याख्या:

जनजातीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए अपनी पहचान को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

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Q8.8. परिवार के विभिन्न रूप क्या हो सकते हैं?

उत्तर:

परिवार के विभिन्न रूप हो सकते हैं जैसे कि मूल परिवार (माता-पिता और उनके बच्चे), विस्तारित परिवार (संयुक्त परिवार जिसमें कई पीढ़ियाँ और दंपति एक साथ रहते हैं), पति-स्थानिक परिवार (जहाँ नवविवाहित जोड़ा वर के माता-पिता के साथ रहता है), पत्नी-स्थानिक परिवार (जहाँ नवविवाहित जोड़ा वधू के माता-पिता के साथ रहता है), पितृवंशीय परिवार (जहाँ उत्तराधिकार पिता से पुत्र को होता है), और मातृवंशीय परिवार (जहाँ उत्तराधिकार माँ से बेटी को होता है)।

व्याख्या:

परिवार की संरचना सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।

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