Chapter 16
Chapter 16 — अध्ययन नोट्स
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16.1 मानव उत्सर्जन तंत्र
व्याख्या16.1 मानव उत्सर्जन तंत्र
मानव शरीर में उत्सर्जन तंत्र मुख्य रूप से शरीर से अवांछित, विषैले और अतिरिक्त पदार्थों को बाहर निकालने के लिए कार्य करता है। इसमें एक जोड़ी वृक्क (Kidneys), एक जोड़ी मूत्र नलिका (Ureters), एक मूत्राशय (Urinary bladder) और एक मूत्र मार्ग (Urethra) शामिल होते हैं। वृक्क सेम के बीज के आकार के गहरे भूरे लाल रंग के अंग होते हैं, जो उदर गुहा के आंतरिक पृष्ठ पर अंतिम वक्षीय और तीसरी कटि कशेरुका के समीप स्थित होते हैं। प्रत्येक वृक्क की लंबाई लगभग 10-12 सेमी, चौड़ाई 5-7 सेमी, मोटाई 2-3 सेमी और भार 120-170 ग्राम होता है। वृक्क की भीतरी सतह पर हाइलम नामक एक खांचा होता है, जिससे मूत्र नलिका, रक्त वाहिकाएं और तंत्रिकाएं प्रवेश करती हैं। हाइलम के भीतरी भाग में वृक्कीय श्रोणि (पेल्विस) होती है, जो मूत्र को संग्रहित करती है। वृक्क की बाहरी सतह पर दृढ़ संपूट होता है। वृक्क में दो मुख्य भाग होते हैं - बाहरी वल्कुट (कॉर्टेक्स) और भीतरी मध्यांश (मेडुला)। मध्यांश में कुछ शंक्वाकार पिरामिड होते हैं जिन्हें मध्यांश पिरामिड कहा जाता है। वल्कुट मध्यांश पिरामिड के बीच फैलकर वृक्क स्तंभ (Columns of Bertini) बनाते हैं। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु (नेफ्रॉन) होते हैं, जो वृक्क की कार्यात्मक इकाई हैं। प्रत्येक नेफ्रॉन में दो मुख्य भाग होते हैं - गुच्छ (ग्लोमेरुलस) और वृक्क नलिका। गुच्छ अभिवाही धमनिका की शाखाओं से बने केशिकाओं का जाल होता है, जो रक्त से निस्यंदन करता है। वृक्क नलिका बोमेन सम्पुट से प्रारंभ होती है, जो समीपस्थ संवलित नलिका, हेनले-लूप, दूरस्थ संवलित नलिका और संग्रह नलिका में विभाजित होती है। गुच्छ से निकलने वाली अपवाही धमनिका वृक्क नलिका के चारों ओर सूक्ष्म केशिकाओं का जाल बनाती है, जिसे परिनालिका केशिका जाल कहते हैं। यह जाल रक्त से आवश्यक पदार्थों का पुनरावशोषण करता है। वल्कुटीय वृक्काणु में वासा रेक्टा या तो अनुपस्थित या अत्यधिक हासित होती है, जबकि सान्निध्य मध्यांश वृक्काणु में वासा रेक्टा अच्छी तरह विकसित होती है।
- मानव उत्सर्जन तंत्र में वृक्क, मूत्र नलिका, मूत्राशय और मूत्र मार्ग शामिल हैं।
- प्रत्येक वृक्क सेम के बीज के आकार का होता है और उदर गुहा में स्थित होता है।
- वृक्क के दो भाग होते हैं: बाहरी वल्कुट (कॉर्टेक्स) और भीतरी मध्यांश (मेडुला)।
- प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख नेफ्रॉन होते हैं, जो मूत्र निर्माण की कार्यात्मक इकाई हैं।
- नेफ्रॉन में गुच्छ और वृक्क नलिका होते हैं, जो रक्त से निस्यंदन और मूत्र निर्माण करते हैं।
- परिनालिका केशिका जाल रक्त से आवश्यक पदार्थों का पुनरावशोषण करता है।
- 📌 वृक्क (Kidney): मानव शरीर का प्रमुख उत्सर्जन अंग।
- 📌 नेफ्रॉन (Nephron): वृक्क की कार्यात्मक इकाई।
- 📌 गुच्छ (Glomerulus): केशिकाओं का जाल जो रक्त से निस्यंदन करता है।
16.2 मूत्र निर्माण
व्याख्या16.2 मूत्र निर्माण
मूत्र निर्माण की प्रक्रिया में तीन मुख्य चरण होते हैं: गुच्छीय निस्यंदन (Glomerular filtration), पुनःअवशोषण (Reabsorption), और स्ववण (Secretion)। पहला चरण गुच्छीय निस्यंदन में वृक्क की केशिकाओं के रक्त दाब की सहायता से रक्त का प्लाज्मा बोमेन सम्पुट में छना जाता है। इसे परा-निस्यंदन (अल्ट्रा फिल्ट्रेशन) कहा जाता है क्योंकि इसमें रक्त के बड़े अणु जैसे प्रोटीन निस्यंदित नहीं होते। प्रति मिनट लगभग 125 मिलीलीटर निस्यंदन होता है, जिसे गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) कहते हैं। दूसरे चरण पुनःअवशोषण में निस्यंदित तरल से शरीर के लिए आवश्यक पदार्थ जैसे जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, आयन आदि नेफ्रॉन की नलिकाओं द्वारा रक्त में पुनः अवशोषित किए जाते हैं। समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में लगभग 65% जल, सभी ग्लूकोज, अमीनो अम्ल और अधिकांश आयनों का पुनःअवशोषण होता है। तीसरे चरण स्ववण में नलिकाओं की कोशिकाएं H⁺, K⁺, अमोनिया जैसे अपशिष्ट पदार्थों को रक्त से निस्यंद में छोड़ती हैं। यह प्रक्रिया शरीर के अम्ल-क्षार संतुलन को बनाए रखने में सहायक होती है। इस प्रकार मूत्र निर्माण की प्रक्रिया में रक्त से प्लाज्मा का छानना, आवश्यक पदार्थों का पुनःअवशोषण और अपशिष्ट पदार्थों का स्ववण शामिल होता है। मूत्र अंततः संग्रह नलिका में संकेंद्रित होकर मूत्राशय में जमा होता है।
- मूत्र निर्माण के तीन चरण: गुच्छीय निस्यंदन, पुनःअवशोषण, स्ववण।
- गुच्छीय निस्यंदन में रक्त का प्लाज्मा बोमेन सम्पुट में छना जाता है।
- प्रति मिनट लगभग 125 मिलीलीटर निस्यंदन होता है (GFR)।
- समीपस्थ संवलित नलिका में अधिकांश जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल पुनःअवशोषित होते हैं।
- स्ववण में H⁺, K⁺, अमोनिया जैसे अपशिष्ट निस्यंद में छोड़े जाते हैं।
- मूत्र निर्माण शरीर के आयनी और अम्ल-क्षार संतुलन में सहायक है।
- 📌 गुच्छीय निस्यंदन (Glomerular filtration): रक्त से प्लाज्मा का छानना।
- 📌 पुनःअवशोषण (Reabsorption): आवश्यक पदार्थों का रक्त में वापसी।
- 📌 स्ववण (Secretion): अपशिष्ट पदार्थों का निस्यंद में छोड़ना।
16.3 वृक्क नलिका के विभिन्न भागों के कार्य
व्याख्या16.3 वृक्क नलिका के विभिन्न भागों के कार्य
वृक्क नलिका (नेफ्रॉन की नलिका) के विभिन्न भाग मूत्र निर्माण की विभिन्न प्रक्रियाओं में विशिष्ट कार्य करते हैं। 1. समीपस्थ संवलित नलिका (Proximal Convoluted Tubule - PCT): यह भाग सरल घनाकार ब्रूश बार्डर उपकला से बना होता है, जो पुनःअवशोषण के लिए सतह
अभ्यास प्रश्न — Chapter 16
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.बोमन कैप्सूल _______ में स्थित है
उत्तर:
1. कॉर्टेक्स
Q2._______ मनुष्यों में सबसे अधिक उत्सर्जन यौगिक का संश्लेषण करता है और इसे ________ के माध्यम से समाप्त किया जाता है
उत्तर:
1.यकृत, मूत्र
Q3.__________ वह बिंदु है जहां दो या तीन प्रमुख गुर्दे की कैल्सिस एक साथ जुड़ती हैं।
उत्तर:
रेनल पेलविस
Q4._____ मूत्र से पानी और सोडियम क्लोराइड की वसूली के लिए जिम्मेदार है।
उत्तर:
3.लूप ऑफ हेनले
Q5.क्रेब्स-हेन्सलेइट चक्र जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का एक क्रम है जो _______ में होता है
उत्तर:
2. जिगर
Q6.1. गुच्छीय निस्यंद दर (GFR) को पारिभाषित कीजिए।
उत्तर:
गुच्छीय निस्यंद दर (GFR) वह मात्रा है जो वृक्क के गुच्छीय निस्यंदक (glomerulus) द्वारा प्रति मिनट निस्यंदित की जाती है। यह रक्तप्लाज्मा की वह मात्रा है जो गुच्छीय निस्यंदक से फिल्टर होकर मूत्राशय की ओर जाती है।
व्याख्या:
गुच्छीय निस्यंद दर को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वृक्क में रक्त का फिल्ट्रेशन होता है। GFR रक्त की वह मात्रा है जो प्रति मिनट गुच्छीय निस्यंदक से होकर गुज़रती है, जिससे मूत्र निर्माण की प्रक्रिया आरंभ होती है।
Q7.2. गुच्छीय निस्यंद दर (GFR) की स्वनियमन क्रियाविधि को समझाइए।
उत्तर:
गुच्छीय निस्यंद दर की स्वनियमन क्रियाविधि में मुख्य रूप से दो तंत्र शामिल होते हैं: म्योतैटिक तंत्र और ट्यूबुलोग्लोमेरुलर प्रतिक्रिया। म्योतैटिक तंत्र में, जब रक्तचाप बढ़ता है तो गुच्छीय निस्यंदक की मांसपेशियां सिकुड़ जाती हैं जिससे रक्त प्रवाह नियंत्रित होता है। ट्यूबुलोग्लोमेरुलर प्रतिक्रिया में, जक्सटाग्लोमेरुलर उपकरण (JGA) द्वारा सोडियम आयन की मात्रा की निगरानी की जाती है और आवश्यकतानुसार रक्त प्रवाह को समायोजित किया जाता है। इस प्रकार, GFR को स्थिर बनाए रखने के लिए ये तंत्र रक्तचाप और मूत्र निस्पंदन को संतुलित करते हैं।
व्याख्या:
स्वनियमन क्रियाविधि में रक्तचाप में परिवर्तन के अनुसार गुच्छीय निस्यंदक की मांसपेशियों की प्रतिक्रिया होती है जिससे GFR स्थिर रहता है। JGA द्वारा ट्यूबुलोग्लोमेरुलर प्रतिक्रिया में सोडियम आयन की मात्रा के आधार पर रक्त प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है।
Q8.3. निम्नलिखित कथनों को सही अथवा गलत में इंगित कीजिए। (अ) मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है। (ब) एडीएच मूत्र को अल्पपरासरणी बनाते हुए जल के निष्कासन में सहायक होता है। (स) बोमेन-संपुट में रक्तप्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है। (द) हेनले-लूप मूत्र के सांद्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (य) समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुन: अवशोषित होता है।
उत्तर:
(अ) गलत - मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा नहीं होता, यह एक अनिवार्य क्रिया है। (ब) सही - एडीएच मूत्र को अल्पपरासरणी बनाता है जिससे जल का पुनः अवशोषण बढ़ता है। (स) सही - बोमेन-संपुट में रक्तप्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है। (द) सही - हेनले-लूप मूत्र के सांद्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (य) सही - समीपस्थ संवलित नलिका में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है।
व्याख्या:
मूत्रण एक अनिवार्य क्रिया है, प्रतिवर्ती क्रिया नहीं। एडीएच मूत्र को अल्पपरासरणी बनाकर जल पुनः अवशोषण को बढ़ाता है। बोमेन-संपुट में प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है क्योंकि प्रोटीन फिल्टर नहीं होते। हेनले-लूप मूत्र के सांद्रण में सहायक है। समीपस्थ संवलित नलिका में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है।
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