Chapter 14
Chapter 14 — अध्ययन नोट्स
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14.1 श्वसन के अंग
व्याख्या14.1 श्वसन के अंग
श्वसन एक अत्यंत महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने शरीर में ऊर्जा उत्पादन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और शरीर में उत्पन्न कार्बन-डाइऑक्साइड को बाहर निकालते हैं। विभिन्न प्राणियों में श्वसन की क्रियाविधि उनके आवास और शरीर संगठन के अनुसार भिन्न होती है। अकशेरुकी जैसे स्पंज, सीलेंटेरेटा, चपटेकूमि आदि अपने पूरे शरीर की सतह से सरल विसरण द्वारा गैसों का आदान-प्रदान करते हैं। केंचुए अपनी आर्द्र त्वचा (आई क्यूटिकल) के माध्यम से श्वसन करते हैं। कीटों में श्वसन नलिकाओं का जाल होता है जो वायु को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाता है। जलीय आर्थोपोडा और मौलस्का में श्वसन क्लोम (गिल) द्वारा होता है, जबकि स्थलचर प्राणियों में श्वसन फेफड़ों द्वारा होता है। कशेरुकों में मछलियाँ क्लोम से श्वसन करती हैं, जबकि उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी फेफड़ों से श्वसन करते हैं। उभयचर जैसे मेंढक अपनी आर्द्र त्वचा से भी श्वसन कर सकते हैं। मानव में श्वसन तंत्र में नाक, ग्रसनी, कंठ, श्वासनली, ब्रोंकाई, ब्रोंकिओल्स और फेफड़े शामिल हैं। नाक के माध्यम से वायु प्रवेश करती है, जो नासा कक्ष से ग्रसनी में जाती है। ग्रसनी आहार और वायु दोनों के लिए मार्ग है। कंठ ध्वनि उत्पन्न करता है और कंठच्छद (epiglottis) भोजन के दौरान श्वासनली को ढकता है ताकि भोजन गलती से श्वासनली में न जाए। श्वासनली वक्ष गुहा के मध्य तक जाती है और दो प्राथमिक श्वसनीयों में विभाजित होती है, जो आगे द्वितीयक, तृतीयक श्वसनी तथा अंतस्थ श्वसनिकाओं में विभाजित होती हैं। अंतस्थ श्वसनिकाएं कृपिकाओं (अल्विओली) में खुलती हैं, जहाँ गैसों का विनिमय होता है। फेफड़े द्विस्तरीय फुप्फुसावरण से ढके होते हैं, जो घर्षण को कम करता है। श्वसन तंत्र का चालन भाग (नाक से अंतस्थ श्वसनिकाओं तक) वायु को कृपिकाओं तक पहुँचाता है, उसे शुद्ध, आर्द्र और शरीर के तापमान तक लाता है। विनिमय भाग (कृपिकाएं) रक्त और वायु के बीच गैसों का आदान-प्रदान करता है। वक्ष गुहा में स्थित फेफड़े डायाफ्राम और पसलियों द्वारा नियंत्रित होते हैं, जो वक्ष गुहा के आयतन में परिवर्तन कर श्वसन क्रिया को संचालित करते हैं।
- अकशेरुकी और सरल जीवों में श्वसन सतही विसरण द्वारा होता है।
- कीटों में श्वसन नलिकाओं का जाल होता है जो वायु को शरीर के अंदर पहुँचाता है।
- जलीय प्राणियों में श्वसन क्लोम (गिल) द्वारा होता है।
- स्थलचर प्राणियों में श्वसन फेफड़ों द्वारा होता है।
- मानव श्वसन तंत्र में नाक, ग्रसनी, कंठ, श्वासनली, ब्रोंकाई, ब्रोंकिओल्स और फेफड़े शामिल हैं।
- फेफड़े द्विस्तरीय फुप्फुसावरण से ढके होते हैं जो घर्षण कम करता है।
- 📌 श्वसन (Respiration): वायुमंडलीय ऑक्सीजन ग्रहण कर कार्बन-डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करने की प्रक्रिया।
- 📌 क्लोम (Gill): जलजीवों में श्वसन के लिए विशेष संवहनीय अंग।
- 📌 कृपिका (Alveoli): फेफड़ों में वायु की थैली जैसी संरचनाएं जहाँ गैसों का विनिमय होता है।
14.2 श्वसन की क्रियाविधि
व्याख्या14.2 श्वसन की क्रियाविधि
श्वसन की क्रिया दो मुख्य चरणों में होती है: अंत:श्वसन (Inspiration) और नि:श्वसन (Expiration)। अंत:श्वसन के दौरान वायुमंडलीय वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है, जबकि नि:श्वसन में फेफड़ों की वायु बाहर निकलती है। इस क्रिया के लिए फेफड़ों और वायुमंडल के बीच दाब प्रवणता (pressure gradient) बनानी पड़ती है। अंत:श्वसन तब होता है जब फेफड़ों के अंदर का दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है। यह स्थिति डायाफ्राम और बाह्य अंतरापशूक (external intercostal) पेशियों के संकुचन से उत्पन्न होती है। डायाफ्राम नीचे की ओर नीचे झुकता है जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है। बाह्य अंतरापशूक पेशियां पसलियों को ऊपर उठाती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन और बढ़ जाता है। वक्ष गुहा के आयतन में वृद्धि से फेफड़ों के अंदर का दाब कम हो जाता है और वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है। नि:श्वसन तब होता है जब डायाफ्राम और अंतरापशूक पेशियां शिथिल हो जाती हैं। डायाफ्राम ऊपर उठता है और पसलियां नीचे आती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन घट जाता है। इससे फेफड़ों के अंदर का दाब वायुमंडलीय दाब से अधिक हो जाता है और वायु बाहर निकलती है। श्वसन की दर औसतन 12-16 बार प्रति मिनट होती है। श्वसन में सम्मिलित वायु के आयतन को स्पाइरोमीटर से मापा जाता है, जो फेफड़ों की कार्यक्षमता का नैदानिक मूल्यांकन करता है। श्वसन से संबंधित विभिन्न आयतन और क्षमताएं भी मापी जाती हैं, जैसे ज्वारीय आयतन (Tidal Volume), अंत:श्वसन सुरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume), नि:श्वसन सुरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume), अवशिष्ट आयतन (Residual Volume) आदि। इन आयतनों के योग से फेफड़ों की कुल क्षमता और जैव क्षमता ज्ञात की जाती है।
- श्वसन दो चरणों में होता है: अंत:श्वसन और नि:श्वसन।
- अंत:श्वसन में फेफड़ों का दाब वायुमंडलीय दाब से कम होता है।
- डायाफ्राम और बाह्य अंतरापशूक पेशियों के संकुचन से वक्ष गुहा का आयतन बढ़ता है।
- नि:श्वसन में फेफड़ों का दाब वायुमंडलीय दाब से अधिक होता है।
- स्पाइरोमीटर से श्वसन आयतन और क्षमताओं का मापन किया जाता है।
- औसतन श्वसन दर 12-16 बार प्रति मिनट होती है।
- 📌 अंत:श्वसन (Inspiration): फेफड़ों में वायु का प्रवेश।
- 📌 नि:श्वसन (Expiration): फेफड़ों से वायु का बाहर निकलना।
- 📌 डायाफ्राम (Diaphragm): वक्ष गुहा के नीचे स्थित गुंबदाकार पेशी।
14.2.1 श्वसन संबंधी आयतन और क्षमताएं
व्याख्या14.2.1 श्वसन संबंधी आयतन और क्षमताएं
श्वसन के दौरान फेफड़ों में वायु के विभिन्न आयतन और क्षमताएं होती हैं, जिन्हें मापा जा सकता है और ये फेफड़ों की कार्यक्षमता का संकेत देते हैं। 1. ज्वारीय आयतन (Tidal Volume, TV): सामान्य श्वसन के दौरान प्रति श्वास ली या छोड़ी जाने वाली वायु की मात्रा
अभ्यास प्रश्न — Chapter 14
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.कीड़े के संबंध में गलत बयान चुनिये
उत्तर:
१.पेट की मांसपेशियां श्वसन में भाग नहीं लेती हैं
Q2.__________ श्वसन सतह की एक विशेषता नहीं है
उत्तर:
१ सूखा
Q3.मानव त्वचा श्वसन अंग के रूप में कार्य नहीं कर सकती क्योंकि
उत्तर:
4.ऊपर के सभी
Q4.परिपक्व स्तनधारी एरिथ्रोसाइट्स में श्वसन __________ हैं
उत्तर:
4..अवायवीय
Q5.जैव क्षमता की परिभाषा दें और इसका महत्व बताएं?
उत्तर:
जैव क्षमता (Vital Capacity) वह अधिकतम वायु की मात्रा है जिसे व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता से एक गहरी श्वास लेने के बाद पूरी तरह बाहर निकाल सकता है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यह फेफड़ों की कार्यात्मक क्षमता का एक महत्वपूर्ण माप है और श्वसन स्वास्थ्य का संकेत देता है।
व्याख्या:
जैव क्षमता = TV + IRV + ERV जहां TV = ज्वारीय आयतन, IRV = प्रेरक श्वास आयतन, ERV = अतिरिक्त श्वास आयतन। यह माप फेफड़ों की क्षमता और श्वसन तंत्र की स्थिति का आकलन करने में सहायक होता है।
Q6.सामान्य निःश्वसन के उपरांत फेफड़ों में शेष वायु के आयतन को बताएं।
उत्तर:
सामान्य निःश्वसन के बाद फेफड़ों में शेष वायु (Residual Volume) लगभग 1200 मिलीलीटर होती है। यह वायु फेफड़ों में बनी रहती है ताकि श्वसन के दौरान फेफड़े पूरी तरह से न सिकुड़ें और गैसों का विनिमय निरंतर बना रहे।
व्याख्या:
Residual Volume (RV) वह वायु है जो सामान्य श्वास छोड़ने के बाद भी फेफड़ों में रहती है। यह फेफड़ों की संरचना को बनाए रखने और गैस विनिमय सतह को स्थिर रखने में मदद करती है।
Q7.गैसों का विसरण केवल कृपकीय क्षेत्र में होता है, श्वसन तंत्र के किसी अन्य भाग में नहीं। क्यों?
उत्तर:
गैसों का विसरण केवल कृपकीय क्षेत्र (Alveolar region) में होता है क्योंकि यहाँ फेफड़ों की दीवारें बहुत पतली होती हैं और रक्त वाहिकाओं की संख्या अधिक होती है, जिससे गैसों का आदान-प्रदान सुगम होता है। श्वसन तंत्र के अन्य भागों में दीवारें मोटी होती हैं और रक्त वाहिकाओं की संख्या कम होती है, इसलिए गैसों का विसरण नहीं होता।
व्याख्या:
कृपिका क्षेत्र में गैसों का विसरण इसलिए होता है क्योंकि: - दीवारें पतली और एक कोशिका मोटी होती हैं। - फेफड़ों की रक्त वाहिकाएं निकट होती हैं। - सतह क्षेत्र अधिक होता है। अन्य भागों में ये शर्तें पूरी नहीं होतीं।
Q8.CO₂ के परिवहन (ट्रांसपोर्ट) की मुख्य क्रियाविधि क्या है; व्याख्या करें?
उत्तर:
CO₂ का परिवहन मुख्यतः तीन तरीकों से होता है: 1. कार्बामिनो हीमोग्लोबिन के रूप में (लगभग 20%) - CO₂ हीमोग्लोबिन से जुड़कर कार्बामिनो हीमोग्लोबिन बनाता है। 2. बायकार्बोनेट आयन के रूप में (लगभग 70%) - CO₂ जल के साथ प्रतिक्रिया कर कार्बोनिक एसिड बनाता है, जो बायकार्बोनेट (HCO₃⁻) और हाइड्रोजन आयन में टूट जाता है। 3. घुलित CO₂ के रूप में (लगभग 10%) - रक्त में घुलित CO₂ के रूप में भी कुछ मात्रा में होता है। यह परिवहन फेफड़ों तक CO₂ को ले जाकर उसे बाहर निकालने में सहायक होता है।
व्याख्या:
CO₂ + H₂O ⇌ H₂CO₃ ⇌ H⁺ + HCO₃⁻ (कार्बोनिक एसिड का निर्माण और विघटन) हीमोग्लोबिन से CO₂ का जुड़ना कार्बामिनो हीमोग्लोबिन बनाता है। बायकार्बोनेट आयन रक्त में CO₂ के परिवहन का मुख्य रूप है।
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Biology · Class 11
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