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Chapter 11

🎓 Class 9📖 Shemushi Prathmo Bhag📖 8 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~12 मिनट
Chapter 10अध्याय 11 / 16Chapter 12

Chapter 11अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

आस्यस्य अभ्यन्तर-प्रयत्न:

अवधारणा

आस्यस्य अभ्यन्तर-प्रयत्न:

इस अध्याय में हम संस्कृत वर्णों के उच्चारण की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण तत्व — आभ्यन्तर-प्रयत्न — का अध्ययन करेंगे। पूर्व की कक्षाओं में वर्णों के उत्पत्ति के तीन तत्त्वों को जाना गया था: स्थानम् (स्थान), करणम् (करण), और आभ्यन्तर-प्रयत्नः। इस पाठ में हम आभ्यन्तर-प्रयत्नः की विस्तृत व्याख्या करेंगे। आभ्यन्तर-प्रयत्नः वह बल या प्रयत्न है जो करण (उच्चारण का उपकरण) द्वारा स्थान (उच्चारण का स्थान) के प्रति किया जाता है। अर्थात्, जब हम कोई वर्ण उच्चारित करते हैं, तो करण अपने स्थान को स्पर्श करता है या उसके समीप जाता है, और यह प्रयत्न आभ्यन्तर-प्रयत्न कहलाता है। यह प्रयत्न पाँच प्रकार के होते हैं: 1) स्पृष्ट-प्रयत्नः — जब करण स्पष्ट रूप से स्थान को स्पर्श करता है, 2) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः — जब करण स्थान को थोड़ा सा स्पर्श करता है, 3) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः — जब करण स्थान को स्पर्श नहीं करता पर समीप जाता है, जिससे थोड़ा अन्तराल बनता है, 4) विवृत-प्रयत्नः — जब करण स्थान के समीप जाता है पर स्पर्श नहीं करता और अन्तराल स्पष्ट होता है, 5) संवृत-प्रयत्नः — विशेष रूप से अ-कार (हस्व) स्वर के उच्चारण में होता है, जहाँ स्थान-करण के बीच संकोचन होता है। इन प्रयत्नों के आधार पर ही वर्णों का वर्गीकरण और उच्चारण की स्पष्टता सुनिश्चित होती है। इस प्रकार, आभ्यन्तर-प्रयत्नः संस्कृत वर्णों के सही और शुद्ध उच्चारण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

  • आभ्यन्तर-प्रयत्नः करण द्वारा स्थान के प्रति प्रयुक्त बल है।
  • यह प्रयत्न पाँच प्रकार के होते हैं: स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत, संवृत।
  • स्पृष्ट-प्रयत्न में करण स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है।
  • संवृत-प्रयत्न विशेष रूप से हस्व अ-कार के उच्चारण में होता है।
  • आभ्यन्तर-प्रयत्न वर्णों के शुद्ध उच्चारण के लिए आवश्यक है।
  • 📌 आभ्यन्तर-प्रयत्नः: उच्चारण में करण द्वारा स्थान के प्रति प्रयुक्त बल।
  • 📌 करणम्: उच्चारण का उपकरण।
  • 📌 स्थानम्: उच्चारण का स्थान।

आभ्यन्तर-प्रयत्न के प्रकार

अवधारणा

आभ्यन्तर-प्रयत्न के प्रकार

आभ्यन्तर-प्रयत्न पाँच प्रकार के होते हैं, जो वर्णों के उच्चारण में करण और स्थान के बीच प्रयुक्त बल के आधार पर विभाजित हैं। 1) स्पृष्ट-प्रयत्नः — जब करण स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है, जैसे मूर्धन्य वर्णों में। 2) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः — जब करण स्थान को थोड़ा सा स्पर्श करता है, जिससे अन्तःस्थ व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं। 3) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः — जब करण स्थान को स्पर्श नहीं करता पर समीप जाता है, जिससे ऊष्म व्यञ्जन और अयोगवाह वर्ण उत्पन्न होते हैं। 4) विवृत-प्रयत्नः — जब करण स्थान के समीप जाता है पर स्पर्श नहीं करता और अन्तराल स्पष्ट होता है, जिससे स्वर उत्पन्न होते हैं। 5) संवृत-प्रयत्नः — विशेष रूप से हस्व अ-कार स्वर के उच्चारण में होता है, जहाँ स्थान-करण के बीच संकोचन होता है। प्रत्येक प्रयत्न के उदाहरण स्वरूप मूर्धन्य वर्णों के चित्र और उनके उच्चारण के उदाहरण दिए गए हैं। इस प्रकार, आभ्यन्तर-प्रयत्न वर्णों के वर्गीकरण और उनकी ध्वनि उत्पत्ति के मूल आधार हैं।

  • स्पृष्ट-प्रयत्नः: करण स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है।
  • ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः: करण स्थान को थोड़ा सा स्पर्श करता है।
  • ईषद्-विवृत-प्रयत्नः: करण स्थान के समीप जाता है पर स्पर्श नहीं करता।
  • विवृत-प्रयत्नः: करण स्थान के समीप जाता है, अन्तराल स्पष्ट होता है।
  • संवृत-प्रयत्नः: हस्व अ-कार स्वर के उच्चारण में संकोचन होता है।
  • 📌 स्पृष्ट-प्रयत्नः: स्पष्ट स्पर्श।
  • 📌 ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः: अल्प स्पर्श।
  • 📌 विवृत-प्रयत्नः: खुलापन।

संवृत-प्रयत्न और अ-स्वर का उच्चारण

अवधारणा

संवृत-प्रयत्न और अ-स्वर का उच्चारण

संवृत-प्रयत्न विशेष रूप से अ-कार (हस्व) स्वर के उच्चारण में होता है। अ-कार के तीन उपभेद होते हैं: हस्व (अ), दीर्घ (आ), और प्लुत (अ३)। कण्ठ्य वर्णों में स्थान और करण दोनों कण्ठ होते हैं। दीर्घ और प्लुत अ-कार के उच्चारण में स्थान-करण के बीच स्पष्ट अन्त

अभ्यास प्रश्नChapter 11

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत — (क) वर्णानाम् उत्पत्यर्थ कति आवश्यकानि तत्वानि भवन्ति ? (ख) कति स्थानानि सन्ति ? (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्न: कतिविध: ? (घ) करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति, तदा करणस्य क: प्रयत्न: भवति ? (ड) अवर्णस्य कति उपभेदा: सन्ति ? (च) संवृत-प्रयत्न: कुत्र भवति ?

उत्तर:

उत्तर: (क) तीनि तत्वानि (स्थानं, प्रयत्न:, करणं) (ख) षट् (6) स्थानानि (ग) चत्वारः (4) प्रकाराः (घ) स्पृष्ट-प्रयत्नः (ड) द्वे उपभेदे (स्वर, व्यञ्जन) (च) संवृत-प्रयत्नः ऊष्माणि व्यञ्जनानि

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य संक्षिप्त उत्तरं एकपदेन दत्तम्। वर्णोत्पत्त्यर्थं आवश्यकानि तत्वानि स्थानं, प्रयत्न:, करणं इति त्रयः। स्थानानि षट् सन्ति। आभ्यन्तर-प्रयत्नाः चत्वारः। करणं यदा स्थानं स्पृशति तदा प्रयत्नः स्पृष्ट-प्रयत्नः। अवर्णस्य द्वे उपभेदे सन्ति। संवृत-प्रयत्नः ऊष्माणि व्यञ्जनानि इति।

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Q2.अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत — (क) आभ्यन्तर-प्रयत्न: क: उच्चते ? (ख) ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: कदा भवति ? (ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन के स्वरा: उच्चार्यन्ते ? (घ) आभ्यन्तर-प्रयत्ना: कुत्र दूश्यन्ते ? (ड) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्ट: स्वर: क: अस्ति ?

उत्तर:

उत्तर: (क) आभ्यन्तर-प्रयत्न: तदा उच्चते यदा वर्णस्य उच्चारणे प्रयत्नः स्थानं स्पृशति। (ख) ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: तदा भवति यदा करणं स्थानं अप्रत्यक्षतया स्पृशति। (ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन स्वराः उच्चार्यन्ते। (घ) आभ्यन्तर-प्रयत्ना: मुखे दूश्यन्ते, विशेषतः उच्चारणकाले। (ड) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्ट: स्वर: दीर्घ: अस्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य पूर्णवाक्येन स्पष्टीकरणं दत्तम्। आभ्यन्तर-प्रयत्नः वर्णोत्पत्तौ स्थानं स्पृशति तदा उच्चते। ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्नः अप्रत्यक्षस्पर्शे जातः। विवृत-प्रयत्नेन स्वराः उच्चार्यन्ते। आभ्यन्तर-प्रयत्नाः मुखे दृश्यन्ते। स्वरेषु दीर्घस्वरः विशिष्टः।

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Q3.अधोलिखितानां वर्णानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत — क-स्तम्भ: ख-स्तम्भ: (क) विवृत-प्रयत्न: (१) व् (ख) स्पृष्ट-प्रयत्न: (२) श् (ग) ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: (३) ऋ (घ) ईष्त्विवृत-प्रयत्न: (४) अ (ड) संवृत-प्रयत्न: (५) घ

उत्तर:

उत्तर: (क) विवृत-प्रयत्न: — (४) अ (ख) स्पृष्ट-प्रयत्न: — (२) श् (ग) ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: — (३) ऋ (घ) ईष्त्विवृत-प्रयत्न: — (१) व् (ड) संवृत-प्रयत्न: — (५) घ

व्याख्या:

प्रत्येक प्रयत्नस्य प्रकारं तदनुरूपं वर्णेन मेलितम्। विवृत-प्रयत्नः स्वरः (अ), स्पृष्ट-प्रयत्नः स्पर्शव्यञ्जन (श्), ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्नः ऋ स्वरः, ईष्त्विवृत-प्रयत्नः व्यञ्जन (व्), संवृत-प्रयत्नः घ व्यञ्जन इति।

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Q4.अधोलिखितानां वाक्यानाम् उत्तराणि आम्/ न इति सन्दर्भानुसारं लिखत— (क) ‘ई’ वर्ण: सन्ध्यक्षरम् अस्ति। (आम् / न) …………………… (ख) ‘ए’ वर्ण: सन्ध्यक्षरम् अस्ति। (आम् / न) …………………… (ग) ‘झ’ वर्ण: सपर्श: अस्ति। (आम् / न) …………………… (घ) ‘र’ वर्ण: स्पर्शोषु परिगण्यते। (आम् / न) …………………… (ङ) ‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणः सन्ति। (आम् / न) ……………………
A.आम्
B.

उत्तर:

उत्तर: (क) आम् (ख) न (ग) आम् (घ) आम् (ङ) आम्

व्याख्या:

‘ई’ वर्णः सन्ध्यक्षरः अस्ति अतः आम्। ‘ए’ वर्णः सन्ध्यक्षरः नास्ति अतः न। ‘झ’ वर्णः स्पर्शव्यञ्जनः अस्ति अतः आम्। ‘र’ वर्णः स्पर्शव्यञ्जनानाम् अन्तर्गतः अतः आम्। ‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणि व्यञ्जनानि सन्ति अतः आम्।

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Q5.रेखाङ्कितपदानि आधुत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत— (क) स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति। ………………………………………… (ख) व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति। …………………………………… (ग) स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः। ………………………………………… (घ) हस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति। ………………………………………… (ङ) व्यञ्जनानां चत्वारो भेदाः भवन्ति। …………………………………………

उत्तर:

उत्तर: (क) स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति। (ख) व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति। (ग) स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः - ह्रस्वः दीर्घः। (घ) हस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति। (ङ) व्यञ्जनानां चत्वारो भेदाः भवन्ति - स्पृष्ट, स्पर्श, ईष्त्स्पृष्ट, संवृत।

व्याख्या:

प्रत्येकं वाक्यं पाठानुसारं पूर्णं कृत्वा प्रश्ननिर्माणं कृतम्। स्वराः स्वतन्त्राः, व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाः, स्वराणां ह्रस्वदीर्घभेदः, ह्रस्वस्य उपभेदः नास्ति, व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः इति।

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Q6.वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत— वर्णाः ………………………………………… (क) एकस्थानि-वर्णाः ………………………………………… (ख) स्पर्श-व्यञ्जनानि ………………………………………… (ग) अयोगवाह-व्यञ्जनानि ………………………………………… (घ) ऊष्म-व्यञ्जनानि ………………………………………… (ङ) द्विस्थानि-वर्णाः …………………………………………

उत्तर:

उत्तर: वर्णाः - स्वराः च व्यञ्जनाः (क) एकस्थानि-वर्णाः - स्वराः (ख) स्पर्श-व्यञ्जनानि - क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ (ग) अयोगवाह-व्यञ्जनानि - य, र, ल, व (घ) ऊष्म-व्यञ्जनानि - क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ (ङ) द्विस्थानि-वर्णाः - य, र, ल, व

व्याख्या:

पाठानुसारं वर्णसमुच्चयः चित्वा प्रत्येकं रिक्तस्थानं पूरितम्। स्वराः एवं व्यञ्जनाः वर्णाः। एकस्थानि वर्णाः स्वराः। स्पर्श-व्यञ्जनानि क-व्यञ्जनाः। अयोगवाह-व्यञ्जनानि य, र, ल, व। ऊष्म-व्यञ्जनानि क-व्यञ्जनाः। द्विस्थानि वर्णाः य, र, ल, व।

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Q7.अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत — (क) वर्णानाम् उत्पत्यर्थ कति आवश्यकानि तत्वानि भवन्ति ? (ख) कति स्थानानि सन्ति ? (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्न: कतिविध: ? (घ) करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति, तदा करणस्य क: प्रयत्न: भवति ? (ड) अवर्णस्य कति उपभेदा: सन्ति ? (च) संवृत-प्रयत्न: कुत्र भवति ?

उत्तर:

उत्तर: (क) तीनि तत्वानि (स्थानं, प्रयत्न:, स्वरूपम्) (ख) षट् स्थानानि सन्ति। (ग) चत्वारि प्रकाराः (विवृत-प्रयत्न:, स्पृष्ट-प्रयत्न:, ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न:, संवृत-प्रयत्न:) (घ) स्पृष्ट-प्रयत्न: भवति। (ड) द्वौ उपभेदौ सन्ति। (च) संवृत-प्रयत्न: ऊष्मा-व्यञ्जनेषु भवति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य संक्षिप्त उत्तरं एकपदेन दत्तम्। वर्णोत्पत्त्यर्थं आवश्यकानि तत्वानि स्थानं, प्रयत्न:, स्वरूपम् इति त्रयः। स्थानानि षट् सन्ति। आभ्यन्तर-प्रयत्नाः चत्वारः प्रकाराः सन्ति। करणं यदि स्थानं स्पृशति तदा प्रयत्न: स्पृष्ट-प्रयत्न: इति भवति। अवर्णस्य द्वौ उपभेदौ सन्ति। संवृत-प्रयत्न: ऊष्मा-व्यञ्जनेषु दृश्यते।

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Q8.अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत — (क) आभ्यन्तर-प्रयत्न: क: उच्चते ? (ख) ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: कदा भवति ? (ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन के स्वरा: उच्चार्यन्ते ? (घ) आभ्यन्तर-प्रयत्ना: कुत्र दूश्यन्ते ? (ड) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्ट: स्वर: क: अस्ति ?

उत्तर:

उत्तर: (क) आभ्यन्तर-प्रयत्न: तदा उच्चते यदा वायुः स्थानं स्पृशति। (ख) ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: तदा भवति यदा करणं स्थानं परस्परं स्पृशति परन्तु न स्पष्टरूपेण। (ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन स्वराः अ, इ, उ, ऋ, ए, ओ इत्यादयः उच्चार्यन्ते। (घ) आभ्यन्तर-प्रयत्ना: मुखे, नासिकायाम्, कण्ठे च दूश्यन्ते। (ड) आभ्यन्तर-प्रयत्ने विशिष्ट: स्वर: स्वरः अस्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य पूर्णवाक्येन उत्तरं दत्तम्। आभ्यन्तर-प्रयत्न: तदा उच्चते यदा वायुः स्थानं स्पृशति। ईष्त्स्पृष्ट-प्रयत्न: करणयोः परस्परस्पर्शे तदा भवति। विवृत-प्रयत्नेन स्वराः उच्चार्यन्ते। आभ्यन्तर-प्रयत्नाः मुखे, नासिकायाम्, कण्ठे दृश्यन्ते। विशिष्टः स्वरः अ इति ज्ञायते।

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