Chapter 10
Chapter 10 — अध्ययन नोट्स
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कारक
परिभाषाकारक
संस्कृत व्याकरण में 'कारक' का अर्थ है वह पद जो क्रिया के साथ संबंध स्थापित करता है और क्रिया की सिद्धि में सहायक होता है। वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वनाम के द्वारा क्रिया संपन्न होती है, उसे कारक कहते हैं। अर्थात्, कारक वह होता है जो क्रिया के सम्पादन में सहायता करता है और क्रिया से संबंधित होता है। उदाहरण के लिए, वाक्य 'नृपस्य पुत्रः ययाति स्वभवने कोषात् स्वहस्तेन याचकेभ्यः धनं ददाति' में विभिन्न पदों का क्रिया 'ददाति' से संबंध है। यहाँ 'ययाति' कर्ता कारक है क्योंकि वह क्रिया को करता है, 'धनं' कर्म कारक है क्योंकि वह क्रिया का लक्ष्य है, 'हस्तेन' करण कारक है क्योंकि वह क्रिया का साधन है, 'याचकेभ्यः' सम्प्रदान कारक है क्योंकि वह लाभार्थी है, 'कोषात्' अपादान कारक है क्योंकि वह त्याग या वियोग को दर्शाता है, और 'स्वभवने' अधिकरण कारक है क्योंकि वह क्रिया का स्थान है। संस्कृत में सम्बन्ध और सम्बोधन को कारक नहीं माना जाता क्योंकि उनका क्रिया से प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। इस प्रकार, कारक छह प्रकार के होते हैं: कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण।
- कारक वह पद है जो क्रिया के साथ संबंध स्थापित करता है।
- संस्कृत में छह प्रकार के कारक होते हैं: कर्त्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण।
- सम्बन्ध और सम्बोधन कारक नहीं होते क्योंकि उनका क्रिया से प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।
- कारक क्रिया की सिद्धि में सहायक होते हैं।
- वाक्य में कारक पद क्रिया के साथ संबंध दर्शाते हैं।
- 📌 कारक: वह पद जो क्रिया के साथ संबंध स्थापित करता है।
- 📌 कर्ता कारक: क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करने वाला।
- 📌 कर्म कारक: जिस पर क्रिया होती है।
कर्त्ता कारक
अवधारणाकर्त्ता कारक
कर्त्ता कारक वह होता है जो क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करता है। संस्कृत में कर्त्ता कारक के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है। कर्त्ता वह होता है जो क्रिया का मुख्यकर्ता होता है, अर्थात् क्रिया को करने वाला। उदाहरण के लिए, वाक्य 'गिरीशः पुस्तकं पठति' में 'गिरीशः' कर्त्ता है क्योंकि वह 'पठति' क्रिया को करता है। कर्ता कारक के पद में प्रथमा विभक्ति लगती है। कर्ता कारक के साथ प्रयोग होने वाले शब्द क्रिया के मुख्यकर्ता होते हैं और वे क्रिया के सम्पादन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। कर्ता कारक के अलावा, प्रथमा विभक्ति का प्रयोग कर्मवाच्य वाक्यों में कर्म के लिए भी होता है।
- कर्त्ता वह होता है जो क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करता है।
- कर्त्ता कारक के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।
- कर्त्ता क्रिया का मुख्यकर्ता होता है।
- प्रथमा विभक्ति कर्ता और कर्म दोनों के लिए प्रयोग हो सकती है।
- उदाहरण: गिरीशः पुस्तकं पठति।
- 📌 कर्त्ता कारक: वह पद जो क्रिया को करता है।
- 📌 प्रथमा विभक्ति: वह विभक्ति जो कर्त्ता और कर्म के लिए प्रयोग होती है।
कर्म कारक
अवधारणाकर्म कारक
कर्म कारक वह होता है जिस पर क्रिया होती है, अर्थात् क्रिया का उद्देश्य या लक्ष्य। संस्कृत में कर्म कारक के लिए द्वितीया विभक्ति (Accusative Case) का प्रयोग होता है। कर्म वह पद होता है जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, वाक्य 'गिरीशः पुस
अभ्यास प्रश्न — Chapter 10
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.प्र. 3. उचितविभक्तिप्रयोगं कृत्वा अधोलिखितपदानां सहायतया वाक्यरचनां कुरुत- (i) समम् (ii) धिक् (iii) उभयतः (iv) विना (v) अन्धः (vi) बहि: (vii) प्रवीण: (viii) अलम् (ix) विभेति (x) श्रेष्ठ:
उत्तर:
उत्तर: (i) समम् - बालकः समम् गच्छति। (ii) धिक् - धिक् शत्रोः। (iii) उभयतः - उभयतः वृक्षा: सन्ति। (iv) विना - रामः सीता विना वनम् न गच्छति। (v) अन्धः - अन्धः मार्गं न पश्यति। (vi) बहि: - बहि: छात्रा: कोलाहलं कुर्वन्ति। (vii) प्रवीण: - प्रवीणः गायने कुशला: सन्ति। (viii) अलम् - अलम् विवादेन। (ix) विभेति - विभेति चौरात्। (x) श्रेष्ठ: - अर्जुनः श्रेष्ठः धनुर्धरः।
व्याख्या:
प्रत्येक दिए गए शब्द के साथ उचित विभक्ति का प्रयोग करके वाक्य बनाए गए हैं। जैसे 'समम्' (तृतीया), 'धिक्' (पञ्चमी), 'उभयतः' (सप्तमी), 'विना' (तृतीया), 'अन्धः' (प्रथमा), 'बहि:' (सप्तमी), 'प्रवीण:' (प्रथमा), 'अलम्' (तृतीया), 'विभेति' (पञ्चमी), 'श्रेष्ठ:' (प्रथमा)।
Q2.प्र. 4. 'क' स्तम्भे शब्दा: दत्ता: सन्ति, 'ख' स्तम्भे च विभक्तयः। कस्य योगे का विभक्तिः प्रयुज्यते इति योजयित्वा लिखत- 'क' (i) 'रुच्' धातु योगे (ii) 'सह' शब्द योगे (iii) 'नमः' शब्द योगे (iv) 'भी' 'त्रा' धातु योगे (v) 'दा' धातु योगे (vi) कर्तृवाच्यस्य कर्तरि (vii) कर्मवाच्यस्य कर्तरि (viii) 'विना' योगे (ix) यस्मिन् अङ्गे विकार: भवति तस्मिन् (x) कर्मवाच्यस्य कर्मणि 'ख' (क) तृतीया (ख) चतुर्थी (ग) पञ्चमी (घ) चतुर्थी (ङ) प्रथमा (च) तृतीया (छ) चतुर्थी (ज) तृतीया (झ) द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी (ञ) प्रथमा
उत्तर:
उत्तर: (i) 'रुच्' धातु योगे - चतुर्थी (ख) (ii) 'सह' शब्द योगे - तृतीया (क) (iii) 'नमः' शब्द योगे - चतुर्थी (ख) (iv) 'भी' 'त्रा' धातु योगे - पञ्चमी (ग) (v) 'दा' धातु योगे - चतुर्थी (ख) (vi) कर्तृवाच्यस्य कर्तरि - प्रथमा (ङ) (vii) कर्मवाच्यस्य कर्तरि - तृतीया (च) (viii) 'विना' योगे - तृतीया (ज) (ix) यस्मिन् अङ्गे विकार: भवति तस्मिन् - द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी (झ) (x) कर्मवाच्यस्य कर्मणि - प्रथमा (ञ)
व्याख्या:
प्रत्येक 'क' स्तम्भ के शब्द/धातु के साथ उचित विभक्ति ('ख' स्तम्भ) का योग किया गया है। जैसे 'रुच्' के साथ चतुर्थी, 'सह' के साथ तृतीया, 'नमः' के साथ चतुर्थी आदि।
Q3.प्र. 5. 'स्थूलपदानां' स्थाने शुद्धपदं लिखत- (i) अध्यापिकाया: परित: छात्रा: सन्ति। (ii) छात्र: आचार्याय प्रश्नम् पृच्छति। (iii) सीता लेखन्या: लेखं लिखति। (iv) गोपाल: शिवस्य सह वार्तां करोति। (v) चौरा: आरक्षिणा विभ्यति। (vi) महापुरुषम् नमः। (vii) त्वाम् किम् रोचते? (viii) कवये कालिदास: श्रेष्ठः। (ix) सा गृहकर्मण: निपुणः। (x) अहम् रेलयानात् कालिकातां गमिष्यामि।
उत्तर:
उत्तर: (i) अध्यापिकायाः परितः छात्राः सन्ति। (ii) छात्रः आचार्यं प्रश्नम् पृच्छति। (iii) सीता लेखन्या लेखं लिखति। (iv) गोपालः शिवेन सह वार्तां करोति। (v) चौराः आरक्षिणः विभेति। (vi) महापुरुषे नमः। (vii) त्वयि किम् रोचते? (viii) कविः कालिदासः श्रेष्ठः। (ix) सा गृहकर्मणि निपुणा। (x) अहम् रेलयानात् कालिकातां गमिष्यामि।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में 'स्थूलपद' के स्थान पर शुद्ध पद का प्रयोग किया गया है। जैसे 'आचार्याय' के स्थान पर 'आचार्यं', 'शिवस्य सह' के स्थान पर 'शिवेन सह', 'महापुरुषम्' के स्थान पर 'महापुरुषे' आदि।
Q4.प्र. 1. कोष्ठकेषु मूलशब्दाः प्रदत्ताः। तेषु उचितविभक्तीः योजयित्वा रिक्तस्थानानानि पूर्यत— i) बालकाः ……………………………… पृच्छन्ति। (अम्बा) ii) नास्ति ……………………………… समः शत्रुः। (क्रोध) iii) ……………………………… भीतः बालकः क्रन्दति। (चौर) iv) शिष्याः ……………………………… विद्यां गृह्णन्ति। (गुरु) v) अहं ……………………………… प्राक् आगमिष्यामि। (अध्यापक) vi) अस्माकम् बालिकाः ……………………………… कुशलाः सन्ति। (गायन) vii) माता ……………………………… स्निहाति। (शिशु) viii) ……………………………… क्रोधः जायते। (काम) ix) ……………………………… नमः। (सरस्वती) x) अलम् ……………………………… । (विवाद) xi) भिक्षुकः ……………………………… याचते। (भिक्षा) xii) धिक् देशस्य ……………………………… । (शत्रु) xiii) वीरः ……………………………… न विरमति। (धर्मयुद्ध) xiv) दुर्योधनः ……………………………… जुगुप्सति सम। (पाण्डव) xv) ……………………………… अर्जुनः श्रेष्ठः धनुर्धरः। (भ्रातृ) xvi) पितरौ ……………………………… सर्वस्वं यच्छतः। (असमद्) xvii) किम् ……………………………… एतत् गीतं रोचते ? (युष्मद्) xviii) ……………………………… परितः वायुमण्डलम् अस्ति। (पृथ्वी) xix) ……………………………… बहिः छात्राः कोलाहलं कुर्वन्ति? (कक्षा) xx) अहम् ……………………………… पूर्वं ……………………………… वन्दे। (शयन, ईश्वर) xxi) परिश्रमिणः ……………………………… स्फूहयन्ति। (सफलता) xxii) वाल्मीकि: ……………………………… रचयिता ? (रामायणम्) xxiii) ……………………………… विभाति सरः। (पंकज)
उत्तर:
i) बालकाः अम्बां पृच्छन्ति। ii) नास्ति क्रोधसमः शत्रुः। iii) चौरात् भीतः बालकः क्रन्दति। iv) शिष्याः गुरुणा विद्यां गृह्णन्ति। v) अहं अध्यापकं प्राक् आगमिष्यामि। vi) अस्माकम् बालिकाः गायनकुशलाः सन्ति। vii) माता शिशुन् स्निहाति। viii) कामात् क्रोधः जायते। ix) सरस्वत्यै नमः। x) अलम् विवादः। xi) भिक्षुकः भिक्षां याचते। xii) धिक् देशस्य शत्रुः। xiii) वीरः धर्मयुद्धं न विरमति। xiv) दुर्योधनः पाण्डवैः जुगुप्सति सम। xv) भ्रातृभ्यः अर्जुनः श्रेष्ठः धनुर्धरः। xvi) पितरौ असमद्भ्यः सर्वस्वं यच्छतः। xvii) किम् युष्मद् एतत् गीतं रोचते? xviii) पृथ्वी परितः वायुमण्डलम् अस्ति। xix) कक्ष्याः बहिः छात्राः कोलाहलं कुर्वन्ति? xx) अहम् शयने पूर्वं ईश्वरं वन्दे। xxi) परिश्रमिणः सफलतां स्फूहयन्ति। xxii) वाल्मीकि: रामायणस्य रचयिता? xxiii) पंकजः विभाति सरः।
व्याख्या:
प्रत्येक रिक्तस्थान में दिए गए शब्द के अनुसार उचित विभक्ति लगाई गई है। जैसे 'अम्बा' के लिए 'अम्बां' (द्वितीया विभक्ति), 'क्रोध' के लिए 'क्रोधसमः' (समासयुक्त), 'चौर' के लिए 'चौरात्' (तृतीया विभक्ति), आदि। इस प्रकार सभी रिक्त स्थानों को संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार पूर्ण किया गया है।
Q5.प्र. 2. कोष्ठकेभ्यः शुद्धम् उत्तरं चित्वा रिक्तस्थानपूर्ति कुरुत— i) ……………………………… सह सीता वनम् अगच्छत्। (रामस्य/रामेण) ii) माता ... स्निह्यति। (माम्/मयि) iii) ... मोदकं रोचते। (मोहनम्/मोहनाय) iv) स: ... धनं ददाति। (रमेशम्/रमेशाय) v) ... पत्राणि पतन्ति। (वृक्षेण/वृक्षात्) vi) अध्यापिका ... पुस्तकं यच्छति। (सुलेखाम्/सुलेखायै) vii) ... परित: वृक्षा: सन्ति। (विद्यालयम्/विद्यालयस्य) viii) ... नम:। (गुरवे/गुरुम्)
उत्तर:
i) रामेण सह सीता वनम् अगच्छत्। ii) माता मयि स्निह्यति। iii) मोहनाय मोदकं रोचते। iv) स: रमेशाय धनं ददाति। v) वृक्षात् पत्राणि पतन्ति। vi) अध्यापिका सुलेखायै पुस्तकं यच्छति। vii) विद्यालयस्य परित: वृक्षा: सन्ति। viii) गुरवे नम:।
व्याख्या:
प्रत्येक रिक्त स्थान में दिए गए विकल्पों में से उचित विभक्ति का चयन किया गया है। जैसे 'रामेण' (तृतीया विभक्ति) 'सह' के साथ प्रयोग होता है, 'मयि' (पञ्चमी विभक्ति) 'माता' के साथ, 'मोहनाय' (चतुर्थी विभक्ति) 'मोदकं रोचते' के लिए, आदि।
Q6.प्र. 3. उचितविभक्तिप्रयोगं कृत्वा अधोलिखितपदानां सहायतया वाक्यरचनां कुरुत— i) समम् ii) धिक् iii) उभयत: iv) विना v) अन्ध: vi) बहि: vii) प्रवीण: viii) अलम् ix) विभेति x) श्रेष्ठ:
उत्तर:
प्रत्येक पद के साथ उचित विभक्ति प्रयोग कर वाक्य बनाएं। उदाहरण: i) समम् - बालकः समं वस्त्रं धारयति। ii) धिक् - धिक् शत्रवे! त्वं दुष्टः। iii) उभयत: - उभयत: मित्रौ सह क्रीडन्ति। iv) विना - विना गुरुं छात्रः न पठति। v) अन्ध: - अन्धः मार्गे न पश्यति। vi) बहि: - बहिः गच्छ। vii) प्रवीण: - सः प्रवीणः क्रीडकः अस्ति। viii) अलम् - अलं विवादं त्यज। ix) विभेति - सः विभेति शत्रुं। x) श्रेष्ठ: - अर्जुनः श्रेष्ठः धनुर्धरः।
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द के साथ उचित विभक्ति लगाकर वाक्य बनाए गए हैं, जो व्याकरण के नियमों के अनुसार सही हैं। जैसे 'समम्' द्वितीया विभक्ति में प्रयोग हुआ है, 'धिक्' संबोधन में, 'उभयत:' तृतीया विभक्ति में, आदि।
Q7.प्र. 4. 'क' स्तम्भे शब्दा: दत्ता: सन्ति, 'ख' स्तम्भे च विभक्तय:। कस्य योगे का विभक्ति: प्रयुज्यते इति योजयित्वा लिखत— 'क' । 'ख' i) 'रुच्' धातु योगे ii) 'सह' शब्द योगे iii) 'नम:' शब्द योगे iv) 'भी' 'त्रा' धातु योगे v) 'दा' धातु योगे vi) कर्तृवाच्यस्य कर्तीरि vii) कर्मवाच्यस्य कर्तीरि viii) 'विना' योगे ix) यस्मिन् अङ्गे विकार: भवति तस्मिन् x) कर्मवाच्यस्य कर्मणि (क) तृतीया (ख) चतुर्थी (ग) पञ्चमी (घ) चतुर्थी (ङ) प्रथमा (च) तृतीया (छ) चतुर्थी (ज) तृतीया (झ) द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी (ञ) प्रथमा
उत्तर:
i) 'रुच्' धातु योगे - तृतीया (क) ii) 'सह' शब्द योगे - चतुर्थी (ख) iii) 'नम:' शब्द योगे - पञ्चमी (ग) iv) 'भी' 'त्रा' धातु योगे - चतुर्थी (घ) v) 'दा' धातु योगे - प्रथमा (ङ) vi) कर्तृवाच्यस्य कर्तीरि - तृतीया (च) vii) कर्मवाच्यस्य कर्तीरि - चतुर्थी (छ) viii) 'विना' योगे - तृतीया (ज) ix) यस्मिन् अङ्गे विकार: भवति तस्मिन् - द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी (झ) x) कर्मवाच्यस्य कर्मणि - प्रथमा (ञ)
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द या धातु के साथ उपयुक्त विभक्ति का चयन व्याकरण के नियमों के अनुसार किया गया है। जैसे 'रुच्' धातु के साथ तृतीया विभक्ति, 'सह' के साथ चतुर्थी, 'नम:' के साथ पञ्चमी, आदि।
Q8.प्र. 5. 'स्थूलपदानां' स्थाने शुद्धपदं लिखत— i) अध्यापिकाया: परित: छात्रा: सन्ति। ... ii) छात्र: आचार्याय प्रश्नम् पृच्छति। ... iii) सीता लेखन्या: लेखं लिखति। ... iv) गोपाल: शिवस्य सह वार्ता करोति। ... v) चौरा: आरक्षिणा विभ्यति। ... vi) महापुरुषम् नम:। ... vii) त्वाम् किम् रोचते? ... viii) कवये कालिदास: श्रेष्ठ:। ... ix) सा गृहकर्मण: निपुण:। ... x) अहम् रेल्यानात् कालिकातां गमिष्यामि। ...
उत्तर:
i) अध्यापिकाया: परित: छात्रा: सन्ति। → अध्यापिकाया: परित: छात्राः सन्ति। ii) छात्र: आचार्याय प्रश्नम् पृच्छति। → छात्रः आचार्याय प्रश्नं पृच्छति। iii) सीता लेखन्या: लेखं लिखति। → सीता लेखन्या लेखं लिखति। iv) गोपाल: शिवस्य सह वार्ता करोति। → गोपालः शिवस्य सह वार्ता करोति। v) चौरा: आरक्षिणा विभ्यति। → चौरा आरक्षिणा विभ्यति। vi) महापुरुषम् नम:। → महापुरुषं नमः। vii) त्वाम् किम् रोचते? → त्वाम् किम् रोचते? viii) कवये कालिदास: श्रेष्ठ:। → कवयः कालिदासः श्रेष्ठः। ix) सा गृहकर्मण: निपुण:। → सा गृहकर्मणि निपुणा। x) अहम् रेल्यानात् कालिकातां गमिष्यामि। → अहं रेल्यानात् कालिकातां गमिष्यामि।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में 'स्थूलपदानां' स्थान पर शुद्ध पद लिखकर वाक्य को व्याकरणसंगत बनाया गया है। जैसे 'अध्यापिकाया:' के स्थान पर 'अध्यापिकाया:' (स्त्रीलिंग, प्रथमा), 'छात्र:' के स्थान पर 'छात्रः' (पुंलिंग, प्रथमा), आदि।