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विकास नीतियाँ और अनुभव (1947-90): भारत की आर्थिक यात्रा

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 2 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

विकास नीतियाँ और अनुभव (1947-90): भारत की आर्थिक यात्रा

विकास नीतियाँ और अनुभव (1947-90) में हम भारत की स्वतंत्रता के बाद की आर्थिक नीतियों और उनके प्रभावों को समझेंगे। यह कक्षा 11 के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय है जो देश की आर्थिक प्रगति की कहानी बताता है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत भारत की आर्थिक स्थिति

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कच्चे माल के उत्पादन और ब्रिटिश वस्तुओं के उपभोक्ता के रूप में सीमित थी। कृषि और हस्तशिल्प उद्योगों को भारी नुकसान हुआ। राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर लगभग 2% से कम थी, जबकि प्रति व्यक्ति आय लगभग 0.5% ही बढ़ी।

  • भारत की स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को बाधित किया गया।
  • कृषि क्षेत्र में जमींदारी प्रथा और कर भार ने उत्पादन को रोका।
  • पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योग ब्रिटिश मशीन निर्मित वस्त्रों से प्रभावित हुए।

इस काल में आर्थिक नीतियाँ ब्रिटिश हितों को प्राथमिकता देती थीं, जिससे भारत की आर्थिक स्वतंत्रता सीमित रही।

स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास नीतियों का आरंभ

1947 के बाद भारत ने आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध दृष्टिकोण अपनाया। पहला पंचवर्षीय योजना (1951-56) कृषि और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित था। विकास नीतियाँ मुख्यतः निम्नलिखित थी:

  • कृषि सुधार और उत्पादन वृद्धि
  • सार्वजनिक क्षेत्र का विकास
  • स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन
  • सामाजिक न्याय और गरीबी उन्मूलन

सरकार ने आर्थिक योजना आयोग की स्थापना की और विकास के लिए विभिन्न योजनाएँ लागू कीं।

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1950-70 के दशक में आर्थिक विकास और चुनौतियाँ

इस अवधि में भारत ने औद्योगिक विकास और कृषि सुधार दोनों पर ध्यान दिया। हालांकि, विकास की गति अपेक्षित नहीं थी। मुख्य कारण:

  • संसाधनों की कमी
  • तकनीकी पिछड़ापन
  • बाजार की सीमितता
  • राजनीतिक अस्थिरता

इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का विस्तार हुआ, लेकिन कृषि क्षेत्र में जमींदारी प्रथा और पारंपरिक तकनीकों की वजह से उत्पादन धीमा रहा।

1980 के दशक में विकास नीतियों में बदलाव

1980 के दशक में आर्थिक नीतियों में कुछ उदारीकरण की शुरुआत हुई। निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता मिली और विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिला। इस दौर की विशेषताएँ:

  • उद्योगों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी
  • कृषि उत्पादन में सुधार के प्रयास
  • सेवा क्षेत्र का विकास

हालांकि, पूर्ण उदारीकरण 1991 के बाद हुआ, पर 1980 के दशक ने आर्थिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया।

औपनिवेशिक और स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियों की तुलना

नीचे दी गई तालिका में औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्र भारत की विकास नीतियों की मुख्य विशेषताएँ तुलना की गई हैं:

पहलूऔपनिवेशिक शासनस्वतंत्र भारत (1947-90)
आर्थिक उद्देश्यब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चा मालआत्मनिर्भरता और समावेशी विकास
कृषि क्षेत्रजमींदारी प्रथा, कर भारभूमि सुधार, उत्पादन वृद्धि प्रयास
उद्योगविनाश और सीमित विकाससार्वजनिक और निजी क्षेत्र का विकास
राष्ट्रीय आय वृद्धिलगभग 2% से कमधीरे-धीरे बढ़ती, पर सीमित गति
आर्थिक स्वतंत्रतासीमितबढ़ती हुई, योजनाबद्ध विकास

यह तुलना स्पष्ट करती है कि स्वतंत्र भारत ने आर्थिक विकास के लिए स्वदेशी नीतियाँ अपनाईं।

आर्थिक विकास के सूत्र और उदाहरण

आर्थिक विकास को मापने के लिए कई सूचकांक और सूत्र उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर निकालने के लिए:

$$ ext{वृद्धि दर} = \frac{ ext{वर्तमान वर्ष की आय} - ext{पिछले वर्ष की आय}}{ ext{पिछले वर्ष की आय}} \times 100 $$

उदाहरण: यदि 1950 में राष्ट्रीय आय 1000 करोड़ रुपये थी और 1951 में 1050 करोड़ रुपये, तो वृद्धि दर होगी:

$$ \frac{1050 - 1000}{1000} \times 100 = 5\% $$

यह दर्शाता है कि आर्थिक विकास की दर 5% रही। इसी प्रकार, कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन आदि के लिए भी वृद्धि दर निकाली जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विकास नीतियाँ और अनुभव (1947-90) का अर्थ क्या है?

यह भारत की स्वतंत्रता के बाद आर्थिक नीतियों और उनके प्रभावों का अध्ययन है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित किया?

इसने भारत को कच्चा माल प्रदाता और ब्रिटिश वस्तुओं का उपभोक्ता बनाया, जिससे आर्थिक विकास धीमा पड़ा।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी आर्थिक नीतियाँ कैसे बदलीं?

भारत ने योजनाबद्ध विकास अपनाया, कृषि सुधार और सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा दिया।

1980 के दशक में भारत की आर्थिक नीतियों में क्या बदलाव हुए?

कुछ उदारीकरण शुरू हुए, निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया गया।

औपनिवेशिक और स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियों में मुख्य अंतर क्या था?

औपनिवेशिक नीतियाँ ब्रिटिश हितों पर केंद्रित थीं, जबकि स्वतंत्र भारत ने स्वदेशी विकास को प्राथमिकता दी।

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