Performing Art Traditions in India | Class 11 Knowledge Traditions Practices of India Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

Performing Art Traditions in India – this guide gives you a concise, exam-ready overview of Performing Art Traditions in India from Class 11 Knowledge Traditions Practices of India, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
MUSIC IN INDIA
भारतीय संगीत (भारतीय संगीत) ने विभिन्न अवसरों पर विकसित होकर हमारी संस्कृति को समृद्ध किया है। इसमें शास्त्रीय, क्षेत्रीय और लोक संगीत के स्वरूप शामिल हैं, जो गायन और वाद्य दोनों रूपों में प्रकट होते हैं। संगीत तीन कलाओं का सम्मिश्रण है: गीत (गायन), वाद्य (वाद्य यंत्र) और नृत्य (नृत्य), जैसा कि पं. शारंगदेव ने 'संगीत रत्नाकर' में कहा है – “गीत, वाद्यं त्रयं संगीतमुच्यते”।
भारतीय संगीत सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों से प्रभावित रहा है और विभिन्न कालों में विकसित हुआ है। इसे तीन मुख्य कालों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. प्राचीन काल (2500 ई.पू. – 1200 ई.) 2. मध्यकालीन काल (1201 – 1800 ई.) 3. आधुनिक काल (1800 से वर्तमान तक)
प्राचीन काल में संगीत की उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमाणों से मानी जाती है। वैदिक काल में ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण और उनका स्वर और लय के साथ गायन हुआ। सामवेद में इन मंत्रों को स्वर और छंद के अनुसार गाया जाता था। सामगान में तीन स्वर होते थे – उदात्त (तेजस्वी स्वर), अनुदात्त (मंद स्वर) और स्वरित (मिश्रित स्वर)। बाद में पाणिनि ने दो अतिरिक्त स्वर – उच्चैस्तरा और सन्नतरा का उल्लेख किया।
इन तीन स्वर से सात स्वर विकसित हुए: षड्ज (सा), ऋषभ (रे), गांधार (गा), मध्यम (म), पंचम (प), धैवत (धा), निषाद (नि)।
सामगान को दो प्रकार के संगीत में बांटा गया – मार्गी (आध्यात्मिक) और देसी (लोकप्रिय)। रामायण, महाभारत और पुराणों में संगीत के कई सन्दर्भ मिलते हैं, जैसे स्वर, ताल, राग, वाद्य यंत्र आदि।
भारत के नाट्यशास्त्र में संगीत, नृत्य और नाटक का विस्तृत वर्णन है। इसमें संगीत के सिद्धांत, राग, ताल, स्वर, लय, मूरचना आदि की चर्चा की गई है।
📊 Diagram: Dancing Shiva; Source: Pragetihasik Bhartiya Chitrakalaa Mein Sangeet
🧪 Activity: विद्यार्थियों से कहा जाए कि वे वैदिक काल के कुछ मंत्रों को स्वर के साथ पढ़ें और सामगान की प्रक्रिया समझें।
🔗 Connection: यह अनुभाग गुरु-शिष्य परंपरा और संगीत शिक्षा की परंपराओं की चर्चा के लिए आधार बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. Define performing arts. What is the role of music in performing arts?
परिभाषा: प्रदर्शन कला (Performing Arts) वे कलाएँ हैं जिनमें कलाकार अपनी कला को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है, जैसे नृत्य, संगीत, नाटक आदि। ये कलाएँ दर्शकों के सामने प्रदर्शन की जाती हैं।
संगीत की भूमिका: संगीत प्रदर्शन कला का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह नृत्य, नाटक और अन्य कलाओं को भावनात्मक और सांगीतिक आधार प्रदान करता है। संगीत के माध्यम से कलाकार अपनी अभिव्यक्ति को गहराई और प्रभावशीलता देता है। संगीत लय, स्वर, ताल आदि के माध्यम से कला को जीवंत बनाता है।
2. Define Sāmagāna. How many streams of Music are there in Vedic Era?
परिभाषा: सामगान (Sāmagāna) वेदों के साम (Sāman) के गायन की विधा है, जिसमें वेदों के मंत्रों को संगीतबद्ध रूप में गाया जाता है। यह वेदों के संगीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वैदिक युग में संगीत की धाराएँ: वैदिक काल में संगीत की तीन प्रमुख धाराएँ थीं - 1. सामगान (Sāmagāna) - साम वेद के मंत्रों का गायन। 2. गायत्री (Gāyatrī) - गायत्री छंद का उच्चारण। 3. ऋग्वेदीय गायन (Ṛgvedic Singing) - ऋग्वेद के मंत्रों का गायन।
3. Write short notes on Nāīyaśāshtra, Brōhaddeshi and Saṅgīta Ratnākara.
नैयाशास्त्र (Nāīyaśāshtra): यह प्राचीन भारतीय संगीत और नाट्यशास्त्र का एक ग्रंथ है, जिसमें संगीत के सिद्धांतों और नाट्य कला के नियमों का वर्णन है।
बृहद्देशी (Brōhaddeshi): यह माटंग द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो संगीत के स्वर, राग और ताल के सिद्धांतों को विस्तार से समझाता है। इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार माना जाता है।
संगीत रत्नाकर (Saṅgīta Ratnākara): यह मंगला मिहिर द्वारा रचित एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जो संगीत, नृत्य और नाट्य के सभी पहलुओं को समेटे हुए है। इसे भारतीय संगीत का अंति
4. How many forms of Classical Music are there in India? Describe them.
भारत में शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख धाराएँ हैं:
1. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत (North Indian Classical Music): यह मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित है। इसमें राग और ताल की प्रणाली विकसित है। इसमें गायन, वादन और नृत्य के माध्यम से संगीत प्रस्तुत किया जाता है।
2. कर्नाटक शास्त्रीय संगीत (South Indian Classical Music): यह दक्षिण भारत में प्रचलित है। इसमें भी राग और ताल का विशेष महत्व है। इसकी प्रस्तुति में वाद्य और गायन दोनों शामिल हैं।
दोनों शास्त्रीय संगीत की अपनी विशिष्टताएँ और शैली हैं, जो भ
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