महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन: नमक सत्याग्रह का इतिहास
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन ने भारत की आज़ादी की लड़ाई को नई दिशा दी। खासकर नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनसमर्थन बढ़ाया और स्वतंत्रता की राह मजबूत की।
महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि
महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों को अपनाया। 1928 में राजनीतिक सक्रियता बढ़ी जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रखा। गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के अन्याय के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन ने आम जनता को संगठित किया और स्वतंत्रता की भावना को बढ़ावा दिया।
1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया, जिससे देश में राष्ट्रीय एकता और उत्साह बढ़ा।
नमक सत्याग्रह: कारण और शुरुआत
ब्रिटिश सरकार ने नमक पर एकाधिकार रखा था, जिससे आम जनता को घरेलू उपयोग के लिए भी नमक बनाने से रोका जाता था। यह कानून गरीबों के लिए भारी आर्थिक बोझ था। गांधी जी ने इस अन्याय के खिलाफ साबरमती आश्रम से 12 मार्च 1930 को दांडी तक पैदल यात्रा शुरू की।
6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्र से नमक बनाया, जिससे ब्रिटिश नमक कानून को चुनौती मिली। यह सत्याग्रह एक अहिंसात्मक विरोध था, जिसने देशभर में जनसमर्थन प्राप्त किया।
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नमक सत्याग्रह का प्रभाव और जनभागीदारी
नमक सत्याग्रह ने देश के हर वर्ग को प्रभावित किया। महिलाओं ने भी इसमें सक्रिय भागीदारी की। ब्रिटिश सरकार ने लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें गांधी जी भी शामिल थे।
इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की कमजोरियों को उजागर किया और यह साबित कर दिया कि उनका शासन अब टिक नहीं सकता। इससे स्वतंत्रता संग्राम में नई ऊर्जा आई और राजनीतिक संवाद शुरू हुए।
गांधी-इविन समझौता और उसके परिणाम
1931 में गांधी जी और ब्रिटिश सरकार के बीच इविन समझौता हुआ। इस समझौते में सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लिया गया और गिरफ्तार कैदियों को रिहा किया गया। हालांकि, यह समझौता स्थायी समाधान नहीं था, लेकिन इसने राजनीतिक वार्ता के द्वार खोले।
इसके बाद गोल मेज सम्मेलन आयोजित हुए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। इस प्रकार, नमक सत्याग्रह ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी और ब्रिटिश सरकार को दबाव में रखा।
नमक सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों की तुलना
नीचे दी गई तालिका में नमक सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन की तुलना की गई है:
| पहलू | नमक सत्याग्रह | असहयोग आंदोलन |
|---|---|---|
| वर्ष | 1930 | 1920-1922 |
| उद्देश्य | नमक कानून का विरोध | ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार |
| नेतृत्व | महात्मा गांधी | महात्मा गांधी |
| रणनीति | पैदल यात्रा, सविनय अवज्ञा | सविनय अवज्ञा, असहयोग |
| जनसमर्थन | व्यापक, महिलाओं की भागीदारी | व्यापक, युवाओं की भागीदारी |
| परिणाम | ब्रिटिश सरकार पर दबाव | आंदोलन का अंत, पुनर्विचार |
यह तुलना समझने में मदद करती है कि कैसे महात्मा गांधी ने विभिन्न समयों पर अलग-अलग रणनीतियाँ अपनाईं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नमक सत्याग्रह कब और क्यों शुरू हुआ?
नमक सत्याग्रह 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से शुरू हुआ। इसका उद्देश्य ब्रिटिश नमक कानून का विरोध करना था, जो आम जनता को नमक बनाने से रोकता था।
महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह के दौरान क्या किया?
गांधी जी ने दांडी तक 24 दिनों की पैदल यात्रा की और 6 अप्रैल 1930 को समुद्र से नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को चुनौती दी।
नमक सत्याग्रह का ब्रिटिश सरकार पर क्या प्रभाव पड़ा?
इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार की कमजोरी उजागर की और लगभग 60,000 लोगों की गिरफ्तारी हुई, जिससे शासन पर दबाव बढ़ा।
गांधी-इविन समझौता क्या था?
1931 में गांधी और ब्रिटिश सरकार के बीच हुआ समझौता, जिसमें सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लिया गया और कैदियों को रिहा किया गया।
नमक सत्याग्रह में महिलाओं की क्या भूमिका थी?
महिलाओं ने इस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, जिससे जनसमर्थन और व्यापक हुआ।
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