सूक्तिमौक्तिकम् | Class 9 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन
सूक्तिमौक्तिकम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सूक्तिमौक्तिकम् from Class 9 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
सूक्तिमौक्तिकम् - शेष श्लोकों का अर्थ एवं जीवन में प्रयोग
इस खंड में सूक्तिमौक्तिकम् के शेष श्लोकों का अर्थ और उनका जीवन में प्रयोग विस्तार से बताया गया है। श्लोकों में दिए गए संदेश जैसे कि 'सर्वे भवन्तु सुखिनः', 'धर्मो रक्षति रक्षितः', और 'मित्रं वद परं न किमपि' जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते हैं। इन श्लोकों का प्रयोग दैनिक जीवन में नैतिकता, सदाचार, और सामाजिक जिम्मेदारी के लिए प्रेरणा के रूप में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' श्लोक सभी के सुख और कल्याण की कामना करता है, जो सहिष्णुता और मानवता की भावना को बढ़ावा देता है। 'धर्मो रक्षति रक्षितः' यह बताता है कि धर्म की रक्षा करने वाला स्वयं सुरक्षित रहता है, इसलिए धर्म का पालन आवश्यक है। 'मित्रं वद परं न किमपि' मित्रता के महत्व को दर्शाता है, जो जीवन में सहयोग और विश्वास का आधार है। इन श्लोकों के माध्यम से विद्यार्थी अपने व्यवहार में सुधार कर सकते हैं और समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं। इस खंड में श्लोकों के अर्थ के साथ-साथ उनके जीवन में उपयोग और महत्व को भी समझाया गया है।
📊 Diagram: इस खंड में कोई चित्र नहीं है, पर श्लोकों के जीवन में प्रयोग को समझाने के लिए उदाहरण दिए गए हैं।
🧪 Activity: विद्यार्थियों को श्लोकों के अर्थ पर आधारित निबंध लिखने और अपने जीवन में उनका पालन करने के लिए प्रेरित किया गया है।
🔗 Connection: यह खंड अगले खंड 'सूक्तिमौक्तिकम् - व्याकरणिक अभ्यास' से जुड़ता है, जहाँ श्लोकों से संबंधित व्याकरणिक अभ्यास कराए जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति? (ख) कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्? (ग) कुत्र दरिद्रता न भवेत्? (घ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति? (ङ) का पुरा लघ्वी भवति?
(क) हतः। (ख) सज्जनः। (ग) वचने। (घ) फलं। (ङ) मैत्री।
2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत- (क) यत्नेन किं रक्षेत् वित्तं वृत्त वा? (ख) अस्माभिः (किं न समाचरेत्) कीदृशम् आचरणं न कर्त्तव्यम्? (ग) जन्तवः केन तुष्यन्ति? (घ) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति? (ङ) सरोवराणां हानि: कदा भवति?
(क) यत्नेन वृत्तं रक्षेत्। (ख) अस्माभिः परेषां प्रतिकूलानि कार्याणि न समाचरेत्। (ग) जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति। (घ) सज्जनानां मैत्री लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् भवति। (ङ) सरोवराणां हानि: शुष्के काले भवति।
3. 'क' स्तम्भे विशेषणानि 'ख' स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत- 'क' स्तम्भः (क) आस्वाद्यतोयाः (ख) गुणयुक्तः (ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना (3) नद्यः (घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना (4) दरिद्र: 'ख' स्तम्भ: (1) खलानां मैत्री (2) सज्जनानां मैत्री
यथोचित योजन: (क) आस्वाद्यतोयाः — नद्यः (ख) गुणयुक्तः — दरिद्र: (ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना — खलानां मैत्री (घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना — सज्जनानां मैत्री
4. अधोलिखितयोः श्लोकयोः आशयं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत- (क) आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्। दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।। (ख) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।
(क) हिन्दी में आशय: दुष्ट और सज्जन दोनों की मित्रता छाया के समान होती है। दुष्ट की मित्रता आरंभ में भारी होती है और धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है, जैसे दिन के पूर्वार्द्ध में छाया बड़ी होती है और बाद में घट जाती है। सज्जन की मित्रता आरंभ में हल्की होती है और समय के साथ बढ़ती जाती है, जैसे दिन के परार्द्ध में छाया बढ़ती जाती है।
(ख) हिन्दी में आशय: प्रिय वचन कहने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। इसलिए हमेशा प्रिय वचन ही बोलना चाहिए, क्योंकि वाणी में कभी दरिद्रता नहीं होती।
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