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सूक्तिमौक्तिकम् | Class 9 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

सूक्तिमौक्तिकम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सूक्तिमौक्तिकम् from Class 9 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

सूक्तिमौक्तिकम् - परिचय

सूक्तिमौक्तिकम् संस्कृत भाषा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है जो विद्यार्थियों को जीवन के विभिन्न पहलुओं को सरल, संक्षिप्त और प्रभावशाली भाषा में समझाने का प्रयास करता है। इस अध्याय में विभिन्न सूक्तियाँ, श्लोक और कथन सम्मिलित हैं जो नैतिकता, धर्म, सत्य, मित्रता, ज्ञान और कर्म के महत्व को उजागर करते हैं। सूक्तिमौक्तिकम् का शाब्दिक अर्थ है - 'सुंदर वाक्यांशों का संग्रह'। यह अध्याय विद्यार्थियों को संस्कृत भाषा के साथ-साथ जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य भी सिखाता है। अध्याय के श्लोकों में जीवन के व्यवहारिक और नैतिक सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है, जो विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं। इस अध्याय के माध्यम से विद्यार्थी संस्कृत के श्लोकों का अध्ययन करते हुए अपने जीवन में सही मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। अध्याय की भाषा सरल और स्पष्ट है, जिससे विद्यार्थी आसानी से समझ सकते हैं। इस अध्याय में प्रस्तुत श्लोकों का प्रयोग दैनिक जीवन में नैतिकता और सदाचार के लिए प्रेरणा के रूप में किया जा सकता है। कुल मिलाकर, सूक्तिमौक्तिकम् अध्याय संस्कृत साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो विद्यार्थियों को भाषा, संस्कृति और जीवन मूल्यों से परिचित कराता है।

📊 Diagram: इस परिचय खंड में कोई चित्र या आकृति नहीं है।

🧪 Activity: इस खंड में कोई विशेष गतिविधि नहीं दी गई है।

🔗 Connection: यह परिचय अगले खंड 'सूक्तिमौक्तिकम् - श्लोक 1 से 5 का अर्थ एवं व्याख्या' से जुड़ता है, जहाँ श्लोकों का विस्तृत अर्थ और व्याख्या दी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति? (ख) कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्? (ग) कुत्र दरिद्रता न भवेत्? (घ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति? (ङ) का पुरा लघ्वी भवति?

(क) हतः। (ख) सज्जनः। (ग) वचने। (घ) फलं। (ङ) मैत्री।

2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत- (क) यत्नेन किं रक्षेत् वित्तं वृत्त वा? (ख) अस्माभिः (किं न समाचरेत्) कीदृशम् आचरणं न कर्त्तव्यम्? (ग) जन्तवः केन तुष्यन्ति? (घ) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति? (ङ) सरोवराणां हानि: कदा भवति?

(क) यत्नेन वृत्तं रक्षेत्। (ख) अस्माभिः परेषां प्रतिकूलानि कार्याणि न समाचरेत्। (ग) जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति। (घ) सज्जनानां मैत्री लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात् भवति। (ङ) सरोवराणां हानि: शुष्के काले भवति।

3. 'क' स्तम्भे विशेषणानि 'ख' स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत- 'क' स्तम्भः (क) आस्वाद्यतोयाः (ख) गुणयुक्तः (ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना (3) नद्यः (घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना (4) दरिद्र: 'ख' स्तम्भ: (1) खलानां मैत्री (2) सज्जनानां मैत्री

यथोचित योजन: (क) आस्वाद्यतोयाः — नद्यः (ख) गुणयुक्तः — दरिद्र: (ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना — खलानां मैत्री (घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना — सज्जनानां मैत्री

4. अधोलिखितयोः श्लोकयोः आशयं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत- (क) आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्। दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।। (ख) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।

(क) हिन्दी में आशय: दुष्ट और सज्जन दोनों की मित्रता छाया के समान होती है। दुष्ट की मित्रता आरंभ में भारी होती है और धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है, जैसे दिन के पूर्वार्द्ध में छाया बड़ी होती है और बाद में घट जाती है। सज्जन की मित्रता आरंभ में हल्की होती है और समय के साथ बढ़ती जाती है, जैसे दिन के परार्द्ध में छाया बढ़ती जाती है।

(ख) हिन्दी में आशय: प्रिय वचन कहने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। इसलिए हमेशा प्रिय वचन ही बोलना चाहिए, क्योंकि वाणी में कभी दरिद्रता नहीं होती।

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