भारत की विदेश नीति | Class 12 Political Science Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

भारत की विदेश नीति – this guide gives you a concise, exam-ready overview of भारत की विदेश नीति from Class 12 Political Science, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
चीन के साथ शांति और संघर्ष
आजाद भारत ने चीन के साथ अपने संबंधों की शुरुआत दोस्ताना और सहयोगपूर्ण तरीके से की। 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ, जिसे भारत ने शीघ्र मान्यता दी। 1954 में भारत और चीन ने पंचशील के पाँच सिद्धांतों पर सहमति जताई, जिनमें शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान, और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान शामिल थे।
हालांकि, 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया, जिससे भारत-चीन संबंधों में तनाव बढ़ा। 1959 में तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत से शरण ली, जिसे चीन ने नापसंद किया। सीमा विवाद के कारण 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। यह युद्ध भारत के लिए एक बड़ा झटका था। चीन ने अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया। भारत को इस युद्ध में भारी नुकसान हुआ और इसके बाद भारत ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत किया।
1962 के युद्ध के बाद भारत-चीन संबंधों में सुधार में लगभग दस साल लगे। 1976 में दोनों देशों ने पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल किए। बाद में भारत के नेताओं ने चीन के दौरे किए और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा दिया। चीन-युद्ध ने भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।
📊 Diagram: यह मध्य एशिया का मशहूर पठार है। ऐतिहासिक रूप से तिब्बत भारत और चीन के बीच विवाद का एक बड़ा मसला रहा है। अतीत में समय-समय पर चीन ने तिब्बत पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण जताया और कई दफा तिब्बत आजाद भी हुआ। 1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया। तिब्बत के ज्यादातर लोगों ने चीनी कब्जे का विरोध किया। 1954 में जब भारत और चीन के बीच पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर हुए तो इसके प्रावधानों में एक बात यह भी शामिल थी कि दोनों देश एक-दूसरे को क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करेंगे। चीन ने इस प्रावधान का अर्थ लगाया कि भारत तिब्बत पर चीनी दावेदारी की बात को स्वीकार कर रहा है। 1956 में चीनी शासनाध्यक्ष चाऊ एन लाई भारत के आधिकारिक दौरे पर आए तो साथ ही साथ तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा भी भारत पहुँचे। उन्होंने तिब्बत की बिगड़ती स्थिति की जानकारी नेहरू को दी। चीन आश्वासन दे चुका था कि तिब्बत को चीन के अन्य इलाकों से कहीं ज्यादा स्वायत्तता दी जाएगी। 1958 में चीनी आधिपत्य के विरुद्ध तिब्बत में सशस्त्र विद्रोह हुआ। इस विद्रोह को चीन की सेनाओं ने दबा दिया। स्थिति बिगड़ती देखकर तिब्बत के पारंपरिक नेता दलाई लामा ने सीमा पारकर भारत में प्रवेश किया और 1959 में भारत से शरण माँगी। भारत ने दलाई लामा को शरण दे दी। चीन ने भारत के इस कदम का कड़ा विरोध किया। पिछले 50 सालों में बड़ी संख्या में तिब्बती जनता ने भारत और दुनिया के अन्य देशों में शरण ली है। भारत में (खासकर दिल्ली में) तिब्बती शरणार्थियों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में संभवतया तिब्बती शरणार्थियों की सबसे बड़ी बस्ती है। दलाई लामा ने भी भारत में धर्मशाला को ही अपना निवास-स्थान बनाया है। 1950 और 1960 के दशक में भारत के अनेक राजनीतिक दल और राजनेताओं ने तिब्बत की आजादी के प्रति अपना समर्थन जताया। इन दलों में सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ शामिल हैं।
🧪 Activity: विद्यार्थियों से चीन-भारत सीमा विवाद और 1962 के युद्ध के कारणों और परिणामों पर चर्चा कराएं।
🔗 Connection: यह अनुभाग पाकिस्तान के साथ भारत के युद्ध और शांति संबंधों की चर्चा से जुड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अवधारणा- बांग्लादेश युद्ध 1971 शिमला समझौता निम्नलिखित में से किन देशों के बीच हुआ था?
भारत-पाकिस्तान
अवधारणा -भारत की परमाणु नीति भारत ने किस वर्ष में सर्वप्रथम परमाणु परीक्षण किया?
मई 1974
अवधारणा -बांग्लादेश युद्ध 1971 शिमला समझौता निम्नलिखित में से किन देशों के बीच हुआ था?
भारत-पाकिस्तान
अवधारणा -एफ्रो एशियाई एकता निम्नलिखित कथनों पर विचार करें 1 इंडोनेशिया के प्रसिद्ध शहर बांडुंग में हुए सम्मेलन में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी थी। 2 गुट निरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन 1961 के सितंबर मैं बेलग्रेड में संपन्न हुआ था। 3 गुटनिरपेक्ष आंदोलन स्थापना में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उपरोक्त कथनों में से कौन सा /से कथन सत्य नहीं है?
उपरोक्त में से कोई नहीं
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