भारतीय समाजशास्त्री | Class 11 Sociology Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

भारतीय समाजशास्त्री – this guide gives you a concise, exam-ready overview of भारतीय समाजशास्त्री from Class 11 Sociology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
गोविंद सदाशिव घूर्ये (1893-1983)
गोविंद सदाशिव घूर्ये का जन्म 12 दिसंबर 1893 को मालवान के कोंकण तटीय क्षेत्र में हुआ था। उनका परिवार प्रारंभ में संपन्न व्यापारी था, लेकिन बाद में आर्थिक पतन हुआ। उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई से संस्कृत में ऑनर्स स्नातक और फिर संस्कृत तथा अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1919 में उन्हें विदेश में समाजशास्त्र का प्रशिक्षण प्राप्त करने छात्रवृत्ति मिली। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स में एल.टी. हॉबहाउस और कैम्ब्रिज में डब्ल्यू.एच.आर. रिवर्स के निर्देशन में अध्ययन किया। 1923 में उन्होंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की और भारत लौटकर बंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के रीडर और विभागाध्यक्ष बने। घूर्ये ने समाजशास्त्र को एक भारतीय विषय के रूप में विकसित किया और बंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग को एक प्रमुख केंद्र बनाया। उन्होंने जाति, प्रजाति, जनजाति, परिवार, विवाह, संस्कृति, धर्म, संघर्ष और एकीकरण जैसे विषयों पर व्यापक शोध किया। घूर्ये ने भारतीय जनजातियों को 'पिछड़े हिंदू समूह' के रूप में देखा और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के पक्ष में नहीं थे, बल्कि विकास की आवश्यकता पर बल दिया। उनके जाति सिद्धांत ने जाति की छह प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित किया, जिनमें जन्म आधारित सदस्यता, सोपानिक विभाजन, सामाजिक अंत:क्रिया पर प्रतिबंध, अधिकार और कर्तव्य, व्यवसाय का वंशानुगत होना, और विवाह पर प्रतिबंध शामिल हैं। घूर्ये ने भारतीय समाजशास्त्र को संस्थागत रूप दिया और इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना की।
📊 Diagram: 1913 : एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई में प्रवेश। संस्कृत (ऑनर्स) में स्नातक। स्नातकोत्तर की उपाधि संस्कृत तथा अंग्रेजी में, इसी कॉलेज से 1918 में।
🧪 Activity: क्रियाकलाप 1: आज के जनजातीय आंदोलनों के विभिन्न पक्षों और कारणों की समीक्षा करें।
🔗 Connection: यह खंड आगे डी.पी. मुकर्जी के विचारों और उनके योगदान की चर्चा से जुड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
2. ‘जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’—इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए हमें दोनों पक्षों के तर्कों को समझना होगा। एक पक्ष का तर्क था कि जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा के समाज में जोड़ना चाहिए ताकि वे विकास के लाभ उठा सकें और सामाजिक, आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि क्षेत्रों में समान अवसरों के पक्षधर थे। वहीं दूसरा पक्ष यह मानता था कि जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक पहचान होती है, जिसे मुख्यधारा में जोड़ने से खतरा हो सकता है। वे जनजातीय समुदायों की स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्
3. भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा जी.एस. घूयें की स्थिति की रूपरेखा दें।
हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूयें ने भारत में प्रजाति और जाति के संबंधों पर अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। रिजले ने प्रजाति को जाति से अलग सामाजिक इकाई माना, जिसमें प्रजाति अधिकतर आदिम और पिछड़ी सामाजिक स्थिति में होती है, जबकि जाति सामाजिक व्यवस्था का एक जटिल रूप है। उन्होंने प्रजाति को सामाजिक विकास के प्रारंभिक चरण के रूप में देखा। दूसरी ओर, जी.एस. घूयें ने जाति को सामाजिक संरचना का मुख्य आधार माना और प्रजाति को जाति के अंतर्गत एक विशेष प्रकार की सामाजिक इकाई के रूप में देखा। घूयें ने जाति को साम
4. जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएं।
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा में इसे एक सामाजिक समूह के रूप में देखा जाता है, जिसकी सदस्यता जन्म के आधार पर होती है और जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियमों द्वारा परिभाषित होता है। जाति व्यवस्था में सामाजिक पदानुक्रम, अंतर्विवाह, और सामाजिक प्रतिबंध शामिल होते हैं। जाति सामाजिक पहचान, समूह की स्वायत्तता और सामाजिक नियंत्रण के माध्यम से समाज में स्थिरता बनाए रखती है। इस परिभाषा में जाति को एक गतिशील सामाजिक संरचना के रूप में भी देखा जाता है, जो समय के साथ बदलती रहती है।
5. ‘जीवंत परंपरा’ से डी.पी. मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
डी.पी. मुकर्जी द्वारा 'जीवंत परंपरा' से तात्पर्य उस सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा से है जो सक्रिय रूप से समाज में जीवित है और जो समाज के सदस्यों के व्यवहार, सोच और जीवनशैली को प्रभावित करती है। यह परंपरा स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती और विकसित होती रहती है। भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर इसलिए बल दिया क्योंकि इससे वे भारतीय समाज की वास्तविकताओं को बेहतर समझ सकते हैं और समाजशास्त्रीय अध्ययन में स्थानीय संदर्भों और सांस्कृतिक विशेषताओं को शामिल कर सकते हैं। इससे शो
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