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भारतीय समाजशास्त्री | Class 11 Sociology Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

भारतीय समाजशास्त्री | Class 11 Sociology Notes

भारतीय समाजशास्त्री – this guide gives you a concise, exam-ready overview of भारतीय समाजशास्त्री from Class 11 Sociology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

भारतीय समाजशास्त्री

भारतीय समाजशास्त्र का इतिहास और विकास लगभग सौ वर्षों से भी अधिक पुराना है। विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा की शुरुआत 1919 में बंबई विश्वविद्यालय से हुई। इसके बाद कलकत्ता और लखनऊ विश्वविद्यालयों ने भी 1920 के दशक में समाजशास्त्र और मानवविज्ञान में शिक्षण और शोध कार्य प्रारंभ किया। आज भारत के अधिकांश प्रमुख विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र विभाग, सामाजिक मानवविज्ञान या मानवविज्ञान विभाग स्थापित हैं। प्रारंभिक दौर में यह स्पष्ट नहीं था कि भारतीय समाजशास्त्र का स्वरूप कैसा होगा और क्या वास्तव में भारत को समाजशास्त्र की आवश्यकता थी। 20वीं शताब्दी के पहले पच्चीस वर्षों में इस विषय में रुचि रखने वालों को स्वयं यह तय करना था कि भारत में समाजशास्त्र की भूमिका क्या होगी। भारतीय संदर्भ की विशिष्टता ने कई प्रश्न खड़े किए, जैसे कि भारत में आधुनिकता और औपनिवेशिक पराधीनता का मिश्रित अनुभव, भारत की प्राचीन सभ्यता और उसमें आदिम या जनजातीय समाज की उपस्थिति, तथा नव स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में समाजशास्त्र की भूमिका। भारतीय समाजशास्त्र के अग्रणी विद्वानों को न केवल इन प्रश्नों के उत्तर खोजने थे, बल्कि नए प्रश्न भी तलाशने थे। इस संदर्भ में भारतीय समाजशास्त्र का विकास एक अनुभव आधारित प्रक्रिया थी, जो पूर्वनिर्मित रूप में उपलब्ध नहीं थी। प्रारंभिक समाजशास्त्री अकस्मात बने, जैसे एल.के. अनन्तकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में गहन मानवविज्ञान और समाजशास्त्रीय अध्ययन किए। इस अध्याय में भारत के चार प्रमुख समाजशास्त्रियों का परिचय दिया गया है, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में जन्म लेकर स्वतंत्र भारत में समाजशास्त्र को एक औपचारिक और संस्थागत स्वरूप दिया।

🔗 Connection: यह परिचय आगे चलकर भारतीय समाजशास्त्र के प्रमुख विद्वानों और उनके योगदान की विस्तृत चर्चा की ओर ले जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

2. ‘जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’—इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए हमें दोनों पक्षों के तर्कों को समझना होगा। एक पक्ष का तर्क था कि जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा के समाज में जोड़ना चाहिए ताकि वे विकास के लाभ उठा सकें और सामाजिक, आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि क्षेत्रों में समान अवसरों के पक्षधर थे। वहीं दूसरा पक्ष यह मानता था कि जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक पहचान होती है, जिसे मुख्यधारा में जोड़ने से खतरा हो सकता है। वे जनजातीय समुदायों की स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्

3. भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा जी.एस. घूयें की स्थिति की रूपरेखा दें।

हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूयें ने भारत में प्रजाति और जाति के संबंधों पर अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। रिजले ने प्रजाति को जाति से अलग सामाजिक इकाई माना, जिसमें प्रजाति अधिकतर आदिम और पिछड़ी सामाजिक स्थिति में होती है, जबकि जाति सामाजिक व्यवस्था का एक जटिल रूप है। उन्होंने प्रजाति को सामाजिक विकास के प्रारंभिक चरण के रूप में देखा। दूसरी ओर, जी.एस. घूयें ने जाति को सामाजिक संरचना का मुख्य आधार माना और प्रजाति को जाति के अंतर्गत एक विशेष प्रकार की सामाजिक इकाई के रूप में देखा। घूयें ने जाति को साम

4. जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएं।

जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा में इसे एक सामाजिक समूह के रूप में देखा जाता है, जिसकी सदस्यता जन्म के आधार पर होती है और जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियमों द्वारा परिभाषित होता है। जाति व्यवस्था में सामाजिक पदानुक्रम, अंतर्विवाह, और सामाजिक प्रतिबंध शामिल होते हैं। जाति सामाजिक पहचान, समूह की स्वायत्तता और सामाजिक नियंत्रण के माध्यम से समाज में स्थिरता बनाए रखती है। इस परिभाषा में जाति को एक गतिशील सामाजिक संरचना के रूप में भी देखा जाता है, जो समय के साथ बदलती रहती है।

5. ‘जीवंत परंपरा’ से डी.पी. मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?

डी.पी. मुकर्जी द्वारा 'जीवंत परंपरा' से तात्पर्य उस सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा से है जो सक्रिय रूप से समाज में जीवित है और जो समाज के सदस्यों के व्यवहार, सोच और जीवनशैली को प्रभावित करती है। यह परंपरा स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती और विकसित होती रहती है। भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर इसलिए बल दिया क्योंकि इससे वे भारतीय समाज की वास्तविकताओं को बेहतर समझ सकते हैं और समाजशास्त्रीय अध्ययन में स्थानीय संदर्भों और सांस्कृतिक विशेषताओं को शामिल कर सकते हैं। इससे शो

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