साखी | Class 10 Hindi Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

साखी – this guide gives you a concise, exam-ready overview of साखी from Class 10 Hindi, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
पाठ प्रवेश
इस खंड में 'साखी' शब्द का अर्थ और उसकी विशेषताएँ समझाई गई हैं। 'साखी' शब्द 'साक्षी' का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है 'प्रत्यक्ष ज्ञान' या 'गवाही'। संत परंपरा में साखी का महत्व अनुभव ज्ञान के रूप में होता है, जो गुरु से शिष्य को दिया जाता है। कबीर का अनुभव क्षेत्र व्यापक था, इसलिए उनकी साखियों में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी भाषाओं के शब्दों का मिश्रण मिलता है, जिसे 'पचमेल खिचड़ी' कहा जाता है।
साखी का छंद दोहा होता है, जिसमें पहली पंक्ति में 13 मात्राएँ और दूसरी में 11 मात्राएँ होती हैं, कुल 24 मात्राएँ होती हैं। यह छंद सरल, प्रभावशाली और यादगार होता है। कबीर की साखियाँ जीवन के तत्वज्ञान की शिक्षा देती हैं, जो सत्य की साक्षी होती हैं। ये साखियाँ गुरु-शिष्य के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का माध्यम हैं। इस प्रकार साखी न केवल कविता है, बल्कि जीवन के गूढ़ सत्य को समझाने वाली शिक्षाप्रद अभिव्यक्ति भी है।
📊 Diagram: See figure_3: चित्र में कबीर की भाषा के मिश्रण और साखी के छंद का विवरण दिया गया है।
🔗 Connection: यह खंड साखी के अर्थ और छंद की जानकारी देने के बाद अगली कड़ी में कबीर की साखियों के मुख्य सन्देश और उनकी सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है? 2. दीपक दिखाई देने पर ओँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। 3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते? 4. संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए। 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है? 6. ‘ऐके अषिर पीव का, पढ़े सु पॉडित होइ’—इस पॉक्त द्वारा कवि क्या कहना चाहता है? 7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख मिलता है क्योंकि मीठे शब्द सुनने वाले के मन को शांति और आनंद मिलता है। इससे बोलने वाले के मन में भी शीतलता और सुकून आता है, क्योंकि मीठी वाणी से सकारात्मक ऊर्जा फैलती है।
2. दीपक दिखाई देने पर ओँधियारा मिट जाता है क्योंकि दीपक प्रकाश का स्रोत है जो अंधकार को दूर करता है। साखी में इसका अर्थ है कि ज्ञान या सच्चाई के प्रकाश से अज्ञानता (अंधकार) समाप्त हो जाती है।
3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि हमारी इंद्रियाँ और मन उसकी व्याप
1. विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। 2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि। 3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि। 4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पॉडित भया न कोइ।
1. 'विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।' का भाव है कि जब मन विरह (वियोग) की स्थिति में होता है, तब शरीर में बेचैनी होती है और कोई भी मंत्र या ध्यान प्रभावी नहीं होता।
2. 'कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि।' का अर्थ है कि कस्तूरी (खुशबू) मृग के नाभि में रहती है, पर मृग उसे जंगल में खोजता रहता है। यह बताता है कि ईश्वर या सत्य हमारे भीतर है, पर हम बाहर खोजते हैं।
3. 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।' का भाव है कि जब अहंकार (मैं) था तब ईश्वर का अनुभव नहीं था, अब अहंकार मिट गया
1. पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए— उदाहरण— जिवै — जीना औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेडा, आँगनिण, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।
प्रचलित रूप:
- औरन — औरों
- माँहि — में
- देख्या — देखा
- भुवंगम — भुजंग
- नेडा — नज़दीक
- आँगनिण — आँगन
- साबण — साबुन
- मुवा — मरा
- पीव — पीव (प्रिय)
- जालौं — जलाऊँ
- तास — ताश
1. ‘साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है’ तथा ‘व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए’—इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।
इस विषय पर परिचर्चा में कहा जा सकता है कि साधु व्यक्ति में निंदा सहन करने की क्षमता विनम्रता और सहिष्णुता का परिचायक है। इससे व्यक्ति का चरित्र निखरता है। मीठी और कल्याणकारी वाणी बोलने से समाज में प्रेम और सद्भाव बढ़ता है, जिससे सभी का कल्याण होता है।
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