साखी | Class 10 Hindi Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

साखी – this guide gives you a concise, exam-ready overview of साखी from Class 10 Hindi, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
कबीर की साखियों का साहित्यिक मूल्य
कबीर की साखियाँ हिंदी साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। वे लोक साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, जो सरल भाषा में गूढ़ विचार प्रस्तुत करती हैं। कबीर की साखियों में छंदबद्धता, लय, और अर्थ की गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
उनकी भाषा जन-जन की भाषा थी, जिससे उनकी कविताएँ आम जनता तक आसानी से पहुँच सकीं। कबीर की साखियाँ न केवल धार्मिक या आध्यात्मिक ग्रंथ हैं, बल्कि सामाजिक और दार्शनिक चिंतन का भी स्रोत हैं। उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य के विकास में मील का पत्थर मानी जाती हैं।
कबीर की साखियों ने लोक साहित्य को समृद्ध किया और हिंदी भाषा के विकास में योगदान दिया। उनकी कविताएँ आज भी साहित्यिक अध्ययन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रमुखता से पढ़ी और गाई जाती हैं।
🔗 Connection: यह खंड कबीर की साखियों की आज की प्रासंगिकता की ओर बढ़ता है, जहाँ उनकी शिक्षाओं का आधुनिक समाज में महत्व समझाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है? 2. दीपक दिखाई देने पर ओँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। 3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते? 4. संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए। 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है? 6. ‘ऐके अषिर पीव का, पढ़े सु पॉडित होइ’—इस पॉक्त द्वारा कवि क्या कहना चाहता है? 7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख मिलता है क्योंकि मीठे शब्द सुनने वाले के मन को शांति और आनंद मिलता है। इससे बोलने वाले के मन में भी शीतलता और सुकून आता है, क्योंकि मीठी वाणी से सकारात्मक ऊर्जा फैलती है।
2. दीपक दिखाई देने पर ओँधियारा मिट जाता है क्योंकि दीपक प्रकाश का स्रोत है जो अंधकार को दूर करता है। साखी में इसका अर्थ है कि ज्ञान या सच्चाई के प्रकाश से अज्ञानता (अंधकार) समाप्त हो जाती है।
3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि हमारी इंद्रियाँ और मन उसकी व्याप
1. विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। 2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि। 3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि। 4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पॉडित भया न कोइ।
1. 'विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।' का भाव है कि जब मन विरह (वियोग) की स्थिति में होता है, तब शरीर में बेचैनी होती है और कोई भी मंत्र या ध्यान प्रभावी नहीं होता।
2. 'कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि।' का अर्थ है कि कस्तूरी (खुशबू) मृग के नाभि में रहती है, पर मृग उसे जंगल में खोजता रहता है। यह बताता है कि ईश्वर या सत्य हमारे भीतर है, पर हम बाहर खोजते हैं।
3. 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।' का भाव है कि जब अहंकार (मैं) था तब ईश्वर का अनुभव नहीं था, अब अहंकार मिट गया
1. पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए— उदाहरण— जिवै — जीना औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेडा, आँगनिण, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।
प्रचलित रूप:
- औरन — औरों
- माँहि — में
- देख्या — देखा
- भुवंगम — भुजंग
- नेडा — नज़दीक
- आँगनिण — आँगन
- साबण — साबुन
- मुवा — मरा
- पीव — पीव (प्रिय)
- जालौं — जलाऊँ
- तास — ताश
1. ‘साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है’ तथा ‘व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए’—इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।
इस विषय पर परिचर्चा में कहा जा सकता है कि साधु व्यक्ति में निंदा सहन करने की क्षमता विनम्रता और सहिष्णुता का परिचायक है। इससे व्यक्ति का चरित्र निखरता है। मीठी और कल्याणकारी वाणी बोलने से समाज में प्रेम और सद्भाव बढ़ता है, जिससे सभी का कल्याण होता है।
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