Chapter 9
Chapter 9 — अध्ययन नोट्स
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जैव प्रौद्योगिकी का परिचय
व्याख्याजैव प्रौद्योगिकी का परिचय
जैव प्रौद्योगिकी वह विज्ञान और तकनीक है जिसमें जीवित जीवों, कोशिकाओं और उनके अणुओं का उपयोग करके उपयोगी उत्पादों का निर्माण किया जाता है। यह क्षेत्र जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान, और तकनीकी ज्ञान का संयोजन है। जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से हम जीवों के आनुवंशिक तत्त्वों को समझकर उन्हें संशोधित कर सकते हैं और नई-नई दवाइयाँ, कृषि उत्पाद, औद्योगिक कच्चे माल आदि प्राप्त कर सकते हैं। इस क्षेत्र ने चिकित्सा, कृषि, उद्योग, और पर्यावरण संरक्षण में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं। जैव प्रौद्योगिकी की शुरुआत 20वीं सदी के मध्य में हुई जब आनुवंशिक सामग्री के अध्ययन और संशोधन की तकनीकें विकसित हुईं। इस क्षेत्र में पुनर्योगज डीएनए तकनीक, क्लोनिंग, जीन अभिव्यक्ति, और पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया (PCR) जैसी विधियाँ शामिल हैं। जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों में पुनर्योगज इंसुलिन, वैक्सीन, कीटनाशक, और पर्यावरणीय उपचार शामिल हैं। साथ ही, इसके विकास के साथ नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दे भी उत्पन्न हुए हैं जिनका समाधान आवश्यक है।
- जैव प्रौद्योगिकी जीवित जीवों और उनके अणुओं का उपयोग करती है।
- यह जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान और तकनीक का संयोजन है।
- इससे चिकित्सा, कृषि, उद्योग और पर्यावरण में सुधार हुआ।
- पुनर्योगज डीएनए तकनीक जैव प्रौद्योगिकी की मुख्य विधि है।
- जैव प्रौद्योगिकी के नैतिक और सामाजिक पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।
- 📌 जैव प्रौद्योगिकी: जीवित जीवों और उनके अणुओं का उपयोग कर उपयोगी उत्पाद बनाने की विज्ञान और तकनीक।
- 📌 पुनर्योगज डीएनए तकनीक: दो या अधिक स्रोतों से डीएनए के अंशों को जोड़कर नया डीएनए बनाना।
पुनर्योगज डीएनए तकनीक
व्याख्यापुनर्योगज डीएनए तकनीक
पुनर्योगज डीएनए तकनीक वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक स्रोतों से डीएनए के अंशों को काटकर, जोड़कर एक नया डीएनए अणु बनाया जाता है। इस तकनीक में मुख्यतः तीन चरण होते हैं: (1) डीएनए का पृथक्करण, (2) डीएनए के अंशों को काटना और (3) उन्हें जोड़ना। इस प्रक्रिया में प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction enzymes) का उपयोग होता है जो डीएनए के विशिष्ट अनुक्रमों को पहचानकर काटते हैं। क्लोनिंग संवाहक (जैसे प्लाज्मिड) में इच्छित जीन को जोड़ा जाता है और फिर इसे होस्ट जीव (जैसे बैक्टीरिया) में प्रवेश कराया जाता है। होस्ट जीव में यह पुनर्योगज डीएनए प्रतिकृत होता है और इच्छित प्रोटीन का उत्पादन करता है। इस तकनीक से हम आनुवंशिक स्तर पर जीवों को संशोधित कर सकते हैं और विभिन्न उपयोगी उत्पाद जैसे इंसुलिन, हार्मोन, और वैक्सीन बना सकते हैं।
- पुनर्योगज डीएनए तकनीक में डीएनए के अंशों को काटकर जोड़ा जाता है।
- प्रतिबंधन एंजाइम विशिष्ट अनुक्रमों को पहचानकर डीएनए काटते हैं।
- क्लोनिंग संवाहक जैसे प्लाज्मिड का उपयोग डीएनए ले जाने के लिए होता है।
- होस्ट जीव में पुनर्योगज डीएनए प्रतिकृत होता है।
- इस तकनीक से चिकित्सा और कृषि में उपयोगी उत्पाद बनाए जाते हैं।
- 📌 प्रतिबंधन एंजाइम: ऐसे एंजाइम जो डीएनए के विशिष्ट अनुक्रमों को पहचानकर काटते हैं।
- 📌 क्लोनिंग संवाहक: वाहक अणु जो पुनर्योगज डीएनए को होस्ट में ले जाते हैं।
पुनर्योगज डीएनए तकनीक का आरेखीय प्रदर्शन
व्याख्यापुनर्योगज डीएनए तकनीक का आरेखीय प्रदर्शन
पुनर्योगज डीएनए तकनीक का आरेखीय प्रदर्शन इस प्रक्रिया के चरणों को स्पष्ट करता है। सबसे पहले, किसी जीव के डीएनए से इच्छित जीन को प्रतिबंधन एंजाइम की सहायता से काटा जाता है। इसी प्रकार, क्लोनिंग संवाहक (जैसे प्लाज्मिड) को भी उसी एंजाइम से काटा जाता है
अभ्यास प्रश्न — Chapter 9
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1- D;k vki nl iqu;ksZxt izksVhu osQ ckjs esa crk ldrs gSa tks fpfdRlh; O;ogkj osQ dke esa yk, tkrs gSa\ irk yxkb;s fd os fpfdRlh; vkS"kf/ osQ :i esa dgk¡ iz;ksx fd, tkrs gSaA (baVjusV dh lgk;rk ysa)A 2- ,d lfp=k (pkVZ) (vkjsf[kr fu:i.k osQ lkFk) cukb, tks izfrca/u ,atkbe dks] (ftl fozQ;k/kj Mh,u, ij ;g dk;Z djrk gS mls)] mu LFkyksa dks tgk¡ ;g Mh,u, dks dkVrk gS o buls mRiUu mRikn dks n'kkZrk gSA 3- d{kk X;kjgoha esa tks vki i<+ pqosQ gSa mlosQ vk/kj ij D;k vki crk ldrs gSa fd vk.kfod vkdkj osQ vk/kj ij ,atkbe cM+s gSa ;k Mh,u,A vki blosQ ckjs esa oSQls irk yxk;saxs\ 4- ekuo dh ,d dksf'kdk esa Mh,u, dh eksyj lkanzrk D;k gksxh\ vius vè;kid ls ijke'kZ yhft,A 5- D;k lqosaQnzdh dksf'kdkvksa esa izfrca/u ,aMksU;wfDy,t feyrs gSa\ vius mÙkj lgh fl¼ dhft,A 6- vPNh gok o feJ.k fo'ks"krk osQ vfrfjDr dh rqyuk esa dkSu lh vU; daiUu ÝykLd lqfo/k,¡ gSa\ 7- f'k{kd ls ijke'kZ dj ik¡p iSfyaMªksfed vuqiz;kl djuk gksxk fd {kkjd&;qXe fu;eksa dk ikyu djrs gq, iSfyaMªksfed vuqozQe cukus osQ mnkgj.k dk irk yxkb,A 8- v/Zlw=kh foHkktu dks è;ku esa j[krs gq, D;k crk ldrs gSa fd iqu;ksZxt Mh,u, fdl voLFkk esa curs gSa\ 9- D;k vki crk ldrs gSa fd izfrosnd (fjiksVZj) ,atkbe dks oj.k;ksX; fpÉu dh mifLFkfr esa ckgjh Mh,u, dks ijiks"kh dksf'kdkvksa esa LFkkukarj.k osQ fy, ekWfuVj djus osQ fy, fdl izdkj mi;ksx esa yk;k tk ldrk S\ 10- fuEufyf[krksa dk laf{kIr o.kZu dhft,& (d) izfrd`rh;u dk mn~Hko ([k) ck;kfsj,DVj (x) vuqizokg lalk/u 11- la{ksi esa crkb, (d) ihlhvkj ([k) izfrca/u ,atkbe vkSj Mh,u, (x) dkbfVust 12- vius vè;kid ls ppkZ djosQ irk yxkb, fd fuEufyf[kr osQ chp oSQls Hksn djsaxs& (d) IykfTeM Mh,u, vkSj xq.klw=kh; Mh,u, ([k) vkj,u, vkSj Mh,u, (x) ,DlksU;wfDy,t vkSj ,aMksU;wfDy,t
उत्तर:
1- iqu;ksZxt izksVhu osQ fpfdRlh; O;ogkj osQ dke mein hota hai, jo ki fpfdRlh; vkS"kf/ osQ :i mein dgk¡ iz;ksx deta hai. Iska udaharan baVjusV hai. 2- Ek lfp=k (pkVZ) yaani ki vkjsf[kr fu:i.k ya lkFk, jo izfrca/u ,atkbe (fozQ;k/kj Mh,u) mein hota hai, usse mlosQ feJ.k ko dkVrk kar mRiUu mRikn n'kkZrk karte hain. 3- d{kk X;kjgoha mein jo vyakti i<+ paata hai, wo vk/kj par atak jata hai ya Mh,u ban jata hai. Isse pata chalta hai ki vk.kfod vkdkj ya vk/kj par ,atkbe cM+s hote hain. 4- Ekuo ke dksf'kdk mein Mh,u ki eksyj lkanzrk hoti hai, jo uske vè;kid se ijke'kZ prapt karti hai. 5- LqosaQnzdh dksf'kdkvksa mein izfrca/u ,aMksU;wfDy,t ka prayog hota hai, jo unke mÙkj lgh fl¼ mein hota hai. 6- vPNh gok aur feJ.k fo'ks"krk osQ vfrfjDr dh rqyuk mein daiUu ÝykLd lqfo/k,¡ hota hai. 7- f'k{kd se ijke'kZ prapt karne ke liye iSfyaMªksfed vuqiz;kl ki avashyakta hoti hai, jisse iSfyaMªksfed vuqozQe ka nirmaan hota hai. 8- v/Zlw=kh foHkktu ko è;ku mein jodne par pata chalta hai ki iqu;ksZxt Mh,u, kisi voLFkk mein curs karta hai. 9- Izfrosnd (fjiksVZj) ,atkbe ko oj.k;ksX; fpÉu mein ckgjh Mh,u, ko ijiks"kh dksf'kdkvksa mein LFkkukarj.k ya ekWfuVj karne ke liye prayog kiya jata hai. 10- FuEufyf[krka ke laf{kIr o.kZu hain: (d) izfrd`rh;u dk mn~Hko ([k) ck;kfsj,DVj (x) vuqizokg lalk/u 11- La{ksi mein shamil hain: (d) ihlhvkj ([k) izfrca/u ,atkbe vkSj Mh,u, (x) dkbfVust 12- Apne vè;kid se ppkZ djosQ irk yxkb kiya jata hai ki fuEufyf[kr osQ chp oSQls Hksn djsakte hain: (d) IykfTeM Mh,u, vkSj xq.klw=kh; Mh,u, ([k) vkj,u, vkSj Mh,u, (x) ,DlksU;wfDy,t vkSj ,aMksU;wfDy,t
व्याख्या:
Prashn 1 se 9 tak subjective prashn hain jo ki jaivik prakriyaon aur unke prabhavon par kendrit hain. Har prashn mein vishesh roop se jaivik tatvon, unke kriyaon, aur prabhavon ka varnan kiya gaya hai. Prashn 10 se 12 tak vibhinn shreniyon mein vargikrit prashn hain jo ki jaivik padarthon aur unke gunon ko samajhne mein madad karte hain. Inka uttar dene ke liye vidyarthi ko jaivik vigyan ke mool siddhanton aur prayogon ki samajh honi chahiye.
Q2.जैव प्रौद्योगिकी के विकास के साथ किन मुख्य नैतिक और सामाजिक पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है?
उत्तर:
जैव प्रौद्योगिकी के विकास के साथ आनुवंशिक संशोधन से उत्पन्न उत्पादों की सुरक्षा, पर्यावरण पर प्रभाव, जैव विविधता की रक्षा, स्वास्थ्य प्रभाव, सामाजिक न्याय, स्वामित्व अधिकार, और जनसामान्य की सहमति जैसे नैतिक और सामाजिक पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।
व्याख्या:
जैव प्रौद्योगिकी के विकास से जुड़े नैतिक और सामाजिक पहलुओं में उत्पादों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता की रक्षा, स्वास्थ्य पर प्रभाव, सामाजिक न्याय, स्वामित्व अधिकार और जनसामान्य की सहमति शामिल हैं। ये सभी पहलू सुनिश्चित करते हैं कि जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग सुरक्षित, न्यायसंगत और समाज के सभी वर्गों के लिए लाभकारी हो।
Q3.जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग में सामाजिक न्याय का क्या महत्व है?
उत्तर:
सामाजिक न्याय यह सुनिश्चित करता है कि जैव प्रौद्योगिकी के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचें और किसी विशेष समूह के साथ भेदभाव न हो। उदाहरण के लिए, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों का लाभ केवल बड़े किसानों तक सीमित न रहकर छोटे किसानों तक भी पहुंचे।
व्याख्या:
सामाजिक न्याय जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लाभों के समान वितरण को सुनिश्चित करता है। इससे समाज में असमानता कम होती है और सभी वर्गों को तकनीकी प्रगति का लाभ मिलता है। यह नैतिकता का एक महत्वपूर्ण पहलू है जो सामाजिक स्थिरता को बढ़ावा देता है।
Q4.जैव प्रौद्योगिकी से उत्पन्न फसलों के स्वास्थ्य पर प्रभावों का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
जैव प्रौद्योगिकी से उत्पन्न फसलों के स्वास्थ्य पर प्रभावों का अध्ययन इसलिए आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये फसलें मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हैं और इनके सेवन से किसी प्रकार की हानि न हो। उदाहरण के लिए, जीन संशोधित फसलों में एलर्जी या विषाक्तता की संभावना की जांच।
व्याख्या:
फसलों के स्वास्थ्य पर प्रभावों का अध्ययन मानव और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। इससे पता चलता है कि संशोधित फसलें सुरक्षित हैं या नहीं, और यदि कोई जोखिम है तो उसे नियंत्रित किया जा सकता है। यह अध्ययन जैव प्रौद्योगिकी के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करता है।
Q5.जैव विविधता की रक्षा जैव प्रौद्योगिकी के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
जैव विविधता की रक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग से प्राकृतिक प्रजातियों और उनके पर्यावरण पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे जैव विविधता कम हो सकती है। उदाहरण के लिए, जीन संशोधित फसलों के फैलाव से प्राकृतिक प्रजातियों पर असर।
व्याख्या:
जैव विविधता की रक्षा जैव प्रौद्योगिकी के सुरक्षित और सतत उपयोग के लिए आवश्यक है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित रहता है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है। जैव प्रौद्योगिकी के विकास में जैव विविधता की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
Q6.जैव प्रौद्योगिकी में स्वामित्व अधिकार का क्या अर्थ है और इसका महत्व क्यों है?
उत्तर:
स्वामित्व अधिकार का अर्थ है जैव प्रौद्योगिकी से उत्पन्न उत्पादों और तकनीकों पर कानूनी अधिकार होना। इसका महत्व इसलिए है ताकि शोधकर्ताओं और कंपनियों को उनके नवाचारों का लाभ मिले और वे अपने उत्पादों की सुरक्षा कर सकें। उदाहरण के लिए, पेटेंट अधिकार।
व्याख्या:
स्वामित्व अधिकार जैव प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि इससे नवाचार को आर्थिक सुरक्षा मिलती है। यह नैतिक और कानूनी पहलू है जो अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देता है।
Q7.जैव प्रौद्योगिकी के विकास और उपयोग में नियम और नैतिकता का पालन क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
नियम और नैतिकता का पालन इसलिए आवश्यक है ताकि जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग सुरक्षित, न्यायसंगत और पर्यावरण के अनुकूल हो। इससे किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव से बचा जा सके और समाज के सभी वर्गों को इसका लाभ मिल सके। उदाहरण के लिए, जैव सुरक्षा कानून।
व्याख्या:
नियम और नैतिकता जैव प्रौद्योगिकी के दुष्प्रभावों को रोकने और इसके सकारात्मक प्रभावों को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं। ये समाज, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
Q8.निम्नलिखित में से कौन सा जैव प्रौद्योगिकी के नैतिक पहलुओं में शामिल नहीं है?
उत्तर:
आर्थिक लाभ कमाना
व्याख्या:
जैव प्रौद्योगिकी के नैतिक पहलुओं में उत्पादों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, और सामाजिक न्याय शामिल हैं। आर्थिक लाभ कमाना एक व्यावसायिक उद्देश्य है, जो नैतिक पहलुओं से अलग है।