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Chapter 8

🎓 Class 11📖 Raajneeti Sidhant📖 9 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
Chapter 7अध्याय 8 / 8

Chapter 8अध्ययन नोट्स

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धर्मनिरपेक्षता क्या है?

व्याख्या

धर्मनिरपेक्षता क्या है?

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है राज्य का किसी एक धर्म को मान्यता न देना और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि राज्य और धर्म के बीच स्पष्ट विभाजन हो, जिससे किसी भी धार्मिक समुदाय के प्रति भेदभाव न हो। इतिहास में देखा गया है कि विभिन्न देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न के उदाहरण मौजूद हैं, जैसे इजरायल में गैर-यहूदी अल्पसंख्यकों की स्थिति, पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की दुर्दशा। भारत में भी धार्मिक आधार पर हिंसा और भेदभाव के कई उदाहरण मिलते हैं, जैसे 1984 के सिख विरोधी दंगे, कश्मीरी पंडितों का पलायन, और 2002 के गुजरात दंगे। ये सभी उदाहरण अंतर-धार्मिक वर्चस्व और धार्मिक उत्पीड़न के रूप हैं। धर्मनिरपेक्षता न केवल अंतर-धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है, बल्कि धर्म के अंदर छिपे वर्चस्व, जैसे जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का भी विरोध करती है। धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य एक ऐसा समाज बनाना है जो धार्मिक वर्चस्व से मुक्त हो, जहाँ सभी धर्मों के प्रति समानता और स्वतंत्रता हो। यह धर्मों के अंदर आजादी और समानता को बढ़ावा देती है। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांत है जो धार्मिक समानता, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देता है।

  • धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है राज्य का किसी धर्म को आधिकारिक मान्यता न देना।
  • यह अंतर-धार्मिक वर्चस्व और धार्मिक उत्पीड़न का विरोध करती है।
  • धर्म के अंदर छिपे भेदभाव, जैसे जाति और लिंग आधारित भेदभाव का भी विरोध करती है।
  • भारत में धार्मिक हिंसा और भेदभाव के उदाहरण धर्मनिरपेक्षता की आवश्यकता को दर्शाते हैं।
  • धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।
  • 📌 धर्मनिरपेक्षता: राज्य का किसी धर्म को आधिकारिक मान्यता न देना और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना।
  • 📌 अंतर-धार्मिक वर्चस्व: एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय पर वर्चस्व स्थापित करना।
  • 📌 अंत:धार्मिक वर्चस्व: किसी धर्म के अंदर छिपा हुआ भेदभाव या वर्चस्व।

धर्मनिरपेक्ष राज्य

व्याख्या

धर्मनिरपेक्ष राज्य

धर्मनिरपेक्ष राज्य वह होता है जो किसी एक धर्म के प्रभाव या नियंत्रण में न हो और सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करे। धार्मिक भेदभाव को रोकने के लिए शिक्षा, साझेदारी, और पारस्परिक सहायता जैसे उपाय सहायक हो सकते हैं, लेकिन केवल ये उपाय पर्याप्त नहीं हैं। आधुनिक समाज में राज्य के पास व्यापक सार्वजनिक शक्ति होती है, इसलिए धार्मिक समानता और टकराव रोकने के लिए राज्य की भूमिका निर्णायक होती है। धर्मनिरपेक्ष राज्य का पहला और आवश्यक गुण है कि वह किसी खास धर्म के पुरोहितों या धार्मिक संस्थाओं द्वारा संचालित न हो। यदि राज्य सत्ता धार्मिक संस्थाओं के अधीन हो, तो वह धर्मतांत्रिक राज्य कहलाता है, जो उत्पीड़न और भेदभाव के लिए जाना जाता है। मध्यकालीन यूरोप में पोप की सत्ता और तालिबानी शासन इसके उदाहरण हैं। धर्मनिरपेक्ष राज्य को न केवल धर्मतांत्रिक होने से इंकार करना चाहिए, बल्कि किसी भी धर्म के साथ औपचारिक कानूनी गठजोड़ से भी बचना चाहिए। धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट संबंध विच्छेद होना चाहिए। इसके साथ ही, धर्मनिरपेक्ष राज्य को शांति, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता, और धार्मिक उत्पीड़न से मुक्ति जैसे मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता के विभिन्न रूप हो सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि राज्य और धर्म के बीच संबंध किस प्रकार स्थापित किए गए हैं और किन मूल्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस संदर्भ में, पश्चिमी और भारतीय मॉडल में भिन्नताएँ देखी जाती हैं, जिन्हें आगे विस्तार से समझा जाएगा।

  • धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी एक धर्म के नियंत्रण में नहीं होता।
  • धर्मतांत्रिक राज्य वह होता है जो धार्मिक संस्थाओं के अधीन होता है।
  • धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट संबंध विच्छेद आवश्यक है।
  • धर्मनिरपेक्ष राज्य शांति, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध होता है।
  • धर्मनिरपेक्षता के विभिन्न रूप हो सकते हैं, जो सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ पर निर्भर करते हैं।
  • 📌 धर्मतांत्रिक राज्य: ऐसा राज्य जो धार्मिक संस्थाओं के नियंत्रण में हो।
  • 📌 संबंध विच्छेद: धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट अलगाव।
  • 📌 धार्मिक स्वतंत्रता: प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता।

धर्मनिरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल

व्याख्या

धर्मनिरपेक्षता का यूरोपीय मॉडल

यूरोपीय धर्मनिरपेक्षता का मुख्य मॉडल अमेरिकी धर्मनिरपेक्षता से प्रेरित है, जिसमें धर्म और राज्य के बीच पारस्परिक निषेध का सिद्धांत अपनाया गया है। इस मॉडल में राज्य धर्म के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता और धर्म भी राज्य के मामलों में दखल नहीं देता। द

अभ्यास प्रश्नChapter 8

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.निम्न में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं? कारण सहित बताइये। (क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना। (ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना। (ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना। (घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना। (ड.) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना। (च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबंधन समितियों की नियुक्ति करना। (छ) किसी मंदिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।

उत्तर:

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है राज्य का किसी एक धर्म को मान्यता न देना और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना। (क) संगत है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता में किसी एक धार्मिक समूह का दूसरे पर वर्चस्व नहीं होता। (ख) असंगत है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता में किसी धर्म को राज्य का धर्म नहीं माना जाता। (ग) संगत है क्योंकि सभी धर्मों को समान आश्रय मिलता है। (घ) असंगत है क्योंकि अनिवार्य प्रार्थना से धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन होता है। (ड) संगत है क्योंकि अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी संस्थाएँ बनाने की अनुमति धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत आती है। (च) असंगत है क्योंकि सरकार का धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में हस्तक्षेप धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है। (छ) संगत है क्योंकि सामाजिक न्याय के लिए सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक है और यह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के अनुरूप है।

व्याख्या:

धर्मनिरपेक्षता का मूल सिद्धांत है कि राज्य किसी धर्म को विशेष स्थान न दे और सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करे। इसलिए जो बातें किसी धर्म को विशेष अधिकार या वर्चस्व देती हैं, वे धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ हैं। वहीं, जो बातें सभी धर्मों को समान अधिकार देती हैं या सामाजिक न्याय के लिए हस्तक्षेप करती हैं, वे धर्मनिरपेक्षता के अनुरूप हैं।

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Q2.धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ। | पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता | भारतीय धर्मनिरपेक्षता | | --- | --- | | धर्म और राज्य का एक दूसरे के मामले में हस्तक्षेप न करने की अटल नीति | राज्य द्वारा समर्थित धार्मिक सुधारों की अनुमति | | विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समानता एक मुख्य सरोकार होना | एक धर्म के भिन्न पंथों के बीच समानता पर जोर देना | | अल्पसंख्यक अधिकारों पर ध्यान देना। | समुदाय आधारित अधिकारों पर कम ध्यान देना | | व्यक्ति और उसके अधिकारों को केंद्रीय महत्व दिया जाना | व्यक्ति और धार्मिक समुदायों दोनों के अधिकारों का संरक्षण |

उत्तर:

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ: - धर्म और राज्य का एक-दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप न करना। - विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समानता पर जोर। - अल्पसंख्यक अधिकारों पर विशेष ध्यान। - व्यक्ति और उसके अधिकारों को केंद्रीय महत्व देना। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ: - राज्य द्वारा धार्मिक सुधारों का समर्थन। - एक धर्म के भिन्न पंथों के बीच समानता पर जोर। - समुदाय आधारित अधिकारों पर कम ध्यान। - व्यक्ति और धार्मिक समुदायों दोनों के अधिकारों का संरक्षण। इस प्रकार, पश्चिमी मॉडल अधिक व्यक्तिगत अधिकारों और धर्म-राज्य पृथक्करण पर केंद्रित है, जबकि भारतीय मॉडल धर्मों के बीच सामंजस्य और समुदायों के अधिकारों के संरक्षण पर अधिक बल देता है।

व्याख्या:

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट दूरी होती है और व्यक्तिगत अधिकारों को प्राथमिकता दी जाती है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता में धर्मों के बीच सामंजस्य और समुदायों के अधिकारों का संरक्षण अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए दोनों मॉडल की विशेषताओं को स्पष्ट रूप से अलग करना आवश्यक है।

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Q3.धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जा सकती है।

उत्तर:

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है राज्य का किसी धर्म को विशेष स्थान न देना और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना। यह एक राजनीतिक और सामाजिक सिद्धांत है जो धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट दूरी बनाए रखता है। धार्मिक सहनशीलता का अर्थ है विभिन्न धर्मों और उनकी मान्यताओं के प्रति सहिष्णुता और सम्मान। यह एक नैतिक और सामाजिक गुण है जो लोगों को एक-दूसरे के धर्मों का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है। धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सहनशीलता दोनों संबंधित हैं लेकिन समान नहीं हैं। धर्मनिरपेक्षता एक संस्थागत और कानूनी व्यवस्था है जबकि धार्मिक सहनशीलता व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार है। इसलिए उनकी बराबरी पूरी तरह नहीं की जा सकती, लेकिन दोनों एक-दूसरे को पूरक करते हैं।

व्याख्या:

धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सहनशीलता दोनों धर्मों के बीच समानता और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। धर्मनिरपेक्षता राज्य के स्तर पर धर्मों के बीच निष्पक्षता सुनिश्चित करती है, जबकि धार्मिक सहनशीलता समाज में व्यक्तिगत स्तर पर सहिष्णुता को बढ़ावा देती है। इसलिए दोनों के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

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Q4.क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए। (क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है। (ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अंदर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है। (ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।

उत्तर:

(क) असहमत। धर्मनिरपेक्षता धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति देती है, बस यह सुनिश्चित करती है कि राज्य किसी धर्म को विशेष स्थान न दे। (ख) सहमत। धर्मनिरपेक्षता धार्मिक समुदायों के बीच समानता और असमानता के खिलाफ है। (ग) असहमत। धर्मनिरपेक्षता का विचार पश्चिमी और ईसाई समाज में विकसित हुआ लेकिन भारत ने इसे अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार अपनाया है, इसलिए यह भारत के लिए उपयुक्त है।

व्याख्या:

धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित करना है, न कि धार्मिक पहचान को खत्म करना। यह सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखता है और असमानता के खिलाफ है। भारत ने धर्मनिरपेक्षता को अपनी विविधता के अनुरूप अपनाया है।

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Q5.भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन् उससे अधिक किन्ही बातों पर है। इस कथन को समझाइये।

उत्तर:

भारतीय धर्मनिरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के अलगाव पर आधारित नहीं है। यह धर्मों के बीच सहिष्णुता, धार्मिक समुदायों के अधिकारों का संरक्षण, और सामाजिक न्याय पर भी जोर देती है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है सभी धर्मों को समान सम्मान देना और उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करना, साथ ही धार्मिक सुधारों और सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करना। इसलिए यह एक सक्रिय और समावेशी दृष्टिकोण है जो केवल अलगाव से अधिक है।

व्याख्या:

पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में धर्म और राज्य का पूर्ण अलगाव होता है, जबकि भारतीय धर्मनिरपेक्षता में धर्मों के बीच सहिष्णुता, सामाजिक न्याय और धार्मिक समुदायों के अधिकारों का संरक्षण भी शामिल है। इसलिए भारतीय मॉडल अधिक व्यापक और सक्रिय है।

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Q6.‘सैद्धांतिक दूरी’ क्या है? उदाहरण सहित समझाइये।

उत्तर:

सैद्धांतिक दूरी का अर्थ है कि राज्य और धर्म के बीच एक स्पष्ट और सिद्धांतगत दूरी हो, जिससे वे एक-दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप न करें। उदाहरण के लिए, पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में धर्म और राज्य पूरी तरह अलग होते हैं, जहाँ राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता और धर्म भी राज्य के मामलों में नहीं। भारतीय संदर्भ में, सैद्धांतिक दूरी का अर्थ यह नहीं कि धर्म और राज्य पूरी तरह अलग हों, बल्कि कि वे सह-अस्तित्व में हों और एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करें।

व्याख्या:

सैद्धांतिक दूरी का तात्पर्य धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट सीमा से है, ताकि दोनों स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें। पश्चिमी मॉडल में यह दूरी अधिक कठोर होती है, जबकि भारतीय मॉडल में यह दूरी लचीली और सहिष्णु होती है।

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Q7.धर्मनिरपेक्षता की मूल परिभाषा क्या है?
A.A) राज्य का किसी एक धर्म को मान्यता देना
B.B) राज्य का सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना
C.C) राज्य का धर्म के मामलों में पूर्ण हस्तक्षेप करना
D.D) राज्य का किसी धर्म को राजधर्म घोषित करना

उत्तर:

राज्य का सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखना

व्याख्या:

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य किसी एक धर्म को मान्यता न देते हुए सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखता है। इससे धार्मिक भेदभाव से बचा जाता है और सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलते हैं।

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Q8.नीचे दिए गए उदाहरणों में से कौन सा अंतर-धार्मिक वर्चस्व का उदाहरण है? 1) 1984 के सिख विरोधी दंगे 2) दलितों का मंदिरों में प्रवेश वर्जित होना 3) कश्मीरी पंडितों का पलायन 4) हिंदू महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश वर्जित होना
A.A) 1 और 3
B.B) 2 और 4
C.C) 1, 2 और 3
D.D) 3 और 4

उत्तर:

1 और 3

व्याख्या:

अंतर-धार्मिक वर्चस्व का मतलब है एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे धार्मिक समुदाय पर वर्चस्व या उत्पीड़न। 1984 के सिख विरोधी दंगे और कश्मीरी पंडितों का पलायन ऐसे उदाहरण हैं जहाँ एक धार्मिक समुदाय को दूसरे समुदाय द्वारा निशाना बनाया गया। जबकि 2 और 4 धर्म के अंदर वर्चस्व के उदाहरण हैं।

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