Chapter 8
Chapter 8 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 11 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
परिचय
व्याख्यापरिचय
इस खंड में अभिप्रेरणा एवं संवेग के महत्व को समझाया गया है। सुनीता, हेमंत और अमन के उदाहरणों के माध्यम से यह बताया गया है कि मानव व्यवहार में अभिप्रेरणा की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। प्रत्येक व्यवहार के पीछे कोई न कोई अभिप्रेरक होता है जो व्यक्ति को लक्ष्य की ओर प्रेरित करता है। व्यवहार लक्ष्य-निर्धारित होता है और तब तक चलता रहता है जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। यदि लक्ष्य प्राप्ति में विफलता होती है तो व्यक्ति के संवेग प्रभावित होते हैं, जैसे दुख या क्रोध। इस अध्याय में अभिप्रेरणा और संवेग के मूल संप्रत्ययों, उनके विकास, कुंठा एवं द्वंद्व, संवेगों की अभिव्यक्ति, सांस्कृतिक प्रभाव, और संवेग प्रबंधन की विधियों का अध्ययन किया जाएगा।
- अभिप्रेरणा वह मानसिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
- व्यवहार लक्ष्य-निर्धारित होता है और लक्ष्य प्राप्ति तक चलता रहता है।
- अभिप्रेरक व्यवहार के कारण होते हैं जो लक्ष्य की ओर प्रेरित करते हैं।
- अभिप्रेरणा और संवेग दोनों व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
- इस अध्याय में कुंठा, द्वंद्व, संवेगों की अभिव्यक्ति और प्रबंधन पर भी चर्चा होगी।
- 📌 अभिप्रेरणा: वह मानसिक प्रक्रिया जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है।
- 📌 अभिप्रेरक: वे कारण जो व्यवहार को प्रेरित करते हैं।
- 📌 संवेग: मन और शरीर में होने वाली मनोवैज्ञानिक अवस्था।
अभिप्रेरणा का स्वरूप
व्याख्याअभिप्रेरणा का स्वरूप
अभिप्रेरणा का संप्रत्यय यह बताता है कि व्यवहार में गति कैसे आती है। अंग्रेजी शब्द 'Motivation' लैटिन शब्द 'movere' से बना है, जिसका अर्थ है 'चलना' या 'गति'। हमारे दैनिक व्यवहारों के पीछे अभिप्रेरक होते हैं जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, विद्यालय जाना ज्ञान प्राप्ति, मित्र बनाना, अच्छी नौकरी पाना या माता-पिता को प्रसन्न करना जैसे विभिन्न कारणों से हो सकता है। अभिप्रेरक व्यवहारों का पूर्वानुमान करने में मदद करते हैं। यदि किसी व्यक्ति में उपलब्धि की तीव्र अभिप्रेरणा हो तो वह विभिन्न क्षेत्रों में कड़ी मेहनत करेगा। अभिप्रेरक वे सामान्य स्थितियाँ हैं जिनके आधार पर हम विभिन्न परिस्थितियों में व्यवहार का पूर्वानुमान कर सकते हैं। अभिप्रेरणा में मूल प्रवृत्तियाँ, अंतर्नोद, आवश्यकताएँ, लक्ष्य और उत्प्रेरक शामिल होते हैं।
- अभिप्रेरणा व्यवहार में गति लाती है।
- अभिप्रेरक व्यवहार के कारण होते हैं जो व्यक्ति को प्रेरित करते हैं।
- व्यवहार लक्ष्य-निर्धारित होता है और अभिप्रेरक लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।
- अभिप्रेरक व्यवहार का पूर्वानुमान करने में सहायक होते हैं।
- अभिप्रेरणा में अंतर्नोद, आवश्यकताएँ, लक्ष्य और उत्प्रेरक शामिल हैं।
- 📌 अभिप्रेरणा: व्यवहार में गति लाने वाली मानसिक प्रक्रिया।
- 📌 अभिप्रेरक: व्यवहार को प्रेरित करने वाले कारण।
- 📌 आवश्यकता: किसी वस्तु या स्थिति की कमी जो अंतर्नोद उत्पन्न करती है।
अभिप्रेरकों के प्रकार
व्याख्याअभिप्रेरकों के प्रकार
अभिप्रेरक दो प्रकार के होते हैं: जैविक (शरीरक्रियात्मक) और मनोसामाजिक। जैविक अभिप्रेरक मुख्यतः शरीर के अंदरूनी तंत्रों पर निर्भर करते हैं, जैसे भूख, प्यास, और काम-वृत्ति। ये जन्मजात होते हैं और जीव के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक होते हैं। मनोसामाजिक अ
अभ्यास प्रश्न — Chapter 8
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. अभिप्रेरणा के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अभिप्रेरणा किसी विशेष लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट सतत व्यवहार की प्रक्रिया है, जो किन्हीं अंतर्नोद शक्तियों का नतीजा होती है। यह वह मानसिक प्रक्रिया है जो किसी व्यक्ति को किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है। अभिप्रेरणा के अंतर्गत व्यक्ति की आवश्यकताएँ, इच्छाएँ, लक्ष्य और उद्देश्य आते हैं जो उसके व्यवहार को दिशा देते हैं।
व्याख्या:
अभिप्रेरणा का अर्थ है किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति के अंदर उत्पन्न होने वाली प्रेरणा और ऊर्जा। यह व्यवहार को सक्रिय और निर्देशित करती है।
Q2.2. भूख तथा प्यास की आवश्यकताओं के जैविक आधार क्या हैं?
उत्तर:
भूख और प्यास की आवश्यकताएँ जैविक अभिप्रेरणाओं के अंतर्गत आती हैं। भूख का जैविक आधार शरीर में ऊर्जा की कमी को महसूस करना है, जो मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस द्वारा नियंत्रित होता है। प्यास का आधार शरीर में जल की कमी को महसूस करना है, जो शरीर के द्रव संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। ये दोनों आवश्यकताएँ जीव के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं और इनके कारण व्यक्ति भोजन और जल की ओर प्रेरित होता है।
व्याख्या:
भूख और प्यास जैविक आवश्यकताएँ हैं जो शरीर की आंतरिक स्थिति के अनुसार उत्पन्न होती हैं। मस्तिष्क के उपवल्कुटीय तंत्र (hypothalamus) में स्थित केंद्र इन आवश्यकताओं को नियंत्रित करते हैं।
Q3.3. किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताएँ कैसे प्रभावित करती हैं? उदाहरणों के साथ समझाइए।
उत्तर:
किशोरों के व्यवहारों में उपलब्धि की आवश्यकता उन्हें लक्ष्य प्राप्ति और सफलता की ओर प्रेरित करती है, जैसे परीक्षा में अच्छा अंक प्राप्त करना। संबंधन की आवश्यकता उन्हें मित्रता, परिवार और सामाजिक समूहों के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है। शक्ति की आवश्यकता उन्हें नेतृत्व, प्रभाव और नियंत्रण की इच्छा देती है, जैसे समूह में नेतृत्व करना। उदाहरण के लिए, एक छात्र जो परीक्षा में सफलता चाहता है, वह उपलब्धि की आवश्यकता से प्रेरित है; जो अपने दोस्तों के साथ अच्छा संबंध बनाना चाहता है, वह संबंधन की आवश्यकता से प्रेरित है; और जो समूह में नेतृत्व करना चाहता है, वह शक्ति की आवश्यकता से प्रेरित है।
व्याख्या:
किशोरों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ उनके व्यवहार को प्रभावित करती हैं। उपलब्धि, संबंधन और शक्ति की आवश्यकताएँ उनके लक्ष्य, सामाजिक संबंध और प्रभाव की इच्छा को दर्शाती हैं।
Q4.4. मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार क्या हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम का प्राथमिक विचार यह है कि मानव की आवश्यकताएँ एक क्रम में होती हैं, जो सबसे मूलभूत शारीरिक आवश्यकताओं से शुरू होकर उच्चतर मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं तक जाती हैं। इस पदानुक्रम में पाँच स्तर होते हैं: (1) शारीरिक आवश्यकताएँ (जैसे भूख, प्यास), (2) सुरक्षा की आवश्यकताएँ (जैसे आश्रय, सुरक्षा), (3) प्रेम और संबंध की आवश्यकताएँ (जैसे मित्रता, परिवार), (4) सम्मान की आवश्यकताएँ (जैसे आत्म-सम्मान, दूसरों का सम्मान), और (5) आत्म-सिद्धि की आवश्यकताएँ (जैसे स्वयं का विकास और पूर्णता)। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति पहले अपनी भूख और सुरक्षा की आवश्यकताओं को पूरा करता है, फिर मित्रता और सम्मान की ओर बढ़ता है, अंत में आत्म-सिद्धि की ओर अग्रसर होता है।
व्याख्या:
मैस्लो ने मानव आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित किया है, जहाँ निचले स्तर की आवश्यकताएँ पूरी होने पर ही व्यक्ति उच्चतर आवश्यकताओं की ओर बढ़ता है।
Q5.5. संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को प्रभावित करती है क्योंकि प्रत्येक संस्कृति के अपने सामाजिक नियम, मूल्य और मान्यताएँ होती हैं जो यह निर्धारित करती हैं कि कौन से संवेग कब, कहाँ और कैसे व्यक्त किए जाएँ। कुछ संस्कृतियाँ संवेगों की खुली अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करती हैं, जबकि अन्य में इसे नियंत्रित या दबाया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ संस्कृतियों में क्रोध को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना अस्वीकार्य माना जाता है, जबकि अन्य में इसे स्वाभाविक माना जाता है। इस प्रकार, संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति के तरीके, मात्रा और अवधि को निर्धारित करती है।
व्याख्या:
संस्कृति के सामाजिक और सांस्कृतिक नियम संवेगों की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं, जिससे व्यक्ति अपने संवेगों को उस संस्कृति के अनुरूप व्यक्त करता है।
Q6.6. निषेधात्मक संवेगों का प्रबंधन क्यों महत्वपूर्ण है? निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय सुझाइए।
उत्तर:
निषेधात्मक संवेगों जैसे क्रोध, भय, और विरुचि का प्रबंधन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये संवेग यदि अत्यधिक या अनुपयुक्त रूप से व्यक्त हों तो व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं। ये संवेग तनाव, चिंता, और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन के लिए उपाय हैं: (1) अपने विचारों की शक्ति को पहचानना, (2) स्वयं को नियंत्रित करना, (3) नकारात्मक आत्म-संवाद से बचना, (4) दूसरों के इरादों को गलत न समझना, (5) अतार्किक विश्वासों को न बढ़ावा देना, (6) क्रोध को रचनात्मक तरीके से व्यक्त करना, (7) अपने भीतर झाँकना और स्वयं में परिवर्तन लाने के लिए समय देना।
व्याख्या:
निषेधात्मक संवेगों का नियंत्रण व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। उचित प्रबंधन से व्यक्ति तनावमुक्त रहता है और सामाजिक संबंध बेहतर होते हैं।
Q7.1. मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम का उपयोग करते हुए विश्लेषण कीजिए कि महान गणितज्ञ एस.ए. रामानुजन तथा महान संगीताचार्य शहनाई वादक उस्ताद बिसमिल्लाह खान (भारत रत्न) को अपने-अपने क्षेत्रों में अति विशिष्ट निष्पादन के लिए किस प्रकार की अभिप्रेरक शक्तियों ने अभिप्रेरित किया होगा। अब अपने आपको तथा पाँच अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों को आवश्यकता संतुष्टि की परिस्थिति में रखिए। चिंतन और चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम के अनुसार, रामानुजन और उस्ताद बिसमिल्लाह खान ने अपने क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए उच्चतर आवश्यकताओं जैसे आत्म-सिद्धि की आवश्यकता से प्रेरणा प्राप्त की होगी। उनकी मूलभूत आवश्यकताएँ जैसे भोजन, सुरक्षा, प्रेम और सम्मान पहले पूरी हो चुकी थीं, जिससे वे अपने कौशल और प्रतिभा के विकास पर ध्यान केंद्रित कर सके। आत्म-सिद्धि की आवश्यकता ने उन्हें अपने कार्य में पूर्णता और नवीनता की ओर प्रेरित किया। इसी प्रकार, स्वयं और अन्य पाँच प्रसिद्ध व्यक्तियों को आवश्यकता संतुष्टि की स्थिति में रखकर यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार विभिन्न आवश्यकताएँ उनके व्यवहार और उपलब्धियों को प्रभावित करती हैं।
व्याख्या:
आत्म-सिद्धि की आवश्यकता व्यक्ति को अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने और उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। रामानुजन और उस्ताद बिसमिल्लाह खान ने इसी प्रेरणा से अपने क्षेत्रों में महानता हासिल की।
Q8.2. बहुत से घरों में लोग बिना नहाए भोजन नहीं करते तथा धार्मिक ब्रत रखते हैं। आपको भूख तथा प्यास की अभिव्यक्ति को विभिन्न सामाजिक रीतिरिवाजों ने कैसे प्रभावित किया है? विभिन्न पृष्ठभूमि के पाँच लोगों पर सर्वेक्षण करके एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के उत्तर में सामाजिक रीतिरिवाजों का भूख और प्यास की अभिव्यक्ति पर प्रभाव समझाया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ संस्कृतियों में भोजन से पहले हाथ धोना या स्नान करना आवश्यक होता है, जो स्वच्छता और धार्मिक विश्वासों से जुड़ा होता है। धार्मिक ब्रत जैसे व्रत रखना भी भूख की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है। सर्वेक्षण में विभिन्न पृष्ठभूमि के पाँच व्यक्तियों से उनके भोजन और प्यास के संबंध में सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं के बारे में जानकारी ली जाती है और एक रिपोर्ट तैयार की जाती है जिसमें उनके अनुभव और सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण होता है।
व्याख्या:
सामाजिक और धार्मिक रीतिरिवाज व्यक्ति के भूख और प्यास की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं। सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी से यह समझा जा सकता है कि ये प्रथाएँ कैसे व्यवहार को नियंत्रित करती हैं।
Manovigyan के सभी 8 अध्याय
Psychology · Class 11