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Chapter 8

🎓 Class 12📖 Bharat main Samajik Parivartan aur Vikas📖 11 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~17 मिनट
Chapter 7अध्याय 8 / 8

Chapter 8अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 11 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

8 सामाजिक आंदोलन

व्याख्या

8 सामाजिक आंदोलन

सामाजिक आंदोलन वे संगठित प्रयास होते हैं जो समाज में व्यापक परिवर्तन लाने या सामाजिक अन्याय, असमानता, शोषण आदि के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए किए जाते हैं। ये आंदोलन केवल असंगठित विरोध या स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन नहीं होते, बल्कि इनमें नेतृत्व, संगठन, विचारधारा और सामूहिक लक्ष्य स्पष्ट होते हैं। सामाजिक आंदोलन समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों, जनजातियों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों आदि के हितों और अधिकारों की रक्षा तथा सामाजिक न्याय स्थापित करने के लिए होते हैं। ये आंदोलन सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों, आर्थिक व्यवस्था और राजनीतिक संस्थानों में परिवर्तन लाने का माध्यम होते हैं। भारत में सामाजिक आंदोलनों का इतिहास प्राचीन काल से है, लेकिन आधुनिक अर्थों में ये आंदोलन औपनिवेशिक काल से विशेष रूप से सक्रिय हुए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी सामाजिक आंदोलनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी सामाजिक आंदोलन समाज के विकास, लोकतंत्र की मजबूती और मानवाधिकारों की रक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। सामाजिक आंदोलन न केवल समाज को बदलते हैं बल्कि अन्य आंदोलनों को भी प्रेरणा देते हैं।

  • सामाजिक आंदोलन संगठित और निरंतर सामूहिक प्रयास होते हैं।
  • इनका उद्देश्य समाज में व्यापक परिवर्तन लाना या अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना होता है।
  • सामाजिक आंदोलन में नेतृत्व, संगठन और साझा विचारधारा होती है।
  • भारत में सामाजिक आंदोलन औपनिवेशिक काल से सक्रिय हुए।
  • ये आंदोलन समाज के विभिन्न वर्गों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
  • सामाजिक आंदोलन समाज को बदलने के साथ-साथ अन्य आंदोलनों को प्रेरित करते हैं।
  • 📌 सामाजिक आंदोलन: समाज में परिवर्तन लाने के लिए संगठित सामूहिक प्रयास।
  • 📌 सामूहिकता: एक साथ मिलकर कार्य करना।
  • 📌 नेतृत्व: आंदोलन का मार्गदर्शन।

8.1 सामाजिक आंदोलन के लक्षण

व्याख्या

8.1 सामाजिक आंदोलन के लक्षण

सामाजिक आंदोलन के कुछ विशिष्ट लक्षण होते हैं जो उन्हें अन्य असंगठित विरोधों से अलग करते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है लंबी अवधि तक निरंतर सामूहिक गतिविधियाँ, जो प्रायः राज्य के विरुद्ध होती हैं और राज्य की नीतियों में परिवर्तन की मांग करती हैं। सामाजिक आंदोलन में संगठन की उपस्थिति आवश्यक होती है, जिसमें नेतृत्व, संरचना, निर्णय प्रक्रिया और सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंध शामिल होते हैं। इसके अलावा, आंदोलन में भाग लेने वाले लोगों के उद्देश्य और विचारधारा में समानता होती है। सामाजिक आंदोलन की एक सामान्य अभिमुखता होती है, जो किसी परिवर्तन को लाने या रोकने के लिए होती है। ये लक्षण आंदोलन की जीवन अवधि के दौरान बदल सकते हैं। सामाजिक आंदोलन प्रायः जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होते हैं, जैसे कि जनजातीय अधिकार, विस्थापन के विरुद्ध संघर्ष, सामाजिक न्याय आदि। इसके विपरीत, कभी-कभी प्रतिरोधी आंदोलन भी जन्म लेते हैं जो यथास्थिति बनाए रखने के लिए होते हैं। उदाहरण के लिए, सती प्रथा के विरोध में राजा राममोहन राय के सुधारों के खिलाफ धर्म सभा का गठन। सामाजिक आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी उपाय भी अपनाए जाते हैं, लेकिन समय के साथ परिवर्तन अवश्य होते हैं।

  • लंबी अवधि तक निरंतर सामूहिक गतिविधियाँ सामाजिक आंदोलन की पहचान हैं।
  • आंदोलन में संगठन, नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया होती है।
  • सामाजिक आंदोलन में समान उद्देश्य और विचारधारा वाले लोग शामिल होते हैं।
  • आंदोलन प्रायः राज्य की नीतियों में परिवर्तन की मांग करते हैं।
  • प्रतिरोधी आंदोलन भी सामाजिक आंदोलन के विरोध में उत्पन्न हो सकते हैं।
  • सामाजिक आंदोलन को दबाने के प्रयास होते हैं, लेकिन परिवर्तन होते हैं।
  • 📌 सामाजिक आंदोलन के लक्षण: संगठन, नेतृत्व, समान उद्देश्य, निरंतरता।
  • 📌 प्रतिरोधी आंदोलन: यथास्थिति बनाए रखने के लिए विरोध।

सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक आंदोलन में अंतर

व्याख्या

सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक आंदोलन में अंतर

सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक आंदोलन दोनों समाज में बदलाव से संबंधित हैं, लेकिन इनमें महत्वपूर्ण अंतर है। सामाजिक परिवर्तन एक सतत और व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिसमें असंख्य व्यक्तियों और समूहों की गतिविधियाँ शामिल होती हैं। यह परिवर्तन धीरे-धीरे हो

अभ्यास प्रश्नChapter 8

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहाँ कोई सामाजिक आंदोलन न हुआ हो, चर्चा करें। ऐसे समाज की कल्पना आप कैसे करते हैं, इसका भी आप वर्णन कर सकते हैं। 2. निम्न पर लघु टिप्पणी लिखें— - महिलाओं के आंदोलन - जनजातीय आंदोलन 3. भारत में पुराने तथा नए सामाजिक आंदोलनों में स्पष्ट भेद करना कठिन है। 4. पर्यावरणीय आंदोलन प्राय: आर्थिक एवं पहचान के मुद्दों को भी साथ लेकर चलते है, विवेचना कीजिए। 5. कृषक एवं नव किसान आंदोलनों के मध्य अंतर बताइए।

उत्तर:

1. ऐसे समाज की कल्पना करें जहाँ सामाजिक आंदोलन न हुआ हो, तो वह समाज संभवतः सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत नहीं होगा। सामाजिक असमानताएँ, अन्याय, और उत्पीड़न लंबे समय तक बिना चुनौती के बने रहेंगे। ऐसे समाज में सामाजिक गतिशीलता कम होगी और सामाजिक संरचनाएँ स्थिर बनी रहेंगी। सामाजिक आंदोलनों के अभाव में सामाजिक जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई कमजोर होगी। 2. लघु टिप्पणियाँ: - महिलाओं के आंदोलन: महिलाओं के आंदोलन ने लैंगिक समानता, अधिकारों की मांग, और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया है। इन आंदोलनों ने दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न जैसे मुद्दों को उजागर किया और कानूनी सुधारों में योगदान दिया। - जनजातीय आंदोलन: जनजातीय आंदोलन ने आदिवासियों के अधिकारों, भूमि संरक्षण, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक न्याय की मांग की है। ये आंदोलन अक्सर आर्थिक शोषण और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध होते हैं। 3. भारत में पुराने और नए सामाजिक आंदोलनों में स्पष्ट भेद करना कठिन है क्योंकि दोनों में कई समानताएँ हैं जैसे कि सामाजिक न्याय की मांग, उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष, और पहचान की लड़ाई। हालांकि नए आंदोलन अधिक स्वायत्त और विविध मुद्दों पर केंद्रित होते हैं, जबकि पुराने आंदोलन राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार पर केंद्रित थे। 4. पर्यावरणीय आंदोलन आर्थिक और पहचान के मुद्दों को साथ लेकर चलते हैं क्योंकि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े निर्णयों का प्रभाव स्थानीय समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान पर पड़ता है। आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होता है। इसलिए ये आंदोलन सामाजिक न्याय, आर्थिक अधिकार और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ते हैं। 5. कृषक और नव किसान आंदोलनों के मध्य अंतर: - कृषक आंदोलन पारंपरिक किसानों द्वारा भूमि अधिकार, कृषि मजदूरी, और उत्पादन संबंधी मुद्दों पर आधारित होते हैं। - नव किसान आंदोलन नए कृषि तकनीकों, बाजार की चुनौतियों, और आधुनिक कृषि नीतियों के संदर्भ में उभरते हैं। ये अधिक संगठित और राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय होते हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सामाजिक आंदोलन के सिद्धांतों, इतिहास और वर्तमान संदर्भों के आधार पर दिया गया है। प्रश्न 1 में समाज की कल्पना और सामाजिक आंदोलन की भूमिका पर चर्चा की गई है। प्रश्न 2 में महिलाओं और जनजातीय आंदोलनों के महत्व को संक्षेप में समझाया गया है। प्रश्न 3 में पुराने और नए आंदोलनों के बीच समानताओं और भेदों का विश्लेषण किया गया है। प्रश्न 4 में पर्यावरणीय आंदोलन के बहुआयामी पहलुओं को समझाया गया है। प्रश्न 5 में कृषक और नव किसान आंदोलनों के बीच के मुख्य अंतर बताए गए हैं।

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Q2.सामाजिक आंदोलन क्या होते हैं? उनके मुख्य लक्षण क्या हैं जो उन्हें असंगठित विरोध से अलग करते हैं?

उत्तर:

सामाजिक आंदोलन वे संगठित प्रयास होते हैं जो समाज में व्यापक परिवर्तन लाने या अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। इनके लक्षण हैं: लंबी अवधि तक निरंतर सामूहिक गतिविधियाँ, संगठन जिसमें नेतृत्व और संरचना होती है, समान उद्देश्य और विचारधारा, तथा परिवर्तन या प्रतिरोध की अभिमुखता। उदाहरण के लिए, दलित अधिकारों के लिए चलाए गए आंदोलन।

व्याख्या:

सामाजिक आंदोलन केवल असंगठित विरोध नहीं होते बल्कि उनमें नेतृत्व, संगठन और सामूहिक लक्ष्य होते हैं। ये आंदोलन प्रायः राज्य की नीतियों में परिवर्तन की माँग करते हैं और जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होते हैं। इनके लक्षण आंदोलन की जीवन अवधि में बदल सकते हैं।

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Q3.भारतीय संविधान में सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार का क्या महत्व है? इसे ब्रिटिश शासन के समय के मताधिकार से कैसे अलग समझा जाता है?

उत्तर:

सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार प्रत्येक व्यस्क को मतदान का अधिकार देता है, जिससे हम अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। ब्रिटिश शासन में मताधिकार सीमित था और केवल संपत्ति रखने वालों को मिलता था, जबकि भारतीय संविधान में सभी व्यस्कों को समान अधिकार मिला। उदाहरण के लिए, महिलाओं को भी मतदान का अधिकार मिला।

व्याख्या:

भारतीय संविधान ने सभी व्यस्कों को मतदान का अधिकार दिया जो लोकतंत्र की आधारशिला है। ब्रिटेन में 19वीं सदी में भी सभी को मताधिकार नहीं था। चार्टरवाद आंदोलन ने सार्वभौमिक मताधिकार की माँग की थी। भारत में यह अधिकार स्वतंत्रता के बाद सुनिश्चित हुआ।

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Q4.निम्नलिखित में से कौन सा सामाजिक आंदोलन का लक्षण नहीं है? A) असंगठित और स्वत:स्फूर्त विरोध B) नेतृत्व और संगठन की उपस्थिति C) समान उद्देश्य और विचारधारा D) राज्य की नीतियों में परिवर्तन की माँग
A.A) असंगठित और स्वत:स्फूर्त विरोध
B.B) नेतृत्व और संगठन की उपस्थिति
C.C) समान उद्देश्य और विचारधारा
D.D) राज्य की नीतियों में परिवर्तन की माँग

उत्तर:

असंगठित और स्वत:स्फूर्त विरोध

व्याख्या:

सामाजिक आंदोलन में असंगठित और स्वत:स्फूर्त विरोध शामिल नहीं होता क्योंकि आंदोलन में नेतृत्व, संगठन और समान उद्देश्य आवश्यक होते हैं। असंगठित विरोध सामाजिक आंदोलन की परिभाषा में नहीं आता।

Easy
Q5.नीचे दिए गए चित्र में 1930 में गांधीजी नमक कानून तोड़ते हुए दिखाए गए हैं। इस घटना का सामाजिक आंदोलन के संदर्भ में क्या महत्व है? (चित्र में महिलाएँ नमक की कड़ाही में लवण-जल डालती हुई दिख रही हैं।)

उत्तर:

यह घटना सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें गांधीजी ने ब्रिटिश नमक कानून का उल्लंघन कर औपनिवेशिक कर नीति के खिलाफ प्रतिरोध किया। यह आंदोलन अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित था और स्वतंत्रता संग्राम में जनता को संगठित करने का माध्यम बना।

व्याख्या:

1930 में गांधीजी द्वारा नमक कानून तोड़ना ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रत्यक्ष चुनौती थी। इस आंदोलन ने आम जनता को ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध संगठित किया और अहिंसात्मक प्रतिरोध की नई राह दिखाई। महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक बनाया।

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Q6.सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक आंदोलन में क्या अंतर है? एक उदाहरण के साथ समझाइए।

उत्तर:

सामाजिक परिवर्तन समाज में धीरे-धीरे होने वाला व्यापक बदलाव है, जबकि सामाजिक आंदोलन संगठित प्रयास होते हैं जो विशिष्ट उद्देश्य के लिए संघर्ष करते हैं। उदाहरण के लिए, संस्कृतीकरण सामाजिक परिवर्तन है, जबकि राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोध सामाजिक आंदोलन है।

व्याख्या:

सामाजिक परिवर्तन सतत और व्यापक होता है, जिसमें कई व्यक्तियों और गतिविधियों का योगदान होता है। सामाजिक आंदोलन विशिष्ट लक्ष्य के लिए संगठित और निरंतर प्रयास होते हैं। आंदोलन सामाजिक परिवर्तन को तीव्र करते हैं और कभी-कभी उसका कारण भी बनते हैं।

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Q7.नीचे दिए गए चित्र में 1930 में चौथे सत्र में ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस की बैठक में सरोजिनी नायडू और अन्य महिला आंदोलनकारी बैठी हैं। इस तस्वीर से सामाजिक आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर क्या समझ बनती है?

उत्तर:

यह तस्वीर दिखाती है कि महिलाओं ने भी सामाजिक आंदोलनों में नेतृत्व और सक्रिय भागीदारी निभाई है, जैसे कि महिला मताधिकार और शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष। सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं ने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।

व्याख्या:

ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस महिलाओं के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच था। इसमें महिलाओं ने मताधिकार, शिक्षा और सामाजिक सुधारों के लिए संगठित प्रयास किए। इस तस्वीर से सामाजिक आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भूमिका स्पष्ट होती है।

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Q8.सामाजिक आंदोलन के दौरान नेतृत्व और संगठन की भूमिका क्यों आवश्यक होती है?

उत्तर:

नेतृत्व और संगठन सामाजिक आंदोलन को दिशा और स्थिरता प्रदान करते हैं। वे सदस्यों के बीच समन्वय करते हैं, निर्णय प्रक्रिया संचालित करते हैं और आंदोलन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए, गांधीजी का नेतृत्व स्वतंत्रता संग्राम में आंदोलन को संगठित और प्रभावी बनाता था।

व्याख्या:

संगठन और नेतृत्व के बिना आंदोलन असंगठित हो सकता है और उसका प्रभाव कम हो सकता है। नेतृत्व आंदोलन को प्रेरित करता है और संगठन सदस्यों को एकजुट करता है, जिससे आंदोलन के लक्ष्य प्राप्त होते हैं।

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