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Chapter 7

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Chapter 7Study Notes

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कबीर की साखियाँ

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कबीर की साखियाँ

इस अनुभाग में कबीर की प्रसिद्ध साखियों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है, जो हिंदी साहित्य में भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संगम हैं। कबीर दास एक महान संत और कवि थे, जिन्होंने अपने सरल और प्रभावशाली दोहों के माध्यम से जीवन के गूढ़ सत्य को प्रकट किया। उनकी साखियाँ जाति, धर्म, और बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर ज्ञान और आत्मा की शुद्धता पर बल देती हैं। पहली साखी में कबीर कहते हैं कि साथ की जाति न पूछो, बल्कि ज्ञान पूछो। इसका अर्थ है कि व्यक्ति की बाहरी पहचान से अधिक उसकी आंतरिक समझ और ज्ञान महत्वपूर्ण है। दूसरी साखी में कबीर कहते हैं कि आवाज़ एक ही होती है, लेकिन लोग उसे अलग-अलग तरीके से समझते हैं, इसलिए सत्य एक ही है, उसे उलटने की आवश्यकता नहीं। तीसरी साखी में कबीर कहते हैं कि माला हाथ में फेरना और जीभ से नाम जपना सच्चा सुमिरन नहीं है, बल्कि मन से ईश्वर का स्मरण करना ही सच्चा भक्ति है। चौथी साखी में वे कहते हैं कि घास को न तोड़ो, क्योंकि जो घास गिरती है, वह आंख में पड़कर असली कष्ट देती है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान और अहिंसा का संदेश है। पाँचवीं साखी में कबीर कहते हैं कि इस जगत में कोई बैरी नहीं है यदि मन शांत और दयालु हो। यह साखी मनुष्य के अंदर की शांति और दया की महत्ता को दर्शाती है। इस प्रकार, कबीर की साखियाँ जीवन के आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों को सरल भाषा में समझाती हैं।

  • कबीर की साखियाँ ज्ञान और भक्ति का संगम हैं।
  • जाति और बाहरी पहचान से ऊपर ज्ञान को महत्व दिया गया है।
  • सच्चा सुमिरन मन से ईश्वर का स्मरण करना है।
  • प्रकृति के प्रति सम्मान और अहिंसा का संदेश दिया गया है।
  • मन की शांति और दया को जीवन का आधार बताया गया है।
  • 📌 साखी: कबीर के दोहे जिन्हें वे जीवन के सत्य और ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • 📌 सुमिरन: ईश्वर के नाम का मनन या जप।
  • 📌 आपा: अहंकार या स्वार्थ।

प्रश्न-अभ्यास

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प्रश्न-अभ्यास

इस अनुभाग में कबीर की साखियों से संबंधित प्रश्न दिए गए हैं, जो विद्यार्थियों को पाठ की गहन समझ विकसित करने में मदद करते हैं। प्रश्नों का उद्देश्य विद्यार्थियों को कबीर के दोहों के भावार्थ, उनकी सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षाओं को समझना और व्यक्त करना है। पहले चार प्रश्न सीधे पाठ से संबंधित हैं, जैसे कि तलवार का महत्व क्या है, मनुवां तो दहुँ दिसि फिरने का क्या अर्थ है, कबीर घास की निंदा क्यों नहीं करते, और मनुष्य के व्यवहार में विरोधी बनाने वाले दोष कौन से हैं। ये प्रश्न विद्यार्थियों को दोहों के भावों को समझने और उनका विश्लेषण करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके बाद के प्रश्न पाठ से आगे के हैं, जो अधिक विचारशील और विश्लेषणात्मक हैं। जैसे कि ‘आपा’ का अर्थ क्या है, क्या यह स्वार्थ है या घमंड, आपा और आत्मविश्वास में क्या अंतर है, कबीर की साखियों में समान विचारों की आवश्यकता पर चर्चा, और कबीर के दोहों को साखी क्यों कहा जाता है। यह अभ्यास विद्यार्थियों की सोच को विकसित करता है और उन्हें कबीर की शिक्षाओं को अपने जीवन में लागू करने के लिए प्रेरित करता है।

  • प्रश्न पाठ के भावार्थ को समझने में मदद करते हैं।
  • विद्यार्थी कबीर के दोहों का विश्लेषण करते हैं।
  • आपा का अर्थ और उसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होती है।
  • समान विचारों और सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पर विचार।
  • कबीर के दोहों को साखी कहने के कारणों को समझना।
  • 📌 आपा: अहंकार या स्वार्थ।
  • 📌 साखी: कबीर के दोहे।

भाषा की बात

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भाषा की बात

इस अनुभाग में कबीर की साखियों में प्रयुक्त भाषा की विशेषताओं और क्षेत्रीय बोलचाल के प्रभावों को समझाया गया है। कबीर की भाषा सरल, सहज और बोलचाल की भाषा के करीब है, जिसमें क्षेत्रीय उच्चारण और शब्दों के रूपों में परिवर्तन देखने को मिलता है। उदाहरण के

Practice QuestionsChapter 7

Includes NCERT exercise questions with answers

Q1.1. ‘तलवार का महत्व होता है ध्यान का नहीं’—उक्त उदाहरण से कबीर क्या कहना चाहते हैं? स्पष्ट कीजिए।

Answer:

यह दोहा यह बताता है कि तलवार का महत्व उसकी उपस्थिति या दिखावे में नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग और ध्यान में है। कबीर कह रहे हैं कि केवल बाहरी चीजों का होना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनका सही ध्यान और सही व्यवहार महत्वपूर्ण है। इसलिए, तलवार का महत्व उसके ध्यान और सही उपयोग में है, न कि केवल उसके होने में।

Explanation:

कबीर इस उदाहरण से यह समझाना चाहते हैं कि बाहरी वस्तुओं या दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण हमारे ध्यान और आचरण का होना है। तलवार का महत्व तभी होता है जब उसका सही उपयोग और ध्यान हो।

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Q2.2. पाठ की तीसरी साखी—जिसकी एक पंक्ति है ‘मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं’ के द्वारा कबीर क्या कहना चाहते हैं?

Answer:

इस साखी में कबीर कह रहे हैं कि जो व्यक्ति मनुष्य के रूप में दोनों दिशाओं में घूमता रहता है, वह वास्तव में सच्चे अर्थ में ईश्वर का स्मरण (सुमिरन) नहीं करता। इसका मतलब है कि केवल बाहरी रूप से घूमना-फिरना या कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन से ईश्वर का स्मरण आवश्यक है।

Explanation:

कबीर इस साखी के माध्यम से यह समझाना चाहते हैं कि केवल शरीर या कर्मों से ईश्वर की भक्ति नहीं होती, बल्कि मन का सच्चा स्मरण आवश्यक है।

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Q3.3. कबीर घास की निंदा करने से क्यों मना करते हैं। पढ़ें हुए दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

Answer:

कबीर घास की निंदा इसलिए नहीं करते क्योंकि घास भी जीव है और उसकी भी अपनी उपयोगिता है। दोहे में यह बताया गया है कि हर जीव का अपना महत्व और स्थान है। घास से गाय-भैंस को भोजन मिलता है, जिससे दूध और अन्य उपयोग होते हैं। इसलिए किसी भी जीव या वस्तु की निंदा करना उचित नहीं है।

Explanation:

कबीर का यह संदेश है कि हमें सभी जीवों और वस्तुओं का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वे सभी किसी न किसी रूप में उपयोगी हैं। निंदा करने से हम अपनी समझ को सीमित कर देते हैं।

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Q4.4. मनुष्य के व्यवहार में ही दूसरों को विरोधी बना लेनेवाले दोष होते हैं। यह भावार्थ किस दोहे से व्यक्त होता है?

Answer:

यह भावार्थ कबीर के उस दोहे से व्यक्त होता है जिसमें कहा गया है कि मनुष्य के अपने दोष और व्यवहार के कारण ही वह दूसरों को अपना विरोधी बना लेता है। इसका अर्थ है कि बाहरी कारणों से अधिक, हमारे अपने आचरण और स्वभाव के कारण ही संघर्ष उत्पन्न होते हैं।

Explanation:

कबीर इस दोहे के माध्यम से यह समझाते हैं कि मनुष्य को अपने दोषों को पहचानना चाहिए और सुधारना चाहिए, तभी वह दूसरों के साथ शांति से रह सकता है।

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Q5.1. “या आप को डारि दे, दया करै सब कोय।” “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय।” इन दोनों पंक्तियों में ‘आपा’ को छोड़ देने या खो देने की बात की गई है। ‘आपा’ किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है? क्या ‘आपा’ स्वार्थ के निकट का अर्थ देता है या घमंड का?

Answer:

यहाँ ‘आपा’ का अर्थ अहंकार या घमंड से है। दोनों पंक्तियों में कहा गया है कि मन का अहंकार या घमंड छोड़ देना चाहिए। ‘आपा’ स्वार्थ से अधिक घमंड के निकट का अर्थ देता है। इसलिए मनुष्य को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिससे उसका अहंकार न बढ़े और वह सबके प्रति दयालु हो।

Explanation:

कबीर का संदेश है कि मनुष्य को अपने अहंकार को त्याग देना चाहिए ताकि वह दूसरों के प्रति दयालु और विनम्र बन सके। ‘आपा’ का अर्थ यहाँ घमंड से है, जो मनुष्य के स्वभाव में बाधा उत्पन्न करता है।

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Q6.2. आपके विचार में आपा और आत्मविश्वास में तथा आपा और उत्साह में क्या कोई अंतर हो सकता है? स्पष्ट करें।

Answer:

‘आपा’ का अर्थ अहंकार या घमंड होता है, जो नकारात्मक भावना है। जबकि आत्मविश्वास और उत्साह सकारात्मक भावनाएँ हैं। आत्मविश्वास वह भावना है जो व्यक्ति को अपने कार्यों में विश्वास दिलाती है, और उत्साह वह ऊर्जा है जो कार्य करने की प्रेरणा देता है। इसलिए आपा (अहंकार) और आत्मविश्वास तथा उत्साह में स्पष्ट अंतर है। आपा नकारात्मक होता है, जबकि आत्मविश्वास और उत्साह सकारात्मक।

Explanation:

इस प्रश्न में आपा को अहंकार के रूप में समझना है, जो मनुष्य के व्यवहार में बाधा डालता है। आत्मविश्वास और उत्साह व्यक्ति को आगे बढ़ने में मदद करते हैं, जबकि आपा उसे गिराता है।

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Q7.3. सभी मनुष्य एक ही प्रकार से देखते-सुनते हैं पर एकसमान विचार नहीं रखते। सभी अपनी-अपनी मनोवृत्तियों के अनुसार कार्य करते हैं। पाठ में आई कबीर की किस साखी से उपर्युक्त पंक्तियों के भाव मिलते हैं, एकसमान होने के लिए आवश्यक क्या है? लिखिए।

Answer:

पाठ में आई वह साखी जिसमें मनुष्य के भिन्न-भिन्न विचारों और मनोवृत्तियों का उल्लेख है, उससे यह भाव मिलता है। एकसमान होने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने मन के अहंकार (आपा) को त्याग दे और सभी के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाए। तभी विचारों में सामंजस्य और एकता संभव है।

Explanation:

कबीर की साखी यह सिखाती है कि भले ही मनुष्य के विचार भिन्न हों, पर अहंकार छोड़कर और प्रेम भाव से सभी एकसमान हो सकते हैं।

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Q8.4. कबीर के दोहों को साखी क्यों कहा जाता है? ज्ञात कीजिए।

Answer:

कबीर के दोहों को साखी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे जीवन के अनुभवों और सत्य की प्रमाणित बातें होती हैं। साखी का अर्थ होता है प्रमाण या गवाही। कबीर के दोहे जीवन के गहरे सत्य और अनुभवों को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं, जो समाज के लिए प्रमाणित और मार्गदर्शक होते हैं।

Explanation:

कबीर की साखियाँ उनके अनुभवों और ज्ञान की गवाही देती हैं। इसलिए उनके दोहों को साखी कहा जाता है।

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