Chapter 6
Chapter 6 — अध्ययन नोट्स
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परिचय
व्याख्यापरिचय
नागरिकता की सुप्रसिद्ध परिभाषा के अनुसार, नागरिकता किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है। यह केवल कानूनी स्थिति नहीं है, बल्कि उस समुदाय के साथ व्यक्ति के संबंधों का प्रतिनिधित्व करती है। इस अध्याय में हम नागरिकता के अर्थ, उसके अधिकारों और कर्तव्यों, तथा आज के समय में नागरिकता से जुड़ी बहसों और संघर्षों का विश्लेषण करेंगे। साथ ही हम यह भी समझेंगे कि नागरिक और राष्ट्र के बीच क्या संबंध होता है और विभिन्न देशों में नागरिकता की कसौटी क्या होती है। नागरिकता के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार, नागरिकता सार्वभौम होनी चाहिए, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी राष्ट्र का सदस्य माना जाना चाहिए। लेकिन इस सिद्धांत के बावजूद विश्व में अनेक राष्ट्रविहीन लोग भी हैं, जिनकी स्थिति पर भी हम विचार करेंगे। अंत में हम वैश्विक नागरिकता की अवधारणा पर चर्चा करेंगे कि क्या यह राष्ट्रीय नागरिकता की जगह ले सकती है। इस अध्याय को पढ़ने के बाद विद्यार्थी नागरिकता के अर्थ को समझने के साथ-साथ वर्तमान में नागरिकता से जुड़े विवादों और चुनौतियों पर भी विचार कर सकेंगे।
- नागरिकता का अर्थ है राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता।
- यह केवल कानूनी स्थिति नहीं, बल्कि व्यक्ति और समुदाय के बीच संबंध है।
- नागरिकता के अधिकार और कर्तव्य नागरिक और राज्य के बीच संबंध को परिभाषित करते हैं।
- नागरिकता का लोकतांत्रिक सिद्धांत सार्वभौम नागरिकता की मांग करता है।
- विश्व में राष्ट्रविहीन लोगों की स्थिति नागरिकता की सीमाओं को दर्शाती है।
- वैश्विक नागरिकता की अवधारणा राष्ट्रीय नागरिकता की पूरक या विकल्प हो सकती है।
- 📌 नागरिकता: किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता।
- 📌 सार्वभौम नागरिकता: ऐसी नागरिकता जो सभी व्यक्तियों को किसी राष्ट्र का सदस्य मानती है।
- 📌 राष्ट्रीय नागरिकता: किसी विशेष राष्ट्र के नागरिक होने की कानूनी स्थिति।
6.1 भूमिका
व्याख्या6.1 भूमिका
नागरिकता की परिभाषा के अनुसार यह किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है। आधुनिक विश्व में राष्ट्रों ने अपने सदस्यों को न केवल राजनीतिक पहचान दी है, बल्कि उन्हें कुछ अधिकार भी प्रदान किए हैं। हम अपने को भारतीय, जापानी या जर्मन नागरिक मानते हैं, जो उस राष्ट्र के सदस्य हैं। नागरिकों को अपने राष्ट्र से सुरक्षा, सहयोग और अधिकारों की अपेक्षा होती है। दुनिया में हजारों ऐसे लोग हैं जो शरणार्थी या अवैध प्रवासी के रूप में जीवन यापन करते हैं क्योंकि कोई राष्ट्र उन्हें नागरिकता देने को तैयार नहीं होता। ऐसे लोग असुरक्षित जीवन बिताते हैं। उदाहरण के लिए, मध्यपूर्व के फिलिस्तीनी शरणार्थी नागरिकता और अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। नागरिकों को मिलने वाले अधिकार विभिन्न देशों में भिन्न हो सकते हैं, पर लोकतांत्रिक देशों में मतदान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यूनतम मजदूरी और शिक्षा जैसे अधिकार शामिल होते हैं। ये अधिकार संघर्षों के माध्यम से प्राप्त हुए हैं। यूरोप में 1789 की फ्रांसीसी क्रांति और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष इसके उदाहरण हैं। भारत में महिला और दलित आंदोलनों ने समान अधिकारों के लिए संघर्ष किया। नागरिकता केवल राज्य और नागरिक के बीच संबंध नहीं है, बल्कि नागरिकों के आपसी संबंधों और समाज के प्रति दायित्वों का भी प्रतिनिधित्व करती है। इसमें कानूनी बाध्यताओं के साथ-साथ नैतिक दायित्व भी शामिल हैं। नागरिकों को देश के संसाधनों का उत्तराधिकारी और न्यासी माना जाता है। इस खंड में दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद नीति का उदाहरण दिया गया है, जहाँ गोरे लोगों को अधिक अधिकार प्राप्त थे जबकि अश्वेत लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ता था। यह दर्शाता है कि पूर्ण और समान सदस्यता का अभाव सामाजिक असमानता और संघर्षों को जन्म देता है।
- नागरिकता राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है।
- नागरिकों को अपने राष्ट्र से सुरक्षा, सहयोग और अधिकारों की अपेक्षा होती है।
- शरणार्थी और अवैध प्रवासियों को नागरिकता और अधिकार नहीं मिल पाते।
- लोकतांत्रिक देशों में मतदान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अधिकार शामिल हैं।
- नागरिकता में कानूनी और नैतिक दायित्व दोनों शामिल होते हैं।
- दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद नीति ने असमान नागरिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया।
- 📌 रंगभेद नीति: नस्ल के आधार पर भेदभाव की सरकारी नीति।
- 📌 नागरिक अधिकार: नागरिकों को प्राप्त कानूनी और राजनीतिक अधिकार।
- 📌 नैतिक दायित्व: समाज और समुदाय के प्रति नागरिकों के अनौपचारिक कर्तव्य।
6.2 संपूर्ण और समान सदस्यता
व्याख्या6.2 संपूर्ण और समान सदस्यता
संपूर्ण और समान सदस्यता का अर्थ है कि नागरिकों को देश में कहीं भी रहने, पढ़ने, काम करने और समान अवसर प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए। लेकिन व्यवहार में जब संसाधन सीमित होते हैं, तो स्थानीय लोग बाहरी लोगों के प्रवेश का विरोध करते हैं। भारत में 'मुंब
अभ्यास प्रश्न — Chapter 6
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.निम्नलिखित में से कौन मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है?
उत्तर:
राष्ट्रपति
Q2.निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति से संबंधित है?
उत्तर:
अनुच्छेद 75
Q3.राष्ट्रपति का महाभियोग ............ में शुरू किया जा सकता है।
उत्तर:
संसद के किसी भी सदन में
Q4.निम्नलिखित में से किसमें राष्ट्रीय आपातकाल के प्रावधान का उल्लेख है?
उत्तर:
अनुच्छेद 352
Q5.1. राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में नागरिकता में अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। समकालीन लोकतांत्रिक राज्यों में नागरिक किन अधिकारों के उपभोग की अपेक्षा कर सकते हैं? नागरिकों के राज्य और अन्य नागरिकों के प्रति क्या दायित्व हैं?
उत्तर:
नागरिकता का अर्थ है किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता। इसमें नागरिकों को अधिकार और दायित्व दोनों प्राप्त होते हैं। समकालीन लोकतांत्रिक राज्यों में नागरिक निम्नलिखित अधिकारों की अपेक्षा कर सकते हैं: - समानता का अधिकार - स्वतंत्रता का अधिकार (जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता) - सुरक्षा का अधिकार - मतदान और चुनाव में भाग लेने का अधिकार - न्याय का अधिकार नागरिकों के दायित्व भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, जिनमें शामिल हैं: - कानून का पालन करना - देश की रक्षा करना - समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना - दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना - कर देना इस प्रकार नागरिकता में अधिकारों के साथ-साथ दायित्व भी होते हैं, जो लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक हैं।
व्याख्या:
प्रश्न में नागरिकता के अधिकार और दायित्व दोनों की चर्चा करने को कहा गया है। लोकतांत्रिक राज्य में नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, सुरक्षा, मतदान और न्याय के अधिकार मिलते हैं। इसके साथ ही नागरिकों का दायित्व होता है कि वे कानून का पालन करें, देश की रक्षा करें, समाज के प्रति जिम्मेदार हों और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें। यह संतुलन लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
Q6.2. सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए तो जा सकते हैं लेकिन हो सकता है कि वे इन अधिकारों का प्रयोग समानता से न कर सकें। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यह कथन यह बताता है कि कानूनी रूप से सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए जा सकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में वे सभी इन अधिकारों का समान रूप से उपयोग नहीं कर पाते। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे आर्थिक असमानता, सामाजिक भेदभाव, शिक्षा की कमी, सांस्कृतिक बाधाएं आदि। उदाहरण के लिए, महिलाओं को समान मतदान का अधिकार तो है, लेकिन सामाजिक दबाव या अशिक्षा के कारण वे इसका पूर्ण लाभ नहीं उठा पातीं। इसलिए, अधिकारों का कानूनी प्रावधान और उनका वास्तविक उपयोग दोनों अलग-अलग बातें हैं।
व्याख्या:
प्रश्न में समान अधिकारों के कानूनी प्रावधान और उनके वास्तविक उपयोग के बीच के अंतर को समझाने को कहा गया है। कानूनी समानता होने के बावजूद सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से सभी नागरिक समान रूप से अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पाते। यह असमानता लोकतंत्र के सामने एक चुनौती है।
Q7.3. भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हाल के वर्षों में किए गए किन्हीं दो संघर्षों पर टिप्पणी लिखिए। इन संघर्षों में किन अधिकारों की माँग की गई थी?
उत्तर:
भारत में नागरिक अधिकारों के लिए कई संघर्ष हुए हैं। दो प्रमुख संघर्ष निम्नलिखित हैं: 1. दलित अधिकार आंदोलन: इस आंदोलन में दलितों ने सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव के विरुद्ध और आरक्षण के अधिकार की मांग की। यह संघर्ष सामाजिक न्याय और समानता के अधिकार की मांग करता है। 2. महिला अधिकार आंदोलन: महिलाओं ने समान वेतन, शिक्षा, सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी के अधिकारों की मांग की। यह संघर्ष लैंगिक समानता और सुरक्षा के अधिकार की मांग करता है। इन संघर्षों ने भारत में नागरिक अधिकारों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
व्याख्या:
प्रश्न में नागरिक अधिकारों के लिए हुए हाल के संघर्षों और उनमें मांगे गए अधिकारों पर टिप्पणी करने को कहा गया है। दलित और महिला अधिकार आंदोलन प्रमुख उदाहरण हैं, जिनमें सामाजिक समानता, सुरक्षा, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी के अधिकारों की मांग की गई। ये संघर्ष नागरिक अधिकारों के विस्तार और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
Q8.4. शरणार्थियों की समस्याएँ क्या हैं? वैश्विक नागरिकता की अवधारणा किस प्रकार उनकी सहायता कर सकती है?
उत्तर:
शरणार्थियों की समस्याएँ: - सुरक्षित आवास और भोजन की कमी - स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता - शिक्षा और रोजगार के अवसरों का अभाव - सामाजिक और राजनीतिक असुरक्षा - कानूनी अधिकारों की कमी वैश्विक नागरिकता की अवधारणा शरणार्थियों की सहायता इस प्रकार कर सकती है: - उन्हें समान मानवाधिकार प्रदान करना - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना - उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना - विभिन्न देशों के बीच सहयोग बढ़ाकर शरणार्थियों के पुनर्वास में सहायता करना इस प्रकार वैश्विक नागरिकता शरणार्थियों को एक समान और सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है।
व्याख्या:
प्रश्न में शरणार्थियों की समस्याओं और वैश्विक नागरिकता की भूमिका पर चर्चा करनी है। शरणार्थियों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिन्हें वैश्विक नागरिकता की अवधारणा के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समान अधिकार देकर हल किया जा सकता है।
Raajneeti Sidhant के सभी 8 अध्याय
Political Science · Class 11