Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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5.1 ऊष्मागतिकी के तकनीकी शब्द
व्याख्या5.1 ऊष्मागतिकी के तकनीकी शब्द
ऊष्मागतिकी में ऊर्जा के परिवर्तन को समझने के लिए कुछ तकनीकी शब्दों का ज्ञान आवश्यक है। सबसे पहले, ब्रह्मांड को दो भागों में विभाजित किया जाता है: निकाय और परिवेश। निकाय वह भाग है जिस पर प्रेक्षण किया जाता है, जबकि परिवेश उस निकाय के बाहर का शेष भाग होता है। निकाय और परिवेश मिलकर ब्रह्मांड बनाते हैं। निकाय को भौतिक सीमाओं जैसे बीकर या परखनली द्वारा परिभाषित किया जा सकता है, और इसे परिवेश से पृथक करने वाली सीमा को परिसीमा कहा जाता है। परिसीमा के माध्यम से हम ऊर्जा और द्रव्य के संचरण को नियंत्रित कर सकते हैं। निकाय के तीन प्रकार होते हैं: खुला, बंद और विलगित। खुला निकाय वह होता है जिसमें ऊर्जा और द्रव्य दोनों का विनिमय परिवेश के साथ संभव होता है, जैसे खुले बीकर में अभिकारक। बंद निकाय में द्रव्य का विनिमय नहीं होता, पर ऊर्जा का हो सकता है, जैसे बंद बीकर। विलगित निकाय में ऊर्जा और द्रव्य दोनों का विनिमय नहीं होता, जैसे थर्मस फ्लास्क। किसी निकाय की अवस्था उसके मापन योग्य स्थूल गुणों जैसे दाब (p), आयतन (V), ताप (T), और संघटन से व्यक्त की जाती है। ये गुण अवस्था-फलन कहलाते हैं क्योंकि इनका मान निकाय की अवस्था पर निर्भर करता है, न कि प्रक्रम के पथ पर। उदाहरण के लिए, तापमान में परिवर्तन पथ-स्वतंत्र होता है। आंतरिक ऊर्जा (U) ऊष्मागतिकी में एक महत्वपूर्ण अवस्था-फलन है, जो निकाय की कुल ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। यह ऊर्जा रासायनिक, यांत्रिक, वैद्युत आदि रूपों में हो सकती है। आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन तब होता है जब निकाय पर कार्य किया जाता है या निकाय ऊष्मा ग्रहण या उत्सर्जित करता है। रूद्धोष्म प्रक्रम में, जहाँ ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता, आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन कार्य के बराबर होता है। इसी कारण आंतरिक ऊर्जा एक अवस्था-फलन है। ऊष्मा (q) वह ऊर्जा है जो तापांतर के कारण निकाय और परिवेश के बीच स्थानांतरित होती है। यदि निकाय ऊष्मा ग्रहण करता है तो q धनात्मक होता है, और यदि निकाय ऊष्मा उत्सर्जित करता है तो q ऋणात्मक होता है। ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ΔU = q + w है, जहाँ ΔU आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन, q ऊष्मा, और w कार्य है। यह नियम ऊर्जा संरक्षण का नियम है, जो कहता है कि ऊर्जा न तो बनाई जा सकती है और न ही नष्ट, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। इस प्रकार, ऊष्मागतिकी के तकनीकी शब्द हमें ऊर्जा के विभिन्न रूपों और उनके परिवर्तनों को समझने में सहायता करते हैं।
- ब्रह्मांड को निकाय और परिवेश में विभाजित किया जाता है।
- परिसीमा निकाय और परिवेश को पृथक करती है।
- निकाय के तीन प्रकार: खुला, बंद, और विलगित।
- अवस्था-फलन जैसे p, V, T निकाय की अवस्था को व्यक्त करते हैं।
- आंतरिक ऊर्जा (U) एक अवस्था-फलन है।
- ऊष्मा (q) और कार्य (w) के कारण आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन होता है।
- 📌 निकाय: ब्रह्मांड का वह भाग जिस पर प्रेक्षण किया जाता है।
- 📌 परिवेश: निकाय के बाहर का शेष भाग।
- 📌 परिसीमा: निकाय और परिवेश के बीच की सीमा।
5.1.4 आंतरिक ऊर्जा : एक अवस्था-फलन
व्याख्या5.1.4 आंतरिक ऊर्जा : एक अवस्था-फलन
आंतरिक ऊर्जा (U) किसी ऊष्मागतिकीय निकाय की वह कुल ऊर्जा है, जिसमें उसके अणुओं की गतिज ऊर्जा, आंतरिक ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, यांत्रिक ऊर्जा आदि सम्मिलित होती है। यह ऊर्जा निकाय की अवस्था का अभिलाक्षणिक फलन है। आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन तब होता है जब निकाय पर कार्य किया जाता है या निकाय ऊष्मा ग्रहण या उत्सर्जित करता है। रूद्धोष्म प्रक्रम वह होता है जिसमें निकाय और परिवेश के बीच ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता। ऐसे प्रक्रम में आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन केवल निकाय पर किए गए कार्य के कारण होता है। उदाहरण के लिए, यदि हम एक थर्मस फ्लास्क में जल को मथकर 1 kJ कार्य करते हैं, तो जल की आंतरिक ऊर्जा में उतना ही परिवर्तन होगा। इसी प्रकार, यदि वैद्युत कार्य द्वारा जल को गर्म किया जाए, तो ताप में समान परिवर्तन होगा, जो आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन को दर्शाता है। ऊष्मा (q) वह ऊर्जा है जो तापांतर के कारण निकाय और परिवेश के बीच स्थानांतरित होती है। यदि निकाय ऊष्मा ग्रहण करता है तो q धनात्मक होता है, और यदि निकाय ऊष्मा उत्सर्जित करता है तो q ऋणात्मक होता है। ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ΔU = q + w है, जहाँ ΔU आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन, q ऊष्मा, और w कार्य है। यह नियम ऊर्जा संरक्षण का नियम है, जो कहता है कि ऊर्जा न तो बनाई जा सकती है और न ही नष्ट, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है। इस नियम के अनुसार, यदि कोई निकाय विलगित है (q = 0 और w = 0), तो उसकी आंतरिक ऊर्जा अपरिवर्तनीय रहती है। आंतरिक ऊर्जा का निरपेक्ष मान ज्ञात करना संभव नहीं है, लेकिन इसके परिवर्तन को मापा जा सकता है। इस प्रकार, आंतरिक ऊर्जा ऊष्मागतिकी का एक मूलभूत अवधारणा है, जो ऊर्जा के विभिन्न रूपांतरणों को समझने में सहायक होती है।
- आंतरिक ऊर्जा (U) निकाय की कुल ऊर्जा है।
- रूद्धोष्म प्रक्रम में ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता।
- रूद्धोष्म प्रक्रम में आंतरिक ऊर्जा परिवर्तन कार्य के बराबर होता है।
- ऊष्मा (q) तापांतर के कारण ऊर्जा का स्थानांतरण है।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम: ΔU = q + w।
- विलगित निकाय में आंतरिक ऊर्जा अपरिवर्तनीय होती है।
- 📌 आंतरिक ऊर्जा (U): निकाय की कुल ऊर्जा।
- 📌 रूद्धोष्म प्रक्रम: ऐसा प्रक्रम जिसमें ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता।
- 📌 ऊष्मा (q): तापांतर के कारण ऊर्जा का स्थानांतरण।
5.2 अनुप्रयोग
व्याख्या5.2 अनुप्रयोग
ऊष्मागतिकी के सिद्धांतों का उपयोग रासायनिक अभिक्रियाओं में ऊर्जा परिवर्तन की गणना में किया जाता है। विशेषकर गैसों के दाब-आयतन कार्य की प्रकृति को समझना आवश्यक है। हम एक घर्षणरहित पिस्टनयुक्त सिलिंडर पर विचार करते हैं, जिसमें आदर्श गैस भरी होती है। यद
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.प्रश्न. किसी आदर्श गैस के संतापी प्रसार में-
उत्तर:
घ) आतंरिक उर्जा स्थिर रहती है|
Q2.प्रश्न . एन्ट्रापी के लिए कौन सी इकाई सही है?
उत्तर:
(ग) JKmol -1
Q3.प्रश्न. सभी तत्वों की एन्थैल्पी उनकी सन्दर्भ- अवस्था में होती है-
उत्तर:
ख) शून्य
Q4.प्रश्न . एक ऊष्माशोषी अभिक्रिया के लिए।
उत्तर:
(ख)∆H ऋणात्मक है
Q5.प्रश्न . आबंध एन्थल्पी किस पर निर्भर करती है-
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी
Q6.प्रश्न . निम्नलिखित में से कौन-सा संबंध सही नहीं है?
उत्तर:
(घ) ∆U=Q+R∆T
Q7.प्रश्न . कपूर को वाष्पीकृत करने पर इसकी एन्ट्रॉपी –
उत्तर:
(ख) बढती है
Q8.प्रश्न. चक्रीय अभीक्रिया के लिए, सिस्टम की आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन होता है-
उत्तर:
(ख) शून्य के बराबर
Rasayan Vigyan bhag-I के सभी 6 अध्याय
Chemistry · Class 11