Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ
व्याख्याभू-आकृतिक प्रक्रियाएँ
पृथ्वी की सतह पर जो विभिन्न आकृतियाँ पाई जाती हैं, वे भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप बनती हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं जिनके द्वारा धरातल के पदार्थों में परिवर्तन होता है। ये प्रक्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं: अंतर्जनित (Endogenic) और बहिर्जनित (Exogenic)। अंतर्जनित प्रक्रियाएँ पृथ्वी के अंदरूनी ऊर्जा स्रोतों से प्रेरित होती हैं, जैसे पटल विरूपण (Diastrophism) और ज्वालामुखीयता (Volcanism)। बहिर्जनित प्रक्रियाएँ सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित होती हैं और ये धरातल के पदार्थों को तोड़ने, घिसने, ले जाने और जमा करने का कार्य करती हैं। इन प्रक्रियाओं में अपक्षय (Weathering), वृहत क्षरण (Mass wasting), अपरदन (Erosion) और निक्षेपण (Deposition) शामिल हैं। धरातल असमतल इसलिए है क्योंकि अंतर्जनित बल सतत् रूप से पृथ्वी की पर्पटी को ऊपर उठाते हैं जबकि बहिर्जनिक बल इन ऊँचाइयों को घिसकर कम करते हैं। इस विरोधात्मक क्रिया के कारण धरातल पर पर्वत, पठार, मैदान आदि विभिन्न भू-आकृतियाँ बनती हैं। बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ मुख्यतः धरातल को समतल करने का कार्य करती हैं जबकि अंतर्जनित प्रक्रियाएँ नई आकृतियाँ बनाती हैं। गुरुत्वाकर्षण बहिर्जनिक प्रक्रियाओं का मूल प्रेरक बल है, जो पदार्थों को ढाल के नीचे की ओर खींचता है। बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारक जैसे जल, हिम, वायु, लहरें और धाराएँ पदार्थों को तोड़कर, ले जाकर और जमा करके धरातल के स्वरूप को बदलते हैं। ये प्रक्रियाएँ जलवायु, स्थलाकृति, शैल संरचना और समय के साथ भिन्न-भिन्न होती हैं। इसलिए पृथ्वी के विभिन्न भागों में भू-आकृतियाँ भी भिन्न होती हैं। इस प्रकार भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ पृथ्वी की सतह को निरंतर बदलती रहती हैं और मानव जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों का निर्माण भी करती हैं। इनके अध्ययन से मानव धरातल के संरक्षण और सतत् उपयोग के उपाय कर सकता है।
- भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं: अंतर्जनित और बहिर्जनित।
- अंतर्जनित प्रक्रियाएँ पृथ्वी के अंदरूनी ऊर्जा स्रोतों से प्रेरित होती हैं।
- बहिर्जनित प्रक्रियाएँ सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित होती हैं और धरातल को घिसती हैं।
- गुरुत्वाकर्षण बहिर्जनिक प्रक्रियाओं का मूल प्रेरक बल है।
- धरातल की असमतलता अंतर्जनित और बहिर्जनिक बलों के विरोध के कारण होती है।
- भू-आकृतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन धरातल के संरक्षण में सहायक है।
- 📌 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ: धरातल के पदार्थों में परिवर्तन करने वाली प्राकृतिक क्रियाएँ।
- 📌 अंतर्जनित प्रक्रियाएँ: पृथ्वी के अंदरूनी ऊर्जा से प्रेरित प्रक्रियाएँ।
- 📌 बहिर्जनित प्रक्रियाएँ: सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित प्रक्रियाएँ जो धरातल को घिसती हैं।
अंतर्जनित प्रक्रियाएँ (Endogenic processes)
व्याख्याअंतर्जनित प्रक्रियाएँ (Endogenic processes)
अंतर्जनित प्रक्रियाएँ पृथ्वी के अंदरूनी ऊर्जा स्रोतों से प्रेरित होती हैं। पृथ्वी के अंदर की ऊर्जा मुख्यतः रेडियोधर्मी पदार्थों के विघटन, पृथ्वी के घूर्णन, ज्वारीय प्रभाव और पृथ्वी की उत्पत्ति से बची ऊष्मा से उत्पन्न होती है। ये ऊर्जा भू-पर्पटी के भीतर पटल विरूपण (Diastrophism) और ज्वालामुखीयता (Volcanism) जैसी प्रक्रियाओं को प्रेरित करती है। पटल विरूपण के अंतर्गत वे सभी प्रक्रियाएँ आती हैं जो भू-पर्पटी को संचलित, विकृत, उठाने या दबाने का कार्य करती हैं। इसमें तीव्र वलयन के कारण पर्वत निर्माण, महाद्वीपों का उत्थान या विकृति, भूकंप और प्लेट विवर्तनिकी शामिल हैं। पटल विरूपण के कारण पृथ्वी की सतह पर पर्वत श्रृंखलाएँ बनती हैं और महाद्वीपों की आकृति बदलती रहती है। ज्वालामुखीयता में पिघली हुई चट्टानें (माग्मा) पृथ्वी की सतह पर आती हैं और ज्वालामुखी बनाते हैं। ज्वालामुखीय गतिविधि से नई चट्टानें बनती हैं और सतह के स्वरूप में परिवर्तन होता है। अंतर्जनित प्रक्रियाएँ मुख्य रूप से भू-आकृति निर्माण के लिए जिम्मेदार होती हैं। ये प्रक्रियाएँ सतत सक्रिय रहती हैं, हालांकि उनकी तीव्रता समय-समय पर बदलती रहती है। इनके कारण धरातल पर नई ऊँचाइयाँ बनती हैं जो बहिर्जनित प्रक्रियाओं द्वारा धीरे-धीरे घिसती हैं। इस प्रकार अंतर्जनित और बहिर्जनित प्रक्रियाएँ मिलकर पृथ्वी की सतह के स्वरूप को निरंतर बदलती रहती हैं।
- अंतर्जनित प्रक्रियाएँ पृथ्वी के अंदरूनी ऊर्जा से प्रेरित होती हैं।
- पटल विरूपण में भू-पर्पटी के संचलन, विकृति और उत्थान की क्रियाएँ शामिल हैं।
- ज्वालामुखीयता में पिघली हुई चट्टानें सतह पर आती हैं।
- अंतर्जनित प्रक्रियाएँ भू-आकृति निर्माण की मुख्य प्रक्रियाएँ हैं।
- भूकंप और प्लेट विवर्तनिकी भी अंतर्जनित प्रक्रियाओं के अंतर्गत आते हैं।
- ये प्रक्रियाएँ भू-पर्पटी को ऊपर उठाकर बहिर्जनित प्रक्रियाओं के विरुद्ध कार्य करती हैं।
- 📌 पटल विरूपण: भू-पर्पटी के संचलन, विकृति और निर्माण की प्रक्रियाएँ।
- 📌 ज्वालामुखीयता: पिघली हुई चट्टानों का सतह पर आना और ज्वालामुखी बनाना।
- 📌 प्लेट विवर्तनिकी: पृथ्वी की पर्पटी के टुकड़ों का संचलन।
बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ (Exogenic processes)
व्याख्याबहिर्जनिक प्रक्रियाएँ (Exogenic processes)
बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ वे प्रक्रियाएँ हैं जो पृथ्वी की सतह पर सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित होती हैं। ये प्रक्रियाएँ धरातल के पदार्थों को तोड़ने, घिसने, ले जाने और जमा करने का कार्य करती हैं। बहिर्जनिक प्रक्रियाओं को अनाच्छादन (Denudation) भी कहा जाता है,
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. बहुवैकल्पिक प्रश्न : (i) निम्नलिखित में से कौन सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है? (क) निक्षेप (ख) ज्वालामुखीयता (ग) पटल-विरूपण (घ) अपरदन (ii) जलयोजन प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है? (क) ग्रेनाइट (ख) क्वार्ट्ज (ग) चीका (क्ले) मिट्टी (घ) लवण (iii) मलवा अवधाव को किस श्रेणी में सम्मिलित किया जा सकता है? (क) भूस्खलन (ख) तीव्र प्रवाही बृहत् संचलन (ग) मंद प्रवाही बृहत् संचलन (घ) अवतलन/धसकन
उत्तर:
(i) अनुक्रमिक प्रक्रिया पटल-विरूपण है क्योंकि यह एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें पटल का विरूपण होता है। (ii) जलयोजन प्रक्रिया मुख्यतः चीका (क्ले) मिट्टी को प्रभावित करती है क्योंकि जलयोजन में पानी के अणु चिपकते हैं और मिट्टी के कणों के बीच प्रतिक्रिया करते हैं। (iii) मलवा अवधाव को मंद प्रवाही बृहत् संचलन की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि यह धीमी गति से होने वाला संचलन है जो सतह पर धीरे-धीरे होता है।
व्याख्या:
प्रत्येक विकल्प की प्रकृति को समझकर सही विकल्प चुना जाता है। अनुक्रमिक प्रक्रिया वह होती है जो क्रमबद्ध होती है, इसलिए पटल-विरूपण सही है। जलयोजन में जल अणु मिट्टी के कणों से जुड़ते हैं, अतः चीका मिट्टी प्रभावित होती है। मलवा अवधाव धीमी गति से होने वाला संचलन है, अतः वह मंद प्रवाही बृहत् संचलन में आता है।
Q2.2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए : (i) अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे? (ii) बृहत् संचलन जो वास्तविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य (Perceptible) हैं, वे क्या हैं? सूचीबद्ध कीजिए। (iii) विभिन्न गतिशील एवं शक्तिशाली बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य संपन्न करते हैं? (iv) क्या मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?
उत्तर:
(i) अपक्षय से चट्टानें टूटती हैं और मृदा बनती है, जिससे विभिन्न प्रकार के आवास बनते हैं जो जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं। (ii) वास्तविक, तीव्र एवं गोचर बृहत् संचलन में भूस्खलन, मलवा अवधाव, ज्वालामुखीय विस्फोट आदि आते हैं। (iii) बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारक जैसे जल, वायु, ताप, बर्फ, और जीव-जंतु भू-आकृति को घिसते, तोड़ते और परिवर्तित करते हैं। (iv) हाँ, अपक्षय के बिना चट्टानों का टूटना और मृदा निर्माण संभव नहीं है, इसलिए यह मृदा निर्माण की अनिवार्यता है।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर दिया गया है जो विषय की मूल बातें स्पष्ट करता है। अपक्षय जैव विविधता के लिए आधार प्रदान करता है, बहिर्जनिक कारक भू-आकृति को प्रभावित करते हैं, और मृदा निर्माण में अपक्षय अनिवार्य है।
Q3.3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए : (i) “हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है,” विवेचना कीजिए। (ii) ‘बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अंतिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए। (iii) क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक दूसरे से स्वतंत्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या कीजिए। (iv) आप किस प्रकार मृदा निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा निर्माण कारकों के बीच अंतर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा निर्माण में दो महत्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?
उत्तर:
(i) पृथ्वी पर भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं: अंतर्जनिक (जैसे ज्वालामुखीयता, भूकंप) और बहिर्जनिक (जैसे अपरदन, अपक्षय)। ये दोनों प्रक्रियाएँ विरोधात्मक हैं क्योंकि अंतर्जनिक निर्माण करती हैं जबकि बहिर्जनिक विनाश या परिवर्तन। इस प्रकार पृथ्वी एक गतिशील खेल का मैदान है जहाँ ये प्रक्रियाएँ लगातार कार्यरत रहती हैं। (ii) बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ जैसे अपरदन, अपक्षय, जलयोजन आदि सूर्य की गर्मी से प्रेरित होती हैं क्योंकि सूर्य की ऊर्जा वायुमंडल, जल चक्र और तापमान को नियंत्रित करती है जो इन प्रक्रियाओं को संचालित करती हैं। (iii) भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि भौतिक अपक्षय से चट्टानें टूटती हैं जिससे रासायनिक अपक्षय के लिए सतह बढ़ती है। उदाहरण के लिए, तापीय विस्तार से चट्टानें टूटती हैं और फिर रासायनिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। (iv) मृदा निर्माण प्रक्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं जो मृदा बनाती हैं जैसे अपक्षय, जलयोजन, जैविक क्रियाएँ। मृदा निर्माण कारक वे तत्व हैं जो इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं जैसे जलवायु, जीव-जंतु, माता-पिता पदार्थ। जलवायु तापमान और वर्षा के माध्यम से अपक्षय और जैविक क्रियाओं को प्रभावित करती है, जबकि जैविक क्रियाएँ मृदा की संरचना और उर्वरता बढ़ाती हैं।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत उत्तर दिया गया है जो विषय की गहन समझ प्रदान करता है। विरोधात्मक प्रक्रियाओं की भूमिका, सूर्य की ऊर्जा का महत्व, अपक्षय की परस्पर निर्भरता, और मृदा निर्माण की प्रक्रियाओं तथा कारकों के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है।
Q4.परियोजना कार्य अपने चतुर्दिक विद्यमान भूआकृति/उच्चावच एवं पदार्थों के आधार पर जलवायु, संभव अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्वों और विशेषताओं को परखिए एवं अंकित कीजिए।
उत्तर:
छात्रों को अपने आस-पास की भू-आकृतियों, उच्चावचों और पदार्थों का अध्ययन करना चाहिए। इसके आधार पर वे जलवायु की विशेषताओं, वहाँ होने वाली अपक्षय प्रक्रियाओं और मृदा के तत्वों तथा उनकी विशेषताओं का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार करें। यह परियोजना क्षेत्रीय भूगोल की समझ को बढ़ाएगी।
व्याख्या:
परियोजना कार्य में पर्यवेक्षण, विश्लेषण और प्रस्तुति शामिल है। यह छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान और पर्यावरण के साथ जुड़ाव प्रदान करता है।
Q5.पृथ्वी की सतह असमतल क्यों है? इसके पीछे कौन-कौन से बल कार्यरत होते हैं और उनका प्रभाव क्या होता है?
उत्तर:
धरातल असमतल इसलिए है क्योंकि अंतर्जनित बल पृथ्वी की पर्पटी को ऊपर उठाते हैं जबकि बहिर्जनिक बल इन ऊँचाइयों को घिसकर कम करते हैं। अंतर्जनित बल नई भू-आकृतियाँ बनाते हैं और बहिर्जनिक बल उन्हें समतल करने का कार्य करते हैं। इस विरोधात्मक क्रिया के कारण पर्वत, पठार और मैदान जैसी विविध भू-आकृतियाँ बनती हैं।
व्याख्या:
धरातल पर अंतर्जनित बल (जैसे पटल विरूपण) सतत् रूप से ऊँचाइयाँ बनाते हैं जबकि बहिर्जनिक बल (जैसे अपक्षय, अपरदन) इन ऊँचाइयों को घिसकर समतल करने का प्रयास करते हैं। इस विरोधी क्रिया के कारण पृथ्वी की सतह असमतल बनी रहती है।
Q6.भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ क्या हैं? अंतर्जनित और बहिर्जनिक प्रक्रियाओं में क्या अंतर है?
उत्तर:
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं जिनके कारण धरातल के पदार्थों में परिवर्तन होता है। अंतर्जनित प्रक्रियाएँ पृथ्वी के अंदरूनी ऊर्जा स्रोतों से प्रेरित होती हैं जैसे पटल विरूपण और ज्वालामुखीयता। बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित होती हैं और ये अपक्षय, वृहत क्षरण, अपरदन एवं निक्षेपण जैसी प्रक्रियाएँ हैं।
व्याख्या:
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं: अंतर्जनित और बहिर्जनिक। अंतर्जनित प्रक्रियाएँ पृथ्वी के अंदर की ऊर्जा से संचालित होती हैं और नई भू-आकृतियाँ बनाती हैं। बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ बाहरी ऊर्जा से संचालित होती हैं और धरातल को घिसने, तोड़ने और जमा करने का कार्य करती हैं।
Q7.गुरुत्वाकर्षण बल भू-आकृतिक प्रक्रियाओं में किस प्रकार प्रेरक बल के रूप में कार्य करता है?
उत्तर:
गुरुत्वाकर्षण बल धरातल पर पदार्थों को ढाल की ओर नीचे की ओर खींचता है, जिससे अपरदन, वृहत संचलन जैसी बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं। यह बल पदार्थों के संचलन की शुरुआत करता है और बहिर्जनिक भू-आकृतिक कारकों जैसे जल, हिम, वायु को गतिशील बनाता है।
व्याख्या:
गुरुत्वाकर्षण बल बहिर्जनिक प्रक्रियाओं का मूल प्रेरक बल है जो पदार्थों को ढाल के नीचे की ओर खींचता है। इसके बिना अपरदन, वृहत संचलन आदि प्रक्रियाएँ संभव नहीं होतीं। यह बल धरातल के पदार्थों पर दबाव डालता है और उनके संचलन को प्रारंभ करता है।
Q8.पटल विरूपण (Diastrophism) की प्रक्रिया में कौन-कौन से भू-आकृतिक घटनाएँ सम्मिलित होती हैं?
उत्तर:
पर्वत निर्माण, महाद्वीप रचना, भूकंप, प्लेट विवर्तनिकी
व्याख्या:
पटल विरूपण में वे सभी प्रक्रियाएँ आती हैं जो भू-पर्पटी को संचलित, विकृत, उठाने या दबाने का कार्य करती हैं, जैसे पर्वत निर्माण, महाद्वीपों का उत्थान, भूकंप, और प्लेट विवर्तनिकी। अन्य विकल्प बहिर्जनिक प्रक्रियाओं या अन्य कारकों से संबंधित हैं।
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