Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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भूमिका
व्याख्याभूमिका
ऋतुचर्या अध्याय की भूमिका में ऋतुओं के अनुसार जीवनचर्या के महत्व को विस्तारपूर्वक समझाया गया है। भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और प्राचीन काल से ही मनुष्य ने ऋतुओं के अनुसार अपने आहार, वस्त्र, विहार और दिनचर्या को अनुकूलित किया है। यह अध्याय महर्षि अग्निवेश द्वारा मूल रूप में रचित तथा महर्षि चरक द्वारा संकलित चरकसंहिता के छठे अध्याय से लिया गया है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार विभिन्न ऋतुओं में आहार और जीवनशैली में परिवर्तन करके व्यक्ति दीर्घायु और स्वस्थ जीवन प्राप्त कर सकता है। ऋतुचर्या का पालन करने से शरीर के दोषों का संतुलन बना रहता है और रोगों से बचाव होता है। इस प्रकार ऋतुचर्या भारतीय आयुर्वेद का एक महत्वपूर्ण अंग है जो प्रकृति के चक्र के अनुरूप जीवन को व्यवस्थित करता है।
- भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व है।
- ऋतुचर्या से शरीर के दोष संतुलित रहते हैं।
- प्राकृतिक ऋतुओं के अनुसार आहार और दिनचर्या बदलनी चाहिए।
- चरकसंहिता के छठे अध्याय से यह ज्ञान प्राप्त होता है।
- ऋतुचर्या से दीर्घायु और स्वस्थ जीवन संभव है।
- 📌 ऋतुचर्या: ऋतुओं के अनुसार जीवनशैली का समायोजन।
- 📌 चरकसंहिता: प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ जिसमें आयुर्वेद के नियम वर्णित हैं।
- 📌 दीर्घायु: लंबी आयु।
ऋतु का वर्गीकरण
अवधारणाऋतु का वर्गीकरण
भारतीय परंपरा में वर्ष को छह प्रमुख ऋतुओं में विभाजित किया गया है – वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर। प्रत्येक ऋतु का अपना विशेष समय, महत्व और प्रभाव होता है। वसन्त ऋतु फाल्गुन और चैत्र मास में आती है, इसे ऋतुओं का राजा कहा जाता है क्योंकि इस समय प्रकृति में नवीनता और सौंदर्य आता है। ग्रीष्म ऋतु वैशाख और ज्येष्ठ मास में होती है, जिसमें तापमान अधिक होता है। वर्षा ऋतु आषाढ़ और श्रावण मास में होती है, इस समय वातावरण में नमी अधिक होती है। शरद ऋतु आश्विन और कार्तिक मास में आती है, यह शीतल और सुखद होती है। हेमन्त ऋतु मार्गशीर्ष और पौष मास में होती है, जिसमें ठंड अधिक होती है। शिशिर ऋतु माघ और फाल्गुन मास में आती है, यह वर्ष की सबसे ठंडी ऋतु होती है। प्रत्येक ऋतु के अनुसार शरीर में दोषों का संतुलन प्रभावित होता है, इसलिए आहार और दिनचर्या में परिवर्तन आवश्यक होता है।
- वर्ष को छह ऋतुओं में विभाजित किया गया है।
- प्रत्येक ऋतु का अपना विशेष समय और प्रभाव होता है।
- वसन्त ऋतु में प्रकृति में नवीनता आती है।
- ग्रीष्म ऋतु में तापमान अधिक होता है।
- वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी बढ़ जाती है।
- शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतुओं में ठंडक बढ़ती है।
- 📌 वसन्त: ऋतु जिसमें कफ दोष बढ़ता है।
- 📌 ग्रीष्म: गर्मी की ऋतु।
- 📌 वर्षा: वर्षा ऋतु जिसमें नमी अधिक होती है।
ऋतुचर्या का महत्व
व्याख्याऋतुचर्या का महत्व
ऋतुचर्या का अर्थ है ऋतुओं के अनुसार आहार, वस्त्र, विहार और दिनचर्या में परिवर्तन करना। प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने बताया है कि यदि मनुष्य ऋतु के अनुसार अपनी जीवनशैली को अनुकूलित करता है तो वह स्वस्थ, प्रसन्न और दीर्घायु रहता है। ऋतुचर्या का पालन करने
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. संस्कृतेन उत्तराणि देयानि (क) अयं पाठः कस्माद् ग्रन्थात् सड्कलितः कश्च तस्य प्रणेता? (ख) कति ऋतवः भवन्ति? कानि च तेषां नामानि? (ग) शिशिरे किं किं वर्जनीयम्? (घ) वसन्ते कायागिनं कः बाधते? (ङ) ग्रीष्मे कीदृशम् अन्नपानं हितं भवति? (च) कस्मिन् ऋतौ पवनादयः कुप्यन्ति? (छ) शरदूतौ पित्तप्रशमनाय किं किं सेव्यम् अस्ति? (ज) हिमागमे कीदृशानि अन्नपानानि वर्जयेत्? (झ) शिशिरे कीदृशम् गृहमाश्रयेत्? (ञ) वसन्ते कानि कर्माणि कारयेत्? (ट) व्यायामं कदा वर्जयेत्? (ठ) इन्द्रुश्मयः कदा प्रशस्यन्ते?
उत्तर:
1.(क) अयं पाठः आयुर्वेदशास्त्रस्य प्रसिद्धः चरकसंहिता इति ग्रन्थात् सड्कलितः। तस्य प्रणेता चरकः। (ख) षड् ऋतवः भवन्ति। तेषां नामानि – वसन्तः, ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, हेमन्तः, शिशिरः। (ग) शिशिरे लघूनि च अन्नपानानि वर्जनीयानि, निवातं वातं च गृहमाश्रयेत्। (घ) वसन्ते कायागिनं वातः बाधते। (ङ) ग्रीष्मे घृतं पयः शीतलानि च अन्नपानानि हितानि भवन्ति। (च) वर्षायां पवनादयः कुप्यन्ति। (छ) शरदूतौ पित्तप्रशमनाय शीतलानि, स्निग्धानि, मधुराणि अन्नपानानि सेव्यम्। (ज) हिमागमे तिक्तानि, कटु, अम्लानि, भारी, तिक्तानि च अन्नपानानि वर्जयेत्। (झ) शिशिरे निवातं वातं च गृहमाश्रयेत्। (ञ) वसन्ते शीतलानि स्निग्धानि मधुराणि कर्माणि कारयेत्। (ट) व्यायामं ग्रीष्मे वर्जयेत्। (ठ) इन्द्रुश्मयः वर्षायां प्रशस्यन्ते।
व्याख्या:
प्रत्येकं प्रश्नं ऋतुचर्यायाः सन्दर्भे संस्कृतग्रन्थचरकसंहितायाः आधारतः उत्तरितम्। ऋतवः षड्, तेषां नामानि च स्पष्टीकृतानि। प्रत्येक ऋतौ कर्तव्यं वा वर्जनीयं कर्म स्पष्टं कृतम्।
Q2.2. रिक्तस्थानपूर्तिः क्रियताम् (क) हिमागमे ... लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्। (ख) शिशिरे निवातम् ... च गृहम् आश्रयेत्। (ग) ... दिवास्वप्नं वर्जयेत्। (घ) ग्रीष्मे घृतं पयः ... भजन् नरः न सीदति। (ङ) ... विमलानि वासांसि प्रशस्यन्ते।
उत्तर:
(क) हिमागमे तिक्तानि, कटु, अम्लानि लघूनि च अन्नपानानि वर्जयेत्। (ख) शिशिरे निवातम् वातं च गृहम् आश्रयेत्। (ग) शिशिरे दिवास्वप्नं वर्जयेत्। (घ) ग्रीष्मे घृतं पयः शीतलानि भजन् नरः न सीदति। (ङ) वसन्ते विमलानि वासांसि प्रशस्यन्ते।
व्याख्या:
प्रत्येक रिक्तस्थानं ऋतुचर्यायाः नियमाः अनुसारं पूरितम्। हिमागमे तिक्तानि, कटु, अम्लानि वर्जनीयानि; शिशिरे निवातं वातं आश्रयः; दिवास्वप्नं वर्जनीयम्; ग्रीष्मे शीतलानि अन्नपानानि हितानि; वसन्ते विमलानि वस्त्राणि प्रशस्यन्ते।
Q3.3. मातृभाषया व्याख्यायन्ताम् (क) हेमन्तशिशिरौ तुल्यौ शिशिरेऽल्पं विशेषणम्। (ख) मयूर्खर्जगत: स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रवि:। (ग) शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्द्रुश्मय:।
उत्तर:
(क) हेमन्त और शिशिर ऋतुएं समान हैं, परंतु शिशिर में थोड़ा भिन्नता है। (ख) मयूर्खरजगत् अर्थात् मयूर और हरिण जैसे जीव ग्रीष्म ऋतु में स्नेहयुक्त पेय पदार्थ पीते हैं। (ग) शरद ऋतु में प्रदोष काल में इन्द्रुश्मय अर्थात् सूर्य की किरणें प्रशंसनीय होती हैं।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्यांश का मातृभाषा में सरल और स्पष्ट अर्थ प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक को ऋतुचर्या के सन्दर्भ में समझने में सुविधा हो।
Q4.4. ऋतुचर्यापाठम् अधिकृत्य प्रत्येकम् ऋतौ किं किं करणीयम् किं किं च न करणीयम् इति मातृभाषया सुस्पष्टयत
उत्तर:
प्रत्येक ऋतु के लिए ऋतुचर्या के अनुसार निम्नलिखित कार्य करने चाहिए और कुछ कार्यों से बचना चाहिए: 1. वसन्त ऋतु: - करणीयम्: शीतल, स्निग्ध, मधुर आहार ग्रहण करना; शीतल वस्त्र धारण करना; शीतल जल पीना। - न करणीयम्: अधिक व्यायाम न करना; गरम वस्त्र न पहनना। 2. ग्रीष्म ऋतु: - करणीयम्: शीतल, लघु आहार लेना; घृत और पय जैसे शीतल पदार्थ ग्रहण करना; व्यायाम वर्जयेत्। - न करणीयम्: भारी, तिक्त, कटु आहार न लेना; अधिक व्यायाम न करना। 3. वर्षा ऋतु: - करणीयम्: शीतल, मधुर आहार ग्रहण करना; इन्द्रुश्मय काल में व्यायाम करना। - न करणीयम्: अधिक व्यायाम न करना; गीले वस्त्र न पहनना। 4. शरद ऋतु: - करणीयम्: पित्तशामक आहार लेना; मधुर, स्निग्ध आहार ग्रहण करना। - न करणीयम्: तिक्त, कटु आहार न लेना। 5. हेमन्त ऋतु: - करणीयम्: स्निग्ध, उष्ण आहार ग्रहण करना; व्यायाम करना। - न करणीयम्: ठंडे जल का सेवन न करना। 6. शिशिर ऋतु: - करणीयम्: लघु, स्निग्ध आहार ग्रहण करना; निवात वात से बचना; गृहमाश्रय करना। - न करणीयम्: भारी, तिक्त आहार न लेना।
व्याख्या:
ऋतुचर्या के नियमों के अनुसार प्रत्येक ऋतु में शरीर की प्रकृति और वात-पित्त-कफ दोषों के अनुसार आहार, वस्त्र, व्यायाम आदि का विवेकपूर्ण चयन करना आवश्यक है। इससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।
Q5.5. अधोलिखितानि विग्रहपदानि आधृत्य समस्तपदानि रचयत यथा – नवम् ओदनम् नवौदनम् कर्मधारय समास: विग्रहपदानि समस्तपदानि समास नाम (क) अन्तानि च पानानि च ... द्वन्द्व: (ख) हेमन्तः च शिशिरः च ... द्वन्द्व: (ग) हिमस्य आगमे ... ष० तत्पुरुष: (घ) कायस्य अग्निम् ... ष० तत्पुरुष: (ङ) अर्कस्य रश्मिभिः ... ष० तत्पुरुष:
उत्तर:
(क) अन्तानि च पानानि च – अन्तपानौ (द्वन्द्व समास) (ख) हेमन्तः च शिशिरः च – हेमशिशिरौ (द्वन्द्व समास) (ग) हिमस्य आगमे – हिमागमे (षष्ठी तत्पुरुष समास) (घ) कायस्य अग्निम् – कायाग्निम् (षष्ठी तत्पुरुष समास) (ङ) अर्कस्य रश्मिभिः – अर्करश्मिभिः (षष्ठी तत्पुरुष समास) प्रत्येक विग्रहपदस्य समस्तपदं संस्कृत समास नियमानुसार निर्मितम्। द्वन्द्व समास में समानार्थक पदाः योजिताः, तत्पुरुष समास में एक पद अन्य पद का विशेषण होता है।
व्याख्या:
समास निर्माण के नियमों के अनुसार द्वन्द्व समास में समान पदों का युग्मन, तत्पुरुष समास में विशेषण और विशेष्य पदों का संयोजन किया गया। उदाहरण स्वरूप, नवम् ओदनम् नवौदनम् कर्मधारय समास।
Q6.6. अधोलिखितपदानामर्थमेलनं क्रियताम् पदानि अर्थः: (क) श्लेष्मा हवारहित (ख) रौश्यम् बड़ा हुआ (जमा हुआ) (ग) निवातम् वात (घ) निचित: भारी (ङ) पवन: हल्का (च) गुरु: वस्त्र (छ) लघु रूखापन (ज) वासांसि कफ
उत्तर:
(क) श्लेष्मा हवारहित – कफरहित (ख) रौश्यम् बड़ा हुआ (जमा हुआ) – जमावस्था (ग) निवातम् वात – शांत वात (घ) निचित: भारी – निश्चित रूप से भारी (ङ) पवन: हल्का – हल्का वायु (च) गुरु: वस्त्र – भारी वस्त्र (छ) लघु रूखापन – हल्का सूखा (ज) वासांसि कफ – वस्त्रों में कफ प्रत्येक पद का अर्थ संस्कृत से हिंदी में स्पष्ट किया गया है।
व्याख्या:
प्रत्येक संस्कृत पद का हिंदी अर्थ संक्षेप में दिया गया है ताकि अर्थ समझने में आसानी हो।
Q7.7. अधोलिखितपदानाम् विपरीतार्थकपदैः सह मेलनं क्रियताम् पदानि विपरीतार्थकपदानि उष्णम् अधिकम् सीदति शीतानाम् तप्तानाम् प्रसीदति गुरु शीतम् अल्पम् लघु
उत्तर:
मेलनं: उष्णम् – शीतम् सीदति – प्रसीदति तप्तानाम् – शीतानाम् गुरु – लघु अल्पम् – अधिकम् प्रत्येक शब्द का विपरीतार्थक शब्द के साथ मेल किया गया है।
व्याख्या:
विपरीतार्थक शब्दों का सही मेल करने से शब्दार्थ की समझ बढ़ती है। उदाहरण स्वरूप, उष्णम् का विपरीत शीतम्, गुरु का विपरीत लघु।
Q8.8. प्रकृतिं प्रत्ययं च योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत हेमन्त + ठक्, स्निह् + क्त, भुज् + तव्यत्, सेव् + यत्, शरद् + अण्।
उत्तर:
पदनिर्माण: हेमन्त + ठक् = हेमन्तठक् स्निह् + क्त = स्निक्त भुज् + तव्यत् = भुज्तव्य सेव् + यत् = सेव्य शरद् + अण् = शरदण प्रत्येक मूलधातु या शब्द में प्रत्यय जोड़कर नए पदों का निर्माण संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार किया गया है।
व्याख्या:
प्रत्यय योजने से नए शब्द बनते हैं जो विशेष अर्थ सूचित करते हैं। उदाहरण स्वरूप, सेव् + यत् = सेव्य (सेवनीय), भुज् + तव्यत् = भुज्तव्य (भोजन योग्य)।