Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
2.1 समष्टि अर्थशास्त्र की कुछ मूलभूत संकल्पनाएँ
व्याख्या2.1 समष्टि अर्थशास्त्र की कुछ मूलभूत संकल्पनाएँ
इस खंड में समष्टि अर्थशास्त्र की मूलभूत संकल्पनाओं का परिचय दिया गया है। एडम स्मिथ की प्रसिद्ध कृति 'एन इनक्वायरी इंटू द नेचर एंड काउजेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशंस' का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि किसी राष्ट्र की आर्थिक संपत्ति कैसे बढ़ती है और देश अमीर अथवा गरीब कैसे बनते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की उपस्थिति ही किसी देश की समृद्धि का निर्धारण नहीं करती, क्योंकि संसाधन संपन्न अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्र भी विश्व के गरीब देशों में आते हैं। आर्थिक संपत्ति का सृजन उत्पादन प्रक्रिया के माध्यम से होता है, जहाँ संसाधनों का कुशल उपयोग आवश्यक होता है। उत्पादन के प्रवाह की उत्पत्ति सामाजिक और तकनीकी ढाँचे के अंतर्गत होती है, जहाँ मानव श्रम, पूँजी, उद्यमिता और भूमि जैसे उत्पादन कारकों का संयोजन होता है। उत्पादन के पश्चात् वस्तुएँ और सेवाएँ उपभोक्ताओं को विक्रय के लिए प्रस्तुत की जाती हैं। अंतिम वस्तुएँ वे होती हैं जिनका अंतिम उपयोग उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है और जो पुनः उत्पादन प्रक्रिया में नहीं जातीं। अंतिम वस्तुओं को उपभोग वस्तुएँ और पूँजीगत वस्तुएँ दो भागों में बांटा जाता है। उपभोग वस्तुएँ वे हैं जिनका उपयोग तुरंत होता है, जैसे आहार और वस्त्र, जबकि पूँजीगत वस्तुएँ वे हैं जो उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग होती हैं, जैसे मशीनरी और उपकरण। मध्यवर्ती वस्तुएँ वे होती हैं जो उत्पादन प्रक्रिया में कच्चे माल के रूप में उपयोग होती हैं और अंतिम वस्तु नहीं होतीं। आर्थिक मापन के लिए वस्तुओं की मात्रा नहीं बल्कि उनका मूल्य आवश्यक होता है, इसलिए मुद्रा का उपयोग सामान्य माप के रूप में किया जाता है। मूल्यांकन में केवल अंतिम वस्तुओं का मूल्य शामिल किया जाता है ताकि मध्यवर्ती वस्तुओं के मूल्य का दोहरा गणना न हो। यहाँ स्टॉक और प्रवाह की संकल्पना भी महत्वपूर्ण है। स्टॉक किसी निश्चित समय पर वस्तुओं या पूँजी का मापन है, जबकि प्रवाह एक निश्चित अवधि में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं या आय का मापन है। पूँजीगत वस्तुओं में टूट-फूट होती है जिसे मूल्यहास कहा जाता है। मूल्यहास को प्रतिस्थापित करने के लिए निवेश आवश्यक होता है। इस प्रकार, निवल निवेश = सकल निवेश – मूल्यहास। अर्थव्यवस्था में उत्पादन, आय और व्यय के बीच एक वर्तुल प्रवाह होता है, जहाँ फर्म उत्पादन के लिए कारकों को भुगतान करती है और परिवार अपनी आय का उपयोग वस्तुओं और सेवाओं की खरीद में करते हैं। इस प्रकार, समष्टि अर्थशास्त्र में उत्पादन, आय और व्यय के बीच गहरा संबंध होता है।
- आर्थिक संपत्ति केवल प्राकृतिक संसाधनों की उपस्थिति से नहीं बनती।
- उत्पादन के चार कारक हैं: श्रम, पूँजी, उद्यमिता और भूमि।
- अंतिम वस्तुएँ वे होती हैं जिनका अंतिम उपयोग उपभोक्ताओं द्वारा होता है।
- मध्यवर्ती वस्तुओं को मूल्यांकन में शामिल नहीं किया जाता ताकि दोहरी गणना से बचा जा सके।
- स्टॉक और प्रवाह में अंतर होता है; स्टॉक किसी निश्चित समय का मापन है, प्रवाह एक अवधि का।
- मूल्यहास पूँजीगत वस्तुओं की टूट-फूट को दर्शाता है, जिसे प्रतिस्थापित करने के लिए निवेश आवश्यक है।
- 📌 अंतिम वस्तु: ऐसी वस्तु जिसका अंतिम उपयोग उपभोक्ता द्वारा किया जाता है और जो पुनः उत्पादन प्रक्रिया में नहीं जाती।
- 📌 मध्यवर्ती वस्तु: उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग होने वाली वस्तु जो अंतिम वस्तु नहीं होती।
- 📌 मूल्यहास: पूँजीगत वस्तुओं की टूट-फूट से होने वाला मूल्य ह्रास।
2.2 आय का वर्तुल प्रवाह और राष्ट्रीय आय गणना की विधि
व्याख्या2.2 आय का वर्तुल प्रवाह और राष्ट्रीय आय गणना की विधि
इस खंड में एक सरल अर्थव्यवस्था में आय के वर्तुल प्रवाह का वर्णन किया गया है, जहाँ सरकार, बचत और बाह्य व्यापार नहीं है। इस सरलीकृत अर्थव्यवस्था में फर्म परिवारों को उत्पादन के कारकों के लिए भुगतान करती है और परिवार अपनी समस्त आय का उपयोग घरेलू फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं पर व्यय करते हैं। इस प्रकार, आय का समस्त मूल्य व्यय के बराबर होता है और कोई लीकेज नहीं होता। आय का यह वर्तुल प्रवाह दो मुख्य क्षेत्रकों—फर्म और परिवार के बीच होता है। फर्म उत्पादन के लिए कारकों की सेवाएँ प्राप्त करती है और उनके लिए मजदूरी, ब्याज, लाभ और लगान के रूप में भुगतान करती है। परिवार इन आयों का उपयोग वस्तुओं और सेवाओं की खरीद में करते हैं, जो फर्मों को प्राप्त होती है। इस प्रकार, आय और व्यय के बीच एक समतुल्यता स्थापित होती है। आय के वर्तुल प्रवाह को रेखाचित्र 2.1 में दर्शाया गया है, जहाँ ऊपर के तीर परिवारों द्वारा फर्मों को वस्तुओं और सेवाओं के लिए किया गया व्यय दिखाते हैं और नीचे के तीर फर्मों द्वारा परिवारों को उत्पादन कारकों के लिए भुगतान को दर्शाते हैं। यह मॉडल समष्टि अर्थशास्त्रीय मॉडल कहलाता है, जो वास्तविक अर्थव्यवस्था के सरलीकृत रूप को दर्शाता है। इसमें बचत, सरकार और बाह्य व्यापार को शामिल नहीं किया गया है। हालांकि, यदि बचत को जोड़ा जाए तो भी कुल आय का मूल्यांकन अपरिवर्तित रहता है। इस खंड में यह भी बताया गया है कि आय की गणना तीन विधियों से की जा सकती है: उत्पाद विधि, व्यय विधि और आय विधि। ये तीनों विधियाँ आर्थिक गतिविधि के विभिन्न पक्षों को दर्शाती हैं, लेकिन अंततः सभी से प्राप्त राष्ट्रीय आय का मान समान होता है।
- सरल अर्थव्यवस्था में फर्म और परिवार के बीच आय का वर्तुल प्रवाह होता है।
- परिवार अपनी आय का समस्त उपयोग वस्तुओं और सेवाओं की खरीद में करते हैं।
- आय और व्यय के बीच समतुल्यता होती है, जिससे राष्ट्रीय आय की गणना संभव होती है।
- आय की गणना तीन विधियों से की जा सकती है: उत्पाद विधि, व्यय विधि और आय विधि।
- सरल मॉडल में बचत, सरकार और बाह्य व्यापार को शामिल नहीं किया गया है।
- आर्थिक मॉडलों का उद्देश्य वास्तविक अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को सरल बनाकर समझना है।
- 📌 वर्तुल प्रवाह: आर्थिक गतिविधियों में आय और व्यय का निरंतर चक्र।
- 📌 समष्टि अर्थशास्त्रीय मॉडल: वास्तविक अर्थव्यवस्था का सरलीकृत रूप।
- 📌 लीकेज: आर्थिक चक्र से आय का बाहर निकलना, जैसे बचत या कर।
2.2.1 उत्पाद अथवा मूल्यवर्धित विधि
व्याख्या2.2.1 उत्पाद अथवा मूल्यवर्धित विधि
उत्पाद विधि में राष्ट्रीय आय की गणना अर्थव्यवस्था में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के वार्षिक मूल्य के योग से की जाती है। इस विधि में प्रत्येक फर्म के मूल्यवर्धित (Value Added) की गणना की जाती है, जो उस फर्म के कुल उत्पादन मूल्य से उसकी मध्यव
अभ्यास प्रश्न — Chapter 2
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.कौन – सी आय कारक लागत पर भारतीय घरेलू उत्पाद का अंश नहीं है?
उत्तर:
विदेशों से निवल कारक आय
Q2.निम्नलिखित में से किसे राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता?
उत्तर:
जीवन बीमा प्रीमियम के भुगतान में व्यक्तिगत सहयोग
Q3.1. उत्पादन के चार कारक कौन-कौन से हैं और इनमें से प्रत्येक के पारिश्रमिक को क्या कहते हैं?
उत्तर:
उत्पादन के चार कारक हैं: भूमि, श्रम, पूंजी और उद्यमिता। - भूमि का पारिश्रमिक: रेंट (भूमि का किराया) - श्रम का पारिश्रमिक: मजदूरी - पूंजी का पारिश्रमिक: ब्याज - उद्यमिता का पारिश्रमिक: लाभ
व्याख्या:
प्रत्येक उत्पादन कारक को उसके योगदान के अनुसार पारिश्रमिक मिलता है। भूमि के लिए रेंट, श्रम के लिए मजदूरी, पूंजी के लिए ब्याज और उद्यमिता के लिए लाभ पारिश्रमिक होते हैं।
Q4.2. किसी अर्थव्यवस्था में समस्त अंतिम व्यय समस्त कारक अदायगी के बराबर क्यों होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था में समस्त अंतिम व्यय (जैसे उपभोग, निवेश, सरकार का व्यय, शुद्ध निर्यात) समस्त कारक अदायगी (मजदूरी, ब्याज, रेंट, लाभ) के बराबर होता है क्योंकि उत्पादन की प्रक्रिया में जो मूल्य जोड़ा जाता है, वह अंततः कारकों को उनके योगदान के अनुसार भुगतान के रूप में जाता है। इसलिए, कुल व्यय = कुल आय। यह राष्ट्रीय आय के सैद्धांतिक सिद्धांत का आधार है।
व्याख्या:
जब कोई वस्तु या सेवा बनाई जाती है, तो उसका मूल्य अंततः उत्पादन में लगे सभी कारकों को भुगतान के रूप में जाता है। इसलिए, समस्त अंतिम व्यय और समस्त कारक अदायगी बराबर होते हैं।
Q5.3. स्टॉक और प्रवाह में भेद स्पष्ट कीजिए। निवल निवेश और पूँजी में कौन स्टॉक है और कौन प्रवाह? हीज में पानी के प्रवाह से निवल निवेश और पूंजी की तुलना कीजिए।
उत्तर:
स्टॉक वह राशि है जो किसी निश्चित समय पर मौजूद होती है, जबकि प्रवाह वह राशि है जो किसी निश्चित अवधि में होती है। - पूंजी स्टॉक है क्योंकि यह किसी समय बिंदु पर मौजूद संसाधन है। - निवल निवेश प्रवाह है क्योंकि यह एक अवधि में पूंजी में वृद्धि को दर्शाता है। हीज में पानी के प्रवाह की तरह, निवल निवेश पानी का प्रवाह है जो पूंजी (पानी की मात्रा) को बढ़ाता है।
व्याख्या:
स्टॉक और प्रवाह का अंतर समय के संदर्भ में होता है। पूंजी एक स्टॉक है जो किसी समय पर मौजूद है, जबकि निवल निवेश वह प्रवाह है जो पूंजी में वृद्धि करता है। पानी के प्रवाह से पानी की मात्रा बढ़ती है, ठीक वैसे ही निवल निवेश पूंजी को बढ़ाता है।
Q6.4. नियोजित और अनियोजित माल-सूची संचय में क्या अंतर है? किसी फर्म की माल-सूची और मूल्यवर्धित के बीच संबंध बताइए।
उत्तर:
नियोजित माल-सूची संचय वह होता है जिसे फर्म जानबूझकर अपने उत्पादन या बिक्री के कारण बढ़ाती या घटाती है। अनियोजित माल-सूची संचय वह होता है जो बिक्री में कमी या मांग में अनपेक्षित बदलाव के कारण होता है। माल-सूची और मूल्यवर्धित के बीच संबंध यह है कि माल-सूची में परिवर्तन मूल्यवर्धित को प्रभावित करता है क्योंकि मूल्यवर्धित उत्पादन की अंतिम कीमत से मध्यवर्ती वस्तुओं की कीमत घटाकर प्राप्त होता है, और माल-सूची में वृद्धि उत्पादन का हिस्सा होती है।
व्याख्या:
नियोजित संचय फर्म की योजना के अनुसार होता है, जबकि अनियोजित संचय बाजार की अनपेक्षित परिस्थितियों का परिणाम होता है। माल-सूची में परिवर्तन से मूल्यवर्धित प्रभावित होता है क्योंकि यह उत्पादन की कुल कीमत में शामिल होता है।
Q7.5. तीनों विधियों से किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद की गणना करने की किन्हीं तीन निष्पत्तियाँ लिखिए। संक्षेप में यह भी बताइए कि प्रत्येक विधि से सकल घरेलू उत्पाद का एक-सा मूल्य क्या आना चाहिए?
उत्तर:
तीनों विधियाँ हैं: उत्पाद विधि, व्यय विधि और आय विधि। तीन निष्पत्तियाँ: 1. तीनों विधियों से प्राप्त सकल घरेलू उत्पाद का मूल्य समान होना चाहिए। 2. उत्पाद विधि में अंतिम वस्तुओं का मूल्य जोड़ा जाता है। 3. व्यय विधि में उपभोग, निवेश, सरकारी व्यय और शुद्ध निर्यात जोड़े जाते हैं। 4. आय विधि में सभी कारक आय (मजदूरी, ब्याज, रेंट, लाभ) जोड़ी जाती है। प्रत्येक विधि से सकल घरेलू उत्पाद का मूल्य एक समान आना चाहिए क्योंकि वे अर्थव्यवस्था के कुल उत्पादन का मात्र विभिन्न दृष्टिकोण हैं।
व्याख्या:
सकल घरेलू उत्पाद की गणना के तीन दृष्टिकोण हैं, जो अंततः समान परिणाम देते हैं क्योंकि वे उत्पादन, व्यय और आय के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं।
Q8.6. बजटीय घाटा और व्यापार घाटा को परिभाषित कीजिए। किसी विशेष वर्ष में किसी देश की कुल बचत के ऊपर निजी निवेश का आधिक्य 2000 करोड़ रु॰ था। बजटीय घाटे की राशि 1500 करोड़ रु॰ थी। उस देश के बजटीय घाटे का परिमाण क्या था?
उत्तर:
बजटीय घाटा: सरकार के व्यय और राजस्व में अंतर, जब व्यय अधिक हो तो बजटीय घाटा होता है। व्यापार घाटा: किसी देश के आयात और निर्यात के बीच अंतर, जब आयात अधिक हो तो व्यापार घाटा होता है। दी गई जानकारी: - निजी निवेश का आधिक्य = 2000 करोड़ रु॰ - बजटीय घाटा = 1500 करोड़ रु॰ बजटीय घाटे का परिमाण = 1500 करोड़ रु॰ (सवाल में दिया हुआ) यहाँ प्रश्न में बजटीय घाटे का परिमाण दिया है, अतः उत्तर 1500 करोड़ रु॰ ही है।
व्याख्या:
बजटीय घाटा और व्यापार घाटा की परिभाषा दी गई है। प्रश्न में बजटीय घाटे की राशि स्पष्ट रूप से दी गई है, इसलिए उसका परिमाण वही होगा।
Samashty Arthshastra Ek Parichay के सभी 6 अध्याय
Economics · Class 12