Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 15 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
परिचय
व्याख्यापरिचय
मनोविज्ञान अनुभवों, व्यवहारों एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है। इस अध्ययन के लिए मनोवैज्ञानिक विभिन्न वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करते हैं ताकि व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का यथार्थ एवं वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जा सके। मनोविज्ञान में व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए प्रेक्षण, प्रयोग, सहसंबंधात्मक अनुसंधान, सर्वेक्षण, मनोवैज्ञानिक परीक्षण और व्यक्ति अध्ययन जैसी विधियाँ प्रायः उपयोग की जाती हैं। ये विधियाँ मनोविज्ञान को एक वैज्ञानिक विषय बनाती हैं क्योंकि ये विधियाँ व्यवस्थित, वस्तुनिष्ठ और परीक्षणीय होती हैं। मनोवैज्ञानिक जाँच का उद्देश्य व्यवहार का वर्णन, पूर्वकथन, व्याख्या, नियंत्रण और प्राप्त ज्ञान का अनुप्रयोग करना होता है। इस अध्याय में आप मनोवैज्ञानिक जाँच के लक्ष्यों, प्रदत्तों के स्वरूप, मनोवैज्ञानिक जाँच की विधियों, प्रदत्त विश्लेषण की विधियों, तथा मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमाओं और नैतिक मुद्दों से परिचित होंगे।
- मनोविज्ञान अनुभवों, व्यवहारों और मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है।
- मनोवैज्ञानिक जाँच के लिए वैज्ञानिक विधियाँ आवश्यक हैं।
- प्रेक्षण, प्रयोग, सहसंबंधात्मक अनुसंधान, सर्वेक्षण, परीक्षण और व्यक्ति अध्ययन प्रमुख विधियाँ हैं।
- मनोवैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य हैं: वर्णन, पूर्वकथन, व्याख्या, नियंत्रण और अनुप्रयोग।
- मनोविज्ञान की जाँच विधियाँ व्यवहार के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करती हैं।
- 📌 मनोविज्ञान: अनुभवों, व्यवहारों और मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन।
- 📌 मनोवैज्ञानिक जाँच: व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन।
- 📌 प्रदत्त: अनुसंधान में एकत्रित सूचनाएँ।
मनोवैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य
व्याख्यामनोवैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य
मनोवैज्ञानिक जाँच के मुख्य लक्ष्य पाँच हैं: वर्णन, पूर्वकथन, व्याख्या, नियंत्रण और अनुप्रयोग। 1. वर्णन: इसमें व्यवहार या घटना का यथासंभव सटीक और विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जाता है ताकि उस व्यवहार को अन्य व्यवहारों से अलग पहचाना जा सके। उदाहरण के लिए, विद्यार्थियों की अध्ययन की आदतों का वर्णन जिसमें नियमित उपस्थिति, कार्य समय पर प्रस्तुत करना आदि शामिल हैं। 2. पूर्वकथन: यह लक्ष्य व्यवहार के भविष्य में घटित होने की संभावना का अनुमान लगाने से संबंधित है। यदि व्यवहारों के बीच संबंध समझ में आ जाए तो हम भविष्य में किसी व्यवहार के घटित होने की भविष्यवाणी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अध्ययन समय और परीक्षा में प्राप्त अंकों के बीच धनात्मक संबंध। 3. व्याख्या: यह व्यवहार के कारणों और निर्धारकों को समझने का प्रयास है। मनोवैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि कोई व्यवहार किन कारणों से होता है और किन दशाओं में नहीं होता। उदाहरण के लिए, कुछ बच्चे अधिक ध्यान क्यों देते हैं। 4. नियंत्रण: व्याख्या के आधार पर व्यवहार को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है, जैसे किसी व्यवहार को बढ़ाना या कम करना। उदाहरण के लिए, अध्ययन के घंटों को नियंत्रित करना। 5. अनुप्रयोग: अनुसंधान का अंतिम लक्ष्य व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाना है। जैसे योग और ध्यान से दबाव कम करना। इस प्रकार, ये लक्ष्य मनोवैज्ञानिक अनुसंधान को वैज्ञानिक और व्यावहारिक बनाते हैं।
- वर्णन: व्यवहार का सटीक और विस्तृत विवरण।
- पूर्वकथन: व्यवहार की भविष्यवाणी करना।
- व्याख्या: व्यवहार के कारणों और निर्धारकों को समझना।
- नियंत्रण: व्यवहार को बढ़ाना या कम करना।
- अनुप्रयोग: अनुसंधान के ज्ञान को जीवन में लागू करना।
- 📌 वर्णन: व्यवहार का यथासंभव सही विवरण।
- 📌 पूर्वकथन: व्यवहार के घटित होने की भविष्यवाणी।
- 📌 व्याख्या: व्यवहार के कारणों की समझ।
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के चरण
व्याख्यामनोवैज्ञानिक अनुसंधान के चरण
वैज्ञानिक अनुसंधान एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जिसमें चार मुख्य चरण होते हैं: समस्या का संप्रत्ययन, प्रदत्त संग्रह, निष्कर्ष निकालना, और शोध निष्कर्षों का पुनरीक्षण। 1. समस्या का संप्रत्ययन: शोधकर्ता अध्ययन के विषय का चयन करता है और समस्या या शोध प्रश
अभ्यास प्रश्न — Chapter 2
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.क्रियाकलाप 2.1 जब मनोविज्ञान का अध्यापक कक्षा में पढ़ा रहा हो तो कुछ विद्यार्थी प्रेक्षण कर सकते हैं। विस्तार से नोट कीजिए कि वह अध्यापक क्या करता है, विद्यार्थी क्या करते हैं तथा विद्यार्थियों एवं शिक्षक की अन्तःक्रिया का लेखा-जोखा तैयार कीजिए। किए गए प्रेक्षणों पर विद्यार्थियों और अध्यापक के साथ विमर्श कीजिए। प्रेक्षण की समानताओं एवं असमानताओं को नोट कीजिए।
उत्तर:
इस क्रियाकलाप में विद्यार्थी कक्षा में अध्यापक के व्यवहार, विद्यार्थियों के व्यवहार और उनके बीच की अन्तःक्रिया को ध्यानपूर्वक प्रेक्षण करते हैं। वे नोट बनाते हैं कि अध्यापक किस प्रकार पढ़ाते हैं, कौन-कौन से शिक्षण विधि का उपयोग करते हैं, विद्यार्थी कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, उनकी गतिविधियाँ क्या हैं, और अध्यापक एवं विद्यार्थियों के बीच संवाद कैसा होता है। प्रेक्षण के बाद विद्यार्थी और अध्यापक मिलकर चर्चा करते हैं, जिसमें वे प्रेक्षण के दौरान देखी गई समानताएँ और असमानताएँ साझा करते हैं। यह अभ्यास विद्यार्थियों को प्रेक्षण की प्रक्रिया समझने और व्यवहार के विश्लेषण में मदद करता है।
व्याख्या:
प्रेक्षण विधि में वस्तुनिष्ठ और विस्तारपूर्वक अवलोकन करना आवश्यक होता है। इस क्रियाकलाप में विद्यार्थी प्रेक्षण के दौरान व्यवहारों को बिना पूर्वाग्रह के नोट करते हैं और बाद में उनके अर्थ पर चर्चा करते हैं। इससे प्रेक्षण की विश्वसनीयता बढ़ती है।
Q2.प्रस्तुत परिकल्पनाओं में अनाश्रित एवं आश्रित परिवर्त्यों की पहचान कीजिए: 1. अध्यापक का कक्षा में व्यवहार छात्रों के निष्पादन को प्रभावित करता है। 2. माता-पिता एवं बच्चों के मध्य स्वस्थ संबंधों से बच्चों में संवेगात्मक समायोजन का विकास होता है। 3. साथियों के दबाव में वृद्धि के साथ दुर्बिचता के स्तर में वृद्धि होती है। 4. युवा बच्चों के वातावरण को विशिष्ट पुस्तकों एवं पहेलियों से समृद्ध बनाने से उनके निष्पादन में वृद्धि होती है।
उत्तर:
1. अध्यापक का कक्षा में व्यवहार (अनाश्रित परिवर्त्य) छात्रों के निष्पादन (आश्रित परिवर्त्य) को प्रभावित करता है। 2. माता-पिता एवं बच्चों के मध्य स्वस्थ संबंध (अनाश्रित परिवर्त्य) से बच्चों में संवेगात्मक समायोजन (आश्रित परिवर्त्य) का विकास होता है। 3. साथियों के दबाव में वृद्धि (अनाश्रित परिवर्त्य) के साथ दुर्बिचता के स्तर (आश्रित परिवर्त्य) में वृद्धि होती है। 4. युवा बच्चों के वातावरण को विशिष्ट पुस्तकों एवं पहेलियों से समृद्ध बनाना (अनाश्रित परिवर्त्य) उनके निष्पादन (आश्रित परिवर्त्य) में वृद्धि करता है। अनाश्रित परिवर्त्य वह होता है जिसे नियंत्रित या बदला जाता है, जबकि आश्रित परिवर्त्य वह होता है जिस पर प्रभाव मापा जाता है।
व्याख्या:
प्रत्येक परिकल्पना में जो कारक नियंत्रित या बदला जाता है वह अनाश्रित परिवर्त्य होता है और जिस पर प्रभाव मापा जाता है वह आश्रित परिवर्त्य होता है। उदाहरण के लिए, अध्यापक का व्यवहार बदलने पर छात्रों के निष्पादन में परिवर्तन देखा जाता है। इसी प्रकार अन्य परिकल्पनाओं में भी अनाश्रित और आश्रित परिवर्त्यों की पहचान की गई है।
Q3.इंटरनेट पर एक अन्वेषणकर्ता ने एक प्रश्नावली बनाई है। आप क्या सुझाव देंगे कि वह प्रश्नावली कैसे तैयार करे ताकि अधिक से अधिक प्रतिक्रियाएँ मिल सकें? इसके लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
इंटरनेट पर प्रश्नावली तैयार करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए: 1. प्रश्न सरल और स्पष्ट हों ताकि सभी लोग आसानी से समझ सकें। 2. प्रश्नावली का आकार छोटा और संक्षिप्त हो ताकि लोग उसे पूरा भरने में रुचि लें। 3. प्रश्नों को आकर्षक और रोचक बनाना चाहिए ताकि उत्तरदाता उत्साहित हों। 4. गोपनीयता का आश्वासन देना चाहिए ताकि लोग ईमानदारी से उत्तर दें। 5. उत्तर देने के लिए समय सीमा स्पष्ट होनी चाहिए। 6. तकनीकी समस्याओं से बचने के लिए प्रश्नावली को विभिन्न उपकरणों पर टेस्ट करना चाहिए। 7. प्रोत्साहन या पुरस्कार देने की व्यवस्था हो सकती है जिससे उत्तरदाता अधिक संख्या में प्रतिक्रियाएँ दें।
व्याख्या:
प्रश्नावली की सफलता इसके डिजाइन और प्रस्तुति पर निर्भर करती है। सरलता, स्पष्टता, और उत्तरदाता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रश्नावली तैयार करनी चाहिए। साथ ही, गोपनीयता और प्रोत्साहन भी प्रतिक्रियाओं की संख्या बढ़ाने में सहायक होते हैं।
Q4.प्रश्नावली देकर जानना चाहता है कि कल्याण कार्यक्रमों के प्रति लोगों की अभिवृत्ति कैसी है। क्या यह अध्ययन सामान्य लोगों के विचारों को सही-सही प्रदर्शित करता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर:
यह अध्ययन सामान्य लोगों के विचारों को सही-सही प्रदर्शित नहीं करता है क्योंकि प्रश्नावली आधारित सर्वेक्षण में प्रतिक्रियादाता अपनी वास्तविक अभिवृत्ति छुपा सकते हैं या सतही उत्तर दे सकते हैं। इसके अलावा, प्रश्नावली में शामिल लोग सर्वेक्षण में भाग लेने के लिए स्वेच्छा से चुनते हैं, जिससे चयन पूर्वाग्रह हो सकता है। अतः यह अध्ययन जनसामान्य के विचारों का पूर्ण और सही प्रतिनिधित्व नहीं करता।
व्याख्या:
प्रश्नावली आधारित सर्वेक्षण में प्रतिक्रियादाता साक्षात्कारकर्ता को नहीं जानते, जिससे असहयोग या अनिच्छा हो सकती है। वे अपनी वास्तविक अभिवृत्ति छुपा सकते हैं या सामाजिक रूप से स्वीकार्य उत्तर दे सकते हैं। इसके अलावा, जो लोग प्रश्नावली भरते हैं वे जनसंख्या का प्रतिनिधि नहीं हो सकते। इसलिए, यह अध्ययन सामान्य लोगों के विचारों को सही-सही प्रदर्शित नहीं करता।
Q5.1. वैज्ञानिक जांच के लक्ष्य क्या होते हैं ?
उत्तर:
वैज्ञानिक जांच के लक्ष्य होते हैं: - व्यवहार और मानसिक प्रक्रियाओं को समझना और व्याख्या करना। - मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का विकास करना। - व्यवहार में सुधार के उपाय सुझाना। - व्यवहार के कारणों और परिणामों का पता लगाना। - मनोवैज्ञानिक समस्याओं का निदान और उपचार करना।
व्याख्या:
वैज्ञानिक जांच का उद्देश्य मनोवैज्ञानिक घटनाओं को व्यवस्थित, वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत तरीके से समझना होता है। यह ज्ञान के विकास और व्यवहार में सुधार के लिए आवश्यक है।
Q6.2. वैज्ञानिक जांच करने में अंतर्निहित विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैज्ञानिक जांच के चरण: 1. समस्या की पहचान: जांच के लिए विषय या समस्या का चयन। 2. परिकल्पना निर्माण: संभावित उत्तर या व्याख्या का प्रस्ताव। 3. योजना बनाना: जांच की विधि और उपकरणों का चयन। 4. डेटा संग्रह: प्रयोग, सर्वेक्षण या प्रेक्षण द्वारा जानकारी एकत्र करना। 5. डेटा विश्लेषण: सांख्यिकीय या गुणात्मक विधियों से डेटा का विश्लेषण। 6. निष्कर्ष निकालना: परिणामों के आधार पर परिकल्पना की पुष्टि या खंडन। 7. रिपोर्ट लेखन: जांच के परिणामों का दस्तावेजीकरण।
व्याख्या:
वैज्ञानिक जांच एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है जिसमें समस्या की पहचान से लेकर निष्कर्ष तक के चरण शामिल होते हैं। प्रत्येक चरण जांच की विश्वसनीयता और वैधता सुनिश्चित करता है।
Q7.3. मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों के स्वरूप: - निरपेक्ष शून्य बिंदु का अभाव: मनोवैज्ञानिक माप में शून्य का निश्चित अर्थ नहीं होता। - सापेक्ष स्वरूप: मापन परिणाम संदर्भ या तुलना पर निर्भर होते हैं। - गुणात्मक और परिमाणात्मक: प्रदत्तों में गुणात्मक (गुणों से संबंधित) और परिमाणात्मक (मात्रा से संबंधित) दोनों प्रकार के डेटा होते हैं। - आत्मपरक व्याख्या: गुणात्मक प्रदत्तों की व्याख्या प्रतिभागी के दृष्टिकोण पर निर्भर होती है।
व्याख्या:
मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों की प्रकृति भौतिक मापों से भिन्न होती है, इसलिए इनके मापन और व्याख्या में सावधानी आवश्यक होती है।
Q8.4. प्रायोगिक तथा नियंत्रित समूह एक-दूसरे से कैसे भिन्न होते हैं? एक उदाहरण की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायोगिक समूह वह समूह होता है जिस पर प्रयोग का प्रभाव डाला जाता है, जबकि नियंत्रित समूह पर कोई प्रभाव नहीं डाला जाता और यह तुलना के लिए होता है। उदाहरण: यदि एक अध्ययन में नई शिक्षण विधि का प्रभाव जानना है, तो प्रायोगिक समूह को नई विधि से पढ़ाया जाएगा और नियंत्रित समूह को पारंपरिक विधि से। फिर दोनों समूहों के परिणामों की तुलना की जाएगी।
व्याख्या:
प्रायोगिक और नियंत्रित समूहों के बीच अंतर यह है कि प्रायोगिक समूह पर स्वतंत्र परिवर्त्य का प्रभाव डाला जाता है जबकि नियंत्रित समूह पर नहीं, जिससे प्रभाव का मूल्यांकन संभव होता है।
Manovigyan के सभी 8 अध्याय
Psychology · Class 11