Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 12 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
9.1 प्रस्तावना
व्याख्या9.1 प्रस्तावना
इस अनुभाग में पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता की मूल अवधारणाओं का परिचय दिया गया है। पोषण का अर्थ है शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की प्राप्ति और उनका उपयोग करना। यह जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह शरीर की वृद्धि, विकास, ऊर्जा उत्पादन और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में सहायक होता है। बच्चों में वृद्धि निरंतर होती रहती है, इसलिए उनकी पोषण संबंधी आवश्यकताएँ उनकी वृद्धि-दर, शरीर के वजन और विकास की प्रत्येक अवस्था में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किए गए पोषक तत्वों पर निर्भर करती हैं। बच्चों में शारीरिक एवं मानसिक विकास तीव्र होता है, इसलिए पोषण की कमी से आजीवन अक्षमताएँ हो सकती हैं। उचित पोषण से बच्चे पूर्ण क्षमताओं के साथ बढ़ते हैं। पर्याप्त पोषण शरीर के अंगों के कार्य, संज्ञानात्मक निष्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, ऊर्जा स्तरों की वृद्धि और सकारात्मक दृष्टिकोण के विकास में योगदान देता है। इस प्रकार, पोषण का अध्ययन बच्चों के समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- पोषण का अर्थ शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की प्राप्ति और उनका उपयोग है।
- बच्चों की पोषण आवश्यकताएँ उनकी वृद्धि-दर, वजन और विकास पर निर्भर करती हैं।
- अपर्याप्त पोषण से शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है।
- पर्याप्त पोषण से रोग प्रतिरोधक क्षमता और ऊर्जा स्तर बढ़ते हैं।
- पोषण बच्चों के संज्ञानात्मक और भावात्मक विकास में सहायक होता है।
- 📌 पोषण: शरीर में भोजन का कार्य करना और आवश्यक पोषक तत्वों की प्राप्ति।
- 📌 स्वस्थता: शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वास्थ्य की स्थिति।
9.2 शैशव (जन्म से 12 माह तक) के दौरान पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता
व्याख्या9.2 शैशव (जन्म से 12 माह तक) के दौरान पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वस्थता
शैशवावस्था में बच्चे की वृद्धि अत्यंत तीव्र होती है, विशेषकर जन्म से 6 माह तक। इस अवधि में बच्चे को माँ का दूध देना सर्वोत्तम पोषण माना जाता है क्योंकि माँ का दूध सभी आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होता है और आसानी से पच जाता है। शिशु को जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू करना चाहिए। प्रारंभिक 2-3 दिनों में नवदुग्ध (कोलॉस्ट्रम) दिया जाना चाहिए जो पीला रंग का तरल होता है और प्रतिरक्षी तत्वों से भरपूर होता है। शिशु की ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्सियम, लौह तत्व, विटामिन ए, थायमिन, नियासीन, राइबोफ्लेविन, विटामिन सी, फोलिक अम्ल आदि की आवश्यकताएँ आई.सी.एम.आर. द्वारा निर्धारित की गई हैं। माँ के दूध के साथ-साथ 6 माह की उम्र के बाद पूरक आहार देना आवश्यक होता है, जो धीरे-धीरे शिशु की बढ़ती पोषण आवश्यकताओं को पूरा करता है। पूरक आहार के प्रकारों में तरल पूरक, अर्द्धदोस पूरक और दोस पूरक आहार शामिल हैं। पूरक आहार देते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि संक्रमण से बचाव हो सके। कम वजन वाले शिशुओं के लिए माँ का दूध सर्वोत्तम आहार है क्योंकि यह रोगाणुनिरोधी गुणों से भरपूर होता है। **Table on page 3 (17×3)** | सारणी 1 – शिशुओं के पोषक तत्वों की अनुशंसित दैनिक मात्रा | | | | --- | --- | --- | | आई.सी.एम.आर. द्वारा अनुशंसित | | | | पोषक तत्व | जन्म से 6 माह तक | 6–12 माह तक | | ऊर्जा (किलो कैलोरी) | 108 कि.ग्रा. शरीर वजन | 98 कि.ग्रा. शरीर वजन | | प्रोटीन (ग्राम) | 2.05 कि.ग्रा. शरीर वजन | 1.65 कि.ग्रा. शरीर वजन | | कैल्सियम (मि.ग्रा.) | 500 | 500 | | विटामिन ए | | | | रेटिनॉल (माइक्रो ग्राम) | 350 | 350 | | अथवा | | | | बीटा कैरोटीन (माइक्रो ग्राम) | 1200 | 1200 | | थायमिन (माइक्रो ग्राम) | 55 / कि.ग्रा. शरीर वजन | 50 / कि.ग्रा. शरीर वजन | | नियासीन (माइक्रो ग्राम) | 710 / कि.ग्रा. शरीर वजन | 650 / कि.ग्रा. शरीर वजन | | राईबोफ्लेविन (माइक्रो ग्राम) | 65 / कि.ग्रा. शरीर वजन | 60 / कि.ग्रा. शरीर वजन | | पाईरिडॉक्सिन (माइक्रो ग्राम) | 0.1 | 0.4 | | एस्कार्बिक अम्ल (विटामिन सी) (माइक्रो ग्राम) | 25 | 25 | | फोलिक अम्ल (माइक्रो ग्राम) | 25 | 25 | | विटामिन बी 12 (माइक्रो ग्राम) | 0.2 | 0.2 | **Table on page 5 (4×3)** | तरल पूरक | अर्द्धदोस पूरक आहार 5-6 माह तक शुरू करना | दोस पूरक – 10 माह से एक वर्ष तक, जब शिशु दांत निकालता है | | --- | --- | --- | | 3:1 के अनुपात में उबले पानी के साथ मिला दूध। तत्पश्चात् कुछ सप्ताह में बिना पानी वाला दूध | अच्छी तरह पकी हुई एवं मसली हुई सब्जी | दाल, अनाज, टुकड़े किया गया मांस जिसमें अनेक चीजें मिलाकर पकाई गई हों। | | संतरे, मौसमी जैसे स्ट्रॉज फलों का रस, 4 माह पर 5 मि. ली. से शुरू करते हुए एक वर्ष तक 85 मि. ली. तक बढ़ाना | दालें और अनाज अलग से अच्छी तरह पका हुआ अथवा मिलाया हुआ। दूध तथा चीनी मिलाई जा सकती है। | भोजन के रूप में हाथों से पकड़कर खाया जाने वाला कच्चा सलाद एवं फल | | सूप : सब्जी, दाल, छना हुआ सूप 4-5 माह पर। लगभग एक वर्ष के बाद नमक और प्याज के साथ बिना छना सूप | अंडपीतक: 7 माह तक, आधे चम्मच अंडे की पीली जर्दी से शुरू करके एक वर्ष तक एक बड़ी चम्मच अंडे की जर्दी | पकाई गई और मसली हुई मछली एवं मांस एक वर्ष के पूरा होने पर शुरू किया जाए। | **Table on page 14 (6×4)** | थायमिन (मि. ग्रा.) | 1.0 | 1.1 | 1.0 | | राइबोलेविन (मि. ग्रा.) | 1.2 | 1.3 | 1.2 | | पाइरिडॉक्सिन (मि. ग्रा.) | 1.6 | 1.6 | 1.6 | | फोलिक अम्ल (माइक्रो ग्राम) | 60 | 70 | 70 | | ऐस्कार्बिक अम्ल (मि. ग्रा.) | 40 | 40 | 40 | | विटामिन बी 12 (मि. ग्रा.) | 0.2.1 | 0.2-1 | 0.2-1 | | नियासिन (मि. ग्रा.) | 13 | 15 | 13 |
- शैशवावस्था में पोषण की आवश्यकता अत्यंत तीव्र होती है।
- माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक आहार है।
- नवदुग्ध (कोलॉस्ट्रम) में प्रतिरक्षी तत्व होते हैं।
- 6 माह के बाद पूरक आहार देना आवश्यक होता है।
- पूरक आहार के प्रकार: तरल पूरक, अर्द्धदोस पूरक, दोस पूरक।
- स्वच्छता पूरक आहार देते समय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- 📌 स्तनपान: माँ के दूध से शिशु को पोषण देना।
- 📌 नवदुग्ध (कोलॉस्ट्रम): जन्म के तुरंत बाद निकलने वाला पीला दूध, जो प्रतिरक्षी तत्वों से भरपूर होता है।
- 📌 पूरक आहार: माँ के दूध के अतिरिक्त शिशु को दिया जाने वाला अन्य खाद्य पदार्थ।
राष्ट्रीय प्रतिरक्षण कार्यक्रम
व्याख्याराष्ट्रीय प्रतिरक्षण कार्यक्रम
राष्ट्रीय प्रतिरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को जन्म से किशोरावस्था तक विभिन्न संक्रामक रोगों से बचाने के लिए टीकाकरण किया जाता है। टीका एक निष्क्रिय जीवाणु या विषाणु होता है जो संक्रमण नहीं करता, लेकिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करता ह
अभ्यास प्रश्न — Chapter 2
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. हमें विद्यालय जाने वाले बच्चे के आहार में संतृप्त वसा, अतिरिक्त चीनी तथा नमक की मात्रा को सीमित क्यों करना चाहिए?
उत्तर:
विद्यालय जाने वाले बच्चे के आहार में संतृप्त वसा, अतिरिक्त चीनी तथा नमक की मात्रा को सीमित इसलिए करना चाहिए क्योंकि अत्यधिक वसा युक्त भोजन, अधिक नमक, कम रेशा एवं चीनी मिले पेय से बच्चों में मोटापा बढ़ता है जो स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता है। यह असक्रिय जीवन-शैली के साथ मिलकर टाइप 2 मधुमेह, उच्च रक्तदाब तथा हृदय रोग जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है। इसलिए संतुलित और पौष्टिक आहार देना आवश्यक है ताकि बच्चे स्वस्थ रहें और उनकी शारीरिक तथा मानसिक वृद्धि सही ढंग से हो सके।
व्याख्या:
संतृप्त वसा, अतिरिक्त चीनी और नमक का अधिक सेवन शरीर में वसा के जमाव, रक्तचाप में वृद्धि और रक्त शर्करा के स्तर को प्रभावित करता है। इससे मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तदाब जैसी बीमारियाँ होती हैं। इसलिए बच्चों के आहार में इनकी मात्रा सीमित करनी चाहिए।
Q2.2. भोजन की योजना बनाने में बच्चों को शामिल करना स्वस्थ खान-पान में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर:
भोजन की योजना बनाने में बच्चों को शामिल करने से वे स्वस्थ खान-पान के महत्व को समझते हैं और अपनी पसंद के अनुसार पौष्टिक विकल्प चुनने लगते हैं। इससे उनकी रुचि बढ़ती है और वे भोजन को लेकर जागरूक होते हैं। बच्चों को योजना में शामिल करने से वे संतुलित आहार की आदतें विकसित करते हैं, जो उनके शारीरिक विकास और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं।
व्याख्या:
जब बच्चे भोजन योजना में भाग लेते हैं तो वे पोषण के बारे में सीखते हैं, अपनी पसंद व्यक्त करते हैं और स्वस्थ विकल्प चुनने के लिए प्रेरित होते हैं। इससे उनकी भोजन की आदतें बेहतर होती हैं और वे पोषण की कमी से बचते हैं।
Q3.3. बचपन में मोटापे में वृद्धि हो रही है। कारण बताइए?
उत्तर:
बचपन में मोटापे में वृद्धि के कारण हैं: (i) आहार में अत्यधिक वसा युक्त भोजन, अधिक नमक, कम रेशा तथा चीनी मिले पेय पदार्थों का अधिक सेवन, (ii) असक्रिय जीवन-शैली, जिसमें शारीरिक गतिविधि की कमी होती है, (iii) अधिक समय तक टेलीविजन देखना और खेल-कूद में भाग न लेना, (iv) उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्ग के बच्चों में पोषण की असंतुलित आदतें। ये सभी कारण मिलकर बच्चों में अतिरिक्त वसा के जमाव और वजन बढ़ने का कारण बनते हैं।
व्याख्या:
अत्यधिक वसा, नमक और चीनी युक्त भोजन तथा कम शारीरिक गतिविधि से कैलोरी का अधिक सेवन होता है और खर्च कम होता है, जिससे मोटापा बढ़ता है।
Q4.4. ‘‘मध्याह्न भोजन योजना’’ से किस प्रकार बच्चों के स्वास्थ्य एवं विद्यालय के कार्य निष्पादन में वृद्धि हुई है?
उत्तर:
मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत विद्यालय में निःशुल्क पौष्टिक भोजन प्रदान किया जाता है जिससे बच्चों को पर्याप्त पोषण मिलता है। इससे बच्चों की कुपोषण की समस्या कम हुई है, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी है, जिससे वे कम बीमार पड़ते हैं। इसके परिणामस्वरूप बच्चों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ी है और विद्यालय में उनका कार्य निष्पादन बेहतर हुआ है। साथ ही विद्यालय में नामांकन बढ़ा है और विद्यालय छोड़ने की दर में कमी आई है। बालिकाओं की संख्या में वृद्धि से शिक्षा में लिंग भेद भी कम हुआ है।
व्याख्या:
मध्याह्न भोजन योजना से बच्चों को पौष्टिक भोजन मिलता है जो उनकी शारीरिक और मानसिक विकास में सहायक होता है। इससे उनकी ऊर्जा स्तर बढ़ती है और वे विद्यालय में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
Q5.(क) आप अपने पैतृक गाँव अथवा किसी अन्य गाँव में जा रहे हैं जहाँ आप पाते हैं कि बच्चे कुपोषित हैं और इसके कारण होने वाले रोगों के शिकार हैं। यदि आपको बच्चों के माता-पिता से बात करने के लिए कहा जाए तो आप किसके बारे में बात करेंगे? (i) बच्चों की रोगों से सुरक्षा करने के लिए पर्याप्त पोषण की भूमिका? (ii) छोटे बच्चों के लिए संतुलित भोजन की योजना? (iii) संचारी रोग तथा प्रतिरक्षण का महत्व? (iv) विद्यालय पूर्व वर्षों के दौरान प्रतिरक्षण कार्यक्रम?
उत्तर:
(i) बच्चों को रोगों से बचाने के लिए पर्याप्त और संतुलित पोषण आवश्यक है क्योंकि इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। (ii) छोटे बच्चों के लिए संतुलित भोजन में सभी आवश्यक पोषक तत्व शामिल होने चाहिए जैसे कि प्रोटीन, विटामिन, खनिज, कार्बोहाइड्रेट और वसा। (iii) संचारी रोगों से बचाव के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना और समय पर टीकाकरण कराना आवश्यक है। (iv) विद्यालय पूर्व वर्षों में प्रतिरक्षण कार्यक्रम बच्चों को विभिन्न संक्रामक रोगों से बचाते हैं, जिससे उनकी सेहत बेहतर होती है और वे स्वस्थ रहते हैं। माता-पिता को इन बातों के प्रति जागरूक करना चाहिए।
व्याख्या:
कुपोषण से बचाने के लिए पोषण, स्वच्छता, टीकाकरण और प्रतिरक्षण कार्यक्रमों की जानकारी देना आवश्यक है ताकि बच्चे स्वस्थ रहें और रोगों से बच सकें।
Q6.(ख) आपके पड़ोसी का दो वर्षीय बच्चा बार-बार डायरिया से पीड़ित होता है। उसको इसके बारे में बताएँ— - शिशुओं की पोषण संबंधी आवश्यकता - शिशु के स्वास्थ्य एवं विकास के लिए अनन्य स्तनपान का महत्व। - अल्प लागत वाले पूरक भोजन तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध भोजन पदार्थों से उनका निर्माण
उत्तर:
शिशुओं की पोषण संबंधी आवश्यकता होती है कि उन्हें जन्म के बाद छह महीने तक केवल माँ का दूध दिया जाए क्योंकि यह सभी आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। अनन्य स्तनपान से शिशु का स्वास्थ्य मजबूत होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और विकास सही होता है। डायरिया से बचाव के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना आवश्यक है। अल्प लागत वाले पूरक भोजन जैसे अंकुरित दालें, उबली हुई सब्जियाँ, स्थानीय फल आदि से पोषण की कमी पूरी की जा सकती है। इनका निर्माण स्थानीय उपलब्ध संसाधनों से किया जा सकता है जिससे बच्चे स्वस्थ रहें।
व्याख्या:
अनन्य स्तनपान से शिशु को रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है। पूरक भोजन से पोषण की कमी पूरी होती है और डायरिया जैसी बीमारियों से बचाव होता है।
Q7.(ग) विद्यालय जाने वाले बच्चों में पौष्टिक भोजन करने की आदतें विकसित करने के लिए उपायों की सूची बनाइए एवं उनकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पौष्टिक भोजन की आदतें विकसित करने के उपाय: 1. बच्चों को स्वस्थ आहार के महत्व के बारे में जागरूक करना। 2. भोजन योजना में बच्चों को शामिल करना ताकि वे अपनी पसंद के अनुसार स्वस्थ विकल्प चुनें। 3. विद्यालय एवं परिवार में स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराना। 4. अस्वास्थ्यकर भोजन जैसे जंक फूड से बचाव करना। 5. नियमित शारीरिक गतिविधि को प्रोत्साहित करना। 6. स्वच्छता का ध्यान रखना, जैसे खाने से पहले हाथ धोना। इन उपायों से बच्चे स्वस्थ भोजन की आदतें विकसित करते हैं, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है।
व्याख्या:
उपरोक्त उपाय बच्चों को स्वस्थ भोजन की ओर प्रेरित करते हैं और उन्हें पोषण की कमी से बचाते हैं।
Q8.(घ) पोषण संबंधी मुद्दों सहित विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की सहायता करने के लिए उन पहलुओं की व्याख्या कीजिए जिन्हें आप ध्यान में रखेंगे— (i) प्रेक्षण (निगरानी) (ii) शारीरिक गतिविधियाँ (iii) खाने के कौशल का विकास (iv) विविधता (v) विशेष आहार
उत्तर:
(i) प्रेक्षण (निगरानी): बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की नियमित निगरानी करना ताकि किसी समस्या का समय पर पता चल सके। (ii) शारीरिक गतिविधियाँ: बच्चों को नियमित रूप से व्यायाम और खेल में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना जिससे उनका शारीरिक विकास हो। (iii) खाने के कौशल का विकास: बच्चों को सही तरीके से खाना खाने, चबाने और निगलने की आदतें सिखाना। (iv) विविधता: आहार में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्वों को शामिल करना ताकि सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल सकें। (v) विशेष आहार: यदि बच्चे को कोई विशेष पोषण संबंधी आवश्यकता हो तो उसके अनुसार आहार योजना बनाना। इन पहलुओं पर ध्यान देकर विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की बेहतर देखभाल की जा सकती है।
व्याख्या:
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए नियमित निगरानी, शारीरिक गतिविधि, सही खाने की आदतें, विविध और विशेष आहार आवश्यक हैं ताकि वे स्वस्थ रहें।
Manav Paristhitiki evm pariwar vigyan Bhag-II के सभी 5 अध्याय
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