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Chapter 12

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Chapter 11अध्याय 12 / 13Chapter 13

Chapter 12अध्ययन नोट्स

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पारितंत्र संरचना एवं क्रियाशीलता

व्याख्या

पारितंत्र संरचना एवं क्रियाशीलता

पारितंत्र को प्रकृति की एक क्रियाशील इकाई के रूप में देखा जाता है जहाँ जीवधारी (जैविक घटक) और अजैविक घटक परस्पर क्रिया करते हैं। इसका आकार छोटे तालाब से लेकर विशाल जंगल या महासागर तक हो सकता है। संपूर्ण जीवमंडल को विश्व पारितंत्र माना जाता है, जिसमें पृथ्वी के सभी स्थानीय पारितंत्र सम्मिलित होते हैं। अध्ययन की सुविधा हेतु पारितंत्र को मुख्यतः स्थलीय और जलीय दो श्रेणियों में बांटा गया है। स्थलीय पारितंत्र के उदाहरण हैं जंगल, घास के मैदान, मरूस्थल आदि, जबकि जलीय पारितंत्र में झील, तालाब, दलदली क्षेत्र, नदियाँ एवं ज्वार-नदमुख (एस्टुअरी) आते हैं। मानव निर्मित पारितंत्र के उदाहरण शस्यभूमि और जलजीवशाला हैं। पारितंत्र की संरचना में जैविक और अजैविक घटक शामिल होते हैं। जैविक घटक में उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक आते हैं, जबकि अजैविक घटकों में हवा, पानी, मिट्टी आदि शामिल हैं। एक पारितंत्र में पादप और प्राणी प्रजातियों की पहचान और गणना से उसकी प्रजाति संघटन (composition) ज्ञात होती है। विभिन्न प्रजातियों का ऊर्ध्वाधर वितरण स्तरविन्यास कहलाता है, जैसे जंगल में वृक्ष सर्वोपरि स्तर, झाड़ियाँ द्वितीयक स्तर और जड़ी-बूटियाँ निचले स्तर पर होती हैं। पारितंत्र की क्रियाशीलता को समझने के लिए उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह और पोषण चक्र जैसे पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप एक छोटे तालाब का पारितंत्र लें, जिसमें पानी, कार्बनिक और अकार्बनिक तत्व, मृदा निक्षेप, सौर ऊर्जा, ताप, जलवायु आदि सभी क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं। तालाब में स्वपोषी घटक जैसे पादप लवक, काई, प्लवक, सीमांत पादप, उपभोक्ता जैसे प्राणिप्लवक, तलीय जीव और अपघटक जैसे कवक, जीवाणु पाए जाते हैं। इस पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सूर्य से उत्पादकों, उपभोक्ताओं और अपघटकों तक एकदिशीय होता है। मृत जीवों का अपघटन होकर पोषक तत्व पुनः उत्पादकों के लिए उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार पारितंत्र एक जीवित और गतिशील इकाई है।

  • पारितंत्र जीवधारी और अजैविक घटकों का क्रियाशील संयोजन है।
  • स्थलीय और जलीय पारितंत्र मुख्य दो प्रकार हैं।
  • प्रजाति संघटन और स्तरविन्यास पारितंत्र की भौतिक संरचना को दर्शाते हैं।
  • ऊर्जा प्रवाह, उत्पादकता, अपघटन और पोषण चक्र पारितंत्र की मुख्य क्रियाएँ हैं।
  • तालाब एक सरल जलीय पारितंत्र का उदाहरण है।
  • पारितंत्र में ऊर्जा सूर्य से उत्पादकों के माध्यम से उपभोक्ताओं और अपघटकों तक प्रवाहित होती है।
  • 📌 पारितंत्र: जीवधारी और अजैविक घटकों का क्रियाशील पर्यावरणीय तंत्र।
  • 📌 स्तरविन्यास: विभिन्न प्रजातियों का ऊर्ध्वाधर वितरण।
  • 📌 प्रजाति संघटन: पारितंत्र में प्रजातियों की पहचान और संख्या।

उत्पादकता

व्याख्या

उत्पादकता

पारितंत्र की क्रियाशीलता और स्थायित्व के लिए सौर ऊर्जा का निरंतर निवेश आवश्यक है। उत्पादकता से तात्पर्य है किसी निश्चित क्षेत्र में एक निश्चित समय में पादपों द्वारा उत्पन्न जैव मात्रा या कार्बनिक सामग्री की मात्रा। इसे ग्राम प्रति वर्ग मीटर (g/m²) या किलो कैलोरी प्रति वर्ग मीटर (K cal/m²) में मापा जाता है। उत्पादकता को सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) और शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) में बांटा जाता है। सकल प्राथमिक उत्पादकता वह कुल कार्बनिक पदार्थ है जो प्रकाश संश्लेषण के दौरान उत्पादकों द्वारा बनता है। इसमें से कुछ हिस्सा पादपों के श्वसन में खर्च हो जाता है। जब GPP से श्वसन द्वारा उपयोग की गई ऊर्जा घटा दी जाती है तो जो बचती है उसे NPP कहते हैं। NPP वह जैव मात्रा है जो उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध होती है। द्वितीयक उत्पादकता उपभोक्ताओं द्वारा नए कार्बनिक पदार्थों के निर्माण की दर है। उत्पादकता विभिन्न पारितंत्रों में पर्यावरणीय कारकों, पोषक तत्वों की उपलब्धता और प्रकाश संश्लेषण क्षमता पर निर्भर करती है। पृथ्वी की कुल वार्षिक प्राथमिक उत्पादकता लगभग 170 बिलियन टन कार्बनिक तत्व (शुष्क भार) है, जिसमें से 55 बिलियन टन महासागरों में और शेष भूमि पर उत्पन्न होती है। महासागरों की निम्न उत्पादकता के कारण पोषक तत्वों की कमी, गहराई, प्रकाश की कमी आदि हैं।

  • उत्पादकता सौर ऊर्जा के निरंतर निवेश पर निर्भर है।
  • सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) और शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) में अंतर होता है।
  • NPP उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध जैव मात्रा है।
  • द्वितीयक उत्पादकता उपभोक्ताओं द्वारा नए कार्बनिक पदार्थों का निर्माण है।
  • उत्पादकता पर्यावरणीय कारकों और पोषक तत्वों पर निर्भर करती है।
  • पृथ्वी की कुल वार्षिक प्राथमिक उत्पादकता लगभग 170 बिलियन टन है।
  • 📌 सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP): प्रकाश संश्लेषण द्वारा कुल कार्बनिक पदार्थ।
  • 📌 शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP): GPP में से श्वसन की ऊर्जा घटाने के बाद बची ऊर्जा।
  • 📌 द्वितीयक उत्पादकता: उपभोक्ताओं द्वारा नए कार्बनिक पदार्थों का निर्माण।

अपघटन

व्याख्या

अपघटन

अपघटन वह प्रक्रिया है जिसमें मृत पादप और प्राणियों के जटिल कार्बनिक अवशेषों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदला जाता है। इस प्रक्रिया में अपघटक जैसे कवक, जीवाणु और केंचुए मुख्य भूमिका निभाते हैं। मृत अवशेषों को अपरद (डेट्राइट्स) कहा जाता है, जो अपघटन

अभ्यास प्रश्नChapter 12

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.रिक्त स्थानों को भरो। (क) पादपों को …………………… कहते हैं; क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड का स्थिरीकरण करते हैं। (ख) पादप द्वारा प्रमुख पारितंत्र का पिरैमिड (सं- का) (………………) प्रकार का है। (ग) एक जलीय पारितंत्र में, उत्पादकता का सीमा कारक ……………… है। (घ) हमारे पारितंत्र में सामान्य अपरदन ……………… हैं। (च) पृथ्वी पर कार्बन का प्रमुख भंडार ……………… है।

उत्तर:

(क) पादपों को उत्पादक कहते हैं; क्योंकि वे कार्बन डाईऑक्साइड का स्थिरीकरण करते हैं। (ख) पादप द्वारा प्रमुख पारितंत्र का पिरैमिड (संख्या का) पिरामिड प्रकार का होता है। (ग) एक जलीय पारितंत्र में, उत्पादकता का सीमा कारक प्रकाश है। (घ) हमारे पारितंत्र में सामान्य अपरदक जीवाणु और कवक होते हैं। (च) पृथ्वी पर कार्बन का प्रमुख भंडार समुद्र और जीवाश्म ईंधन हैं।

व्याख्या:

पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बन डाईऑक्साइड को स्थिरीकृत करते हैं, इसलिए उन्हें उत्पादक कहा जाता है। पादपों की संख्या अधिक होती है, इसलिए पारितंत्र का संख्या पिरामिड होता है। जलीय पारितंत्र में प्रकाश की उपलब्धता उत्पादकता का सीमा कारक होती है। अपरदक जीवाणु और कवक होते हैं जो मृत पदार्थों का अपघटन करते हैं। पृथ्वी पर कार्बन का प्रमुख भंडार समुद्र और जीवाश्म ईंधन हैं।

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Q2.एक खाद्य श्रृंखला में निम्नलिखित में सर्वाधिक संख्या किसकी होती है- (क) उत्पादक (ख) प्राथमिक उपभोक्ता (ग) द्वितीयक उपभोक्ता (घ) अपघटक
A.A) उत्पादक
B.B) प्राथमिक उपभोक्ता
C.C) द्वितीयक उपभोक्ता
D.D) अपघटक

उत्तर:

सर्वाधिक संख्या उत्पादकों की होती है क्योंकि वे खाद्य श्रृंखला के आधार होते हैं और ऊर्जा का उत्पादन करते हैं। उत्पादकों की संख्या अधिक होती है ताकि उपभोक्ताओं को पर्याप्त ऊर्जा मिल सके।

व्याख्या:

खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह उत्पादकों से शुरू होता है। उत्पादक (जैसे पादप) की संख्या सबसे अधिक होती है क्योंकि वे सूर्य की ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। उपभोक्ताओं की संख्या क्रमशः कम होती जाती है। इसलिए, सर्वाधिक संख्या उत्पादकों की होती है।

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Q3.एक झील में द्वितीय (दूसरी) पोषण स्तर होता है- (क) पादपप्लवक (ख) प्राणिप्लवक (ग) नितलक (बैनथॉस) (घ) मछलियाँ
A.A) पादपप्लवक
B.B) प्राणिप्लवक
C.C) नितलक (बैनथॉस)
D.D) मछलियाँ

उत्तर:

द्वितीय पोषण स्तर प्राणिप्लवक होता है क्योंकि वे प्राथमिक उपभोक्ता होते हैं जो उत्पादकों (पादपप्लवक) को खाते हैं।

व्याख्या:

झील के पारितंत्र में पादपप्लवक उत्पादक होते हैं जो प्रकाश संश्लेषण करते हैं। प्राणिप्लवक वे जीव हैं जो पादपप्लवकों को खाते हैं और इसलिए वे द्वितीय पोषण स्तर पर होते हैं। नितलक और मछलियाँ उच्च पोषण स्तर पर होती हैं।

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Q4.द्वितीयक उत्पादक हैं- (क) शाकाहारी (शाकभक्षी) (ख) उत्पादक (ग) मांसाहारी (मांसभक्षी) (घ) उपरोक्त कोई भी नहीं
A.A) शाकाहारी (शाकभक्षी)
B.B) उत्पादक
C.C) मांसाहारी (मांसभक्षी)
D.D) उपरोक्त कोई भी नहीं

उत्तर:

द्वितीयक उत्पादक नहीं होते। उत्पादक वे जीव होते हैं जो स्वयं प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। शाकाहारी और मांसाहारी उपभोक्ता होते हैं। इसलिए सही उत्तर है (घ) उपरोक्त कोई भी नहीं।

व्याख्या:

प्राथमिक उत्पादक वे जीव होते हैं जो सूर्य की ऊर्जा का उपयोग कर कार्बन डाईऑक्साइड से कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं। द्वितीयक उत्पादक शब्द गलत है क्योंकि उत्पादक केवल प्राथमिक स्तर पर होते हैं। शाकाहारी और मांसाहारी उपभोक्ता होते हैं।

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Q5.प्रासंगिक सौर विकिरण में प्रकाश संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण का क्या प्रतिशत होता है? (क) 100% (ग) 50% (ग) 1-5% (घ) 2-10%
A.A) 100%
B.B) 50%
C.C) 1-5%
D.D) 2-10%

उत्तर:

प्रकाश संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण का प्रतिशत लगभग 1-5% होता है।

व्याख्या:

सौर विकिरण का केवल एक छोटा भाग (लगभग 1-5%) प्रकाश संश्लेषण के लिए सक्रिय होता है, जो मुख्यतः नीले और लाल रंग की तरंग दैर्ध्य सीमा में होता है।

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Q6.निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करें — (क) चारण खाद्य श्रृंखला एवं अपरद खाद्य श्रृंखला (ख) उत्पादन एवं अपघटन (ग) ऊर्ध्ववर्ती (शिखरांश) व अधोवर्ती पिरैमिड

उत्तर:

(क) चारण खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह प्रकाश संश्लेषक से शुरू होकर शाकाहारी और फिर मांसाहारी तक होता है, जबकि अपरद खाद्य श्रृंखला में मृत जैव पदार्थों का अपघटन होता है। (ख) उत्पादन वह प्रक्रिया है जिसमें जीव ऊर्जा का संचय करते हैं (जैसे प्रकाश संश्लेषण), जबकि अपघटन मृत पदार्थों को सरल पदार्थों में तोड़ने की प्रक्रिया है। (ग) ऊर्ध्ववर्ती पिरामिड में ऊर्जा या संख्या ऊपर की ओर कम होती है, जबकि अधोवर्ती पिरामिड में यह उल्टा हो सकता है, जैसे कुछ जलीय पारितंत्रों में संख्या पिरामिड उल्टा होता है।

व्याख्या:

चारण खाद्य श्रृंखला में जीव सीधे उत्पादकों को खाते हैं, जबकि अपरद खाद्य श्रृंखला में मृत पदार्थों का अपघटन होता है। उत्पादन ऊर्जा संचय की प्रक्रिया है, अपघटन ऊर्जा मुक्त करने की। ऊर्ध्ववर्ती पिरामिड में ऊर्जा या संख्या ऊपर की ओर घटती है, अधोवर्ती में बढ़ सकती है।

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Q7.निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करें — (क) खाद्य श्रृंखला तथा खाद्य जाल (बेब) (ख) लिटर (कर्कट) एवं अपरद (ग) प्राथमिक एवं द्वितीयक उत्पादकता

उत्तर:

(क) खाद्य श्रृंखला एक सरल रेखीय श्रृंखला होती है जिसमें ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव तक जाती है, जबकि खाद्य जाल में कई खाद्य श्रृंखलाएँ जुड़ी होती हैं। (ख) लिटर (कर्कट) मृत पत्तियों और अन्य कार्बनिक पदार्थों का जमा होता है, जबकि अपरद वे जीव होते हैं जो इस लिटर को अपघटित करते हैं। (ग) प्राथमिक उत्पादकता वह दर है जिस पर उत्पादक जीव ऊर्जा का निर्माण करते हैं, जबकि द्वितीयक उत्पादकता उपभोक्ताओं द्वारा ऊर्जा का संचय है।

व्याख्या:

खाद्य श्रृंखला सरल होती है, खाद्य जाल जटिल। लिटर मृत कार्बनिक पदार्थ है, अपरदक जीव इसे तोड़ते हैं। प्राथमिक उत्पादकता ऊर्जा निर्माण की दर है, द्वितीयक उत्पादकता उपभोक्ताओं की ऊर्जा संचय दर।

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Q8.पारिस्थितिक तंत्र के घटकों की व्याख्या करें।

उत्तर:

पारिस्थितिक तंत्र के घटक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: 1. जीवित घटक (Biotic components): इनमें उत्पादक (जैसे पादप), उपभोक्ता (शाकाहारी, मांसाहारी), और अपरदक (जैसे बैक्टीरिया, कवक) शामिल हैं। 2. निर्जीव घटक (Abiotic components): इनमें जल, वायु, मिट्टी, तापमान, प्रकाश आदि शामिल हैं जो जीवों के जीवन के लिए आवश्यक हैं। ये दोनों घटक मिलकर पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं।

व्याख्या:

पारिस्थितिक तंत्र में जीवित घटक ऊर्जा प्रवाह और पोषक तत्व चक्र में भूमिका निभाते हैं, जबकि निर्जीव घटक पर्यावरणीय परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। दोनों के बीच अंतःक्रिया से पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बनता है।

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