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अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि

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अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामिअध्ययन नोट्स

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अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि - परिचय

व्याख्या

अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि - परिचय

इस अध्याय का शीर्षक 'अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि' है, जिसका अर्थ है 'अब मैं शिक्षा का वर्णन करता हूँ'। वेदों का बोध, रक्षा एवं परंपरा को समृद्ध बनाए रखने के लिए वेदांगों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वेदांग छह हैं - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। इन सभी का ज्ञान वेदों के उत्तम बोध के लिए आवश्यक है। इनमें से शिक्षा को सर्वप्रथम स्थान दिया गया है, जैसा कि श्लोक में कहा गया है - 'शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य', अर्थात् शिक्षा वेद का घ्राण (सुनने की क्षमता) है। 'शिक्षा' शब्द सामान्यतः 'शिक्ष्' धातु से उत्पन्न माना जाता है जिसका अर्थ है 'शिक्षित होना' या 'शिक्षा देना'। परन्तु इस वेदांग में इसे 'शक्' धातु के सन्नत रूप से निकला माना जाता है, जिसका अर्थ है 'शक्तिमान होना' या 'शक्तिमान बनने की इच्छा रखना'। इस वेदांग में मुख्यतः वर्णोच्चारण और वेदमंत्रों के सही उच्चारण का ज्ञान दिया गया है, जो वेदों के अध्ययन और संरक्षण के लिए अनिवार्य है। पाणिनि के व्याकरणशास्त्र का पूरक शिक्षाग्रन्थ संभवतः पिंगलाचार्य द्वारा रचित 'पाणिनीय शिक्षा' है, जो वेदपरंपरा को सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने में सहायक है। इस प्रकार, शिक्षा वेदांगों में प्रथम स्थान प्राप्त है और वेदों के सही उच्चारण एवं अध्ययन के लिए इसका ज्ञान अनिवार्य है।

  • वेदांग छह हैं: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
  • शिक्षा वेदांगों में प्रथम स्थान रखता है।
  • 'शिक्षा' शब्द का अर्थ यहाँ 'शक्तिमान बनने की इच्छा' है।
  • शिक्षा में वर्णोच्चारण और वेदमंत्रों का सही उच्चारण सिखाया जाता है।
  • पाणिनीय शिक्षा ग्रन्थ वेदपरंपरा के संरक्षण में महत्वपूर्ण है।
  • वेदों के अध्ययन और संरक्षण के लिए वेदांगों का ज्ञान आवश्यक है।
  • 📌 वेदांग: वेदों के सहायक अंग जो वेदों के सही अध्ययन के लिए आवश्यक हैं।
  • 📌 शिक्षा: यहाँ वर्णोच्चारण और वेदमंत्रों के सही उच्चारण का ज्ञान।
  • 📌 पाणिनीय शिक्षा: पाणिनि के व्याकरणशास्त्र का पूरक ग्रन्थ।

वर्णों और स्वरों का स्वरूप

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वर्णों और स्वरों का स्वरूप

इस खंड में वर्णों और स्वरों के स्वरूप का विस्तृत वर्णन किया गया है। वेदों में वर्णों का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वेदों का सही उच्चारण ही वेदों के अध्ययन और संरक्षण का आधार है। वर्णों को त्रिपष्टि और चतु: पष्टि के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। त्रिपष्टि का अर्थ है तीन प्रकार के पष्टि (स्पर्श, उदात्त, अनुदात्त) और चतु: पष्टि चार प्रकार के पष्टि। स्वरों की संख्या २० है और स्पर्श वर्ण २५ हैं। इसके अतिरिक्त अनुस्वार, विसर्ग, लृकार, प्लुत आदि वर्ण भी हैं। वर्णों का उच्चारण शरीर के विभिन्न स्थानों से होता है, जैसे कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि। वर्णों के उच्चारण के स्थानों का वर्णन इस प्रकार है: - कण्ठ: कण्ठ से उच्चारित वर्ण - तालु: तालु से उच्चारित वर्ण - मूर्धा: मस्तक या सिर से उच्चारित वर्ण - दन्त: दाँतों से उच्चारित वर्ण - ओष्ठ: ओष्ठों से उच्चारित वर्ण स्वरों के प्रकार हैं: उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, ह्वस्व, दीर्घ, प्लुत। ये स्वरों के उच्चारण के काल, स्थान और प्रयत्न के अनुसार भेद हैं। वर्णों का सही उच्चारण वेदों के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है क्योंकि वेदों के मंत्रों का अर्थ और प्रभाव सही उच्चारण पर निर्भर करता है।

  • वर्णों की संख्या २५ और स्वरों की संख्या २० है।
  • स्वरों के प्रकार: उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, ह्वस्व, दीर्घ, प्लुत।
  • वर्णों के उच्चारण के स्थान: कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ।
  • अनुस्वार और विसर्ग भी वर्णों में शामिल हैं।
  • वर्णों का सही उच्चारण वेदों के अध्ययन के लिए अनिवार्य है।
  • वर्णों को त्रिपष्टि और चतु: पष्टि के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।
  • 📌 स्वर: ऐसे वर्ण जिनका उच्चारण बिना किसी बाधा के होता है।
  • 📌 स्पर्श वर्ण: ऐसे वर्ण जिनका उच्चारण करते समय किसी अंग का स्पर्श होता है।
  • 📌 अनुस्वार: नासिका से उच्चारित एक प्रकार का वर्ण।

पाठक गुण और दोष

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पाठक गुण और दोष

इस खंड में वेदों के पाठकों के गुण और दोषों का वर्णन किया गया है। वेदों के सही और प्रभावी पाठ के लिए पाठकों में कुछ विशेष गुण होने आवश्यक हैं। पाठकों के प्रमुख गुण हैं: 1. माधुर्य: पाठ में मधुरता और सुगमता होना। 2. अक्षरव्यक्ति: प्रत्येक अक्षर को स्प

अभ्यास प्रश्नअथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत- (क) अनुस्वारयमानाम् उच्चारणस्थानं किमुच्यते? (ख) ऊष्मणः गतिः कतिविधा? (ग) वेदस्य मुखं किं स्मृतम्? (घ) अज्ञानान्धस्य लोकस्य चक्षुः पाणिनिना कया उन्मीलितम्? (ङ) निरुक्तं वेदस्य किमुच्यते? (च) पुत्रान् हरन्ती व्याघ्री तान् काभ्यां न पीडयेत्?

उत्तर:

उत्तर- (क) नासिका (ख) द्विधा (ग) मुखम् (घ) ज्ञानाञ्जनशलाकया (ङ) निरुक्तम् (च) भ्राणाभ्यां

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द में दिया गया है जो पाठ के अनुसार है।

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Q2.अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत- (क) वर्णविदः किं प्राहुः? (ख) कौ वर्णौ पराश्रितौ? (ग) वर्णानाम् कति स्थानानि? तानि च कानि इत्यपि स्पष्टं लिखत। (घ) कौदृशाः पाठकाः अधमाः मताः? (ङ) पाठकानां गुणाः के मताः? (च) किं प्रोक्तवते पाणिनये नमः?

उत्तर:

उत्तर- (क) वर्णविदः वेदवर्णानां ज्ञानवान् भवति। (ख) वर्णौ कण्ठोष्टजौ पराश्रितौ सन्ति। (ग) वर्णानाम् अष्ट स्थानानि सन्ति। तानि - कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्ताः, ओष्ठौ, जिह्वामूलम्, नासिका, ललाटम्। (घ) अधमाः पाठकाः अनर्थज्ञाः सन्ति। (ङ) पाठकानां गुणाः सुस्वरः, माधुर्यम्, लयसमर्थम्, पदच्छेदः च सन्ति। (च) पाणिनये नमः कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ के अनुसार पूर्ण वाक्य में दिया गया है। वर्णों के स्थानों की संख्या और नाम स्पष्ट किए गए हैं।

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Q3.अधोलिखितकथनेषु रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) चत्वाश्च यमाः स्मृताः। (ख) मनः कायागिनमाहन्ति सः मारुतं प्रेरयति। (ग) सोदीणौ मूर्ध्यभिहतो मारुतः वक्त्रमापद्य वर्णान् जनयते। (घ) ओ औ कण्ठोष्ठजौ स्मृतौ। (ङ) पाणिनिना अज्ञानजं तमः विमलैः शब्दवारिभिः भिन्नम्। (च) साङ्गं वेदमधीत्य ब्रह्मलोके महीयते।

उत्तर:

उत्तर- (क) चत्वारः यमाः किमर्थं स्मृताः? (ख) मनः कायागिनं कथं आहन्ति? (ग) सोदीणौ मूर्ध्यभिहतो मारुतः वक्त्रम् कथं आपद्यते? (घ) ओ औ कण्ठोष्ठजौ कथं स्मृतौ? (ङ) पाणिनिना अज्ञानजं तमः कथं विमलैः शब्दवारिभिः भिन्नम्? (च) साङ्गं वेदमधीत्य ब्रह्मलोके कथं महीयते?

व्याख्या:

प्रत्येक रेखांकित पद के आधार पर प्रश्न बनाए गए हैं जो पाठ के अर्थ को समझने में सहायक हैं।

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Q4.श्लोकान्वयं समुचितपदैः पूर्यत- (क) त्रिपष्टिश्चतु: पष्टिवां वर्णाः शम्भुमते मताः। प्राकृते संस्कृते चापि स्वयं प्रोक्ताः स्वयंभुवः।। (ख) येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्। कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः।।

उत्तर:

उत्तर- (क) त्रिपष्टिश्चतु: पष्टिवां वर्णाः शम्भुमते मताः प्राकृते च संस्कृते च स्वयंभुवः प्रोक्ताः। (ख) येन महेश्वरात् अक्षरसमाम्नायमधिगम्य कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः।

व्याख्या:

श्लोकान्वय में समुचित पदों का प्रयोग कर अर्थ स्पष्ट किया गया है।

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Q5.अधोलिखितश्लोकयोः भावं समुचितपदैः पूर्यत- कथितम्, अस्त्रस्वरूपाः, दंभ्रुभ्याम्, विचाराभिव्यक्तये अतिध्यानेन, परमावश्यकम् (क) व्याघ्री यथा हरेत्पुत्रान्द्रष्ट्राभ्यां न तु पीडयेत्। भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्।। (ख) अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः।।

उत्तर:

उत्तर- (क) यदि व्याघ्री पुत्रान् द्रष्टृभ्यां न पीडयेत् तथा भीता पतनभेदाभ्यां तद्वत् वर्णान् प्रयोजयेत्। (ख) अज्ञानान्धस्य लोकस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै पाणिनये नमः।

व्याख्या:

श्लोकों के भाव को समझकर समुचित पदों का प्रयोग कर पूर्ण वाक्य बनाए गए हैं।

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Q6.यथायोग्यं योजयत- (क) स्वरा विंशतिरेकश्च कालतो नियमा अचि। (ख) आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् हस्तौ कल्पोऽथ पद्यते। (ग) हस्वो दीर्घः प्लुत इति उरः कण्ठः शिरस्तथा। (घ) छन्दः पादौ तु वेदस्य मनो युङ्कते विवक्षया। (ङ) यादयश्च स्मृता ह्यष्टौ स्पष्टानां पञ्चविंशतिः। (च) अष्टौ स्थानानि वर्णानाम् चत्वारश्च यमाः स्मृताः।

उत्तर:

उत्तर- (क) स्वरा विंशतिरेकश्च कालतो नियमा अचि। (ख) आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् हस्तौ कल्पोऽथ पद्यते। (ग) हस्वो दीर्घः प्लुत इति उरः कण्ठः शिरस्तथा। (घ) छन्दः पादौ तु वेदस्य मनो युङ्कते विवक्षया। (ङ) यादयश्च स्मृता ह्यष्टौ स्पष्टानां पञ्चविंशतिः। (च) अष्टौ स्थानानि वर्णानाम् चत्वारश्च यमाः स्मृताः।

व्याख्या:

प्रत्येक पंक्ति को यथायोग्य रूप से योजित किया गया है।

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Q7.मञ्जूषातः पदानि चित्वा समुचिते स्तम्भद्र्ये लिखत- शिरःकम्पी, लयसमर्थम्, अल्पकण्ठः, गीती, माधुर्यम्, सुस्वरः, अनर्थज्ञः, पदच्छेदः | पाठकाधमाः | पाठकगुणाः | | --- | --- | | ... | ... | | ... | ... | | ... | ... | | ... | ... |

उत्तर:

उत्तर- पाठकाधमाः: अनर्थज्ञः, पदच्छेदः, शिरःकम्पी, अल्पकण्ठः पाठकगुणाः: सुस्वरः, माधुर्यम्, लयसमर्थम्, गीती

व्याख्या:

दिए गए पदों को उनके अर्थानुसार पाठकाधमाः और पाठकगुणाः स्तम्भों में वर्गीकृत किया गया है।

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Q8.उदाहरणानुसारं प्रदत्तपदेभ्यः उपसर्गं चित्वा उपसर्गसहायतया नवीनपदं रचयत- | उदाहरणम्- प्रोक्ताः | उपसर्गः प्र | नवीनपदम् प्रारम्भः | | --- | --- | --- | | (क) अनुस्वारः | ... | ... | | (ख) विसर्गः | ... | ... | | (ग) दुःस्पृष्टः | ... | ... | | (घ) संयुतम् | ... | ... | | (ङ) सुस्वरः | ... | ... | | (च) अधिगम्य | ... | ... |

उत्तर:

उत्तर- (क) उपसर्गः प्र + अनुस्वारः = प्रानुस्वारः (ख) उपसर्गः प्र + विसर्गः = प्रविसर्गः (ग) उपसर्गः दु + दुःस्पृष्टः = दुष्पृष्टः (घ) उपसर्गः सम् + संयुतम् = संयुतम् (ङ) उपसर्गः सु + सुस्वरः = सुस्वरः (च) उपसर्गः अधि + अधिगम्य = अधिगम्य

व्याख्या:

प्रत्येक प्रदत्त पद में उपसर्ग जोड़कर नया पद रचना।

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